Tuesday, September 24, 2024

टूथपेस्ट

मैं इकसठ का हूँ पर इतना पुराना भी नहीं। एडिसन, आइन्स्टाइन, ग्राहम बेल, मारकोनी सब अपनी प्रतिभा के बल पर तब तक दुनिया बदल चुके थे। 


लेकिन कुछ क्षेत्र सारे विकास से वंचित रह ही जाते हैं। 


मेरा गाँव - शिवगढ़ - भी मेरे जन्म के कई वर्ष बाद तक वंचित रहा। नल मैंने पहली बार अपने ननिहाल - सैलाना - में देखा। यह कोई सरकारी नल नहीं था। दासाब - मेरे नाना - अपने ही घर में सन् 1936 से त्रिवेदी प्रायवेट स्कूल चलाते थे। घर में कुआँ था। बच्चे बिना पानी बर्बाद किए जल पी सके इसलिए एक टंकी रख रखी थी जिसमें नल की टोंटी भी थी। सुबह स्कूल में आते ही से कुछ बच्चों की ज़िम्मेदारी होती थी कुएँ से पानी खींच कर टंकी भरने की। 


शिवगढ़ में पानी पीने के लिए बावड़ी से लाया जाता था। मम्मी ही लाती थी। तीन पीतल के घड़े सर पर रखकर नंगे पाँव। मैं भी नंगे पाँव ही रहता था। 


नहाने के लिए हम खार जाते थे। खार यानी पानी की वह धारा जो बाँध से छोड़ी जाती थी। 


शिवगढ़ में बिजली नहीं थी। मम्मी को आटा दो पाटो की चक्की चलाकर पीसना पड़ता था। मक्की का आटा भी ऐसे ही पीसते थे। उस ज़माने में गेहूँ महँगा होता था। इसलिए अक्सर मक्के की रोटी ही बनती थी। 


टूथब्रश/टूथपेस्ट कुछ नहीं था। हथेली पर राख रख कर उँगली लगा-लगा कर दाँत साफ़ किया करते थे। राख से ही बर्तन साफ़ होते थे। राख से ही हाथ धोए जाते थे। राख चूल्हे से मिल जाती थी। 


नहाने के लिए होता था लाइफ़बॉय साबुन। कपड़े धोने के लिए नाम रहित पीली बट्टी। 


नमक पाऊडर जैसा नहीं डलियों में आता था। जैसे मिश्री की डली पर उससे दस गुना बड़ी। चीनी नहीं गुड़ खाया जाता था। चीनी को अशुद्ध माना जाता था। चाय को नशा कहा जाता था। रइसों के चोंचले। 


बिजली नहीं होने के वजह से घर में कोई उपकरण नहीं थे। चाबी  भरने से चलने वाली अलार्म घड़ी थी। उसमें चाबी भरने में मज़ा आता था। अलार्म का टाईम सेट कर उसकी टनननन आवाज़ सुनना अच्छा लगता था। मेरे लिए यह एक रोचक खिलौना था। 


शाम को रोशनी के लिए लालटेन जला ली जाती थी। बहुत कम समय के लिए। खाना अंधेरा होने से पहले ही खा लिया जाता था। बहुत जल्दी ही हम सो जाते थे। लालटेन आधे घंटे में ज़्यादा नहीं चलता होगा। 


सोने के लिए कोई अलग कमरा नहीं होता था। न कोई पलंग। घर में कोई फ़र्नीचर नहीं होता था। पहली कुर्सी दासाब की जाली में देखी। वहाँ बच्चों का आना-जाना मना था। इसलिए पहली बार कुर्सी पर रूनखेड़ा में मामासाब के रेलवे क्वार्टर में बैठा। मामासाब वहाँ स्टेशन मास्टर थे और गर्मी की छुट्टियों में हम सब वहीं रहते थे। कुर्सी मुझे इतनी पसन्द आई कि मैं दो कुर्सियों को जोड़ कर और कुशन लगाकर उसी पर सो जाता था। सोचता था, वाह क्या ठाठ की ज़िंदगी है। सब ज़मीं पर सो रहे हैं मैं उन सबसे ऊपर। 


राहुल उपाध्याय । 24 सितम्बर 2024 । टोक्यो से होनोलुलु जाते हुए 






Wednesday, September 18, 2024

ओसाका - 18 सितम्बर 2024

मेरी आदत है मैं पहले से कुछ जानकारी नहीं लेता हूँ कि आगामी यात्रा में कब, क्या होगा। कहाँ जाएँगे। कहाँ रूकेंगे। कहाँ खाएँगे। मुझे लगता है कि जो होगा, अच्छा ही होगा। और होता ही है। 

 आज टोक्यो से भागते दौड़ते हमने ओसाको की फ़्लाइट पकड़ी। टोक्यो एयरपोर्ट पर कर्मचारी अंग्रेज़ी कम समझते हैं। उससे उलझन भी होती है। फिर एयरलाइंस के नाम भी बदलते रहते हैं। उलझन और बढ़ जाती है। उन्नीस लोग साथ हो तो कोई न कोई कहीं न कहीं पीछे छूट ही जाता है। उसे समेटो तो कोई और फिसल जाता है। मुझे इन सबसे परेशानी नहीं होती। इन्हें मैं यात्रा के आनंद का अभिन्न अंग मानता हूँ। 

 लोग सोच रहे थे कि हम एयरपोर्ट से होटल जाएँगे। नहा-धो कर, खा-पी कर कुछ घूमेंगे। थोड़ा आराम भी करेंगे। समय का भी अंतर है। जापान भारत से साढ़े तीन घंटे आगे है। हम कल शाम छः बजे चले। सुबह छः बजे टोक्यो और दस बजे ओसाका पहुँचे। तब से हम घूम रहे हैं। अब तक होटल नहीं गए हैं। कुछ लोग असहज हैं। 

 पर जो दो नज़ारे देखे, उनसे दिन बन गया। 

 पहला था तेरह सौ वर्ष पूर्व बना बौद्ध मन्दिर। बहुत ही भव्य और विशालकाय। मन्दिर के अंदर बुद्ध की भव्य प्रतिमाएँ हैं। अद्भुत। 

 दूसरा अक्वेरियम। इसमें सबसे ख़ास बात यह कि यहाँ विश्व के हर क्षेत्र की जलवायु की नक़ल बना दी गई है। इसलिए यहाँ पेंग्विन भी हैं। और सील भी। व्हेल भी। डॉल्फिन भी। शार्क भी। 

 राहुल उपाध्याय । 18 अगस्त 2024 । ओसाका

Monday, September 16, 2024

वीर ज़ारा- समीक्षा

कल बहुत नमक खर्च हुआ। 


यश चोपड़ा द्वारा निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म 'वीर ज़ारा' हाल ही में दोबारा रिलीज़ हुई है और यह मेरा सौभाग्य रहा कि मैं दिल्ली के छोटे से दौरे के दौरान इसे देख पाया। 2004 में जब यह पहली बार रिलीज़ हुई थी तब मैं सेन फ़्रांसिस्को में रहता था एवं अत्यंत व्यस्त था दो बच्चों की परवरिश में, अपने सबवे रेस्टोरेन्ट के प्रबंधन में एवं नयी नौकरी ढूँढने में। इसे डीवीडी पर ही देख कर संतोष कर लिया था। 


बड़े पर्दे पर देखने का रोमांच तो हमेशा ही रहता है। आदित्य चोपड़ा की कहानी, स्क्रीनप्ले, और संवाद ने एक ऐसा समाँ बाँधा कि 192 मिनट कब गुज़र गए पता ही नहीं चला। 


शुरूआत के कुछ सीन छोटे किए जा सकते थे। चौधरी सुरेन प्रताप सिंह और सरस्वती देवी की नोकझोंक भी हटाई जा सकती थी। लोहड़ी का गीत भी हटाया जा सकता था। 


जैसे ही मनोज वाजपेयी का किरदार आया, कहानी में दम आया। फिर तो भावनाओं का बाँध जैसे टूट पड़ा हो। दिव्या दत्ता, किरण खेर, बोमन ईरानी, इन सबके अभिनय ने फ़िल्म में चार चाँद लगा दिए। न जाने कितनी बार आँखों से आँसू टपकते रहे। 


गीत और संगीत इस फिल्म की जान हैं। उन्हीं के सहारे यह फ़िल्म आसानी से धीमी गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती गई। 


मैंने जोड़-भाग नहीं किया लेकिन मेरा अनुमान है कि केवल गीतों में ही सौ मिनट खर्च हो गए होंगे। 


राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2024 । दिल्ली 

Sunday, September 15, 2024

15 सितम्बर 1986

8 सितम्बर 1986 को मिले इस वीसा ने मेरी ज़िन्दगी का रूख बदल दिया। 


मेरे पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी। बोकारो स्टील प्लांट की पसंदीदा नौकरी का प्रस्ताव भी था। मैं आरामपसंद हूँ। और एक आरामदायक ज़िन्दगी की परिकल्पना 1985 की गर्मियों में की इन्टर्नशिप कर चुका था। बोकारो की ज़िंदगी, वहाँ की आवास व्यवस्था से मैं प्रसन्न था। नौ से पाँच वातानुकूलित दफ़्तर में काम करूँगा। शाम को फिल्म देखूँगा और जी भर आईस क्रीम खाऊँगा। 


22 का था। लेकिन सोच यही तक सीमित थी। किसी बात का जज़्बा नहीं। कपिल देव इससे कम उम्र में पाकिस्तान में देश का गौरव बढ़ा चुके थे। 


यह वीसा भी मेरी महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। आय-आय-टी की हवा ही कुछ ऐसी होती है। आप भी भीड़ का एक हिस्सा है। जो सब करते हैं, वही आप भी करते हैं। मौलिक सोच बहुत कम होती है। 


सबने जी-आर-ई की परीक्षा दी। मैंने भी दी। टोफल की भी। अमेरिका के चार कॉलेज को मास्टर्स के आवेदन पत्र भेजे। उनमें से एक ने स्वीकृति दे दी और छात्रवृत्ति भी। 


अमेरिका आना इतना आसान नहीं है। इसीलिए मुझे हार-फूल से विदा किया गया। मेरे परिवार के लिए, एवं देश के लिए, मैं देश का गौरव था जिसे ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ था। हर कोई ख़ुश था। 


15 सितम्बर 1986. जिस दिन मैं रवाना हुआ, मैं बहुत रोया। इसलिए नहीं कि मुझमें देशप्रेम कूट-कूट कर भरा था। बल्कि इसलिए कि एक बार नवीं कक्षा में असफल होने के बाद मुझे हर परीक्षा से चिढ़ थी। मुझे सीखना, सिखाना बहुत पसन्द है। इम्तिहान से नफ़रत। हालाँकि उस असफलता ने ही मुझे सिखाया कि कैसे सीखा जाता है। 


जैसे ही बी-टेक ख़त्म हुआ, नौकरी मिली, मैं निश्चिंत था कि अब कोई इम्तिहान नहीं दूँगा। अब यह दो साल की ज़हमत और आ गई सर पर। 


कहने को कोई कह सकता है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी। वीसा लेने तुम ख़ुद गए थे। न जाते तो सारी समस्या की जड़ ही मिट जाती। 


कहना आसान है। सारी हवा ही ऐसी होती है कि न चाहते हुए भी कदम बढ़ते जाते हैं। 


यह वीसा एक साल का था। मास्टर्स करने में दो साल लगते हैं। यानी पहले साल में मैं भारत आऊँ तो वापस बिना नया वीसा लिए अमेरिका जा सकता हूँ। उसके बाद भारत आ सकता हूँ, लेकिन अमेरिका के लिए वीसा लिए बिना नहीं। वीसा मिलना ऐसा जैसे लॉटरी निकलना। पता नहीं किसे मिले, किसे नहीं। 


पहले साल मिलने-जुलने के लिए आना असंभव था। टिकिट के लिए पैसे ही नहीं थे। छात्रवृत्ति से किराया और घर का खर्च निकल जाता था। पढ़ाई के बाद नौकरी लगी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, कम्प्यूटर साईंस, फ़्रेंकलिन कॉलेज, इण्डियना में। अब पैसा था, लेकिन वापस आना इतना आसान नहीं कि टिकट ली और बैठ गए। 


यदि भारत आया, और वीसा नहीं मिला तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा। सो मेक्सिको गया। वीसा नहीं मिला। एक साल बाद फिर गया। तब मिल गया। 


इसी फ़ोटो में दिख रहा है कि मैं 9 जुलाई 1991 को वापस पहली बार भारत आया। 


इस फ़ोटो में दिख रहे हैं बाऊजी और मम्मी। जबलपुर रेल्वे स्टेशन। मेरी ट्रेन के इंतज़ार में। हाथ में फिर से हार-फूल लिए। 


पाँच साल बाद वे मुझे और मैं उन्हें पहली बार देखूँगा। वीडियो कॉलिंग तो दूर, घर पर फ़ोन भी नहीं थे। जब जनवरी में वे कलकत्ता किसी शादी में गए, तब मैंने पहली बार मम्मी की आवाज़ सुनी। 67 मिनट बात की। बात कम, रोया ज़्यादा। पूरी कॉल का खर्च महीने भर के अपार्टमेंट के किराए से ज़्यादा था। 


राहुल उपाध्याय । 15 सितम्बर 2024


Wednesday, September 4, 2024

शिक्षक दिवस

हम गर्व से कहते हैं कि हमारी संस्कृति में मातृ दिवस, पितृ दिवस का कोई स्थान नहीं है। क्योंकि हर दिन हम उनका सम्मान करते हैं, आदर करते हैं, ख़याल रखते हैं, देखभाल करते हैं। 


फिर ये शिक्षक दिवस क्यों? ये गुरू पूर्णिमा किस लिए?


शिक्षक एक पेशा है। रोज़गार है। कैरियर है। वेतन मिलता है। मुफ्त में कोई कुछ नहीं पढ़ाता। 


पढ़ाता भी है तो सबको एक साथ। कोई सीख पाता है। कोई नहीं। 


इसमें छात्र की भूमिका ज़्यादा है या शिक्षक की?


गुरू? गुरू तो कोई होता ही नहीं है। यूँ ही हमने भ्रम पाल रखे हैं। 


गाना सिखाने वाले भी गुरू नहीं। पैसे लेकर सिखाते हैं। रोज़गार है। पेशा है। इसी तरह से तबला सिखाने वाले, गिटार सिखाने वाले, सब के सब धन कमा रहे हैं। और कुछ लोग सीख जाते हैं। कुछ नहीं। 


क्रिकेट के कोच, ऑफिस के सलाहकार सब इन्हीं श्रेणियों में फ़िट हो जाते हैं। गुरू कोई नहीं। 


कोई कहता है मेरी माँ मेरी गुरू है। मेरे पिता मेरे गुरू हैं। 


ये सब भी रिश्तेदार हैं जो अपने बच्चों का भला चाहते हैं और समय-समय पर राय देते हैं। गुरू नहीं। 


राहुल उपाध्याय । 5 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


स्त्री 2 - समीक्षा

स्त्री 2 बिलकुल बेकार, बकवास, बच्चों के लायक़ फ़िल्म है जिसे बच्चे भी नहीं देख पाएँगे। और समझ तो कोई नहीं पाएगा। 


आजकल लोगों को सच कहने में शर्म आने लगी है। ख़ासकर तब जब कुछ पापुलर हो जाए तो उसके ख़िलाफ़ कुछ कहना तो ग़ैर-ज़िम्मेदार लगने लगता है। यह फिल्म इतने पैसे कमा रही है तो ज़रूर कुछ तो अच्छा ही होगा। कैसे कह सकते हैं कि बे-सर-पैर की है। 


सरकटा पात्र तो है ही पटकथा भी सरकटी है। 


फ़िल्म का ख़ास आकर्षण 'आई नहीं' गीत है। गीत क्या नृत्य है। लेकिन यह गीत फ़िल्म में है ही नहीं। फ़िल्म के अंत होने पर क्रेडिट रोल के साथ ज़बरदस्ती घुसेड़ दिया गया है। और जैसे कि यह कम पड़ रहा था तो एक और गीत भी जोड़ दिया गया है। जनता तब तक थियेटर से बाहर हो चुकी थी। 


'आई नहीं' गीत की धुन 'भूल भूलैया' के गीत 'हरे राम हरे कृष्ण' से चुराई गई है। कोरियोग्राफ़ी 'पुष्पा' के गीत 'सामी' से चुराई गई है। तमन्ना का काम सिर्फ़ एक आयटम सांग के लिए है। वह गीत भी 'पठान' के गीत 'बेशर्म' से चुराया गया है। 


जैसे कि अंदेशा हो कि कहानी अपने दम पर नहीं चल पाएगी तो दो मेहमान कलाकार भी हैं। अक्षय कुमार और वरूण धवन। जिनकी कोई तुक नहीं है। 


वन लाइनर जोक्स रील्स में ज़्यादा प्रभावी हैं। फिल्म में नहीं। अटल जी, दिशा पटानी और नेहा कक्कड़ का सन्दर्भ अच्छा लगा। अर्द्धनारीश्वर का सीजीआई भी पसन्द आया। गुफा में लावा आदि लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स जैसी फ़िल्मों से प्रभावित लगे। 


मैं मुम्बई फ़िल्म के स्क्रिप्ट राईटर्स आदि से मिल चुका हूँ। तो दुख होता है यह देखकर कि वे विदेशी फ़िल्मों की नक़ल करने में अपनी भलाई समझते हैं। और दर्शक भी ख़ुश होते हैं कि हम भी उनके जैसी फ़िल्म बना सकते हैं। 


राहुल उपाध्याय । 4 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


Monday, September 2, 2024

आईसी 814 - समीक्षा

आईसी 814 अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित एक वेब सीरीज़ है। जो इन दिनों काफ़ी चर्चा में हैं एवं सराही जा रही है। यह भी एक भेड़ चाल का उदाहरण है। 


जन समाज की सराहना तो भेड़ चाल से प्रभावित है ही, इस सीरीज़ का निर्माण भी भेड़ चाल से प्रेरित है। हम नया विषय कोई सोच ही नहीं पाते हैं। वही घिसीपिटी ड्रामा-त्रासदी-सच्ची घटना के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। ऐसी कई सीरीज़ बनती रही हैं और बनती रहेंगी। 


ज़बरदस्ती में मामला इतने एपिसोड में खींचा गया है। टीवी चैनल है, अख़बार है, विशेष आवश्यकता वाला बच्चा है, पति-पत्नी का मनमुटावा है, साँस लेने में तकलीफ़ है, फ़र्ज़ निभानेवाली परिचारिकाएँ हैं, मोटे अफ़सर हैं, रात के अंधेरे में हो रहे खुफिया ऑपरेशन हैं, राजनीतिक मतभेद हैं। सारे मसाले हैं। खिचड़ी तो अच्छी ही बनेगी। उस पर से निर्माण की गुणवत्ता और कलाकारों की अदायगी उम्दा है। तो वाह तो निकलेगी ही। 


लेकिन यदि थोड़ा दूर होकर गंभीरता से सोचें तो क्या है इस वेब सीरीज़ में? कुछ भी नया नहीं। कोई नया विचार नहीं। कोई जागरूकता नहीं। 


अनुभव सिन्हा की भीड़ फ़िल्म भीड़ से अलग थी। छोटी फ़िल्म। गहरी बात। 


आईसी 814 से निराशा ही हाथ लगी। 


सारे उम्दा कलाकारों की उम्दा अदायगी व्यर्थ गई। उनके पात्र रोबोट जैसे लग रहे थे। एक ही इमोशन पूरी सीरीज़ में। जैसे उन्हें चिंतित रहने के अलावा और कोई निर्देश नहीं दिया गया। 


राहुल उपाध्याय । 3 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


Sunday, September 1, 2024

चुनाव

गोपखपुर में क़रीब 120 प्राइवेट स्कूल है। उन स्कूलों की एक संस्था है। गोरखपुर स्कूल्स एसोसिएशन। आज उसके पदाधिकारियों के चुनाव थे। 


मेरे मित्र, विकास, को उपाध्यक्ष नामांकित किया गया था। मैंने आग्रह किया कि क्या मैं इस प्रक्रिया को देख सकता हूँ तो उन्होंने सहमति दे दी। मैं देखना चाहता था कि एक छोटी संस्था का चुनाव कैसा होता है। 


दस बजे होटल विवेक में चुनाव था। शाम चार बजे तक चला। पहले चाय-नाश्ता था। एक बजे भोजन भी। सब सर्व सहमति से चुन लिए गए। सचिव के पद के लिए दो उम्मीदवार थे। गोरखपुर के विधायक भी मंच पर उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि दोनों प्रत्याशी आपस में बात कर लें एवं एक बैठ जाए। पर ऐसा नहीं हुआ और चौबीस वर्ष के संस्था के इतिहास मे पहली बार गुप्त मतदान हुआ। जो हार गए उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया गया। उपाध्यक्ष चार हो सकते हैं। दो ही व्यक्ति नामांकित हुए थे। ये तीसरे बन गए। इस प्रकार से सौहार्द बना रहा। किसी का दिल नहीं दुखा। 


आज ही के दिन सबसे पाँच हज़ार रूपये की वार्षिक सदस्यता भी वसूली गई। सबने नगद दिए। कोई पेटीएम नहीं। क़रीब सत्तर सदस्य मौजूद थे। सबके पास आईफ़ोन था। हर कोई बिज़नेसमैन था। कोई भी शिक्षाविद नहीं। सारे स्कूलों का मिलाकर वार्षिक कारोबार दो हज़ार करोड़ रुपए का है। सारे सदस्य पुरुष थे। एक भी महिला नहीं। बाद में दो महिलाएँ आईं। उनके पिता कोविड में गुज़र गए तो वे अब स्कूल चला रही हैं। 


पूरा दिन अच्छा गुज़रा। फ़िल्मों में जो दिखाया जाता है उसे आँखों के सामने घटित होते देखना अच्छा लगा। 


कान्वेन्ट स्कूल वाले नहीं आए। वे आते ही नहीं है। उन्हें इस संस्था की ज़रूरत नहीं है। उनका अपना ही रुतबा है। इसी तरह से जो स्कूल शीर्ष पर हैं, वे भी नहीं आते हैं। उन्हें भी इस संस्था की आवश्यकता नहीं है। ये स्कूल इसलिए शीर्ष पर हैं कि वे हर किसी को अपने स्कूल में दाख़िला नहीं देते हैं। एडमिशन टेस्ट होता है। जिसमें सौ में से दस ही सफल हो पाते हैं। वे फ़ीस भी तगड़ी लेते हैं और सब सहर्ष देते हैं। 


यह संस्था उन लोगों के लिए काम की है जो किसी न किसी कारण से शासन की निगाहों में हैं। जैसे कि शिक्षक-छात्र अनुपात, कमरों का क्षेत्रफल, पीने के पानी की सुविधा, खेल-कूद की सुविधाएँ, इमारत की हालत, आदि। पढ़ाई के मापदंड अभी विकसित नहीं हैं एवं उन पर क्रियान्वयन करना कठिन है। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 


जन्मदिन समारोह

ज़िन्दगी में पहली बार कल रात एक ऐसे जन्मदिन समारोह में शामिल हुआ, जहां हर परिवार अपनी कार से आया। जन्मदिन पन्द्रह वर्षीय कन्या का था। क़रीब बीस परिवार के पचास प्राणी थे। हर परिवार कोई न कोई बिज़नेस कर रहा है। 


समारोह शहर से दूर बसे रिज़ोर्ट मे था। घर से वहाँ तक जाते-जाते एक घंटा लग गया। सोचा नहीं था कि गोरखपुर जैसे शहर में इतना वक्त लग सकता है। 


हर व्यक्ति मांसाहारी था। हर कोई मदिरापान कर रहा था। 


इस रिज़ोर्ट में एक स्वीमिंग पूल के इर्द-गिर्द यह समारोह आयोजित किया गया था। मंच पर डीजे ऊँची आवाज़ में संगीत बजा रहा था। युवा पीढ़ी और छोटे बच्चे नाच रहे थे। 


कुछ युवा कुछ टेबल पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। पाँच कबाना थे जिनमें समविचार वाले धरना जमाए बैठे थे। औरतें अलग। आदमी अलग। जजमान के मायके वाले अलग। ससुराल वाले अलग। 


मैं आदमियों के गुट में था। ज़्यादातर बातें बिज़नेस, ज़मीन और सम्पत्ति के बारे में होती रहीं। उन्होंने मुझे यह भी जताया कि अमेरिका सहित सारी दुनिया भारतीय प्रवासियों की वजह से चल रही है। 


समारोह में भोजन प्रचुर मात्रा में था। स्टार्टर में ही इतने व्यंजन थे कि पेट भर जाए। केक कटने के बाद रोटी-चावल-दाल-पनीर-कोफ्ता और मांसाहारी व्यंजन भी थे। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर