मैं इकसठ का हूँ पर इतना पुराना भी नहीं। एडिसन, आइन्स्टाइन, ग्राहम बेल, मारकोनी सब अपनी प्रतिभा के बल पर तब तक दुनिया बदल चुके थे।
लेकिन कुछ क्षेत्र सारे विकास से वंचित रह ही जाते हैं।
मेरा गाँव - शिवगढ़ - भी मेरे जन्म के कई वर्ष बाद तक वंचित रहा। नल मैंने पहली बार अपने ननिहाल - सैलाना - में देखा। यह कोई सरकारी नल नहीं था। दासाब - मेरे नाना - अपने ही घर में सन् 1936 से त्रिवेदी प्रायवेट स्कूल चलाते थे। घर में कुआँ था। बच्चे बिना पानी बर्बाद किए जल पी सके इसलिए एक टंकी रख रखी थी जिसमें नल की टोंटी भी थी। सुबह स्कूल में आते ही से कुछ बच्चों की ज़िम्मेदारी होती थी कुएँ से पानी खींच कर टंकी भरने की।
शिवगढ़ में पानी पीने के लिए बावड़ी से लाया जाता था। मम्मी ही लाती थी। तीन पीतल के घड़े सर पर रखकर नंगे पाँव। मैं भी नंगे पाँव ही रहता था।
नहाने के लिए हम खार जाते थे। खार यानी पानी की वह धारा जो बाँध से छोड़ी जाती थी।
शिवगढ़ में बिजली नहीं थी। मम्मी को आटा दो पाटो की चक्की चलाकर पीसना पड़ता था। मक्की का आटा भी ऐसे ही पीसते थे। उस ज़माने में गेहूँ महँगा होता था। इसलिए अक्सर मक्के की रोटी ही बनती थी।
टूथब्रश/टूथपेस्ट कुछ नहीं था। हथेली पर राख रख कर उँगली लगा-लगा कर दाँत साफ़ किया करते थे। राख से ही बर्तन साफ़ होते थे। राख से ही हाथ धोए जाते थे। राख चूल्हे से मिल जाती थी।
नहाने के लिए होता था लाइफ़बॉय साबुन। कपड़े धोने के लिए नाम रहित पीली बट्टी।
नमक पाऊडर जैसा नहीं डलियों में आता था। जैसे मिश्री की डली पर उससे दस गुना बड़ी। चीनी नहीं गुड़ खाया जाता था। चीनी को अशुद्ध माना जाता था। चाय को नशा कहा जाता था। रइसों के चोंचले।
बिजली नहीं होने के वजह से घर में कोई उपकरण नहीं थे। चाबी भरने से चलने वाली अलार्म घड़ी थी। उसमें चाबी भरने में मज़ा आता था। अलार्म का टाईम सेट कर उसकी टनननन आवाज़ सुनना अच्छा लगता था। मेरे लिए यह एक रोचक खिलौना था।
शाम को रोशनी के लिए लालटेन जला ली जाती थी। बहुत कम समय के लिए। खाना अंधेरा होने से पहले ही खा लिया जाता था। बहुत जल्दी ही हम सो जाते थे। लालटेन आधे घंटे में ज़्यादा नहीं चलता होगा।
सोने के लिए कोई अलग कमरा नहीं होता था। न कोई पलंग। घर में कोई फ़र्नीचर नहीं होता था। पहली कुर्सी दासाब की जाली में देखी। वहाँ बच्चों का आना-जाना मना था। इसलिए पहली बार कुर्सी पर रूनखेड़ा में मामासाब के रेलवे क्वार्टर में बैठा। मामासाब वहाँ स्टेशन मास्टर थे और गर्मी की छुट्टियों में हम सब वहीं रहते थे। कुर्सी मुझे इतनी पसन्द आई कि मैं दो कुर्सियों को जोड़ कर और कुशन लगाकर उसी पर सो जाता था। सोचता था, वाह क्या ठाठ की ज़िंदगी है। सब ज़मीं पर सो रहे हैं मैं उन सबसे ऊपर।
राहुल उपाध्याय । 24 सितम्बर 2024 । टोक्यो से होनोलुलु जाते हुए