Sunday, April 10, 2016

रामचरितमानस के पहले 360 दोहों का पाठ


चैत्र के महीने में जब सम्वत शुरू होता है, तब नौ दिनों तक नवरात्रि का पर्व भी मनाया जाता है, जिसका समापन रामनवमी से होता है। कहा जाता है कि उस दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इसी कारण यह प्रथा भी है कि रामचरितमानस को नौ भागों में बाँटकर, नौ दिन तक पढ़ा जाता है।  इस वर्ष नवरात्रि आठ दिन की है, इसलिए आठ दिन में नौ भाग ख़त्म किए जाएँगे। मैंने आज दूसरे दिन तीसरा भाग समाप्त कर लिया है। 

रामचरितमानस में सात काण्ड हैं। कुल 1074 दोहे। नौ हिस्सों में बाँटने पर तीन हिस्सों में मैंने 360 दोहे पढ़ें। उनमें से कुछ का मैं यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ - जिन्होंने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया:

 
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संत परिभाषा इससे उम्दा हो ही नहीं सकती:

* बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥3 (क)॥
भावार्थ:-मैं संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अंजलि में रखे हुए सुंदर फूल (जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिसने उनको रखा उन) दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं (वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं।)॥3 (क)॥ 

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और सिमरन के पक्ष में इससे अच्चा और कोई तर्क ही नहीं:

* राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख॥21॥
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110वें दोहे में पार्वती जी शंकर भगवान से रामकथा सुनाने का अनुरोध करती है, तब श्री महादेवजी के हृदय में सारे रामचरित्र आ गए। प्रेम के मारे उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में जल भर आया। श्री रघुनाथजी का रूप उनके हृदय में आ गया, जिससे स्वयं परमानन्दस्वरूप शिवजी ने भी अपार सुख पाया| शिवजी दो घड़ी तक ध्यान के रस (आनंद) में डूबे रहे, फिर उन्होंने मन को बाहर खींचा और तब वे प्रसन्न होकर श्री रघुनाथजी का चरित्र वर्णन करने लगे॥ 

और तुलसीदास जी ने शंकर भगवान के मुख से रामचरितमानस की यह सुप्रसिद्ध चौपाई कहलवाई -

मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥112.2॥
भावार्थ:-मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले (बालरूप) श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥2॥ 

यह जानकर तो मेरे रोमांच की कोई सीमा ही नहीं रही कि न सिर्फ़ हम बल्कि भगवान शंकर भी यह चाहते हैं कि श्रीरामजी भक्तों पर कृपा करें| गोस्वामी तुलसीदास जी के कवित्व और साहस का कोई सानी नहीं|
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और 140.3 में यह भी भगवान शंकर ही कह रहे हैं पार्वति जी से कि:
* हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
भावार्थ:-श्री हरि अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। 
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द्वादशाक्षर मंत्र क्या है, यहाँ देखें:

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥143॥
भावार्थ:-और द्वादशाक्षर मन्त्र (ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) का प्रेम सहित जप करते थे। भगवान वासुदेव के चरणकमलों में उन राजा-रानी का मन बहुत ही लग गया॥143॥ 
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241.2 में राम-लक्ष्मण सीता स्वयंवर की सभा में उपस्थित हैं और उन्हें देखकर सब क्या सोच रहे हैं, इसे व्यक्त करने के लिए गोस्वामीजी ने यह लिखा:

जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥2॥
भावार्थ:-जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥2॥ 
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259.3 में सीताजी के मन में यह विश्वास जगाया कि:

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥3॥
भावार्थ:-तो सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान मुझे रघुश्रेष्ठ श्री रामचन्द्रजी की दासी अवश्य बनाएँगे। जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥3॥ 

सद्भाव सहित
राहुल

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