Saturday, May 30, 2026

बशीर बद्र

किसी के दाह संस्कार में कितने लोग आते हैं उससे हमें कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। लेकिन है। हम उस संख्या से उस बंदे की लोकप्रियता और उसके सम्मान का अंदाज़ा लगाते हैं जैसे कि वो संख्या कोई मापदंड हो जबकि यह जानकार हैरत होगी कि आइंस्टाइन के दाह संस्कार में केवल बारह लोग मौजूद थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनकी कब्र पर कोई श्रद्धा सुमन अर्पित हो, इसलिए उन्होंने दफ़्न होने के बजाय जलाया जाना ज़्यादा ज़रूरी समझा। उनकी यह इच्छा पूरी हुई। उनकी एक और इच्छा थी कि उनके दिमाग़ को कोई निकाल न ले और उसकी चीरफाड़ हो। एक डॉक्टर ने उनकी इच्छा के विपरीत उनका दिमाग़ निकाल लिया। उसे लेकर कई दिनों तक यहाँ-वहाँ भागता रहा। बाद में उसे कहीं जमा भी कर दिया। 


लेकिन देखने बोली बात यह है कि वे स्वयं नहीं चाहते थे कि उनके मरने के बाद कोई तमाशा हो। 


जब इंसान सशरीर था तब वह लोकप्रिय था। तब उसे सम्मान मिला। और नहीं है तब भी लोग अपनी-अपनी तरह से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उन्हें याद कर रहे हैं। उन्हें सम्मानित कर रहे हैं। दाह-संस्कार में जाना, न जाना कोई मायने नहीं रखता है। और वैसे भी अंत के कुछ पलों में या महीनों में या वर्षों में उस इंसान का समाज के लिए योगदान बहुत ही न्यून होता है। परिवार के लिए ज़रूर ये क्षति है पर बाक़ी दुनिया के लिए तो वो पहले ही से ग़ायब थे। अभी रवि प्रताप जी ने जो वीडियो शेयर किया, नहीं करना चाहिए था। ऐसे दुखद वीडियो क्यों दिखाने चाहिए।


आइंस्टाइन से जुड़ी एक और बात। उनका इलाज हो सकता था और वे शायद कुछ और दिन ज़िंदा रह सकते थे लेकिन उनका मानना था कि उन्होंने एक भरपूर जीवन जी लिया है और अब और जीना बेकार है इसलिए इलाज नहीं करवाया। 


मेरी मम्मी करीब चालीस साल सैलाना से बाहर शिमला, कलकत्ता, दिल्ली जबलपुर, बैंगलूरू, मेरठ जैसे शहरों में रहीं। बाऊजी के गुज़र जाने के बाद फिर सैलाना लौटीं। वहाँ जा कर कई चीज़ों की सुविधा हुई। लेकिन एक बात वे बार-बार मुझसे कहती थीं कि यहाँ मैं मरी तो 50 लोग तक तो इकट्ठे हो जाएँगे। दिल्ली में पाँच आदमी भी मुश्किल से जुड़ पाते। किस्मत की बात कि वे गुज़रीं यहाँ मेरे पास सिएटल शहर में। वो भी कोविड के आस-पास। फिर भी उनकी इच्छा एक तरह से पूरी हो गई। दाह संस्कार में बीस लोग शायद आए होंगे। पर चूंकि ऑनलाइन सुविधा भी थी तो इसका सजीव प्रसारण देखते हुए पचास लोग तो इकट्ठे हो गए थे। 

बशीर बद्र ने हजारों शेर लिखे होंगे लेकिन उनका सारा साहित्य संसार इन चंद अशआर में समेटा जा सकता है

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों


परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता,

किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता


बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,

जहाँ दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल,

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है


कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

राहुल उपाध्याय । 30 मई 2026 । सिएटल 




Friday, May 8, 2026

VRP

मई का महीना कितना रोचक है। सन 55 में मम्मी की शादी हुई। 2023 में मेरा तलाक। 2020 में मुझे माइक्रोसॉफ़्ट में कहा गया कि मैं अपने जिंदगी के सफर की कहानी लिखूं। और इसी मई के महीने में आज मुझसे कहा गया कि मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ सकता हूँ और उसके बदले में मुझे एक लाख डॉलर मिलेंगे। यानी एक करोड़ रुपए, यह कम भी है और एक तरह से नहीं भी। एक करोड़ रुपए बहुत होते हैं, पर एक लाख डॉलर कुछ भी नहीं। टैक्स के बाद यह हो जाएगा $70,000 या ₹70 लाख। उतने में तो मैंने अभी टेस्ला ही ली थी। एक टेस्ला के बदले नौकरी कैसे छोड़ दूँ? 


यह ले-ऑफ नहीं है। ले-ऑफ में आपके पास अपना निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। एकतरफा निर्णय होता है कि अब आपकी नौकरी नहीं है। अब आप यहां से चले जाइए। यहां निर्णय मेरे हाथों में है। मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ूं, चाहूं तो ना छोड़ूं। पर लोग कह रहे हैं कि अभी तो एक करोड़ रूपए या एक लाख डॉलर मिल रहे हैं। बाद में अगर कुछ हुआ तो शायद कुछ भी ना मिले। खैर, मुझे तो इसमें कोई रुचि नहीं है। टेस्ला मेरे पास है ही और 70 लाख रुपए या 70,000 डॉलर की मेरे जीवन में कोई कीमत नहीं है। 


मैं सन 2008 से ही धन कमाने की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुका हूं। तब तो जबकि ज्यादा जरूरत भी थी, बच्चे छोटे थे, उन्हें कॉलेज भेजना था। तब भी धन कमाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस हो रही थी। अब तो जबकि मैं अकेला हूं, सिर्फ अपनी ही देखभाल करनी है। तब तो और भी आवश्यकता नहीं है। न कोई घर का किराया है, न कोई ज्यादा खर्च। 


पिछले दिनों माइक्रोसॉफ़्ट का स्टॉक बहुत गिरा है। पिछले अक्टूबर से लेकर अभी तक मेरे खाते में कुल साढ़े तीन लाख डॉलर की गिरावट आई है। एक लाख डालर तो कुछ भी नहीं है। 


लोग कहते हैं कि ऐसी बातें ना कहनी चाहिए, ना लिखनी चाहिए, इतने विस्तार से। नजर लग सकती है। देखिए आगे क्या होता है। 


हैं दामन पे जो दाग मेरे

मैं उनसे हुआ अमीर हूँ 


तुम मिले, मुझे सब मिला

मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ


राहुल उपाध्याय । 7 मई 2026 । सिएटल 




Saturday, May 2, 2026

एक दिन

साई पल्लवी और जुनैद खान अभिनीत नई फिल्म "एक दिन" बहुत ही अच्छी फिल्म है। सिर्फ दो घंटे की है, जो कि आजकल चार घंटे चलने वाली फिल्मों के बजाय काफी अच्छी है और पूरी फिल्म एक ही विषय पर केंद्रित है। इधर-उधर की बातों में भटकती नहीं है। हाँ, हालांकि एक अंग्रेजी फिल्म ‘वन डे’ पर आधारित है, लेकिन फिर भी बहुत अच्छी है। मैंने मूल फिल्म देखी नहीं है, पर जो भी हो, बहरहाल बहुत ही अच्छी फिल्म है। 


फिल्म का विषय यह सोचने पर बाध्य करता है कि हमें सब कुछ पूरे जीवन ही क्यों चाहिए? एक जीवन भी कई बार पूरा नहीं पड़ता है, पर एक जीवन की सीमा तो है ही। तो कभी अगर एक दिन की ही सीमा हो तो क्या बुरा है? क्यों हम चाहें कि हम पेरिस में पूरे जीवन रहें? क्यों नहीं एक दिन ही काफी है? 


इसी तरह किसी का साथ एक दिन, 50 दिन या पाँच साल ही रहे तो भी क्या बुरा है? क्यों पूरे जीवन साथ रहने की जिद है? 


फिल्म की पटकथा में कुछ खामियां जरूर हैं, लेकिन वो सब नजरअंदाज की जा सकती हैं। 


साई पल्लवी का अभिनय बहुत ही दमदार है। 


इस फिल्म की वजह से शायद लोग अब जापान ठंड के दिनों में जाने की कोशिश करेंगे, और यह एक नया स्विट्जरलैंड साबित हो सकता है। 


राहुल उपाध्याय । 2 मई 2026 । सिएटल