Friday, November 1, 2024

सिंघम अगैन

सिंघम अगैन रोहित शेट्टी की सुपरकॉप सीरीज़ की नवीनतम फिल्म है। इस बार वे एनिमल की सफलता से इतने प्रभावित हुए कि अपनी फिल्म में भी खून-ख़राबा बढ़-चढ़ कर दिखाया। रोहित की फ़िल्में मनमोहन देसाई की जैसी मज़े वाली होती थीं। अब वे भटक गए हैं। एक तो एनिमल की विभत्सता और दूसरी ओर रामायण से तुलना। दीवाली के मौक़े पर रामलीला के सन्दर्भ को जोड़ कर भक्तों को बटोरना चाहते हैं। लेकिन फ़ार्मूला जमा नहीं। कॉमेडी बहुत ही नगण्य है। बाजीराव के बेटे का किरदार ठीक से नहीं लिखा गया। कितनी बार मन हुआ कि फ़िल्म अब ख़त्म हो कि तब ख़त्म हो। और फ़िल्म ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही। 


सलमान खान के इंतज़ार ने फ़िल्म को झेलने के लिए मजबूर कर दिया। 


राहुल उपाध्याय । 1 नवम्बर 2024 । सिएटल 

भूल भूलैया 3 - समीक्षा

भूल भूलैया 3 बहुत ही मज़ेदार फ़िल्म है। एकदम पैसा वसूल। कहानी तो वही पुरानी है। लेकिन घटना क्रम एकदम नया है। ताज़गी लिए हुए। पूरी फ़िल्म में कहानी दर्शक को बांधे रहती है। कार्तिक आर्यन आजकल के शाहरुख़ खान हैं। वे हर प्रकार की एक्टिंग कर लेते हैं। और असर छोड़ते हैं। राजपाल यादव और संजय मिश्रा की अदाकारी भी लाजवाब है। माधुरी दीक्षित और विद्या बालन को नयी फिल्म में देखकर अच्छा लगा। वे लगी ही नहीं कि गुज़रे कल की अभिनेत्रियाँ हैं। तृप्ति और उनमें कोई ख़ास फ़र्क़ नज़र नहीं आया। 


अनीस बज़्मी का निर्देशन प्रशंसा के योग्य है। नये गाने बाधा बनते हैं। उन्हें हटा देना चाहिए था। पुराने गीत - मेरे ढोलना और हरे राम, हरे कृष्ण - बेहतरीन हैं। 


राहुल उपाध्याय । 1 नवम्बर 2024 । सिएटल 




Thursday, October 24, 2024

लुक डुरांट

कुछ नम्बर ऐसे होते हैं जिन्हें दो या दो से ज़्यादा बराबर भागों में विभाजित किया जा सकता है। 


जैसे कि चावल के चार दानों को दो बराबर भागों में बाँटा जा सकता है। 


छ: दानों को भी दो भागों में बराबर बाँटा जा सकता है। और तीन बराबर भागों में भी। 


लेकिन सात दानों को नहीं। बस देखते ही रहिए। कुछ कर नहीं पाएँगे। 


ऐसे नम्बर को प्राइम नम्बर कहते हैं। 


दो दानों को दो बराबर भागों में बाँटा जा सकता है किंतु दोनों भागों में मात्र एक ही दाना आ पाएगा इसलिए दो को प्राइम नम्बर नहीं मान सकते। क्योंकि हर भाग में एक से ज़्यादा दाने होने चाहिए।


इस तरह दो, तीन, पाँच, सात, ग्यारह आदि प्राइम नम्बर हैं। 


जिस तरह कि सम और विषम संख्या अनगिनत हैं, प्राइम नम्बर भी अनगिनत हैं। 


लेकिन हर प्राइम नम्बर अभी तक ज्ञात नहीं है। क्योंकि यदि आप कहें कि अमुक नम्बर विषम है तो मैं उससे बड़ा विषम नम्बर तुरंत बता सकता हूँ। क्योंकि किसी भी विषम नम्बर में दो जोड़ देने से उससे बड़ा विषम नम्बर मिल जाता है। ऐसा अन्य संख्याओं के साथ भी है। हर एक को इजाद करने का एक फ़ार्मूला है। प्राइम नम्बर का कोई फ़ार्मूला नहीं है। 


और इसीलिए दुनिया लगी हुई है बड़े से बड़ा प्राइम नम्बर ढूँढने में। 


कोई नम्बर प्राइम है या नहीं इसे तय करने की विधि बहुत आसान है। पर समय बहुत खर्च होता है यदि नम्बर बहुत बड़ा है तो। 


मान लीजिए कोई पूछे 101 प्राइम है या नहीं तो 101 का या इसके आसपास का स्क्वेयर रूट पता करें। 100 का स्क्वेयर रूट 10 है। तो जितने भी प्राइम नम्बर हैं दस से कम (2, 3, 5, 7) उन्हें देखना होगा कि क्या 101 को उतने भाग में विभाजित किया जा सकता है? 


आप पाएंगे कि यह सम्भव नहीं है। इसलिए 101 प्राइम नम्बर है। 


यदि नम्बर में चार करोड़ दस लाख चौबीस हज़ार तीन सौ बीस अंक हो तो उसे प्राइम नम्बर ठहराना आसान नहीं है। काग़ज़ और कलम से तो क़तई नहीं। पूरी ज़िंदगी गुज़र जाएगी। 


इसीलिए अब सुपर कम्प्यूटर इस काम के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। सुपर कम्प्यूटर कोई एक कम्प्यूटर नहीं है जो कि कहीं से ख़रीद लिया जाए। इसे खुद ही तैयार करना पड़ता है कम्प्यूट (संगणक) शक्तियाँ जोड़ कर। आजकल स्टोरेज और कम्प्यूट माइक्रोसॉफ़्ट या अमेज़ॉन जैसी संस्थाओं से ख़रीदे जा सकते हैं। पहले कम्प्यूट के लिए कैलिफ़ोर्निया की इंटेंल कम्पनी के चिप्स काम आते थे जिन्हें सीपीयू कहा जाता था। आजकल कैलिफ़ोर्निया में ही स्थित एनविडिया कम्पनी के चिप्स काम आते हैं जिन्हें जीपीयू कहा जाता है। ये जीपीयू सीपीयू से कई ज़्यादा शक्तिशाली हैं एवं इसलिए महँगे भी बहुत हैं। पर क्या करें, इनके बिना गुज़ारा भी नहीं है। इन जीपीयू का आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा निर्मित सुविधाओं के लिए किया जा रहा है। चैट जीपीटी इसी से सम्भव हुई। जो कि अनुवाद करने में निपुण है। अब अनुवादक की ज़रूरत उतनी ही कम हो गई है जितनी कि एक ट्रैवेल एजेंट की। 


एनविडिया इस वजह से इन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बन गई है स्टॉक के दाम के हिसाब से। सारे शेयर की क़ीमत तीन ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा है। ऐसी मात्र दो और कम्पनियाँ हैं - एपल और माइक्रोसॉफ़्ट। 


एपल और माइक्रोसॉफ़्ट धीरे-धीरे इस स्थान पर पहुँचीं हैं। एनविडिया ने पिछले पाँच साल में ही यह सफ़र तय कर लिया जबकि यह भी तीस साल पुरानी कम्पनी है। 


