इत्ती सी थी - 11 वर्ष की - जब वह मुझे पहली बार जबलपुर में मिली थी। कितनी चपर-चपर बातें करती थी। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ी लड़की जैसी। करती ही रहती थी।
मेरी शादी में आई थी। उसके पिता बाऊजी के छात्र थे।
मैं अमेरिका आ गया। पलट कर कभी जबलपुर नहीं गया। उससे दोबारा मुलाक़ात नहीं हुई।
आज से दो साल पहले फ़ेसबुक ने उसे मेरा चेहरा दिखा दिया, मुझसे जोड़ दिया।
तब तक मेरा तलाक़ हो चुका था। क्या पता नियति को इसी का इंतज़ार था।
यदा-कदा फ़ोन कर देती थी। वह सेन फ्रांसिस्को में रहती है। मैं सिएटल में। टाइम ज़ोन एक ही है। लेकिन दूरी हज़ार मील की।
बातों-बातों में दोनों ने एक-दूसरे का पता पूछ लिया।
मैं इन दिनों मिशन पर हूँ। अमेरिका की पचास विधानसभाओं के साथ सेल्फी लेने की धुन सवार हुई है। अप्रैल के अंत में पूर्वी अमेरिका स्थित चार राज्यों के भ्रमण की योजना है।
शनिवार को रमनी जी की पोस्ट देखी कि वे पुणे रहने जा रही है। ये तो बहुत बड़ा धमाका था। उन्होंने मेरी किताब - उधेड़बुन - माँगी थी। मैंने पता माँगा और डाक से भेज दी। किताब मिलने पर उनसे फ़ोन पर बात हुई। कहने लगी, अप्रैल में जब भारत जाऊँगी तब पढ़ूँगी।
मुझे अजीब लगा। यहाँ पढ़ने में क्या दिक़्क़त है। फिर सोचा वे अक्सर वहाँ अपने अपने बेटे के पास जाती हैं और वहां पोते पोतियों के साथ तीन महीने गुजार कर फिर वापस आ जाती हैं। तो फुर्सत से पढ़ लेंगी।
पर अब तो वो रहने जा रही हैं। मतलब उनसे मुलाकात का भी मौका मिलने वाला नहीं है। मैं चाहता था कि उनसे एक दिन तो मिलूं। बस आज मिलूँगा, कल मिलूँगा करता रहता था। फिर सोचा अब तो मिलना ही है। 10 अप्रैल को जा रही थी। पंद्रह तक टैक्स भरना होता है। टैक्स भर लूं। फिर जाऊं तो सर पर कोई बोझ नहीं रहेगा और आनंद आएगा। फिर लगा कि नहीं यह सब करते-करते समय बीत जाएगा और उनके जाने का समय आ जाएगा। टैक्स को पीछे छोड़ा और आनन-फ़ानन निकल गया।
रास्ते में सुनील से और उसके परिवार से मुलाक़ात हुई। रात भी वहीं उनके घर ठहर गया। बच्चों को शायद अपना कमरा देना पड़ा। मैंने लाख कहा मैं फ़ैमिली रूम में सो जाऊंगा। लेकिन वे नहीं माने। खैर, अच्छा भोजन किया रात को, अच्छा नाश्ता किया सुबह। निकलने ही वाला था कि बातों-बातों में इतना समय निकल गया कि सुनील की पत्नी मीना ने उस दिन छुट्टी भी ले ली और बातें करती रहीं। बहुत अच्छा लगा। इतने आत्मीय तरीके से बैठ के बातें हुई। बच्चों ने भी रात को मेरी जीवन-गाथा सुनी। उनसे अंग्रेज़ी में बात हुई। क्योंकि उन्हें ज्यादा हिंदी नहीं आती है। सुनील को बहुत हैरानी हुई कि मैं इतनी अंग्रेजी बोल सकता हूँ।
चलते-चलते मीना ने मेरे साथ कुछ खाने को भी रख दिया। बहुत, बहुत, बहुत अच्छा लगा।
रमनी जी के यहां भी मैं अचानक ही पहुंचा। पहले से उन्हें कोई सूचना नहीं दी। उनके यहां गेटेड कम्युनिटी है, तो अंदर जाने के लिए उन्हें फोन करना ही पड़ा। उन्हें पता चल गया कि मैं आ गया हूं। उन्होंने भी तुरंत मेरे लिए भोजन का इंतजाम किया, और फिर उनके गेस्ट रूम में उस रात मैं सोया। सुबह उठकर उन्होंने बहुत अच्छा भोजन तैयार किया। बहुत अच्छी बातें हुई। उन्हें खुशी हुई कि मैं उनके जाने से पहले मिल सका।
रमनी जी और उनके पति मदन मोहन जी दोनों 80 की उम्र के आसपास हैं और आज भी मिल-जुलकर खाना बनाते हैं। रमनी जी सब्जियां काट देती हैं और उन्हें बताती जाती है कि अब यह रखो, अब यह डालो, अब वो डालो, अब घी डालो, टमाटर भूनो, आदि।
मदन मोहन जी ने कहा कि इतने सालों के अभ्यास के बाद मैं सब सीख चुका हूं, लेकिन आज भी करता वही हूं जो यह कहती है। अपने मन से कुछ नहीं करता।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका नाम मदन मोहन मालवीय जी के ऊपर रखा गया था। वे बनारस से हैं, बनारस में पैदा हुए, और बनारस में ही मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। संयोगवश मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी वहीं से हुई।
उन्होंने भी साथ में खाने के लिए कुछ दे दिया। बहुत खुशी हुई। अब मैं जल्दी से सिएटल आना चाहता था। टैक्स भी भरना था। अगले दिन काम पर भी जाना था, पर मन नहीं माना। मैंने सोचा चलो निधि से मिलते हुए चलते हैं। सेन फ्रांसिसको की ओर गाड़ी मोड़ दी।
निधि के यहां पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो गई। रात के पौने नौ बज गए थे और ये सब लोग रात को नौ बजे सो जाते हैं। सुबह पांच बजे से दिन शुरू हो जाता है। मेरी वजह से बहुत इनको असुविधा हुई होगी, लेकिन सब बहुत खुश थे कि मैं आ गया। अंततः निधि से, निधि के पति से, उनके दो बच्चों से मिलकर बहुत खुशी हुई।
रात को ही निधि ने मेरे लिए खाना भी बनाया, और फिर सुबह जब मैं निकल रहा था तब उसने फिर भोजन बनाया।
उसने बताया कि उसे खाना बनाना नहीं आता था। उसे खाना बनाना उसके पति ने ही सिखाया।साबुदाने की खिचड़ी बनाने के लिए साबुदाना दही में भिगोती है। यह मैंने पहली बार देखा और उसके बगीचे में कड़ी पत्ता बहुत उग रहा है।
रास्ते के लिए एक थर्मस में पैक करके खाना दिया। थर्मस इतना अच्छा जिसमें खाना बहुत देर तक गर्म रहता है, और उसने वो थर्मस दे भी दिया। यह भी नहीं सोचा कि वापस उसे मिलने वाला नहीं है। ऐसा बहुत कम होता है। आमतौर पर महिलाएं बहुत कुछ दे देंगी। लेकिन किचन का कोई सामान, कोई बर्तन, कोई टप्परवेयर, कोई थर्मस आदि नहीं देंगी। इसलिए, डिस्पोज़ेबल रखती हैं।
अब जब भी वो थर्मस देखता हूँ तो उस दिन की याद आ जाती है।
राहुल उपाध्याय । 22 अप्रैल 2026 । डेनवर के ऊपर उड़ते हुए, सिएटल से वाशिंगटन डीसी जाते हुए।
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