अम्स्टरडम की यात्रा में मैं एक सेक्स वर्कर से मिला। अम्स्टरडम की यह ख़ासियत है कि यहाँ सेक्स वर्कर को सही मायने में कर्मचारी माना जाता है। उनको काम करने की निश्चित साफ़-सुथरी जगह दी जाती है। काम करने के दिन और घंटे निश्चित किए जाते हैं। कम घंटे काम कर सकती हैं। ज़्यादा नहीं। कोई ओवरटाइम नहीं। दाम भी तय है। सौ यूरो बीस मिनट के। इसमें भी कोई फेरबदल नहीं कि दस मिनट के पचास वग़ैरह।
स्वास्थ्य सेवा भी निःशुल्क दी जाती है। सुरक्षा भी। यदि कोई ग़लत कदम उठाए तो बटन दबाते ही सुरक्षा कर्मी हाज़िर। लेकिन कोई आसपास मंडराता नहीं रहता।
बिना कंडोम सेक्स नहीं कर सकते। चुम्बन नहीं कर सकते। होंठ से होंठ नहीं मिला सकते। इन सबसे थूक द्वारा बीमारी फैलने का डर रहता है।
एक निर्धारित क्षेत्र है जिसे रेड लाइट एरिया कहा जाता है। वहाँ कोई दो चार सड़के हैं जहाँ सड़क के दोनों ओर दस-बीस दरवाज़े हैं एक के बाद एक। हर दरवाज़े में या तो पर्दा लगा है या एक लड़की/महिला खड़ी है। इनकी उम्र इक्कीस से पचास तक होती है। जो खड़ी है उसने सिर्फ़ ब्रा और अंडरवियर पहन रखा है। आप उससे आँख से आँख मिलाएँगे तो वह इशारे से पूछेगी - क्या अंदर आना चाहते हो? दरवाज़ों पर इतना मोटा काँच है कि बाहर की आवाज़ अंदर और अंदर की आवाज़ बाहर नहीं आती।
यदि आप हाँ में सिर हिलाते हैं तो वह दरवाज़ा खोलेगी, दाम माँगेंगीं और सौ यूरो मिलते ही पर्दा गिरा देगी, दरवाज़ा बंद कर देगी और आपको अंदर एक कमरे में आने को कहेगी।
वहाँ एक बिस्तर है। एक बाथरूम है। एक वॉश बेसिन है।
आपसे पूछेगी, क्या करना चाहोगे, कैसे करना चाहोगे।
मैंने तो कहा सिर्फ़ बात करनी है। कहने लगी, सच्ची? मैंने कहा, मैं कभी किसी सेक्स वर्कर से नहीं मिला हूँ। रेड लाइट एरिया शायद हर शहर में होते होंगे। हाई स्कूल के ज़माने में कलकत्ता में सुना था कि कहीं तो है। कॉलेज के वक्त बनारस में कुछ लड़के तो हो भी आए थे। मैं कभी कहीं नहीं गया। पहली बार आया हूँ। बहुत कौतूहल है। हिन्दी फ़िल्मों में देखा है कि जो भी ऐसा काम करती हैं वे अपनी मर्ज़ी से नहीं करतीं। उन पर किसी आंटी का या जल्लाद का दबाव होता है। वे भागना चाहती हैं पर भाग नहीं सकतीं।
उसने कहा मैं तो स्वेच्छा से करती हूँ। मैं यहाँ कॉलेज में पढ़ रही हूँ। मैं बल्गारिया की रहने वाली हूँ। स्कूल की फ़ीस, अपार्टमेंट का किराया, खाना-पीना सब इससे चलता है। मैंने वैट्रेस की नौकरी भी की। सेक्स में जितनी कमाई है उतनी किसी में नहीं।
मेरे पड़ोस में जो है वो पिछले बीस साल से यही काम कर रही है। घर भी ख़रीद लिया है। उनके दोस्तों को सब को पता है कि वह सेक्स वर्कर है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है।
मैंने कहा एक दिन में तुम कितनी बार सेक्स कर पाती होगी। ज़्यादा कमाई तो हो नहीं पाती होगी। कहने लगी सात-आठ बार तो आराम से कर सकती हूँ। बीस दिन काम करूँ तो पन्द्रह हज़ार यूरो एक महीने में कमा सकती हूँ। पर इतने लोग आते नहीं हैं। शुक्र-शनि-रवि को ही इतने मिल पाते हैं।
एक बार सेक्स होते ही हम लड़कियाँ बहुत जल्दी दूसरे ग्राहक के लिए तैयार हो जाती हैं। लड़कों में यह बात नहीं है। इसीलिए ये धंधा सिर्फ़ लड़कियाँ ही कर पाती हैं।
मैंने कहा इस धंधे में कुछ तो बुरा भी होता होगा। जब सब अच्छा है, कमाई भी अच्छी है तो सब क्यों नहीं करतीं?
सही कह रहे हो। बुरा कुछ भी नहीं है। कई बार कुछ बदतमीज़ लोग नशा कर के आ जाते हैं और उलूल-जुलूल हरकत करने लग जाते हैं। सुरक्षाकर्मी बचा तो लेते हैं पर एकाध घंटे के लिए मूड ख़राब तो हो ही जाता है। कुछ कुछ ऐसा ही कॉलेज के लड़के भी करते हैं। दो लड़के एकसाथ करना चाहते हैं। कई बार मैं मान भी जाती हूँ। मुझे भी एडवेंचर पसन्द है।
मैंने कहा, बीस मिनट में क्या-क्या होता है। तुम किस तो करने नहीं देती। तो फ़ोर-प्ले तो होता ही नहीं होगा। तुम्हें कुछ तो समय चाहिए चिकनाई लाने में। ताकि तुम्हें घर्षण से दर्द न हो। कैसे सहन कर लेती हो बिना चिकनाई के?
कहने लगी सबसे पहले हम लिंग पर कंडोम चढ़ाते हैं। फिर उसे मुँह में लेकर बड़ा करते हैं। इस प्रक्रिया से समय की बचत होती है और हममें चिकनाई भी पैदा हो जाती है। बस हम भी तैयार, वो भी तैयार। इस तरह से बीस मिनट भी खर्च नहीं होते और काम ख़त्म। सबसे ज़्यादा समय तो बंदे को कपड़े उतारने में और पहनने में लगता है।
मैंने कहा, यह तो बहुत बेइंसाफ़ी है, तुम मज़े भी लेती हो और साथ में धनराशि भी।
बोली, यह तो हमारी क़िस्मत है। कई बार इतना दुख होता है जब लोग बस दरवाज़े की तरफ़ देखते हैं और कोई रूचि नहीं दिखाते। लगता है कोई कमी है मुझमें। शायद पास वाली मुझसे ज़्यादा जवान है, ज़्यादा खूबसूरत है, ज़्यादा पतली है, ज़्यादा मुस्कराती है। उसके खड़े होने का अंदाज़ मादक होगा। उसकी हेयरस्टाइल अच्छी होगी। उसने पलकें अच्छी सजाई होगी। काजल अच्छा होगा। कब, किसको, क्या पसन्द आ जाए पता नहीं।
और हमारे हाथ में कोई चयन नहीं। जो आ जाता है उसे स्वीकार कर लेते हैं। वरना इससे भी हाथ धोना पड़ेगा।
यहाँ की सोसायटी में हर किसी की गर्लफ़्रेंड है। हर कोई अपने घर में खुश है। यहाँ कौन आएगा?
तुम आए अच्छा लगा, कमाई हुई, पर तुममें भी भूख नहीं।
क्या हो गया है दुनिया को? एक अच्छी भली लड़की ग्राहक को तरस रही है।
राहुल उपाध्याय । 5 अक्टूबर 2024 । होनेलुलु से सेन होज़े जाते हुए