Saturday, April 23, 2016

रामचरितमानस का नौवाँ भाग

शुक्रवार 15 अप्रैल के दिन नौवें भाग में उत्तरकाण्ड के शेष दोहे पढ़े। कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

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12 में आश्चर्य हुआ जानकर कि न सिर्फ़ देवता, बल्कि वेद भी आए श्रीराम की स्तुति करने। वेदों का मानवीकरण अनूठा लगा। 

करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम॥12 ख॥
भावार्थ:-सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए। तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥12 (ख)॥
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22 में भी अद्भुत शब्दों का खेल है। दण्ड के दो अर्थ हैं। दोनों के भेद का क्या फ़ायदा उठाया है गोस्वामीजी ने। 
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥22॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचने वालों के नृत्य समाज में है और 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही सुनाई पड़ता है (अर्थात् राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिए साम, दान, दण्ड और भेद- ये चार उपाय किए जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिए दण्ड किसी को नहीं होता, दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। भेद, शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।)॥22॥
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कहा जाता है कि गोस्वामीजी ने लव-कुश का वर्णन नहीं किया है। लेकिन 25.2 में है। यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई कि सब भाईयों के दो-दो पुत्र हुए। 
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥3॥
भावार्थ:-सीताजी के लव और कुश ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणों ने वर्णन किया है॥3॥
* दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥4॥
भावार्थ:-वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणों के धाम हैं और अत्यंत सुंदर हैं, मानो श्री हरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो बड़े ही सुंदर, गुणवान् और सुशील थे॥4॥
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33.4 में अत्यंत अद्भुत दृश्य है। सनकादि मुनि श्रीराम को देखकर हर्षित हैं, और श्रीराम उन्हें देखकर। सबसे बड़ी बात श्रीरामजी का कहना कि उनके दर्शन से ही सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। 
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥4॥ 
भावार्थ:-हे मुनीश्वरो! सुनिए, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनों ही से (सारे) पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है, जिससे बिन ही परिश्रम जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है॥4॥
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46.1 में श्रीराम भरत से कहते हैं कि भक्ति मार्ग बहुत आसान है और क्या है। 
* कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥1॥
भावार्थ:-कहो तो, भक्ति मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की! (यहाँ इतना ही आवश्यक है कि) सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे॥1॥
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52.3 में पुष्टि होती है कि भगवान शंकर जो पार्वतीजी को रामकथा सुना रहे हैं वो कौन सी है। वे उसका श्रेय काकभुशुण्डिजी को देते हैं। बड़प्पन हो तो ऐसा। 
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥3॥ 
भावार्थ:-यह पवित्र कथा भगवान् के परम पद को देने वाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को सुनाई थी॥3॥
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57 में पता चलता है कि भगवान शंकर ने हंस का रूप धारण करके काकभुशुण्डिजी से रामकथा सुनी थी। और यह तब की बात है जब पार्वतीजी पूर्व जन्म में दक्ष की पुत्री थीं एवं अपने प्राण त्याग चुकी थीं। 
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥57॥
भावार्थ:-तब मैंने हंस का शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्री रघुनाथजी के गुणों को आदर सहित सुनकर फिर कैलास को लौट आया॥57॥
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शंकरजी पार्वतीजी को बताते हैं कि कैसे गरूड़जी ने कथा सुनी। इस प्रसंग से यह निश्चित हो जाता है कि रामजी की लीला ऐसी न्यारी है कि हर किसी को किसी न किसी प्रसंग पर संदेह हो ही जाता है। यह सब रामजी की ही माया (59.2 प्रबल राम कै माया) के कारण है।  60.3 में ब्रह्माजी स्वयं स्वीकारते हैं कि वे भी माया के चक्कर में आजाते हैं। गोस्वामीजी की विलक्षण प्रतिभा को नमन कि वे सारे देवी-देवताओं के संवाद सहज भाव से लिखते चले जाते हैं। अत्यंत अद्भुत।  
* अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥3॥
भावार्थ:-यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य (की बात) नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुंदर वाणी बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेवजी जानते हैं॥3॥
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75.1 और 75.2 में काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि श्रीराम का जन्म कई बार हुआ है और होता रहता है। यह अपनी समझ से परे हैं। शायद समानांतर ब्रह्माण्ड की ओर संकेत है। 
* राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥
जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥1॥ 
भावार्थ:-हे हे गरुड़जी! श्री रामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिए। जब-जब श्री रामचंद्रजी मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिए बहुत सी लीलाएँ करते हैं॥1॥
* तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥
जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥2॥
भावार्थ:-तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाल लीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्म महोत्सव देखता हूँ और (भगवान् की शिशु लीला में) लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ॥2॥
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80.3 में काकभुशुण्डिजी करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी देखते हैं। अद्भुत रोमांच की स्थिति है। 
* उदर माझ सुनु अंडज राया। देखउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥2॥
भावार्थ:-हे पक्षीराज! सुनिए, मैंने उनके पेट में बहुत से ब्रह्माण्डों के समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक से एक की बढ़कर थी॥2॥
* कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥
अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥3॥
भावार्थ:-करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चंद्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,॥3॥
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96 में जानकर प्रसन्नता भी हुई और दुख भी कि कलयुग आ भी चुका और जा भी चुका। एक नहीं, कई बार। 
* पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥96 ख॥
भावार्थ:-हे प्रभो! पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपारायण और वेद के विरोधी थे। 
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106.5 में पुन: अनुपम कवि कल्पना का उदाहरण मिलता है। 
* जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥5॥ 
भावार्थ:-नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसी का नाश करता है। हे भाई! सुनिए, आग से उत्पन्न हुआ धुआँ मेघ की पदवी पाकर उसी अग्नि को बुझा देता है॥5॥
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अंत के दस दोहों में कई ज्ञान की बातें हैं, कलियुग के लक्षण हैं, और गरूड़जी के प्रश्नों के उत्तर हैं। यहाँ यह भी समझ आता है कि याज्ञवल्क्य जी बता रहे हैं कि भगवान शंकर बता रहे हैं कि काकभुशुण्डिजी क्या कह रहे हैं। यानि मूल कथावाचक काकभुशुण्डिजी हैं। जिसे भगवान शंकर ने पार्वतीजी के अनुरोध पर दोहराया। और उसी वृत्तांत को याज्ञवल्क्य जी कह रहे हैं। उसे सर्वप्रथम वाल्मीकिजी ने संस्कृत में लिखा। और वही गोस्वामीजी ने अवधि में लिखा। 
सद्भाव सहित,
राहुल

