Wednesday, April 22, 2026

सुनील, रमनी जी और निधि - एक यात्रा

इत्ती सी थी - 11 वर्ष की - जब वह मुझे पहली बार जबलपुर में मिली थी। कितनी चपर-चपर बातें करती थी। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ी लड़की जैसी। करती ही रहती थी। 


मेरी शादी में आई थी। उसके पिता बाऊजी के छात्र थे। 


मैं अमेरिका आ गया। पलट कर कभी जबलपुर नहीं गया। उससे दोबारा मुलाक़ात नहीं हुई। 


आज से दो साल पहले फ़ेसबुक ने उसे मेरा चेहरा दिखा दिया, मुझसे जोड़ दिया। 


तब तक मेरा तलाक़ हो चुका था। क्या पता नियति को इसी का इंतज़ार था। 


यदा-कदा फ़ोन कर देती थी। वह सेन फ्रांसिस्को में रहती है। मैं सिएटल में। टाइम ज़ोन एक ही है। लेकिन दूरी हज़ार मील की। 


बातों-बातों में दोनों ने एक-दूसरे का पता पूछ लिया। 


मैं इन दिनों मिशन पर हूँ। अमेरिका की पचास विधानसभाओं के साथ सेल्फी लेने की धुन सवार हुई है। अप्रैल के अंत में पूर्वी अमेरिका स्थित चार राज्यों के भ्रमण की योजना है। 


शनिवार को रमनी जी की पोस्ट देखी कि वे पुणे रहने जा रही है। ये तो बहुत बड़ा धमाका था। उन्होंने मेरी किताब - उधेड़बुन - माँगी थी। मैंने पता माँगा और डाक से भेज दी। किताब मिलने पर उनसे फ़ोन पर बात हुई। कहने लगी, अप्रैल में जब भारत जाऊँगी तब पढ़ूँगी। 


मुझे अजीब लगा। यहाँ पढ़ने में क्या दिक़्क़त है। फिर सोचा वे अक्सर वहाँ अपने अपने बेटे के पास जाती हैं और वहां पोते पोतियों के साथ तीन महीने गुजार कर फिर वापस आ जाती हैं। तो फुर्सत से पढ़ लेंगी। 


पर अब तो वो रहने जा रही हैं। मतलब उनसे मुलाकात का भी मौका मिलने वाला नहीं है। मैं चाहता था कि उनसे एक दिन तो मिलूं। बस आज मिलूँगा, कल मिलूँगा करता रहता था। फिर सोचा अब तो मिलना ही है। 10 अप्रैल को जा रही थी। पंद्रह तक टैक्स भरना होता है। टैक्स भर लूं। फिर जाऊं तो सर पर कोई बोझ नहीं रहेगा और आनंद आएगा। फिर लगा कि नहीं यह सब करते-करते समय बीत जाएगा और उनके जाने का समय आ जाएगा। टैक्स को पीछे छोड़ा और आनन-फ़ानन निकल गया। 


रास्ते में सुनील से और उसके परिवार से मुलाक़ात हुई। रात भी वहीं उनके घर ठहर गया। बच्चों को शायद अपना कमरा देना पड़ा। मैंने लाख कहा मैं फ़ैमिली रूम में सो जाऊंगा। लेकिन वे नहीं माने। खैर, अच्छा भोजन किया रात को, अच्छा नाश्ता किया सुबह। निकलने ही वाला था कि बातों-बातों में इतना समय निकल गया कि सुनील की पत्नी मीना ने उस दिन छुट्टी भी ले ली और बातें करती रहीं। बहुत अच्छा लगा। इतने आत्मीय तरीके से बैठ के बातें हुई। बच्चों ने भी रात को मेरी जीवन-गाथा सुनी। उनसे अंग्रेज़ी में बात हुई। क्योंकि उन्हें ज्यादा हिंदी नहीं आती है। सुनील को बहुत हैरानी हुई कि मैं इतनी अंग्रेजी बोल सकता हूँ। 


चलते-चलते मीना ने मेरे साथ कुछ खाने को भी रख दिया। बहुत, बहुत, बहुत अच्छा लगा। 


रमनी जी के यहां भी मैं अचानक ही पहुंचा। पहले से उन्हें कोई सूचना नहीं दी। उनके यहां गेटेड कम्युनिटी है, तो अंदर जाने के लिए उन्हें फोन करना ही पड़ा। उन्हें पता चल गया कि मैं आ गया हूं। उन्होंने भी तुरंत मेरे लिए भोजन का इंतजाम किया, और फिर उनके गेस्ट रूम में उस रात मैं सोया। सुबह उठकर उन्होंने बहुत अच्छा भोजन तैयार किया। बहुत अच्छी बातें हुई। उन्हें खुशी हुई कि मैं उनके जाने से पहले मिल सका। 


रमनी जी और उनके पति मदन मोहन जी दोनों 80 की उम्र के आसपास हैं और आज भी मिल-जुलकर खाना बनाते हैं। रमनी जी सब्जियां काट देती हैं और उन्हें बताती जाती है कि अब यह रखो, अब यह डालो, अब वो डालो, अब घी डालो, टमाटर भूनो, आदि। 


मदन मोहन जी ने कहा कि इतने सालों के अभ्यास के बाद मैं सब सीख चुका हूं, लेकिन आज भी करता वही हूं जो यह कहती है। अपने मन से कुछ नहीं करता। 


उन्होंने यह भी बताया कि उनका नाम मदन मोहन मालवीय जी के ऊपर रखा गया था। वे बनारस से हैं, बनारस में पैदा हुए, और बनारस में ही मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। संयोगवश मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी वहीं से हुई। 


उन्होंने भी साथ में खाने के लिए कुछ दे दिया। बहुत खुशी हुई। अब मैं जल्दी से सिएटल आना चाहता था। टैक्स भी भरना था। अगले दिन काम पर भी जाना था, पर मन नहीं माना। मैंने सोचा चलो निधि से मिलते हुए चलते हैं। सेन फ्रांसिसको की ओर गाड़ी मोड़ दी। 


निधि के यहां पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो गई। रात के पौने नौ बज गए थे और ये सब लोग रात को नौ बजे सो जाते हैं। सुबह पांच बजे से दिन शुरू हो जाता है। मेरी वजह से बहुत इनको असुविधा हुई होगी, लेकिन सब बहुत खुश थे कि मैं आ गया। अंततः निधि से, निधि के पति से, उनके दो बच्चों से मिलकर बहुत खुशी हुई।


रात को ही निधि ने मेरे लिए खाना भी बनाया, और फिर सुबह जब मैं निकल रहा था तब उसने फिर भोजन बनाया। 


उसने बताया कि उसे खाना बनाना नहीं आता था। उसे खाना बनाना उसके पति ने ही सिखाया।साबुदाने की खिचड़ी बनाने के लिए साबुदाना दही में भिगोती है। यह मैंने पहली बार देखा और उसके बगीचे में कड़ी पत्ता बहुत उग रहा है।


रास्ते के लिए एक थर्मस में पैक करके खाना दिया। थर्मस इतना अच्छा जिसमें खाना बहुत देर तक गर्म रहता है, और उसने वो थर्मस दे भी दिया। यह भी नहीं सोचा कि वापस उसे मिलने वाला नहीं है। ऐसा बहुत कम होता है। आमतौर पर महिलाएं बहुत कुछ दे देंगी। लेकिन किचन का कोई सामान, कोई बर्तन, कोई टप्परवेयर, कोई थर्मस आदि नहीं देंगी। इसलिए, डिस्पोज़ेबल रखती हैं। 


अब जब भी वो थर्मस देखता हूँ तो उस दिन की याद आ जाती है। 


राहुल उपाध्याय । 22 अप्रैल 2026 । डेनवर के ऊपर उड़ते हुए, सिएटल से वाशिंगटन डीसी जाते हुए। 

Sunday, April 19, 2026

आशा भोसले

आशा जी से मेरा खास लगाव नहीं रहा। 


बचपन से ही फिल्में देखना, गाने सुनना बहुत पसंद रहा। वही एक मनोरंजन का साधन था। फिल्में बहुत देर बाद देखनी शुरू कीं जब हम मेरठ रहने लगे। पांचवीं कक्षा में था तब मैं। बहुत अच्छी-अच्छी फिल्में देखीं। आनंद, अनुराग, दाग। ये सब राजेश खन्ना के जमाने की फिल्में हैं। उनमें मुख्य रूप से गायक के गाने ही प्रभावित करते थे। जैसे किशोर कुमार। बाद में मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मुकेश - इनसे भी परिचित हुआ, पर गायिकाओं की तरफ रुझान नहीं हुआ। बाद में जब हुआ भी तो लता के गीत ज्यादा पसंद आए। जब बनारस में मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तब उमराव जान के गाने बहुत अच्छे लगे और तब समझ में आया कि आशा भोसले भी कुछ गाती हैं। पर निकाह के गानों की वजह से सलमा आगा भी उतनी ही अच्छी लगती थी। और यह बहुत बाद में पता चला कि आशा भोसले जो हैं वे लता मंगेशकर की बहन हैं। शादी से पहले उन्होंने कभी गाना नहीं गाया यह सोचकर अभी भी आश्चर्य होता है। आशा मंगेशकर के नाम से कोई गीत उनका मैंने नहीं देखा है। वैसे तो गायिकाएं बहुत कम उम्र से गाना शुरू कर देती हैं और आशा जी ने भी किया ही होगा, और लता जी की बहन है तो उससे फायदा भी होना चाहिए था, पर सुना है कि उससे नुकसान भी बहुत हुआ। क्योंकि कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे छोटे-छोटे पेड़ उग नहीं पाते हैं।

 

बहरहाल, यह सब जानकारी विकिपीडिया पर होगी, जरूर होगी, पर मैं आजकल बहुत कम ही इधर-उधर खोजबीन करता हूँ। जितना मेरे जीवन में आ पाया उतना ही मैं समझता हूँ। अब आधे घंटे विकिपीडिया पढ़कर मैं यह नहीं बताना चाहता कि मुझे इनकी यह जानकारी, इनकी वो जानकारी है। हां, मुझे यह भी पता है कि इनकी पहली शादी किसी भोसले से हुई थी और फिर वो ठीक नहीं चली। बाद में इन्होंने पंचम - यानी राहुल देव बर्मन - के साथ शादी की और वो भी शायद ठीक नहीं चली। पता नहीं पर ये साथ में कभी रहे नहीं। इनके संतान भी नहीं हुई कोई। और बीच में शायद ओ पी नैयर के साथ भी इनका कुछ जुड़ाव रहा और सुनते हैं कि एक बार कुछ उनके बीच में बहुत झगड़ा हो गया। तो खैर, यह तो आपसी रिश्तों की बातें हैं। पर गायिका के रूप में वे अच्छा ही गाती थीं और बहुत सारे गीत हैं इनके जिनकी बहुत बड़ी लंबी सूची बनाई जा सकती है, पर फिर भी शायद उमराव जान और इजाज़त के गीत ही ज्यादा जहन में आएंगे। बाकी सब शायद दिमाग पर जोर देने पर, ढूंढने पर मिल भी सकते हैं। 


अब बात है इनके गुजरने की। उम्र 92 साल थी। पिछले एक साल तक वह कुछ गा भी रही थी, किसी शो पर, स्टेज पर, किसी न किसी कार्यक्रम में। पर फिल्मों में तो गायन नहीं मिल रहा था उनको।  


मुझे गायकी की ज्यादा जानकारी नहीं है। मेरे घर हर महीने के चौथे शनिवार को जब गोष्ठी होती है तो जो भी गाता है, मुझे अच्छा ही लगता है। पर जहां तक फिल्मों की बात है, फिल्मों में शायद उन्हें ही लिया जाता है जिनके गायन में दम है। मैं फिल्मों में गायन को ही गुणवत्ता का आधार समझता हूँ। मुझे नहीं लगता कि कुछ सालों से उन्हें किसी फिल्म में काम मिला था। कोई गीत गाया था। अब कुछ फिल्मकार हैं जिनकी अपनी खुद की पसंद-नापसंद होती है। उनमें से हैं यश चोपड़ा और बड़जात्या परिवार, उन्हें लता मंगेशकर से काफी लगाव था। वे चाहते थे कि लता उनके लिए जरूर गाएं। इसी के चलते वीर ज़ारा में लता जी ने यश चोपड़ा के लिए गीत गाए। फिर भी सब गीत तो अच्छे नहीं लगे। एकाध गीत में तो लगा कि लता जी थक गई थीं। उन्होंने भी अपनी दोस्ती के चलते वो गीत गा दिये, वरना उन्होंने भी गायन बंद कर दिया था।


कलाकारों के लिए तो मैं कहूंगा कि जीवन चाहे जितना ही लंबा हो, लेकिन जो श्रोता है, जो दर्शक हैं, उनके लिए उनका जीवन उतना ही सीमित है जितना जब तक वो कार्यरत थे, जब तक उनका काम सामने आ रहा था और सराहा जा रहा था। उसके बाद की जिंदगी तो परिवार के लिए है। जो जितना जिए उतना अच्छा। 


अब लोग कहते हैं कि यह एक अपूरणीय क्षति है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह कैसे कहा जाए। हर इंसान का जाना एक अपूरणीय क्षति है, तो फिर किसी एक खास व्यक्ति के लिए क्यों कहा जाए? जब सबके लिए अपूरणीय क्षति है, तो इसमें क्या बड़ी बात हो गई? खैर, ये तो मेरा ही टेढ़ा दिमाग है, जो ऐसा सोचता है। 


लता जी को लोग लता दी, या लता दीदी कहते थे। आशा जी को आशा ताई। ऐसा क्यों? मेरी समझ से परे है। शायद इसलिए कि दीदी ने शादी नहीं की और ताई ने कर ली। खैर, मेरी समझ से परे है। 


कुछ गीत आशा और लता दोनों ने साथ भी गाए हैं। अब पता नहीं उस जमाने में तो साथ में ही गाए होंगे। आजकल तो खैर, कोई भी साथ-साथ नहीं गाते हैं। पहले एक आदमी गा लेता है, फिर दूसरा गा लेता है, फिर जोड़ दिया जाता है। उत्सव का एक गीत है मन क्यों बहका रे बहका। वो लता और आशा दोनों ने गाया है, और बहुत ही सुंदर बन पड़ा है। इस गीत की खासियत यह भी है कि इसके संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल हैं। आमतौर पर कलात्मक फिल्मों का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ नहीं जोड़ा जाता है, और ये इस फिल्म की खासियत थी। 

https://youtu.be/tyOAj-4sPdw?si=K8Lt8B1yYOWaOg6H


ये साये हैं, ये दुनिया है। यह गीत मुझे उनका बहुत ही पसंद है। उसे मैं सैकड़ों बार, हजारों बार सुन सकता हूँ और कभी भी मन नहीं भरेगा। 

https://youtu.be/USEXZM6mMIQ?si=If9sj8JdSVtQ09Yg



तीसरी मंजिल का गाना, आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा। यह गीत आशा जी को बहुत पसंद था क्योंकि इसमें कुछ नवीनता थी उस समय के लिए। यह एक डांस नम्बर था और इसमें कई तरह के प्रयोग किए गए थे। ठीक है, डांस नम्बर के हिसाब से। वैसे मुझे इसमें कोई माधुर्य नज़र नहीं आता।  


उनकी एक और बात मुझे जो अच्छी लगती थी, वह यह कि वे जब भी किसी कार्यक्रम में जाती थीं, जहां कुछ लोग अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते थे। वे जब भी उन गीतों को सुनती थीं, चाहे वो उनके गीत हों या किसी और के गीत हों, वे हमेशा उनमें कुछ न कुछ सुधार की गुंजाइश ढूंढती थीं और उन्हें खुलकर बताती थीं। उन्हें यह नहीं लगता था कि अरे, अभी तो नए-नए बच्चे हैं। जितना कर रहे हैं, बहुत अच्छा कर रहे हैं। छोटी-बड़ी गलतियां नजरअंदाज कर देनी चाहिए। 


कुछ लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय शोक मनाया जाना चाहिए था। उन्हें भी भारत रत्न दिया जाना चाहिए था। खैर, सबकी अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन मुझे अच्छा लगा कि विविध भारती पर यूनूस खान ने सजीव प्रसारण किया और आशा जी के कुछ गैर फिल्मी गीत भी सुनाए जो कि ज्यादा प्रचलित नहीं हैं। सजीव प्रसारण मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।


ग़ैर फ़िल्मी गीतों में जो बहुत पसंद है, वह है कामायनी का यह गीत। जयशंकर प्रसाद के शब्दों को लयबद्ध करने का कमाल जयदेव ने किया था।

https://youtu.be/ipsbfYhv0AI?si=XamiV-xGHK7Ppm6z


पहले भी रिकॉर्ड करके ही कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे, पर आजकल ज्यादातर कार्यक्रम रिकॉर्ड किए होते हैं। बिनाका गीतमाला भी 40 साल पहले रिकॉर्डेड ही होता था। मुंबई में रिकॉर्ड होता था, फिर श्रीलंका जाता था और वहां से प्रसारित होता था। पर मैं हमेशा भ्रम में रहा कि यह सजीव था। 


सजीव प्रसारण में यूनुस खान का गला रुंध गया, और वे बता रहे थे कि आंखें नम सी हो रही हैं। यह भावुकता सिर्फ सजीव प्रसारण में ही हो सकती है, और इसीलिए मेरे मन में सजीव प्रसारण के लिए खास स्थान है। 


जिस दिन आशा जी गुजरीं , मैं एक गोष्ठी में शामिल था और वहां बिना यह जाने कि आशा जी गुजर चुकी हैं, किसी ने अपने जीवन का सबसे पसंदीदा गीत बहुत सालों बाद पहली बार गाया। "आगे भी जाने ना तू" और वह बहुत ही अच्छा रहा। मुझे लगता है कि एक तरह से हम लोगों ने उन्हें एक श्रद्धांजलि दी। 


जो भी है बस यही एक पल है। 


मैं 63 वर्ष का हूँ और अब मुझे लग रहा है कि मेरे जाने के बाद मेरी संपत्ति का सदुपयोग हो। इसलिए इन दिनों मैं एक ऐसी योजना में जुड़ गया हूँ जहाँ मुझे लगता है कि पैसा कहीं सही जगह काम आए। परिवार को तो देना नहीं है। परिवार के पास समुचित धन है, समुचित शिक्षा है, समुचित क्षमता है जिससे कि वो अपना जीवन सुख से बिता सके। मुझे लगता है कि नोबेल पुरस्कार जो है वो एक अच्छा पुरस्कार है। उसमें भी कुछ गुण-दोष हैं जरूर, पर फिर भी कई तरह से, कई मायनों में वो अच्छा है। मैं भी उसी की पद्धति पर कुछ आगे सोच रहा हूँ। नाम सोच लिया है प्रकाश पुरस्कार। प्रकाश मेरी माँ का नाम है। 


राहुल उपाध्याय । 19 अप्रैल 2026 । सिएटल 



Friday, December 19, 2025

बाढ़ के बाद

सिएटल यूँ तो बरसात के लिए बहुत बदनाम है पर पिछले दो हफ़्ते से बहुत ही ज़्यादा बारिश हो रही है। नदियाँ उफान पर थीं, भूस्खलन के कारण रास्ते बंद हो गए थे। कुछ घरों में पानी घुस गया था। 


यहाँ ज़िले को काउंटी कहा जाता है। उन्होंने कुछ उपाय जारी किए हैं बाढ़ के बाद किसी समस्या से कैसे निपटने के लिए। 


यह देखकर अच्छा लगा कि ये निर्देश अन्य भाषाओं के साथ-साथ हिंदी में भी हैं। 


https://cdn.kingcounty.gov/-/media/king-county/depts/dph/documents/safety-injury-prevention/emergency-preparedness/what-to-keep-after-flood/what-to-keep-after-a-flood-hi.pdf?rev=3b93bd5971304bde91eb708ba96bca46&hash=CB381FA41D4DCB10779C8C7C573B56E0&fbclid=IwVERFWAOyWI5leHRuA2FlbQIxMQBzcnRjBmFwcF9pZAo2NjI4NTY4Mzc5AAEeRox0xm-RfE1MR7FK84-U8lLGQ0Quz_a1_9n8i-MnkOw3RuC2wQr8mnUAC30_aem_W0BH3v_tSN8Z7BmWgzeePw


राहुल उपाध्याय । 19 दिसम्बर 2025 । सिएटल 



Thursday, December 18, 2025

सरोगेसी

समय कितना बदल रहा है।

लोग जन्मतिथि से अपनी राशि तय करते हैं। समय और स्थान देखकर जन्मपत्री बनती हैं। रिश्ते तय होते हैं।

कुछ इससे अपना भविष्य भी तय करते हैं। कितनी आयु रहेगी। कौनसी व्याधियों से जूझेंगे। नेता बनेंगे या अभिनेता। घर बनेगा या ग़रीब ही मर जाएँगे।

सीज़ेरियन ऑपरेशन से दिन-समय कुछ हद तक वश में कर लिया गया है। स्थान भी अब लोग बदलने लगे हैं। अमेरिका में पैदा हो तो जन्मपत्री चाहे कुछ भी कहे, अमेरिका की नागरिकता से जीवन के आसार बेहतर तो हो जाते हैं।

अमेरिका का वीसा लेने में कठिनाई हो सकती है तो उसका भी एक तोड़ निकाल लिया गया है।

अमेरिका के एक समाचार पत्र वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार चीन में प्रतिबंध होने के कारण कुछ बेहद अमीर लोग अमेरिका की ढीली व्यवस्था का फ़ायदा उठाकर सरोगेसी के ज़रिये अमेरिका में बच्चे पैदा करवा रहे हैं, और इसने अमेरिका में एक महँगा लेकिन फलता-फूलता कारोबार खड़ा कर दिया है।

इस व्यवस्था में माता-पिता अपना जेनेटिक मटीरियल (अंडाणु/शुक्राणु) विदेश भेजते हैं और बच्चा अमेरिका में जन्म लेता है।

प्रति बच्चे की लागत लगभग 2 लाख डॉलर (करीब 1.6–1.7 करोड़ रुपये) तक हो सकती है।

क्योंकि बच्चा अमेरिका में पैदा होता है, उसे अमेरिकी नागरिकता मिल जाती है — यही इस अंतरराष्ट्रीय माँग की एक बड़ी वजह है।

Tuesday, December 9, 2025

किताब

कब, कैसे, कहाँ से ख़ुशी मिल सकती है, कहा नहीं जा सकता। 


पिछले साल अजय ब्रह्मत्मज जी के अनुरोध पर सौ कविताओं का संकलन तैयार कर लिया। प्रमिला जी ने प्रस्तावना लिख दी। इ-बुक प्रकाशित हो गई। पे-वॉल के पीछे। जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?


मनीष पांडेय ने अमेज़ॉन पर इ-बुक पब्लिश कर दी। जब फ़्री थी, कुछ लोगों ने डाउनलोड कर ली। कभी पढ़ेंगे यह सोचकर। 


कुछ ने पीडीएफ माँग ली। शायद कभी पढ़ेंगे नहीं। 


सिएटल में संतोष जी मिलीं। कहने लगीं मुझे तो किताब हाथ में चाहिए। किंडल, व्हाट्सएप, ब्लॉग, फ़ेसबुक मुझसे नहीं होता। 


मैंने उनके लिए एक अपने कम्प्यूटर से प्रिंट कर ली। जब तक देता तब तक वे भ्रमण पर निकल गईं। 


सत्यप्रकाश जी प्रयागराज जा रहे थे। मैंने वह किताब उन्हें मधु के लिए दे दी। उन्होंने कहा यह तो मैं रखूँगा। सो दूसरी प्रिंट कर के दी मधु के लिए। 


मन में तो था कि शायद मधु भी नहीं पढ़ेगी। कुछ कविताएँ तो व्हाट्सएप पर, ब्लॉग पर, फ़ेसबुक पर पढ़ ही चुकी है। फिर भी भेज दी। 


सपने में भी नहीं सोचा था कि मधु की बेटी, ओमी, इस किताब को इतना प्यार देगी। अपनी बना लेगी। मधु का नाम बदलकर अपना नाम लिख लेगी। 


मैं जानता हूँ कि उसे कविताओं की समझ नहीं है। वह इन्हें साहित्य की दृष्टि से नहीं आंक रही है। 


वह जो कुछ भी कर रही है अद्भुत है। कोई उससे करवा नहीं रहा है। उसे पता भी नहीं है कि उसके इस व्यवहार से मुझे कैसा लगेगा। 


आठ साल की बच्ची इसे अपने साथ स्कूल ले जा रही है। सीने से लगा रही है। माँ के भी हाथ नहीं आने दे रही है। छुपा कर रख रही है। 


क्या ज्ञानपीठ, क्या नोबेल। सब तुच्छ इसके सामने। 


राहुल उपाध्याय । 9 दिसम्बर 2025 । सिएटल 




Saturday, October 18, 2025

भागवत’ - चैप्टर 1 - राक्षस

कहानी कितनी ही सच्ची क्यों न हो, उसे पर्दे पर दिखाते समय कुछ बेवक़ूफ़ियाँ हटा देनी चाहिए। 


कौनसा फ़ोन नम्बर कब से बंद पड़ा है यह तो पुलिस वालों को पता होना ही चाहिए। बार-बार दर्शक को चमकाने की यदि यह हरकत है तो बहुत ही घटिया हरकत है। 


पूरी फौज पहुँच जाते ही किसी के घर बिना जाने कि जिस नाम के व्यक्ति को वो खोज रहे हैं वह महिला है कि पुरुष। 


तमाम ऐसी बेवक़ूफ़ियाँ हैं। 


जब अपराधी अपने जुर्म स्वीकार कर रहा है तो फिर इतना तमाशा क्यों?


अंत में जब शालू मिल जाती है तो इतनी ख़ुशी क्यों? वह आत्महत्या ही तो कर रही थी। कुंडी अंदर से बंद थी। 


तो यह केस मोहन के खिलाफ गया कैसे?


मोहन को पहले प्रताड़ित किया गया। बाद में सारी सुविधा दी गई ताकि वह क़ानून पढ़कर अपना बचाव कर सके। 


अजीब ही दुनिया है। 


लेकिन 'भागवत' - चैप्टर 1 - राक्षस - कुछ बातें तो ज़रूर कह जाता है। पहली तो यह कि परिवार अनजान है कि बेटी कब किससे बात करती है, मिलती है। दूसरी यह कि बेटी तैयार है आज़ादी से जीने के लिए। 


दोनों ही बातें हमारे समाज की परिपक्वता दर्शाती हैं। माता-पिता कोई जेलर तो नहीं जो बेटी की हर हरकत पर निगरानी रखें। और बेटी भी जब बालिग़ है तो अपना भला-बुरा सोच सकती है। किसी के इजाज़त की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। 


इस शो में कुछ लडकियों का नुक़सान ज़रूर हुआ है पर इसका यह मतलब नहीं कि पहरेदारी बड़ा दी जाए या लड़कियाँ प्यार करना बंद कर दे। 


प्यार तो अंधा ही होता है। 


राहुल उपाध्याय । 18 अक्टूबर 2025 । सिएटल 



Friday, July 18, 2025

ये मैंने कैसे जूते पहन रखे हैं

जब से होश सँभाला है मम्मी को हमेशा मेहनत करते देखा। सबकी सेवा करते देखा। यातनाएँ सहते देखा। सबसे दबते देखा। किचन में फँसते देखा। दो मिनट की फुरसत नहीं। गाँव में बावड़ी से पीने का पानी धूप में, नंगे पाँव सर पर पीतल के घड़ों में लाते देखा। 


तब से मन में था कि जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा मम्मी को जितना सुख हो सकेगा दूँगा। 


मम्मी को साथ रखने की कोशिश की। लेकिन बात बनी नहीं। उनका कहना था कि तू अमरीकन बन गया है भारत में खुश नहीं रह पाएगा। हम भारतीय हैं। हमने अमेरिका की चकाचौंध देख ली है। जीवनशैली देख ली है। हम अमेरिका में खुश नहीं रह पाएंगे। 


जब हमें ज़रूरत महसूस होगी, हम कह देंगे, तुम मिलने आ जाना। 


बाऊजी के गुज़रने के बाद भी कोशिश की। लेकिन उन्हें फिर भी भारत की आज़ादी पसंद थी। जब जहां जाना हो चले जाओ। रिक्शा, बस, ट्रेन, प्लेन सब सहज उपलब्ध है। अमेरिका सोने की जेल है। 


मैं मन मार कर रह गया। अपने सुख के लिए उन्हें दुखी नहीं कर सकता। 


2018 में वे अपने ही बनाए मन्दिर में गिर गईं। बिना किसी के सहारे अब यात्राएं मुश्किल थीं। 


मुझसे कहा अब यहाँ भी जेल ही है। अमेरिका ले चल। लोहे की जेल से सोने की जेल भली। 


पासपोर्ट ख़त्म हो चुका था। वीसा ख़त्म हो चुका था। कई प्रयासों के बाद पासपोर्ट बन गया। अमेरिका के वीसा के लिए दिन तय हो गया। मुम्बई में साक्षात्कार होना था। अकेली जा नहीं सकती। 


मैंने यहाँ से वन-वे टिकट लिया। यह सोचकर कि वीसा मिले ना मिले। न मिले तो मैं तब तक अमेरिका वापस नहीं लोटूँगा जब तक कि मम्मी को वीसा नहीं मिले। यह मेरा मिशन इमपॉसिबल था। 


वीसा मिल गया। हम अमेरिका आ गए। अब मैं उनके ग्रीन कार्ड की तैयारी में लग गया। प्रण कर लिया कि जब तक ग्रीन कार्ड नहीं मिलेगा मैं बाल नहीं कटवाऊँगा। पूरी कार्यवाही में एक साल लग गया। ग्रीन कार्ड आ गया।


और कोरोना लग गया। नाई की दुकान पर जाना उचित न समझ उस्तरा आदि ख़रीद कर खुद से बाल काटने लगा। 


मम्मी गुज़र गईं। बाल उतर गए। कोरोना भाग गया। बाल बढ़ने लगे। उस्तरा चलाने की आदत पड़ गई थी सो खुद ही काटता रहा। 


1 जुलाई 2024 को नया घर लिया। 10 जुलाई 2025 को नयी गाड़ी ली। सोचा चलो बाल कटा लिए जाए नाई से। 


भारत में जब भी बाल कटवाए हैं आदमी ने काटे हैं। अमेरिका में जब भी बाल कटवाए हैं लड़की ने ही काटे हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। 


मैं शीशे में देख रहा था और यह देखकर चौंक गया कि ये कौन से जूते मैंने पहन लिए। ऐसे जूते तो मेरे पास हैं ही नहीं। और ये पांव क्यों दिख रहे हैं। मैंने तो जींस पहनी है। कुछ समझ नहीं आया। 


इस उहापोह में सिर्फ एक सेकंड लगा होगा। पर उस सेकंड ने मुझे विचलित कर दिया। 


जब समझा तो बहुत हँसी आई। मैंने हेयर स्टाइलिस्ट से कहा कि क्या यहाँ फोटो खींचना मना है? उसने कहा नहीं। तो मैंने कहा शुभ काम में देरी क्यों करनी। खींच दो। 


दरअसल शीशा आदमकद नहीं है। छोटा है। पाँव और जूते उसके हैं जो शीशे के उस पार बैठी है।  


राहुल उपाध्याय । 18 जुलाई 2025 । सिएटल