1988 में अलाबामा में जन्मे लुक डुरांट ने 22 वर्ष की उम्र में कैलटेक से स्नातक होने के बाद एनविडिया में इंजीनियर के पद पर नौकरी हासिल कर ली। वहाँ वे जीपीयू पर काम करते रहे। 33 वर्ष की उम्र में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और प्राइम नम्बर की खोजबीन में जुट गए। 


पिछले तीन वर्ष में उन्होंने इस खोज में दो मिलियन डॉलर खर्च कर दिए कम्प्यूट शक्ति ख़रीदने में। इतनी ज़्यादा शक्ति कोई भी संस्था एक आम नागरिक को नहीं बेचती है। इसलिए इन्होंने नौ महीने पहले ही एक संस्था बनाई। उसके बाद खोज तीव्र गति से बड़ी। 


सारा काम कम्प्यूटर करता है। जब वह तय कर लेता है कि यह प्राइम नम्बर है तो वह एक सूचना भेजता है। जब लुक के फोन पर  यह सूचना आई वे सेन होज़े एयरपोर्ट पर सामान की जाँच वाली सिक्योरिटी की क़तार में खड़े थे। 


कम्प्यूटर तो बेजान है। उसने न ख़ुद को, न इन्हें बधाई दी। ये भी सोचते रह गए कि अब क्या? अब क्या। वे क़तार में बढ़ते रहे। बड़ा काम हुआ। पर इतना भी बड़ा नहीं कि नाचा-कूदा जाए। फिर दूसरे सिस्टम से भी इसकी पुष्टि होनी अभी बाक़ी थी। 


इस खोज के लिए उन्हें तीन हज़ार डॉलर की धनराशि मिली है। 


इस तरह के काम के लिए एक अलग ही धुन चाहिए। दो मिलियन डॉलर में बहुत कुछ किया जा सकता है। घर ख़रीदा जा सकता है। किराए पर चढ़ाया जा सकता है। और धन कमाया जा सकता है। दान दिया जा सकता है। बेसहारों को सहारा दिया जा सकता है। अस्पताल में एक वार्ड खोला जा सकता है। कुछ बिस्तर लगाए जा सकते हैं। 


या फिर ऐसा किया जाए जिसकी कोई उपयोगिता नहीं है, जिसे समझना सबके बस की बात नहीं, जिसके लिए कोई नोबेल पुरस्कार भी नहीं है। 


फिर भी कुछ तो है कि मैं उनके काम के बारे में लिख रहा हूँ। कुछ तो है कि मेरे बेटे ने मुझे इसकी जानकारी दी। कुछ तो है कि कुछ लोग इसके बारे में और जानने के उत्सुक है। कुछ तो है कि कुछ लोगों को एक नई जानकारी मिल रही है। 


राहुल उपाध्याय । 24 अक्टूबर 2024 । सिएटल 




मुंजा - समीक्षा

मुंजा फ़िल्म हॉलीवुड की फ़िल्मों से बुरी तरह से प्रभावित है। लॉर्ड् ऑफ़ द रिंग्स और हैरी पॉटर तो दो मुख्य पात्रों में साफ नज़र आते हैं। 


फ़िल्म का आरम्भ बहुत ही प्रभावशाली है। बाल कलाकार ने जान फूंक दी। बहुत ही ख़तरनाक नजारा बन गया। कैमरे ने भी सहयोग दिया। बाक़ी फ़िल्म एक सस्ती कॉमेडी है कुछ स्पेशियल अफेक्ट्स के साथ। 


सहयोगी कलाकार- सरदार मित्र और हीरो की चचेरी बहन- ने भी उम्दा अभिनय किया है। 


ऐसी फ़िल्मों में कब क्या हो जाए कह नहीं सकते। 


अंत में अभिषेक बनर्जी और वरूण धवन भी जोड़ दिए गए। 


कहा ना कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। 


राहुल उपाध्याय । 24 अक्टूबर 2024 । सिएटल 


Sunday, October 20, 2024

खेल खेल में- समीक्षा

'खेल खेल में' एक विदेशी फ़िल्म पर आधारित मुदस्सर अज़ीज़ द्वारा निर्देशित फ़िल्म है। 


फ़िल्म के संवाद, निर्देशन और अभिनय कमाल के हैं। कहानी बहुत ही नाटकीय है पर एक असर छोड़ जाती है। 


अक्षय कुमार की उम्र जो है वह दिखाई गई है। अक्षय का अभिनय भी संतुलित है। 


फ़िल्म में कोई भी दूध का धुला नहीं है। पर कोई खलनायक भी नहीं है। बहुत ही अच्छे विषय पर एक साफ़-सुथरी फ़िल्म है। 


राहुल उपाध्याय । 20 अक्टूबर 2024 । सिएटल 

Thursday, October 10, 2024

द सिग्नेचर- समीक्षा

'द सिग्नेचर' फ़िल्म सिर्फ़ दो वजह से देखी जा सकती है। एक तो यदि आप महिमा चौधरी के प्रशंसक हैं तो उसे देखकर ख़ुशी होगी। दूसरी वजह से है कि पता चल जाएगा कि अनुपम खेर पर केन्द्रित फ़िल्म कितनी बोझिल हो सकती है। 


पूरी फिल्म में कहानी पर नहीं अनुपम खेर के अभिनय पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है। और यह फिल्म वहीं कमजोर पड़ जाती है। 


अन्नु कपूर को बहुत ही सीधे-सादे रूप में दिखाया गया है। अनुपम खेर के रेसीडेंसी वाले सीन की कोई तुक समझ नहीं आई। 


अंत बहुत नाटकीय है और उससे कुछ हासिल नहीं होता। फ़िल्म कभी भी विश्वसनीय नहीं बन पाती है। 


रणवीर शौरी को व्यर्थ में ही लिया और उनकी क्षमता को व्यर्थ किया। 


बीच-बीच में गाने हैं और कविताएँ हैं। लेकिन वे बाधा ही बनते हैं। 


राहुल उपाध्याय । 10 अक्टूबर 2024 । सिएटल 

Saturday, October 5, 2024

सेक्स वर्कर

अम्स्टरडम की यात्रा में मैं एक सेक्स वर्कर से मिला। अम्स्टरडम की यह ख़ासियत है कि यहाँ सेक्स वर्कर को सही मायने में कर्मचारी माना जाता है। उनको काम करने की निश्चित साफ़-सुथरी जगह दी जाती है। काम करने के दिन और घंटे निश्चित किए जाते हैं। कम घंटे काम कर सकती हैं। ज़्यादा नहीं। कोई ओवरटाइम नहीं। दाम भी तय है। सौ यूरो बीस मिनट के। इसमें भी कोई फेरबदल नहीं कि दस मिनट के पचास वग़ैरह। 


स्वास्थ्य सेवा भी निःशुल्क दी जाती है। सुरक्षा भी। यदि कोई ग़लत कदम उठाए तो बटन दबाते ही सुरक्षा कर्मी हाज़िर। लेकिन कोई आसपास मंडराता नहीं रहता। 


बिना कंडोम सेक्स नहीं कर सकते। चुम्बन नहीं कर सकते। होंठ से होंठ नहीं मिला सकते। इन सबसे थूक द्वारा बीमारी फैलने का डर रहता है। 