Saturday, April 16, 2016

रामचरितमानस का आठवाँ भाग

गुरूवार 14 अप्रैल के दिन आठवें भाग में लंकाकाण्ड समाप्त हुआ और उत्तरकाण्ड के 10 दोहे पढ़े। कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

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32.1 में दो बातें हैं। दोनों ही आज प्रासंगिक हैं। निंदा करना आजकल आम बात है। और जिस देश में मैं रह रहा हूँ वहाँ बिना गो वध के लोगों का खाना नहीं पचता है। जबकि आजसे 440 वर्ष पूर्व ये दोनों पाप की श्रेणी में आते  थे। कवि प्रदीप के शब्दों में - देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान। 

 जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥1॥

भावार्थ:-जब रावण ने श्री रामजी की निंदा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यंत क्रोधित हुए, क्योंकि (शास्त्र ऐसा कहते हैं कि) जो अपने कानों से भगवान् विष्णु और शिव की निंदा सुनता है, उसे गो वध के समान पाप होता है॥1॥
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अरण्यकाण्ड में जिस रेखा का उल्लेख नहीं मिलता,  उसकी ओर मंदोदरी इंगित करती हैं लंकाकाण्ड के 36.1 में रावण को सम्बोधित करते हुए। 
समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥
रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥1॥
भावार्थ:- हे कान्त! मन में समझकर (विचारकर) कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है॥1॥
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कहा जाता है कि भगवान राम नर रूप में लीला करके संसार का उद्धार करने आए थे। लेकिन फिर भी कई प्रसंग ऐसे हैं जहाँ कोई-कोई पात्र उनके ईश्वर होने का रहस्य जान जाता है। अजब विडम्बना है कि किष्किन्धाकाण्ड में रावण, सुंदरकाण्ड में विभीषण, और यहाँ मंदोदरी राम को ईश्वर मान लेते है, लेकिन दशरथ, कैकेयी, और भरत का विश्वास उतना अडिग नहीं है, तभी तो दशरथ राम के वनवास से अतिशय आहत होते हैं, कैकेयी उन्हें वनवास भेज देती हैं, और भरत उन्हें वापस आने को कहते हैं। 
* अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥4॥

भावार्थ:- अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिए (डींग न हाँकिए) मेरे कहने पर हृदय में कुछ विचार कीजिए। हे पति! आप श्री रघुपति को (निरा) राजा मत समझिए, बल्कि अग-जगनाथ (चराचर के स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिए॥4॥
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45.2 में श्रीराम के करूण हृदय का एक और उदाहरण मिलता है। 
* खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी॥
उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥2॥
भावार्थ:- ब्राह्मणों का मांस खाने वाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं, जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं, (परन्तु सहज में नहीं पाते)। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रामजी बड़े ही कोमल हृदय और करुणा की खान हैं। (वे सोचते हैं कि) राक्षस मुझे वैरभाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं॥2॥
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62.8 में श्रीराम अपने उत्तरदायित्व के प्रति कितने कटिबद्ध हैं, यह लक्ष्मण मूर्छा प्रसंग से पता चलता है। 
* सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥8॥
भावार्थ:- सब प्रकार से सुख देने वाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने (माता/पिता ने) तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं?॥8॥
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और इसी प्रसंग में (62.9 में) गोस्वामीजी के कवित्व का एक और अनूठा उदाहरण:  बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन
* बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥
भावार्थ:-सोच से छुड़ाने वाले श्री रामजी बहुत प्रकार से सोच कर रहे हैं। उनके कमल की पंखुड़ी के समान नेत्रों से (विषाद के आँसुओं का) जल बह रहा है। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखंड (वियोगरहित) हैं। भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान् ने (लीला करके) मनुष्य की दशा दिखलाई है॥9॥
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89.1 में आश्चर्य हुआ जानकर कि श्रीराम ने रथ पर सवार होकर रावण से युद्ध किया। सारी तस्वीरें उन्हें पैदल ही दिखाती हैं। मैंने रामानंद सागर की टीवी श्रंखला देखी नहीं है। 
* देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥
सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥1॥
भावार्थ:- देवताओं ने प्रभु को पैदल (बिना सवारी के युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ। (फिर क्या था) इंद्र ने तुरंत अपना रथ भेज दिया। (उसका सारथी) मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया॥1॥
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90 के छंद में बहुत अनूठा वर्णन है पुरूष प्रवृति का, गुलाब, आम और कटहल से तुलना करके। ऐसी तुलना कहीं नहीं देखी-सुनी। एकदम नई, जबकि है 442 वर्ष पुरानी। 
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।
संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ 
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
भावार्थ:-व्यर्थ बकवाद करके अपने सुंदर यश का नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं- पाटल (गुलाब), आम और कटहल के समान। एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार (पुरुषों में) एक कहते हैं (करते नहीं), दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणी से कहते नहीं॥
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और फिर दोहे में रावण से श्रीराम के लिए दुर्वचन कहलवाने का साहस करते हैं, जबकि श्रीराम उनके परम ईष्ट हैं। 
* राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥90॥
भावार्थ:-श्री रामजी के वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला-) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं॥90॥
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97 दोहे में एक और अनुपम उपमा है - जिमि तीरथ कर पाप
दोहा :
* तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥97॥
भावार्थ:-तब श्री रघुनाथजी ने रावण के सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले। पर वे फिर बहुत बढ़ गए, जैसे तीर्थ में किए हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं)!॥97॥
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111 में यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि ब्रह्माजी भी श्रीराम के चरणकमलों में प्रेम चाहते हैं। और श्रीराम की स्तुति करते हैं। 
* खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा।।
नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं।।11।। 
भावार्थ:-आप दुष्टों का खंडन करने वाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्री शिव-पार्वती द्वारा सेवित हैं। हे राजाओं के महाराज! मुझे यह वरदान दीजिए कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा कल्याणदायक (अनन्य) प्रेम हो।।11।।

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114 की इन तीन चौपाइयों में बहुत ही मर्म की बात है। 

सुधा बरषि कपि भालु जियाए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए।।
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।।3।।
भावार्थ:-इंद्र ने अमृत बरसाकर वानर-भालुओं को जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभु के पास आए। अमृत की वर्षा दोनों ही दलों पर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।।3।।
* रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूट भव बंधन।।
सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा।।4।।
भावार्थ:-क्योंकि राक्षस के मन तो मरते समय रामाकार हो गए थे। अत: वे मुक्त हो गए, उनके भवबंधन छूट गए। किंतु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान् की लीला के परिकर) थे। इसलिए वे सब श्रीरघुनाथजी की इच्छा से जीवित हो गए।।4।।
* राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।
खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न।।5।।
भावार्थ:-श्रीरामचंद्रजी के समान दीनों का हित करने वाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसों को मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापों के घर और कामी रावण ने भी वह गति पाई जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते।।5।।
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युद्ध में श्रीराम के विजयी होते ही ब्रह्मा, इंद्र और शिव श्रीराम की स्तुति करते हैं, (क्रमश: 111, 113 और 115 में)। श्रीराम का इतना आदर सम्मान पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है। शिव कहते हैं
* मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन।।1।।
भावार्थ:-हे रघुकुल के स्वामी! सुंदर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुंदर बाण धारण किए हुए आप मेरी रक्षा कीजिए। आप महामोहरूपी मेघसमूह के (उड़ाने के) लिए प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वन के (भस्म करने के) लिए अग्नि हैं और देवताओं को आनंद देने वाले हैं।।1।।

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117 में यह पुष्टि हो जाती है कि भगवान प्रेम के भूखे हैं। 

जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥117 ख॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! अनेकों प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी श्री रामचंद्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं॥117 (ख)॥
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सद्भाव सहित,
राहुल

Thursday, April 14, 2016

रामचरितमानस का सातवाँ भाग

आज सातवें भाग में अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकांड, और सुंदरकाण्ड समाप्त हुए। लंकाकाण्ड के 16 दोहे पढ़े। कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

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31.1 में गीधराज जटायु श्रीराम को बता देते हैं कि सीताजी 
का अपहरण रावण ने किया है। इतनी जल्दी उन्हें पता चल फिरभी वे सीताजी की खोज करते ही रहते हैं, यह समझ नहीं आया। 

* तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥1॥

भावार्थ:- तब धीरज धरकर गीध ने यह वचन कहा- हे भव (जन्म-मृत्यु) के भय का नाश करने वाले श्री रामजी! सुनिए। हे नाथ! रावण ने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्ट ने जानकीजी को हर लिया है॥1॥
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34 में शबरी प्रसंग में झूठे बेर का कोई उल्लेख नहीं है। 
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥34॥

भावार्थ:- उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया॥34॥
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36.6 में श्रीराम शबरी से सीताजी के बारे में पूछते हैं और वे बता भी देती हैं। आश्चर्य है कि उन्हें यह सब कैसे मालूम?
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥

भावार्थ:- (शबरी ने कहा-) हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवर को जाइए। वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!॥6॥
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44 में इतनी बड़ी विडम्बना है कि विश्वास ही नहीं होता। श्रीराम सीताजी के वियोग में हैं। नारदजी समझ जाते हैं कि यह उनके श्राप का परिणाम है। वे आकर पूछते है कि आपने मेरा विवाह क्यों नहीं होने दिया। उत्तर :
* अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥44॥

भावार्थ:- युवती स्त्री अवगुणों की मूल, पीड़ा देने वाली और सब दुःखों की खान है, इसलिए हे मुनि! मैंने जी में ऐसा जानकर तुमको विवाह करने से रोका था॥44॥
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किष्किंधाकाण्ड के आरम्भ में (2.1) हनुमानजी भेस बदल कर श्रीराम से मिलते हैं चूँकि सुग्रीव सावधान करते हैं कि कहीं शत्रु तो नहीं है? और श्रीराम भी हनुमानजी को पहचान नहीं पाते हैं। वाह री लीला!
लगता है कि आत्मरक्षा में भेस बदलने में बुराई नहीं है। और ऐसा हनुमानजी दो बार और करते हैं - विभीषण से मिलते समय, और उत्तरकाण्ड में भरत से मिलते समय।  
जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥
नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥1॥

भावार्थ:-(श्री रामचंद्रजी ने कहा-) हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी॥1॥
* इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥2॥

भावार्थ:-यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए ॥2॥
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किष्किंधाकांड के 7वें दोहे में मित्र और कुमित्र के कई लक्षण बताए गए हैं। मुझे याद है कि यह हिस्सा मेरी 10वीं की पाठ्यपुस्तक में था। और मैं इतना प्रभावित हुआ था कि सारी की सारी पंक्तियाँ भावार्थ सहित ममेरे भाई को लिखे एक पत्र में उद्धृत भी की थीं। यहाँ बस एक चौपाई प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
चौपाई : 
* जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥

भावार्थ:-जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥
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किष्किंधाकाण्ड के 24 वें दोहे में ही लगा कि हनुमानजी को सीताजी मिल गई। लेकिन ये स्वयंप्रभा थीं।  वाह! क्या रोमांचक स्थिति थी मेरी। यह जानते हुए भी कि सुंदरकाण्ड में मिलेंगी, मन बावला हो चला था। 
* दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज।
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥24॥

भावार्थ:-अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपवन (बगीचा) और तालाब देखा, जिसमें बहुत से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुंदर मंदिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है॥24॥

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सुंदरकाण्ड के 57वें दोहे में यह बात अजीब लगी कि बिना भय के प्रीति नहीं होती। 
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥57॥
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59.3 में बहुचर्चित एवं विवादित पंक्तियाँ हैं। मेरा मत यह है कि जैसे किसी फ़िल्म में किसी खलनायक को कुछ अनाप-शनाप बोलते हम सुनते हैं तो संवाद लेखक की सोच की निंदा नहीं करते। हम समझते हैं कि वह संवाद उस पात्र के लिए उचित था। यहाँ भी हमें यही समझना चाहिए। समुद्र जो कि अनुरोध और विनय से नहीं माना और डराने पर माना, उस पात्र ने अपने बचाव में ये पंक्तियाँ कही हैं। इन्हें शाश्वत सत्य मानने पर हम बाध्य नहीं हैं। यह उस पात्र की सोच है। लेखक/कवि की नहीं। 
* प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥

भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥3॥
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सद्भाव सहित,
राहुल

Wednesday, April 13, 2016

रामचरितमानस का छठा भाग

आज छठें भाग में अयोध्याकाण्ड समाप्त हुआ और अरण्यकाण्ड के 29 दोहे पढ़े। कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

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237.1 में केवट? आश्चर्य हुआ। क्या ये वही है जो केवट प्रसंग में थे? जी हाँ। 


* तब केवट ऊँचे चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥1॥

भावार्थ:-तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरजी से कहने लगा- हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष दिखाई देते हैं,॥1॥

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254 में मुनि वशिष्ठ कहते हैं वही बात जो गुरू नानक कहते हैं जपजी में -    हुकुम रजाई चलना नानक लिखिया नाल। तेरे ही हुकुम पे चलू, ऐसा हो जाये कुछ, तू जानता है कि सही क्या है, क्यूँकि तू कल भी था तेरे को कल का भी पता है, तू आज भी है तेरे को आज का भी पता है, तू कल भी होंगा, कि कल क्या चाहिए वो भी तुझे पता है, मुझे क्या मालूम कुछ? इसलिए तू जो करेंगा वो ही सही होंगा! 

ध्यान दें कि गुरू नानक का जन्म गोस्वामी तुलसीदास से 30 साल पहले हुआ था। 

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥254॥

भावार्थ:-अतएव श्री रामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सबका हित होगा। (इस तत्त्व और रहस्य को समझकर) अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो॥254॥

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274.3 में हमें पता चलता है कि श्रीराम क्यूँ इतने निराले हैं। मन प्रसन्न हो जाता है। मन होता है काश हम इनसे मिल सकें या मिल पाते। 
लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥
सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥3॥

भावार्थ:-श्री रामजी की लड़कपन से ही यह बान है कि वे प्रेम को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। श्री रघुनाथजी शील और संकोच के समुद्र हैं। वे सुंदर मुख के (या सबके अनुकूल रहने वाले), सुंदर नेत्र वाले (या सबको कृपा और प्रेम की दृष्टि से देखने वाले) और सरल स्वभाव हैं॥3॥

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23 में पता चलता है कि रावण भगवान श्रीराम के हाथों मरने में अपनी भलाई समझता है। 

* सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥1॥

भावार्थ:-(वह मन ही मन विचार करने लगा-) देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में कोई ऐसा नहीं, जो मेरे सेवक को भी पा सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान के सिवा और कौन मार सकता है?॥1॥
* सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥
तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥2॥

भावार्थ:-देवताओं को आनंद देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान ने ही यदि अवतार लिया है, तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभु के बाण (के आघात) से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा॥2॥
* होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥
जौं नररूप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥3॥

भावार्थ:-इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं, अतएव मन, वचन और कर्म से यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्य रूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूँगा॥3॥
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24 में पता चलता है कि सीताजी नहीं सीताजी के प्रतिबिम्ब का अपहरण हुआ था। 
चौपाई :
* सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥

भावार्थ:-हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो॥1॥

* जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥

भावार्थ:-श्री रामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्री सीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गईं। सीताजी ने अपनी ही छाया मूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी॥2॥
* लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥3॥

भावार्थ:-भगवान ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना। स्वार्थ परायण और नीच रावण वहाँ गया, जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया॥3॥
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सद्भाव सहित,
राहुल

Tuesday, April 12, 2016

Complete Shri Ramcharitamanas Playlist (Agyat Sanyasi)

Complete Shri Ramcharitamanas Playlist (Anup Jalota and Agyat Sanyasi)

श्रीरामचरितमानस - सम्पूर्ण पाठ - सतना के एक अज्ञात सन्यासी

श्रीरामचरितमानस को कई तरह से पढ़ा जा सकता है. कुछ लोग मिलजुलकर 24 घण्टे में पढ़ लेते हैं. तो कुछ अपने आप ही 9 दिन में. या फ़िर 30 दिन में.

यहाँ मैं वो 30 विडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनमें श्रीरामचरितमानस 30 भागों में बाँट कर गाई गई है.

गाने वाले हैं सतना के एक अज्ञात सन्यासी.

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श्रीरामचरितमानस - श्री अनूप जलोटा एवं सतना के एक अज्ञात सन्यासी

श्रीरामचरितमानस को कई तरह से पढ़ा जा सकता है. कुछ लोग मिलजुलकर 24 घण्टे में पढ़ लेते हैं. तो कुछ अपने आप ही 9 दिन में. या फ़िर 30 दिन में.

यहाँ मैं वो 30 विडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनमें श्रीरामचरितमानस 30 भागों में बाँट कर गाई गई है.

गाने वाले हैं श्री अनूप जलोटा एवं सतना के एक अज्ञात सन्यासी.
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