Saturday, October 17, 2026

रूमा की कहानी

रूमा की कहानी

——- राहुल उपाध्याय
-॰-

जबसे मैं अमेरिका आई हूँ बहुत खुश हूँ। सबसे पहले तो इस बात से खुश थी कि दस वर्ष की उम्र में ही पासपोर्ट बन गया। बताओ ऐसे कितने हैं जिनका इतनी कम उम्र में कुछ भी बना हो। अपने सारे परिवार में, अपने सारे दोस्तों में, अपने आस-पड़ोस में दूर-दूर तक कोई नहीं था जिसका पासपोर्ट बना हो। यहाँ तक कि व्हाट्सएप पर भी जितने हैं सब के बच्चों के पास भी नहीं है।

पापा हैदराबाद में आय-टी फ़ील्ड में काम करते थे। उनकी कम्पनी का एक प्रोजेक्ट अमेरिका में भी था। चूँकि वे अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करते थे, उनके बॉस ने उनसे पूछा कि क्या वो इस प्रोजेक्ट पर काम करना चाहेंगे?

पापा ने पहले घर पर बात की। सबकी इच्छा जाननी चाही। दादाजी, दादीजी, बुआजी सब क्या सोचते हैं इस बारे में। और हाँ मम्मी से भी।

मुझसे भी पूछा। मैं तो पगला ही गई। यह भी कोई पूछने की बात है? जिधर देखो उधर अमेरिका छाया हुआ है। आय-फ़ोन कहाँ से आया? अमेरिका से। एन्ड्रायड फ़ोन कहाँ से आया? अमेरिका से। गूगल कम्पनी कहाँ है? अमेरिका में। फ़ेसबुक कहाँ है? अमेरिका में। अमेज़ॉन कहाँ है? अमेरिका में। हॉलीवुड कहाँ है? अमेरिका में। डिस्नेलेण्ड कहाँ है? अमेरिका में।

अमेरिका, अमेरिका, अमेरिका!

क्या नहीं है अमेरिका में? सब कुछ तो है। पिज़्ज़ा। बर्गर। आईसक्रीम। पेप्सी। चिप्स।

सब मतलब सब।

घर में भी सब राज़ी हो गए।

जल्दी-जल्दी पासपोर्ट बना। हम सब ने फ़ोटो खिंचवाए। वीसा के लिए एम्बेसी गए। वहाँ मुझसे कुछ नहीं पूछा गया। मैं तो बड़े अच्छे से तैयार होकर गई थी। दो चोटी बनाई थी। अंग्रेज़ी बोल लेती थी, पर कच्ची-पक्की। मम्मी ने बहुत तैयारी करवाई। व्हाट इज़ योर नेम। माई नेम इज़ रूमा। वग़ैरह। वग़ैरह। कुछ काम नहीं आया। बेकार इतनी मेहनत की।

बहुत सारी शॉपिंग हुई। छ: बड़े-बड़े सूटकेस भर कर हम लोग एयरपोर्ट पहुँचे। इतने बड़े सूटकेस कि मैं पूरी फ़िट हो जाऊँ। लम्बी लाईन। मैं तो उतावली हो रही थी कि कब प्लेन में बैठूँ।

प्लेन में घुसते ही ऐसा लगा जैसे स्वर्ग में आ गए। सब फ़्री। जितना पेप्सी पीना हो पियो। जितना चॉकलेट खाना हो खाओ। आईसक्रीम भी। खाना भी। ढेर सारी फ़िल्में। कार्टून। टीवी शो। सब फ़्री। कहीं एक पैसे का खर्चा नहीं।

और पता है, मुझे एक बैकपैक भी मिला। बहुत ही प्यारा। खूबसूरत। रंग-बिरंगा। उसके अंदर थी एक कलरिंग बुक और क्रेयॉन।

पूरे रास्ते भर ख़ूब मौज रही। सूरज डूबा ही नहीं। पता है हम सुबह चार बजे चले और शाम आठ बजे पहुँच गए।

और हैरत की बात ये कि न्यू यॉर्क में सूरज डूब रहा था और वहाँ हैदराबाद में दूसरे दिन का सूरज निकल रहा था। न्यू-यॉर्क में रविवार की शाम की आठ बजी थी और हैदराबाद में सोमवार की सुबह की साड़े-पाँच बज रही थी। मेरा तो अभी भी सर चक्कर खा जाता है ये सब घंटे जोड़ते-घटाते।

घर पहुँचे तो अलग ही ठाठ थे। यहाँ फ़्लैट कोई नहीं कहता। सब अपार्टमेंट कहते हैं। लिफ़्ट कोई नहीं कहता। इलेवेटर कहते हैं। बाथरूम नहीं कहते। रेस्ट रूम कहते हैं। भिंडी को ओकरा और बैंगन को एग-प्लांट कहते हैं।

ऐसा लगा कि है तो अंग्रेज़ी पर कोई नहीं भाषा सीख रही हूँ। शुरू में स्कूल में न बच्चों की न टीचर की, कोई बात समझ नहीं आती थी। बोलने का लहजा इतना अलग कि सब सर के ऊपर से ही निकल जाता था।

फिर यकायक सब समझने लगी। अब तो दादाजी भी शिकायत करते हैं कि तू क्या बोलती रहती है, कुछ पल्ले नहीं पड़ता। पता नहीं कब मैं भी यहाँ के बच्चों जैसी बोलने लगी। उनके जैसे कपड़े पहनने लगी।

यहाँ आटोरिक्शा नहीं चलता। उबर से टैक्सी कर सकते हैं। तीस डॉलर तक खर्च हो जाता है कहीं भी जाना हो। भारत में तीस रूपये कुछ नहीं होते। यहाँ तीस डॉलर बहुत होते हैं। एक डॉलर में पाँच केले आ जाते हैं। एक ब्रेड का बड़ा पैकेट आ जाता है। सो हम कहीं नहीं जाते हैं जब तक पापा दफ़्तर से नहीं आ जाते। जब तक वे आते हैं शाम हो जाती है। देर हो जाती है। थक जाते हैं। इसलिए कहीं नहीं जाते। हाँ, यह अच्छी बात है कि शनिवार-रविवार दोनों ही दिन छुट्टी होती है। तब बहुत मज़ा आता है। हम तीनों मिलकर ग्रोसरी ख़रीदने जाते हैं। आते वक़्त चॉटहाऊस से डोसा-इडली-पाव-भाजी जैसा चटपटा खा कर आते हैं।

यह अच्छी बात है कि हमारे पास एक ही कार है। कहीं जाना हो तो साथ ही जाना पड़ता है। मुझे अकेले घर भी नहीं छोड़ सकते हैं। ग़ैर-क़ानूनी जो है। इसलिए हमारा पूरा परिवार हमेशा साथ रहता है। है ना अच्छी बात?

शनिवार की शाम हम किसी के यहाँ तो कोई हमारे यहाँ आ जाता है। तब बहुत स्पेशियल खाना बनता है। खीर-पूड़ी। गाजर का हलवा। सेवियाँ।

अमेरिकन खाना क्या होता है, हमें नहीं पता। हम अभी भी अपना उत्तर भारतीय खाना ही खा रहे हैं। पिज़्ज़ा। बर्गर। पास्ता। ये सब तो हम हैदराबाद में भी खाते थे। लेकिन ये सब फ़ास्ट फ़ूड है। असली अमेरिकी खाना नहीं है। स्कूल के कैफ़ेटेरिया में मिलता है अमेरिकन खाना। ज़्यादातर में मीट होता है। या फीका। या बिलकुल बर्फ सा ठंडा। सूप गर्म होता है। लेकिन मीट वाला। पिज़्ज़ा गर्म होता है। लेकिन मीट वाला।

मैं घर से ही लंच लेकर जाती हूँ। मम्मी सेण्डविच बना कर रख देती है। साथ में कोई फल काट कर रख देती है।

टीवी पर बहुत बढ़िया प्रोग्राम आते हैं। घर में हाई स्पीड इंटरनेट है। वाईफ़ाई हमेशा चलता रहता है। जब जो मन चाहे शो देखो। गाने सुनो। यूट्यूब देखो। मौज ही मौज है।

फल और मिठाईयों की कोई कमी नहीं। फ्रिज और डब्बे तरह-तरह के व्यंजनों से भरे हुए हैं। ख़त्म हुए नहीं कि और आ जाते हैं। किसी बात की कोई कमी नहीं।

बस एक दुख हुआ। बहुत दुख हुआ। इतना दुख हुआ कि बता नहीं सकती। उधर बुआ की शादी हो रही थी। सारी तैयारियाँ हो रही थी। मैं व्हाट्सएप पर देख-देख कर ख़ुश हो रही थी। और शादी में जाने की ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी कि सारे सपनों पर पानी फिर गया।

हम शादी में नहीं जाएँगे। पापा ने कह दिया।

क्यों नहीं जाएँगे? हम तो ज़रूर जाएँगे।

पापा ने कहा तुम बच्ची हो। कुछ नहीं समझती हो। बस कह दिया नहीं जाएँगे तो नहीं जाएँगे।

मैं बहुत रोई। कभी कहते हैं इतनी बड़ी हो गई हो, अपना काम खुद किया करो। कल को तुम्हारा ब्याह हो जाएगा तो कैसे घर चलाओगी। कॉलेज की पढ़ाई कैसे करोगी। वग़ैरह। वग़ैरह।

और आज बच्चा बना दिया।

मैंने मम्मी से पूछा। मम्मी ने कहा बेटा हम परदेस में हैं। कई सारे ऐसे क़ानून होते हैं जो हम समझ कर भी नहीं समझ पाते हैं।

बस ये समझ ले कि हम चक्रव्यूह में फँस गए हैं। पता है न अभिमन्यु की कहानी? उसे चक्रव्यूह में घुसने की कला आती थी। निकलने की नहीं।

यह भी कुछ वैसा ही है। हमें अमेरिका आने का विसा तो मिल गया। और हम खुशी-ख़ुशी आ भी गए। और हम खुश भी हैं। बता कौनसा दुख है यहाँ? एक भी नहीं।

और हम यहाँ से जब चाहें जा भी सकते हैं। कोई रोक-टोक नहीं। लेकिन एक बार चले गए तो फिर लौट कर आ नहीं सकते। क्योंकि जो विसा पहले मिला था। अब ऐसे नहीं मिलेगा। कई काग़ज़ात इकट्ठे करने हैं। मोहर लगवानी है। अपाइंटमेंट लेने हैं। यही सब तू नहीं समझेगी।

हम आज़ाद देश में आज़ाद थे। पिंजरा खुला था। हम स्वतंत्र रूप से उड़ सकते थे। लेकिन हमें पिंजरे का बाथरूम, किचन, 24 घंटे नल से निकलता गर्म पानी, वातानुकूलित घर, चमचमाती कार, मक्खन सी सड़क आदि सब इतने पसन्द आ गए थे, कि कहीं हम कल ये सारे सुख खो न दें, इसी डर में आज के सुख की बलि चढ़ा बैठें।

बुआ की शादी हमारे बिना हुई। हमारे बिना हो गई।

मैं आज भी ख़ुश हूँ।

-॰-

27 जनवरी 2022
सिएटल

Sunday, July 26, 2026

मुसाफ़िर कैफ़े

जिस कहानी में रतलाम हो, सुधा-चंदर हों, इंदौर हो, भोपाल हो, शिमला नहीं तो मसूरी ही हो, वो कहानी बुरी कैसे लग सकती है। अभी तक तो दो एपिसोड ही देखे हैं पता नहीं आगे जा कर कैसी रहेगी पर अभी तो बहुत अच्छी लग रही है। बिंज वॉच करके मैं सारे ही एपिसोड एक साथ देखना चाहता था लेकिन मन को रोका। पिछले महीने शिंगल्स हो गए थे तब से सोचता हूँ रात देर तक जागना सेहत के लिए ठीक नहीं है। 


दिव्य प्रकाश दुबे के उपन्यास - मुसाफ़िर कैफे - पर यह धारावाहिक आधारित है। जो कि आधुनिक युग के बहुत चर्चित लेखक हैं। 


मुख्य कलाकार विक्रांत मेसी हैं। सुधा की भूमिका में वेदिका पिंटो हैं। तीसरा किरदार महिमा मकवाना निभा रही हैं। तीनों ने जानदार अभिनय किया है। 


संवाद भी अच्छे हैं। प्रवाह भी अच्छा है। 


कभी-कभी लगता है कि साहित्य में सास-बहू का या एकता कपूर का या करण जौहर का तड़का लग गया है। 


लेकिन रचनात्मकता के लिए थोड़ी ढील तो देनी ही चाहिए। 


रूचिर अरूण निर्देशक हैं। 


राहुल उपाध्याय । 26 जुलाई 2026 । सिएटल 

Sunday, June 28, 2026

Re: इतवारी पहेली: 2026/06/21

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On Sun, Jun 21, 2026 at 3:17 AM Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> wrote:

इतवारी पहेली:


रांझे की संतान होती तो #^ ## होती

मेहनत करती तो सुनीता ### होती 


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। हर ^ अक्षर के ऊपर वाली बिंदी है या चंद्रबिंदु। जैसे कि मंगल —> #^## या चाँद—> #^#)


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 

सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 28 जून 2026 को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 5 जुलाई 2026 । सिएटल 


Sunday, June 21, 2026

इतवारी पहेली: 2026/06/21

इतवारी पहेली:


रांझे की संतान होती तो #^ ## होती

मेहनत करती तो सुनीता ### होती 


इन दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। हर ^ अक्षर के ऊपर वाली बिंदी है या चंद्रबिंदु। जैसे कि मंगल —> #^## या चाँद—> #^#)


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 

सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 28 जून 2026 को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 5 जुलाई 2026 । सिएटल 


Saturday, May 30, 2026

बशीर बद्र

किसी के दाह संस्कार में कितने लोग आते हैं उससे हमें कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। लेकिन है। हम उस संख्या से उस बंदे की लोकप्रियता और उसके सम्मान का अंदाज़ा लगाते हैं जैसे कि वो संख्या कोई मापदंड हो जबकि यह जानकार हैरत होगी कि आइंस्टाइन के दाह संस्कार में केवल बारह लोग मौजूद थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनकी कब्र पर कोई श्रद्धा सुमन अर्पित हो, इसलिए उन्होंने दफ़्न होने के बजाय जलाया जाना ज़्यादा ज़रूरी समझा। उनकी यह इच्छा पूरी हुई। उनकी एक और इच्छा थी कि उनके दिमाग़ को कोई निकाल न ले और उसकी चीरफाड़ हो। एक डॉक्टर ने उनकी इच्छा के विपरीत उनका दिमाग़ निकाल लिया। उसे लेकर कई दिनों तक यहाँ-वहाँ भागता रहा। बाद में उसे कहीं जमा भी कर दिया। 


लेकिन देखने बोली बात यह है कि वे स्वयं नहीं चाहते थे कि उनके मरने के बाद कोई तमाशा हो। 


जब इंसान सशरीर था तब वह लोकप्रिय था। तब उसे सम्मान मिला। और नहीं है तब भी लोग अपनी-अपनी तरह से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उन्हें याद कर रहे हैं। उन्हें सम्मानित कर रहे हैं। दाह-संस्कार में जाना, न जाना कोई मायने नहीं रखता है। और वैसे भी अंत के कुछ पलों में या महीनों में या वर्षों में उस इंसान का समाज के लिए योगदान बहुत ही न्यून होता है। परिवार के लिए ज़रूर ये क्षति है पर बाक़ी दुनिया के लिए तो वो पहले ही से ग़ायब थे। अभी रवि प्रताप जी ने जो वीडियो शेयर किया, नहीं करना चाहिए था। ऐसे दुखद वीडियो क्यों दिखाने चाहिए।


आइंस्टाइन से जुड़ी एक और बात। उनका इलाज हो सकता था और वे शायद कुछ और दिन ज़िंदा रह सकते थे लेकिन उनका मानना था कि उन्होंने एक भरपूर जीवन जी लिया है और अब और जीना बेकार है इसलिए इलाज नहीं करवाया। 


मेरी मम्मी करीब चालीस साल सैलाना से बाहर शिमला, कलकत्ता, दिल्ली जबलपुर, बैंगलूरू, मेरठ जैसे शहरों में रहीं। बाऊजी के गुज़र जाने के बाद फिर सैलाना लौटीं। वहाँ जा कर कई चीज़ों की सुविधा हुई। लेकिन एक बात वे बार-बार मुझसे कहती थीं कि यहाँ मैं मरी तो 50 लोग तक तो इकट्ठे हो जाएँगे। दिल्ली में पाँच आदमी भी मुश्किल से जुड़ पाते। किस्मत की बात कि वे गुज़रीं यहाँ मेरे पास सिएटल शहर में। वो भी कोविड के आस-पास। फिर भी उनकी इच्छा एक तरह से पूरी हो गई। दाह संस्कार में बीस लोग शायद आए होंगे। पर चूंकि ऑनलाइन सुविधा भी थी तो इसका सजीव प्रसारण देखते हुए पचास लोग तो इकट्ठे हो गए थे। 

बशीर बद्र ने हजारों शेर लिखे होंगे लेकिन उनका सारा साहित्य संसार इन चंद अशआर में समेटा जा सकता है

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों


परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता,

किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता


बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,

जहाँ दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल,

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है


कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

राहुल उपाध्याय । 30 मई 2026 । सिएटल 




Friday, May 8, 2026

VRP

मई का महीना कितना रोचक है। सन 55 में मम्मी की शादी हुई। 2023 में मेरा तलाक। 2020 में मुझे माइक्रोसॉफ़्ट में कहा गया कि मैं अपने जिंदगी के सफर की कहानी लिखूं। और इसी मई के महीने में आज मुझसे कहा गया कि मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ सकता हूँ और उसके बदले में मुझे एक लाख डॉलर मिलेंगे। यानी एक करोड़ रुपए, यह कम भी है और एक तरह से नहीं भी। एक करोड़ रुपए बहुत होते हैं, पर एक लाख डॉलर कुछ भी नहीं। टैक्स के बाद यह हो जाएगा $70,000 या ₹70 लाख। उतने में तो मैंने अभी टेस्ला ही ली थी। एक टेस्ला के बदले नौकरी कैसे छोड़ दूँ? 


यह ले-ऑफ नहीं है। ले-ऑफ में आपके पास अपना निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। एकतरफा निर्णय होता है कि अब आपकी नौकरी नहीं है। अब आप यहां से चले जाइए। यहां निर्णय मेरे हाथों में है। मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ूं, चाहूं तो ना छोड़ूं। पर लोग कह रहे हैं कि अभी तो एक करोड़ रूपए या एक लाख डॉलर मिल रहे हैं। बाद में अगर कुछ हुआ तो शायद कुछ भी ना मिले। खैर, मुझे तो इसमें कोई रुचि नहीं है। टेस्ला मेरे पास है ही और 70 लाख रुपए या 70,000 डॉलर की मेरे जीवन में कोई कीमत नहीं है। 


मैं सन 2008 से ही धन कमाने की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुका हूं। तब तो जबकि ज्यादा जरूरत भी थी, बच्चे छोटे थे, उन्हें कॉलेज भेजना था। तब भी धन कमाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस हो रही थी। अब तो जबकि मैं अकेला हूं, सिर्फ अपनी ही देखभाल करनी है। तब तो और भी आवश्यकता नहीं है। न कोई घर का किराया है, न कोई ज्यादा खर्च। 


पिछले दिनों माइक्रोसॉफ़्ट का स्टॉक बहुत गिरा है। पिछले अक्टूबर से लेकर अभी तक मेरे खाते में कुल साढ़े तीन लाख डॉलर की गिरावट आई है। एक लाख डालर तो कुछ भी नहीं है। 


लोग कहते हैं कि ऐसी बातें ना कहनी चाहिए, ना लिखनी चाहिए, इतने विस्तार से। नजर लग सकती है। देखिए आगे क्या होता है। 


हैं दामन पे जो दाग मेरे

मैं उनसे हुआ अमीर हूँ 


तुम मिले, मुझे सब मिला

मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ


राहुल उपाध्याय । 7 मई 2026 । सिएटल 




Saturday, May 2, 2026

एक दिन

साई पल्लवी और जुनैद खान अभिनीत नई फिल्म "एक दिन" बहुत ही अच्छी फिल्म है। सिर्फ दो घंटे की है, जो कि आजकल चार घंटे चलने वाली फिल्मों के बजाय काफी अच्छी है और पूरी फिल्म एक ही विषय पर केंद्रित है। इधर-उधर की बातों में भटकती नहीं है। हाँ, हालांकि एक अंग्रेजी फिल्म ‘वन डे’ पर आधारित है, लेकिन फिर भी बहुत अच्छी है। मैंने मूल फिल्म देखी नहीं है, पर जो भी हो, बहरहाल बहुत ही अच्छी फिल्म है। 


फिल्म का विषय यह सोचने पर बाध्य करता है कि हमें सब कुछ पूरे जीवन ही क्यों चाहिए? एक जीवन भी कई बार पूरा नहीं पड़ता है, पर एक जीवन की सीमा तो है ही। तो कभी अगर एक दिन की ही सीमा हो तो क्या बुरा है? क्यों हम चाहें कि हम पेरिस में पूरे जीवन रहें? क्यों नहीं एक दिन ही काफी है? 


इसी तरह किसी का साथ एक दिन, 50 दिन या पाँच साल ही रहे तो भी क्या बुरा है? क्यों पूरे जीवन साथ रहने की जिद है? 


फिल्म की पटकथा में कुछ खामियां जरूर हैं, लेकिन वो सब नजरअंदाज की जा सकती हैं। 


साई पल्लवी का अभिनय बहुत ही दमदार है। 


इस फिल्म की वजह से शायद लोग अब जापान ठंड के दिनों में जाने की कोशिश करेंगे, और यह एक नया स्विट्जरलैंड साबित हो सकता है। 


राहुल उपाध्याय । 2 मई 2026 । सिएटल