एक निर्धारित क्षेत्र है जिसे रेड लाइट एरिया कहा जाता है। वहाँ कोई दो चार सड़के हैं जहाँ सड़क के दोनों ओर दस-बीस दरवाज़े हैं एक के बाद एक। हर दरवाज़े में या तो पर्दा लगा है या एक लड़की/महिला खड़ी है। इनकी उम्र इक्कीस से पचास तक होती है। जो खड़ी है उसने सिर्फ़ ब्रा और अंडरवियर पहन रखा है। आप उससे आँख से आँख मिलाएँगे तो वह इशारे से पूछेगी - क्या अंदर आना चाहते हो? दरवाज़ों पर इतना मोटा काँच है कि बाहर की आवाज़ अंदर और अंदर की आवाज़ बाहर नहीं आती। 


यदि आप हाँ में सिर हिलाते हैं तो वह दरवाज़ा खोलेगी, दाम माँगेंगीं और सौ यूरो मिलते ही पर्दा गिरा देगी, दरवाज़ा बंद कर देगी और आपको अंदर एक कमरे में आने को कहेगी। 


वहाँ एक बिस्तर है। एक बाथरूम है। एक वॉश बेसिन है। 


आपसे पूछेगी, क्या करना चाहोगे, कैसे करना चाहोगे। 


मैंने तो कहा सिर्फ़ बात करनी है। कहने लगी, सच्ची? मैंने कहा, मैं कभी किसी सेक्स वर्कर से नहीं मिला हूँ। रेड लाइट एरिया शायद हर शहर में होते होंगे। हाई स्कूल के ज़माने में कलकत्ता में सुना था कि कहीं तो है। कॉलेज के वक्त बनारस में कुछ लड़के तो हो भी आए थे। मैं कभी कहीं नहीं गया। पहली बार आया हूँ। बहुत कौतूहल है। हिन्दी फ़िल्मों में देखा है कि जो भी ऐसा काम करती हैं वे अपनी मर्ज़ी से नहीं करतीं। उन पर किसी आंटी का या जल्लाद का दबाव होता है। वे भागना चाहती हैं पर भाग नहीं सकतीं। 


उसने कहा मैं तो स्वेच्छा से करती हूँ। मैं यहाँ कॉलेज में पढ़ रही हूँ। मैं बल्गारिया की रहने वाली हूँ। स्कूल की फ़ीस, अपार्टमेंट का किराया, खाना-पीना सब इससे चलता है। मैंने वैट्रेस की नौकरी भी की। सेक्स में जितनी कमाई है उतनी किसी में नहीं। 


मेरे पड़ोस में जो है वो पिछले बीस साल से यही काम कर रही है। घर भी ख़रीद लिया है। उनके दोस्तों को सब को पता है कि वह सेक्स वर्कर है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। 


मैंने कहा एक दिन में तुम कितनी बार सेक्स कर पाती होगी। ज़्यादा कमाई तो हो नहीं पाती होगी। कहने लगी सात-आठ बार तो आराम से कर सकती हूँ। बीस दिन काम करूँ तो पन्द्रह हज़ार यूरो एक महीने में कमा सकती हूँ। पर इतने लोग आते नहीं हैं। शुक्र-शनि-रवि को ही इतने मिल पाते हैं। 


एक बार सेक्स होते ही हम लड़कियाँ बहुत जल्दी दूसरे ग्राहक के लिए तैयार हो जाती हैं। लड़कों में यह बात नहीं है। इसीलिए ये धंधा सिर्फ़ लड़कियाँ ही कर पाती हैं। 


मैंने कहा इस धंधे में कुछ तो बुरा भी होता होगा। जब सब अच्छा है, कमाई भी अच्छी है तो सब क्यों नहीं करतीं?


सही कह रहे हो। बुरा कुछ भी नहीं है। कई बार कुछ बदतमीज़ लोग नशा कर के आ जाते हैं और उलूल-जुलूल हरकत करने लग जाते हैं। सुरक्षाकर्मी बचा तो लेते हैं पर एकाध घंटे के लिए मूड ख़राब तो हो ही जाता है। कुछ कुछ ऐसा ही कॉलेज के लड़के भी करते हैं। दो लड़के एकसाथ करना चाहते हैं। कई बार मैं मान भी जाती हूँ। मुझे भी एडवेंचर पसन्द है। 


मैंने कहा, बीस मिनट में क्या-क्या होता है। तुम किस तो करने नहीं देती। तो फ़ोर-प्ले तो होता ही नहीं होगा। तुम्हें कुछ तो समय चाहिए चिकनाई लाने में। ताकि तुम्हें घर्षण से दर्द न हो। कैसे सहन कर लेती हो बिना चिकनाई के?


कहने लगी सबसे पहले हम लिंग पर कंडोम चढ़ाते हैं। फिर उसे मुँह में लेकर बड़ा करते हैं। इस प्रक्रिया से समय की बचत होती है और हममें चिकनाई भी पैदा हो जाती है। बस हम भी तैयार, वो भी तैयार। इस तरह से बीस मिनट भी खर्च नहीं होते और काम ख़त्म। सबसे ज़्यादा समय तो बंदे को कपड़े उतारने में और पहनने में लगता है। 


मैंने कहा, यह तो बहुत बेइंसाफ़ी है, तुम मज़े भी लेती हो और साथ में धनराशि भी। 


बोली, यह तो हमारी क़िस्मत है। कई बार इतना दुख होता है जब लोग बस दरवाज़े की तरफ़ देखते हैं और कोई रूचि नहीं दिखाते। लगता है कोई कमी है मुझमें। शायद पास वाली मुझसे ज़्यादा जवान है, ज़्यादा खूबसूरत है, ज़्यादा पतली है, ज़्यादा मुस्कराती है। उसके खड़े होने का अंदाज़ मादक होगा। उसकी हेयरस्टाइल अच्छी होगी। उसने पलकें अच्छी सजाई होगी। काजल अच्छा होगा। कब, किसको, क्या पसन्द आ जाए पता नहीं। 


और हमारे हाथ में कोई चयन नहीं। जो आ जाता है उसे स्वीकार कर लेते हैं। वरना इससे भी हाथ धोना पड़ेगा। 


यहाँ की सोसायटी में हर किसी की गर्लफ़्रेंड है। हर कोई अपने घर में खुश है। यहाँ कौन आएगा?


