किसी के दाह संस्कार में कितने लोग आते हैं उससे हमें कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। लेकिन है। हम उस संख्या से उस बंदे की लोकप्रियता और उसके सम्मान का अंदाज़ा लगाते हैं जैसे कि वो संख्या कोई मापदंड हो जबकि यह जानकार हैरत होगी कि आइंस्टाइन के दाह संस्कार में केवल बारह लोग मौजूद थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनकी कब्र पर कोई श्रद्धा सुमन अर्पित हो, इसलिए उन्होंने दफ़्न होने के बजाय जलाया जाना ज़्यादा ज़रूरी समझा। उनकी यह इच्छा पूरी हुई। उनकी एक और इच्छा थी कि उनके दिमाग़ को कोई निकाल न ले और उसकी चीरफाड़ हो। एक डॉक्टर ने उनकी इच्छा के विपरीत उनका दिमाग़ निकाल लिया। उसे लेकर कई दिनों तक यहाँ-वहाँ भागता रहा। बाद में उसे कहीं जमा भी कर दिया।
लेकिन देखने बोली बात यह है कि वे स्वयं नहीं चाहते थे कि उनके मरने के बाद कोई तमाशा हो।
जब इंसान सशरीर था तब वह लोकप्रिय था। तब उसे सम्मान मिला। और नहीं है तब भी लोग अपनी-अपनी तरह से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उन्हें याद कर रहे हैं। उन्हें सम्मानित कर रहे हैं। दाह-संस्कार में जाना, न जाना कोई मायने नहीं रखता है। और वैसे भी अंत के कुछ पलों में या महीनों में या वर्षों में उस इंसान का समाज के लिए योगदान बहुत ही न्यून होता है। परिवार के लिए ज़रूर ये क्षति है पर बाक़ी दुनिया के लिए तो वो पहले ही से ग़ायब थे। अभी रवि प्रताप जी ने जो वीडियो शेयर किया, नहीं करना चाहिए था। ऐसे दुखद वीडियो क्यों दिखाने चाहिए।
आइंस्टाइन से जुड़ी एक और बात। उनका इलाज हो सकता था और वे शायद कुछ और दिन ज़िंदा रह सकते थे लेकिन उनका मानना था कि उन्होंने एक भरपूर जीवन जी लिया है और अब और जीना बेकार है इसलिए इलाज नहीं करवाया।
मेरी मम्मी करीब चालीस साल सैलाना से बाहर शिमला, कलकत्ता, दिल्ली जबलपुर, बैंगलूरू, मेरठ जैसे शहरों में रहीं। बाऊजी के गुज़र जाने के बाद फिर सैलाना लौटीं। वहाँ जा कर कई चीज़ों की सुविधा हुई। लेकिन एक बात वे बार-बार मुझसे कहती थीं कि यहाँ मैं मरी तो 50 लोग तक तो इकट्ठे हो जाएँगे। दिल्ली में पाँच आदमी भी मुश्किल से जुड़ पाते। किस्मत की बात कि वे गुज़रीं यहाँ मेरे पास सिएटल शहर में। वो भी कोविड के आस-पास। फिर भी उनकी इच्छा एक तरह से पूरी हो गई। दाह संस्कार में बीस लोग शायद आए होंगे। पर चूंकि ऑनलाइन सुविधा भी थी तो इसका सजीव प्रसारण देखते हुए पचास लोग तो इकट्ठे हो गए थे।
बशीर बद्र ने हजारों शेर लिखे होंगे लेकिन उनका सारा साहित्य संसार इन चंद अशआर में समेटा जा सकता है
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,
जहाँ दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल,
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
राहुल उपाध्याय । 30 मई 2026 । सिएटल
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