तुम आए अच्छा लगा, कमाई हुई, पर तुममें भी भूख नहीं। 


क्या हो गया है दुनिया को? एक अच्छी भली लड़की ग्राहक को तरस रही है। 


राहुल उपाध्याय । 5 अक्टूबर 2024 । होनेलुलु से सेन होज़े जाते हुए

Thursday, October 3, 2024

नियम

अत्याचार और ज़ुल्म की कोई जाति नहीं होती। कोई धर्म नहीं होता। कोई देश नहीं होता। यह सिर्फ मानवीय भावनाओं पर निर्भर करता है। कोई अत्याचार करना चाहता है और करता है। अनजाने में नहीं, जानबूझकर करता है। और कोई अत्याचार सहता है। सहता ही रहता है। सहने में अपनी भलाई समझता है। हवाई आठ द्वीपों का समूह जहां एक हज़ार वर्ष पहले तक कोई आबादी नहीं थी। बाद में आसपास के द्वीपों से लोग आकर बस गए। उन्हें लगा कि प्रशासन चलाने के लिए, राजा-प्रजा वाला सिस्टम स्थापित करना होगा। कुछ राजा बन गए। बाक़ी प्रजा। नियम बना दिए गए कि राजा से आँख नहीं मिलाई जा सकती, राजा की राह में नहीं आ सकते, आपकी परछाई राजा की परछाई को छू नहीं सकती। इन तीनों सूरतों में आपको मौत की सजा दी जाएगी। ऐसी ही परिस्थिति हमारे यहाँ सामन्तवाद में थी। और यह स्थिति आज भी हर कहीं है। दफ़्तर में, कॉलेज में, घर में। पिता से ज़बान लड़ाता है? जवाब देने लग गए हो? इस घर के नियम हर बहू मानती आई है, तुम्हें भी मानना ही होगा। कब साड़ी पहननी है, कब सूट, हम तय करेंगे। किस त्योहार पर किसकी पूजा कितनी बजे होगी, क्या बनेगा, कौन बनाएगा, हम तय करेंगे। जवाब नहीं दे सकते, सवाल नहीं पूछ सकते। ये कैसे परिवार हैं? डर पैदा कर इज़्ज़त कमाना? ख़ुशी है कि संयुक्त परिवार के विघटन से कम से कम नई पीढ़ी को यह आज़ादी तो मिली है कि वे पिता से आँख से आँख मिलाकर बात कर सकते हैं। ससुर के चंगुल से बच सकते हैं। राहुल उपाध्याय । 3 अक्टूबर 2024 । कवाई, हवाई

Wednesday, October 2, 2024

मुश्ताक़

सबकी कहानी एक सी है। सबकी कहानी अलग है। चाहे वो सिंगापुर की वाणी हो। या अमेरिका का मुश्ताक़। 


मुश्ताक़ महाराष्ट्र में पैदा होकर पाकिस्तान में पला-बढ़ा और सऊदी में डॉक्टर की हैसियत से रहने लगा। पत्नी भी डॉक्टर। समाज में खूब इज़्ज़त। पैसा भी बहुत कमाया। 1990 में 40 की उम्र में पाँच लाख डॉलर की बचत। पाकिस्तान में तीन लाख डॉलर की सम्पत्ति। सब ठीक चल रहा था। 


मुश्ताक़ आगा खानी इस्माइली है। पूरा मुसलमान नहीं। ठीक से पता भी नहीं कि इस्लाम क्या होता है। 


सऊदी में हफ़्ते में एक दिन इस्माइलों की जमात होती थी। जहां धर्म-कर्म आधा घंटा होता था। बाक़ी समय खाना-पीना, गपशप, नाच-गाना होता था। किसी ने शिकायत कर दी कि यहाँ नशीले पदार्थ बेचे जाते हैं। पुलिस आ धमकी। बहुत बेइज़्ज़ती हुई। 


बहन और बहनोई अमेरिका में आराम से बसर कर रहे थे। बहनोई रियल इस्टेट के धंधे में सफलता के झंडे गाड़ रहे थे। भानजे ने कहा अमेरिका आ जाओ। बच्चों का भविष्य बन जाएगा। 


इनके भाई भी अमेरिका में थे। वे परचूनी दुकान चला रहे थे। 


ये बोरिया-बिस्तर बांधकर अमेरिका चले आए। आए तो थे विज़िटर वीसा पर भाई से मिलने। वीसा के तहत छ: महीने के अंदर अमेरिका छोड़ देना चाहिए था। ये रूक गए। बारह-तेरह साल ग़ैर क़ानूनी रूप से रहे। बच्चे छोटे थे सो हाई स्कूल तक की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं थी। ऊपर से शिक्षा नि:शुल्क भी थी। बचत ज़्यादा दिन नहीं चल सकती। भाई ने मदद की। एक परचूनी दुकान खरीदवा दी। चार लाख डॉलर में। फिर भी थे तो अवैध ही। 


अमेरिका में हज़ारों लोग ऐसे ही रह जाते हैं। सरकार के पास इतना समय नहीं है कि हर अवैध को ढूँढती फिरे और उसे निष्कासित करे। इन्हीं अवैध व्यक्तियों के पीछे ट्रम्प आवाज़ उठा रहे हैं। 


ख़ैर बहनोई के पास ज़्यादा पैसा था। वे उन्हें वैध बनने में मदद करवा सकते थे। मदद की भी। पर उस प्रकिया में तीन साल लग गए। तीसरे साल में बहन और बहनोई के रिश्तों में खटास आ गई। बहनोई मुकर गए मदद करने से। काफ़ी कोशिश के बाद बहनोई राज़ी हुए कि नहीं तो बच्चों का भविष्य बिगड़ जाएगा और मुश्ताक़ के पास ग्रीन कार्ड आ गया, बच्चों को कॉलेज में दाख़िला मिल गया और आज सब खुशहाल हैं। 


जब तक ग्रीन कार्ड नहीं आया था दोनों पति-पत्नी झरझर आँसू रोते थे कि कहाँ फँस गए। डॉक्टर होते हुए अमेरिका में कभी डॉक्टरी नहीं की। 


दो बेटी, दो बेटे हैं। सबकी शादी हो गई। एक को छोड़कर। वह शादी को घाटे का सौदा मानता है। 


चारों बच्चे हर महीने पाँच सौ डॉलर अपने माता-पिता को देते हैं जबकि सरकार की तरफ़ से सोशियल सिक्योरिटी, एक तरह की पेंशन, मिल रही है। उन पैसों को ये एक एकाउंट में जमा कर देते हैं जो कि बच्चों के ही नाम पर है। 


पाकिस्तान में तीन फ़्लैट हैं। उनके किराए से साली का घर चलता है जो आजीवन अविवाहित रही और जिसने इनके बच्चों का ख़याल रखा जब ये शुरू में सऊदी में संघर्ष कर रहे थे। सास का भी ख़याल उसने रखा। अब सास नहीं रहीं। होती तो उनका ग्रीन कार्ड करवा, सिटीज़न बनवा, साली का ग्रीन कार्ड भी बनवा सकते थे। 


अमेरिका को या विदेश को कोई कितना ही बुरा-भला कह ले, अंततोगत्वा सबका मन विदेश जाने का, विदेश में बसने का हो ही जाता है। 


सबकी कहानी एक है। सबकी कहानी अलग है। 


राहुल उपाध्याय । 2 अक्टूबर 2024 । कोना, हवाई 






Tuesday, September 24, 2024

टूथपेस्ट

मैं इकसठ का हूँ पर इतना पुराना भी नहीं। एडिसन, आइन्स्टाइन, ग्राहम बेल, मारकोनी सब अपनी प्रतिभा के बल पर तब तक दुनिया बदल चुके थे। 


लेकिन कुछ क्षेत्र सारे विकास से वंचित रह ही जाते हैं। 


मेरा गाँव - शिवगढ़ - भी मेरे जन्म के कई वर्ष बाद तक वंचित रहा। नल मैंने पहली बार अपने ननिहाल - सैलाना - में देखा। यह कोई सरकारी नल नहीं था। दासाब - मेरे नाना - अपने ही घर में सन् 1936 से त्रिवेदी प्रायवेट स्कूल चलाते थे। घर में कुआँ था। बच्चे बिना पानी बर्बाद किए जल पी सके इसलिए एक टंकी रख रखी थी जिसमें नल की टोंटी भी थी। सुबह स्कूल में आते ही से कुछ बच्चों की ज़िम्मेदारी होती थी कुएँ से पानी खींच कर टंकी भरने की। 


शिवगढ़ में पानी पीने के लिए बावड़ी से लाया जाता था। मम्मी ही लाती थी। तीन पीतल के घड़े सर पर रखकर नंगे पाँव। मैं भी नंगे पाँव ही रहता था। 


नहाने के लिए हम खार जाते थे। खार यानी पानी की वह धारा जो बाँध से छोड़ी जाती थी। 


शिवगढ़ में बिजली नहीं थी। मम्मी को आटा दो पाटो की चक्की चलाकर पीसना पड़ता था। मक्की का आटा भी ऐसे ही पीसते थे। उस ज़माने में गेहूँ महँगा होता था। इसलिए अक्सर मक्के की रोटी ही बनती थी। 


टूथब्रश/टूथपेस्ट कुछ नहीं था। हथेली पर राख रख कर उँगली लगा-लगा कर दाँत साफ़ किया करते थे। राख से ही बर्तन साफ़ होते थे। राख से ही हाथ धोए जाते थे। राख चूल्हे से मिल जाती थी। 


नहाने के लिए होता था लाइफ़बॉय साबुन। कपड़े धोने के लिए नाम रहित पीली बट्टी। 


नमक पाऊडर जैसा नहीं डलियों में आता था। जैसे मिश्री की डली पर उससे दस गुना बड़ी। चीनी नहीं गुड़ खाया जाता था। चीनी को अशुद्ध माना जाता था। चाय को नशा कहा जाता था। रइसों के चोंचले। 


बिजली नहीं होने के वजह से घर में कोई उपकरण नहीं थे। चाबी  भरने से चलने वाली अलार्म घड़ी थी। उसमें चाबी भरने में मज़ा आता था। अलार्म का टाईम सेट कर उसकी टनननन आवाज़ सुनना अच्छा लगता था। मेरे लिए यह एक रोचक खिलौना था। 


शाम को रोशनी के लिए लालटेन जला ली जाती थी। बहुत कम समय के लिए। खाना अंधेरा होने से पहले ही खा लिया जाता था। बहुत जल्दी ही हम सो जाते थे। लालटेन आधे घंटे में ज़्यादा नहीं चलता होगा। 


सोने के लिए कोई अलग कमरा नहीं होता था। न कोई पलंग। घर में कोई फ़र्नीचर नहीं होता था। पहली कुर्सी दासाब की जाली में देखी। वहाँ बच्चों का आना-जाना मना था। इसलिए पहली बार कुर्सी पर रूनखेड़ा में मामासाब के रेलवे क्वार्टर में बैठा। मामासाब वहाँ स्टेशन मास्टर थे और गर्मी की छुट्टियों में हम सब वहीं रहते थे। कुर्सी मुझे इतनी पसन्द आई कि मैं दो कुर्सियों को जोड़ कर और कुशन लगाकर उसी पर सो जाता था। सोचता था, वाह क्या ठाठ की ज़िंदगी है। सब ज़मीं पर सो रहे हैं मैं उन सबसे ऊपर। 


राहुल उपाध्याय । 24 सितम्बर 2024 । टोक्यो से होनोलुलु जाते हुए 






Wednesday, September 18, 2024

ओसाका - 18 सितम्बर 2024

मेरी आदत है मैं पहले से कुछ जानकारी नहीं लेता हूँ कि आगामी यात्रा में कब, क्या होगा। कहाँ जाएँगे। कहाँ रूकेंगे। कहाँ खाएँगे। मुझे लगता है कि जो होगा, अच्छा ही होगा। और होता ही है। 

 आज टोक्यो से भागते दौड़ते हमने ओसाको की फ़्लाइट पकड़ी। टोक्यो एयरपोर्ट पर कर्मचारी अंग्रेज़ी कम समझते हैं। उससे उलझन भी होती है। फिर एयरलाइंस के नाम भी बदलते रहते हैं। उलझन और बढ़ जाती है। उन्नीस लोग साथ हो तो कोई न कोई कहीं न कहीं पीछे छूट ही जाता है। उसे समेटो तो कोई और फिसल जाता है। मुझे इन सबसे परेशानी नहीं होती। इन्हें मैं यात्रा के आनंद का अभिन्न अंग मानता हूँ। 

 लोग सोच रहे थे कि हम एयरपोर्ट से होटल जाएँगे। नहा-धो कर, खा-पी कर कुछ घूमेंगे। थोड़ा आराम भी करेंगे। समय का भी अंतर है। जापान भारत से साढ़े तीन घंटे आगे है। हम कल शाम छः बजे चले। सुबह छः बजे टोक्यो और दस बजे ओसाका पहुँचे। तब से हम घूम रहे हैं। अब तक होटल नहीं गए हैं। कुछ लोग असहज हैं। 

 पर जो दो नज़ारे देखे, उनसे दिन बन गया। 

 पहला था तेरह सौ वर्ष पूर्व बना बौद्ध मन्दिर। बहुत ही भव्य और विशालकाय। मन्दिर के अंदर बुद्ध की भव्य प्रतिमाएँ हैं। अद्भुत। 

 दूसरा अक्वेरियम। इसमें सबसे ख़ास बात यह कि यहाँ विश्व के हर क्षेत्र की जलवायु की नक़ल बना दी गई है। इसलिए यहाँ पेंग्विन भी हैं। और सील भी। व्हेल भी। डॉल्फिन भी। शार्क भी। 

 राहुल उपाध्याय । 18 अगस्त 2024 । ओसाका

Monday, September 16, 2024

वीर ज़ारा- समीक्षा

कल बहुत नमक खर्च हुआ। 


यश चोपड़ा द्वारा निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म 'वीर ज़ारा' हाल ही में दोबारा रिलीज़ हुई है और यह मेरा सौभाग्य रहा कि मैं दिल्ली के छोटे से दौरे के दौरान इसे देख पाया। 2004 में जब यह पहली बार रिलीज़ हुई थी तब मैं सेन फ़्रांसिस्को में रहता था एवं अत्यंत व्यस्त था दो बच्चों की परवरिश में, अपने सबवे रेस्टोरेन्ट के प्रबंधन में एवं नयी नौकरी ढूँढने में। इसे डीवीडी पर ही देख कर संतोष कर लिया था। 


बड़े पर्दे पर देखने का रोमांच तो हमेशा ही रहता है। आदित्य चोपड़ा की कहानी, स्क्रीनप्ले, और संवाद ने एक ऐसा समाँ बाँधा कि 192 मिनट कब गुज़र गए पता ही नहीं चला। 


शुरूआत के कुछ सीन छोटे किए जा सकते थे। चौधरी सुरेन प्रताप सिंह और सरस्वती देवी की नोकझोंक भी हटाई जा सकती थी। लोहड़ी का गीत भी हटाया जा सकता था। 


जैसे ही मनोज वाजपेयी का किरदार आया, कहानी में दम आया। फिर तो भावनाओं का बाँध जैसे टूट पड़ा हो। दिव्या दत्ता, किरण खेर, बोमन ईरानी, इन सबके अभिनय ने फ़िल्म में चार चाँद लगा दिए। न जाने कितनी बार आँखों से आँसू टपकते रहे। 


गीत और संगीत इस फिल्म की जान हैं। उन्हीं के सहारे यह फ़िल्म आसानी से धीमी गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती गई। 


मैंने जोड़-भाग नहीं किया लेकिन मेरा अनुमान है कि केवल गीतों में ही सौ मिनट खर्च हो गए होंगे। 


राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2024 । दिल्ली 

Sunday, September 15, 2024

15 सितम्बर 1986

8 सितम्बर 1986 को मिले इस वीसा ने मेरी ज़िन्दगी का रूख बदल दिया। 


मेरे पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी। बोकारो स्टील प्लांट की पसंदीदा नौकरी का प्रस्ताव भी था। मैं आरामपसंद हूँ। और एक आरामदायक ज़िन्दगी की परिकल्पना 1985 की गर्मियों में की इन्टर्नशिप कर चुका था। बोकारो की ज़िंदगी, वहाँ की आवास व्यवस्था से मैं प्रसन्न था। नौ से पाँच वातानुकूलित दफ़्तर में काम करूँगा। शाम को फिल्म देखूँगा और जी भर आईस क्रीम खाऊँगा। 


22 का था। लेकिन सोच यही तक सीमित थी। किसी बात का जज़्बा नहीं। कपिल देव इससे कम उम्र में पाकिस्तान में देश का गौरव बढ़ा चुके थे। 


यह वीसा भी मेरी महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। आय-आय-टी की हवा ही कुछ ऐसी होती है। आप भी भीड़ का एक हिस्सा है। जो सब करते हैं, वही आप भी करते हैं। मौलिक सोच बहुत कम होती है। 


सबने जी-आर-ई की परीक्षा दी। मैंने भी दी। टोफल की भी। अमेरिका के चार कॉलेज को मास्टर्स के आवेदन पत्र भेजे। उनमें से एक ने स्वीकृति दे दी और छात्रवृत्ति भी। 


अमेरिका आना इतना आसान नहीं है। इसीलिए मुझे हार-फूल से विदा किया गया। मेरे परिवार के लिए, एवं देश के लिए, मैं देश का गौरव था जिसे ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ था। हर कोई ख़ुश था। 


15 सितम्बर 1986. जिस दिन मैं रवाना हुआ, मैं बहुत रोया। इसलिए नहीं कि मुझमें देशप्रेम कूट-कूट कर भरा था। बल्कि इसलिए कि एक बार नवीं कक्षा में असफल होने के बाद मुझे हर परीक्षा से चिढ़ थी। मुझे सीखना, सिखाना बहुत पसन्द है। इम्तिहान से नफ़रत। हालाँकि उस असफलता ने ही मुझे सिखाया कि कैसे सीखा जाता है। 


जैसे ही बी-टेक ख़त्म हुआ, नौकरी मिली, मैं निश्चिंत था कि अब कोई इम्तिहान नहीं दूँगा। अब यह दो साल की ज़हमत और आ गई सर पर। 


कहने को कोई कह सकता है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी। वीसा लेने तुम ख़ुद गए थे। न जाते तो सारी समस्या की जड़ ही मिट जाती। 


कहना आसान है। सारी हवा ही ऐसी होती है कि न चाहते हुए भी कदम बढ़ते जाते हैं। 


यह वीसा एक साल का था। मास्टर्स करने में दो साल लगते हैं। यानी पहले साल में मैं भारत आऊँ तो वापस बिना नया वीसा लिए अमेरिका जा सकता हूँ। उसके बाद भारत आ सकता हूँ, लेकिन अमेरिका के लिए वीसा लिए बिना नहीं। वीसा मिलना ऐसा जैसे लॉटरी निकलना। पता नहीं किसे मिले, किसे नहीं। 


पहले साल मिलने-जुलने के लिए आना असंभव था। टिकिट के लिए पैसे ही नहीं थे। छात्रवृत्ति से किराया और घर का खर्च निकल जाता था। पढ़ाई के बाद नौकरी लगी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, कम्प्यूटर साईंस, फ़्रेंकलिन कॉलेज, इण्डियना में। अब पैसा था, लेकिन वापस आना इतना आसान नहीं कि टिकट ली और बैठ गए। 


यदि भारत आया, और वीसा नहीं मिला तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा। सो मेक्सिको गया। वीसा नहीं मिला। एक साल बाद फिर गया। तब मिल गया। 


इसी फ़ोटो में दिख रहा है कि मैं 9 जुलाई 1991 को वापस पहली बार भारत आया। 


इस फ़ोटो में दिख रहे हैं बाऊजी और मम्मी। जबलपुर रेल्वे स्टेशन। मेरी ट्रेन के इंतज़ार में। हाथ में फिर से हार-फूल लिए। 


पाँच साल बाद वे मुझे और मैं उन्हें पहली बार देखूँगा। वीडियो कॉलिंग तो दूर, घर पर फ़ोन भी नहीं थे। जब जनवरी में वे कलकत्ता किसी शादी में गए, तब मैंने पहली बार मम्मी की आवाज़ सुनी। 67 मिनट बात की। बात कम, रोया ज़्यादा। पूरी कॉल का खर्च महीने भर के अपार्टमेंट के किराए से ज़्यादा था। 


राहुल उपाध्याय । 15 सितम्बर 2024


Wednesday, September 4, 2024

शिक्षक दिवस

हम गर्व से कहते हैं कि हमारी संस्कृति में मातृ दिवस, पितृ दिवस का कोई स्थान नहीं है। क्योंकि हर दिन हम उनका सम्मान करते हैं, आदर करते हैं, ख़याल रखते हैं, देखभाल करते हैं। 


फिर ये शिक्षक दिवस क्यों? ये गुरू पूर्णिमा किस लिए?


शिक्षक एक पेशा है। रोज़गार है। कैरियर है। वेतन मिलता है। मुफ्त में कोई कुछ नहीं पढ़ाता। 


पढ़ाता भी है तो सबको एक साथ। कोई सीख पाता है। कोई नहीं। 


इसमें छात्र की भूमिका ज़्यादा है या शिक्षक की?


गुरू? गुरू तो कोई होता ही नहीं है। यूँ ही हमने भ्रम पाल रखे हैं। 


गाना सिखाने वाले भी गुरू नहीं। पैसे लेकर सिखाते हैं। रोज़गार है। पेशा है। इसी तरह से तबला सिखाने वाले, गिटार सिखाने वाले, सब के सब धन कमा रहे हैं। और कुछ लोग सीख जाते हैं। कुछ नहीं। 


क्रिकेट के कोच, ऑफिस के सलाहकार सब इन्हीं श्रेणियों में फ़िट हो जाते हैं। गुरू कोई नहीं। 


कोई कहता है मेरी माँ मेरी गुरू है। मेरे पिता मेरे गुरू हैं। 


ये सब भी रिश्तेदार हैं जो अपने बच्चों का भला चाहते हैं और समय-समय पर राय देते हैं। गुरू नहीं। 


राहुल उपाध्याय । 5 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


स्त्री 2 - समीक्षा

स्त्री 2 बिलकुल बेकार, बकवास, बच्चों के लायक़ फ़िल्म है जिसे बच्चे भी नहीं देख पाएँगे। और समझ तो कोई नहीं पाएगा। 


आजकल लोगों को सच कहने में शर्म आने लगी है। ख़ासकर तब जब कुछ पापुलर हो जाए तो उसके ख़िलाफ़ कुछ कहना तो ग़ैर-ज़िम्मेदार लगने लगता है। यह फिल्म इतने पैसे कमा रही है तो ज़रूर कुछ तो अच्छा ही होगा। कैसे कह सकते हैं कि बे-सर-पैर की है। 


सरकटा पात्र तो है ही पटकथा भी सरकटी है। 


फ़िल्म का ख़ास आकर्षण 'आई नहीं' गीत है। गीत क्या नृत्य है। लेकिन यह गीत फ़िल्म में है ही नहीं। फ़िल्म के अंत होने पर क्रेडिट रोल के साथ ज़बरदस्ती घुसेड़ दिया गया है। और जैसे कि यह कम पड़ रहा था तो एक और गीत भी जोड़ दिया गया है। जनता तब तक थियेटर से बाहर हो चुकी थी। 


'आई नहीं' गीत की धुन 'भूल भूलैया' के गीत 'हरे राम हरे कृष्ण' से चुराई गई है। कोरियोग्राफ़ी 'पुष्पा' के गीत 'सामी' से चुराई गई है। तमन्ना का काम सिर्फ़ एक आयटम सांग के लिए है। वह गीत भी 'पठान' के गीत 'बेशर्म' से चुराया गया है। 


जैसे कि अंदेशा हो कि कहानी अपने दम पर नहीं चल पाएगी तो दो मेहमान कलाकार भी हैं। अक्षय कुमार और वरूण धवन। जिनकी कोई तुक नहीं है। 


वन लाइनर जोक्स रील्स में ज़्यादा प्रभावी हैं। फिल्म में नहीं। अटल जी, दिशा पटानी और नेहा कक्कड़ का सन्दर्भ अच्छा लगा। अर्द्धनारीश्वर का सीजीआई भी पसन्द आया। गुफा में लावा आदि लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स जैसी फ़िल्मों से प्रभावित लगे। 


मैं मुम्बई फ़िल्म के स्क्रिप्ट राईटर्स आदि से मिल चुका हूँ। तो दुख होता है यह देखकर कि वे विदेशी फ़िल्मों की नक़ल करने में अपनी भलाई समझते हैं। और दर्शक भी ख़ुश होते हैं कि हम भी उनके जैसी फ़िल्म बना सकते हैं। 


राहुल उपाध्याय । 4 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


Monday, September 2, 2024

आईसी 814 - समीक्षा

आईसी 814 अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित एक वेब सीरीज़ है। जो इन दिनों काफ़ी चर्चा में हैं एवं सराही जा रही है। यह भी एक भेड़ चाल का उदाहरण है। 


जन समाज की सराहना तो भेड़ चाल से प्रभावित है ही, इस सीरीज़ का निर्माण भी भेड़ चाल से प्रेरित है। हम नया विषय कोई सोच ही नहीं पाते हैं। वही घिसीपिटी ड्रामा-त्रासदी-सच्ची घटना के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। ऐसी कई सीरीज़ बनती रही हैं और बनती रहेंगी। 


ज़बरदस्ती में मामला इतने एपिसोड में खींचा गया है। टीवी चैनल है, अख़बार है, विशेष आवश्यकता वाला बच्चा है, पति-पत्नी का मनमुटावा है, साँस लेने में तकलीफ़ है, फ़र्ज़ निभानेवाली परिचारिकाएँ हैं, मोटे अफ़सर हैं, रात के अंधेरे में हो रहे खुफिया ऑपरेशन हैं, राजनीतिक मतभेद हैं। सारे मसाले हैं। खिचड़ी तो अच्छी ही बनेगी। उस पर से निर्माण की गुणवत्ता और कलाकारों की अदायगी उम्दा है। तो वाह तो निकलेगी ही। 


लेकिन यदि थोड़ा दूर होकर गंभीरता से सोचें तो क्या है इस वेब सीरीज़ में? कुछ भी नया नहीं। कोई नया विचार नहीं। कोई जागरूकता नहीं। 


अनुभव सिन्हा की भीड़ फ़िल्म भीड़ से अलग थी। छोटी फ़िल्म। गहरी बात। 


आईसी 814 से निराशा ही हाथ लगी। 


सारे उम्दा कलाकारों की उम्दा अदायगी व्यर्थ गई। उनके पात्र रोबोट जैसे लग रहे थे। एक ही इमोशन पूरी सीरीज़ में। जैसे उन्हें चिंतित रहने के अलावा और कोई निर्देश नहीं दिया गया। 


राहुल उपाध्याय । 3 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


Sunday, September 1, 2024

चुनाव

गोपखपुर में क़रीब 120 प्राइवेट स्कूल है। उन स्कूलों की एक संस्था है। गोरखपुर स्कूल्स एसोसिएशन। आज उसके पदाधिकारियों के चुनाव थे। 


मेरे मित्र, विकास, को उपाध्यक्ष नामांकित किया गया था। मैंने आग्रह किया कि क्या मैं इस प्रक्रिया को देख सकता हूँ तो उन्होंने सहमति दे दी। मैं देखना चाहता था कि एक छोटी संस्था का चुनाव कैसा होता है। 


दस बजे होटल विवेक में चुनाव था। शाम चार बजे तक चला। पहले चाय-नाश्ता था। एक बजे भोजन भी। सब सर्व सहमति से चुन लिए गए। सचिव के पद के लिए दो उम्मीदवार थे। गोरखपुर के विधायक भी मंच पर उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि दोनों प्रत्याशी आपस में बात कर लें एवं एक बैठ जाए। पर ऐसा नहीं हुआ और चौबीस वर्ष के संस्था के इतिहास मे पहली बार गुप्त मतदान हुआ। जो हार गए उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया गया। उपाध्यक्ष चार हो सकते हैं। दो ही व्यक्ति नामांकित हुए थे। ये तीसरे बन गए। इस प्रकार से सौहार्द बना रहा। किसी का दिल नहीं दुखा। 


आज ही के दिन सबसे पाँच हज़ार रूपये की वार्षिक सदस्यता भी वसूली गई। सबने नगद दिए। कोई पेटीएम नहीं। क़रीब सत्तर सदस्य मौजूद थे। सबके पास आईफ़ोन था। हर कोई बिज़नेसमैन था। कोई भी शिक्षाविद नहीं। सारे स्कूलों का मिलाकर वार्षिक कारोबार दो हज़ार करोड़ रुपए का है। सारे सदस्य पुरुष थे। एक भी महिला नहीं। बाद में दो महिलाएँ आईं। उनके पिता कोविड में गुज़र गए तो वे अब स्कूल चला रही हैं। 


पूरा दिन अच्छा गुज़रा। फ़िल्मों में जो दिखाया जाता है उसे आँखों के सामने घटित होते देखना अच्छा लगा। 


कान्वेन्ट स्कूल वाले नहीं आए। वे आते ही नहीं है। उन्हें इस संस्था की ज़रूरत नहीं है। उनका अपना ही रुतबा है। इसी तरह से जो स्कूल शीर्ष पर हैं, वे भी नहीं आते हैं। उन्हें भी इस संस्था की आवश्यकता नहीं है। ये स्कूल इसलिए शीर्ष पर हैं कि वे हर किसी को अपने स्कूल में दाख़िला नहीं देते हैं। एडमिशन टेस्ट होता है। जिसमें सौ में से दस ही सफल हो पाते हैं। वे फ़ीस भी तगड़ी लेते हैं और सब सहर्ष देते हैं। 


यह संस्था उन लोगों के लिए काम की है जो किसी न किसी कारण से शासन की निगाहों में हैं। जैसे कि शिक्षक-छात्र अनुपात, कमरों का क्षेत्रफल, पीने के पानी की सुविधा, खेल-कूद की सुविधाएँ, इमारत की हालत, आदि। पढ़ाई के मापदंड अभी विकसित नहीं हैं एवं उन पर क्रियान्वयन करना कठिन है। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


जन्मदिन समारोह

ज़िन्दगी में पहली बार कल रात एक ऐसे जन्मदिन समारोह में शामिल हुआ, जहां हर परिवार अपनी कार से आया। जन्मदिन पन्द्रह वर्षीय कन्या का था। क़रीब बीस परिवार के पचास प्राणी थे। हर परिवार कोई न कोई बिज़नेस कर रहा है। 


समारोह शहर से दूर बसे रिज़ोर्ट मे था। घर से वहाँ तक जाते-जाते एक घंटा लग गया। सोचा नहीं था कि गोरखपुर जैसे शहर में इतना वक्त लग सकता है। 


हर व्यक्ति मांसाहारी था। हर कोई मदिरापान कर रहा था। 


इस रिज़ोर्ट में एक स्वीमिंग पूल के इर्द-गिर्द यह समारोह आयोजित किया गया था। मंच पर डीजे ऊँची आवाज़ में संगीत बजा रहा था। युवा पीढ़ी और छोटे बच्चे नाच रहे थे। 


कुछ युवा कुछ टेबल पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। पाँच कबाना थे जिनमें समविचार वाले धरना जमाए बैठे थे। औरतें अलग। आदमी अलग। जजमान के मायके वाले अलग। ससुराल वाले अलग। 


मैं आदमियों के गुट में था। ज़्यादातर बातें बिज़नेस, ज़मीन और सम्पत्ति के बारे में होती रहीं। उन्होंने मुझे यह भी जताया कि अमेरिका सहित सारी दुनिया भारतीय प्रवासियों की वजह से चल रही है। 


समारोह में भोजन प्रचुर मात्रा में था। स्टार्टर में ही इतने व्यंजन थे कि पेट भर जाए। केक कटने के बाद रोटी-चावल-दाल-पनीर-कोफ्ता और मांसाहारी व्यंजन भी थे। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 

Saturday, August 31, 2024

चाबी पुराण

तीन-चार साल पहले जब मैं अपना घर छोड़ कर अलग रह रहा था, पत्नी का फ़ोन आया कि कार की चाबी नहीं मिल रही है। कार ड्राइववे पर खड़ी है। ताला लगा हुआ है। ड्राइववे पर खड़ी, जी का जंजाल बन गई है। दो गाड़ियाँ और भी हैं। उनमें से बस एक गराज में जा पा रही है। दूसरी सड़क पर है। जल्दी से इस गाड़ी को दफ़ा करो। 


आजकल की गाड़ियाँ ऐसी हैं कि उनकी चाबी बनवाने में सात सौ-आठ सौ डॉलर का खर्च हो जाता है। यानी तक़रीबन पचास हज़ार रूपये। 


यह गाड़ी पुरानी हो चली थी। बेचने पर शायद ज़्यादा क़ीमत नहीं मिलती। सो चाबी बनवाने के खर्च को ध्यान में रखते हुए मैंने नेशनल पब्लिक रेडियो के स्थानीय स्टेशन (वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा संचालित) को दान में दे दी। 


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मेरे एक मित्र कनाडा गए घुमने। सिएटल से वेन्कुवर पास ही है। लोग अक्सर जाते रहते हैं। सब अपनी कार से ही जाते हैं। 


ये शॉपिंग करने निकले। कास्टको। जो कि एक महाकाय स्टोर है। शॉपिंग के बाद स्टोर से निकले तो भूल गए कि कार कहाँ पार्क की थी। ग़नीमत से कार की चाबी में यह सुविधा है कि बटन दबा दो तो कार की लाईट चमचमाने लगती है और आवाज़ भी करती है। इस तरह से थोड़ी देर में कार मिल गई। साथ में एक साल का बच्चा भी था। सो स्ट्रोलर से उसे निकालना, कार सीट में बिठाना, इन सब गतिविधियों में व्यस्त हो गए। 


घर - जो कि एक एयर बी एण्ड बी है - पहुँचे तो पता चला कार की चाबी नहीं मिल रही है। बहुत ढूँढा नहीं मिली। पत्नी और बच्चे और सामान को घर पर छोड़कर वापस वह कास्टको गया। वहाँ भी नहीं मिली। कार डीलर को फ़ोन किया। उन्होंने कहा कि गाड़ी यदि चल रही है तो चाबी गाड़ी में ही है। 


अब ये अजब सुविधा या दिक्कत है कि इन दिनों चाबी से गाड़ी स्टार्ट नहीं होती। एक बटन दबाने से ही गाड़ी चल देती है। बशर्ते चाबी आपके पास हो। 


वह वापस घर आया। घर पहुँचकर गाड़ी बंद हो गई। अब वह चलने का नाम न ले। 


रहस्य गहराता गया। फिर निष्कर्ष निकाला गया कि चाबी शायद कार की छत पर रह गई थी जो बड़ी देर तक वहीं रही लेकिन आखरी ट्रिप में कहीं गिर गई। 


झक मारकर सात सौ डॉलर की फ़ीस देकर नई चाबी बनवानी पड़ी। 


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भारत में एक मित्र का आलीशान घर है। बहुत ही आरामदायक एवं वैभव से भरपूर। महल कह लीजिए। लेकिन कहीं किसी की बुरी नज़र न लग जाए इसलिए सब कुछ छुपा रखा है। बाहर गेट से लगता है जैसे कोई खंडहर है। पीछे की ओर खूबसूरत लॉन है और भव्य मुख्य द्वार है। 


हर कमरा बहुत बड़ा है। हर कमरे के साथ विशालकाय बाथरूम है। अलमारियाँ है। बैठने की व्यवस्था है। मतलब हर कमरा अपने आप में टू बी एच के है। के - यानी किचन -  को छोड़ दीजिए। 


रात को जब मैं अपने कमरे में सो रहा था, मित्र का फ़ोन आया कि अंदर से ताला अच्छे से लगा लेना। और एक रॉड रखी है कमरे में, उसे भी दरवाज़े में फँसा देना ताकि अतिरिक्त सुरक्षा रहे। कभी ऐसा हुआ नहीं है कि कोई घर में घुस आए। पर ज़माना ख़राब है। सबको हमारी सफलता सुहाती नहीं है। कोई भी घुस सकता है। कोई कितना भी हल्ला करे, दरवाज़ा नहीं खोलना। 


घर के परिसर के बाहर गेट है। गार्ड है। भव्य द्वार पर ताला है। रॉड है। फिर भी इतनी एहतियात?


ख़ैर, मैंने रॉड लगा ली। जैसा देश, वैसा भेष। 


हम किसी पार्टी में गए। आते-आते रात के एक बज गए। वे अपने कमरे में सोने चले गए, मैं अपने। 


उनके बेटे और बहू शहर से बाहर गए हुए थे। घर में हम तीन ही थे। 


क़रीब एक घंटे बाद फ़ोन आया। हम अपने कमरे में बंद हो गए हैं। तुम नीचे आकर बाहर से खोल सकते हो। 


मैं गया। दरवाज़े में चाबी लगी हुई थी। मैंने चाबी से ताला खोला और वह बाहर आ पाया। 


हुआ यह कि जब हम पार्टी में गए थे तब वह अपना कमरा लॉक करके गया था। एक और ताला अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। 


जब वे कमरे में घुसे तो ताला तो खोल दिया पर चाबी की-होल में ही रह गई। फिर अंदर से बंद कर दिया। 


यह अजीब बात है कि जब चाबी की-होल में है तो अंदर से ताला बंद तो हो सकता है पर खुल नहीं सकता। खुलता बाहर से चाबी से ही है। या यदि चाबी की-होल से गिर जाए या हटा दी जाए। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर