Saturday, August 31, 2024

चाबी पुराण

तीन-चार साल पहले जब मैं अपना घर छोड़ कर अलग रह रहा था, पत्नी का फ़ोन आया कि कार की चाबी नहीं मिल रही है। कार ड्राइववे पर खड़ी है। ताला लगा हुआ है। ड्राइववे पर खड़ी, जी का जंजाल बन गई है। दो गाड़ियाँ और भी हैं। उनमें से बस एक गराज में जा पा रही है। दूसरी सड़क पर है। जल्दी से इस गाड़ी को दफ़ा करो। 


आजकल की गाड़ियाँ ऐसी हैं कि उनकी चाबी बनवाने में सात सौ-आठ सौ डॉलर का खर्च हो जाता है। यानी तक़रीबन पचास हज़ार रूपये। 


यह गाड़ी पुरानी हो चली थी। बेचने पर शायद ज़्यादा क़ीमत नहीं मिलती। सो चाबी बनवाने के खर्च को ध्यान में रखते हुए मैंने नेशनल पब्लिक रेडियो के स्थानीय स्टेशन (वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा संचालित) को दान में दे दी। 


—-


मेरे एक मित्र कनाडा गए घुमने। सिएटल से वेन्कुवर पास ही है। लोग अक्सर जाते रहते हैं। सब अपनी कार से ही जाते हैं। 


ये शॉपिंग करने निकले। कास्टको। जो कि एक महाकाय स्टोर है। शॉपिंग के बाद स्टोर से निकले तो भूल गए कि कार कहाँ पार्क की थी। ग़नीमत से कार की चाबी में यह सुविधा है कि बटन दबा दो तो कार की लाईट चमचमाने लगती है और आवाज़ भी करती है। इस तरह से थोड़ी देर में कार मिल गई। साथ में एक साल का बच्चा भी था। सो स्ट्रोलर से उसे निकालना, कार सीट में बिठाना, इन सब गतिविधियों में व्यस्त हो गए। 


घर - जो कि एक एयर बी एण्ड बी है - पहुँचे तो पता चला कार की चाबी नहीं मिल रही है। बहुत ढूँढा नहीं मिली। पत्नी और बच्चे और सामान को घर पर छोड़कर वापस वह कास्टको गया। वहाँ भी नहीं मिली। कार डीलर को फ़ोन किया। उन्होंने कहा कि गाड़ी यदि चल रही है तो चाबी गाड़ी में ही है। 


अब ये अजब सुविधा या दिक्कत है कि इन दिनों चाबी से गाड़ी स्टार्ट नहीं होती। एक बटन दबाने से ही गाड़ी चल देती है। बशर्ते चाबी आपके पास हो। 


वह वापस घर आया। घर पहुँचकर गाड़ी बंद हो गई। अब वह चलने का नाम न ले। 


रहस्य गहराता गया। फिर निष्कर्ष निकाला गया कि चाबी शायद कार की छत पर रह गई थी जो बड़ी देर तक वहीं रही लेकिन आखरी ट्रिप में कहीं गिर गई। 


झक मारकर सात सौ डॉलर की फ़ीस देकर नई चाबी बनवानी पड़ी। 


—-


भारत में एक मित्र का आलीशान घर है। बहुत ही आरामदायक एवं वैभव से भरपूर। महल कह लीजिए। लेकिन कहीं किसी की बुरी नज़र न लग जाए इसलिए सब कुछ छुपा रखा है। बाहर गेट से लगता है जैसे कोई खंडहर है। पीछे की ओर खूबसूरत लॉन है और भव्य मुख्य द्वार है। 


हर कमरा बहुत बड़ा है। हर कमरे के साथ विशालकाय बाथरूम है। अलमारियाँ है। बैठने की व्यवस्था है। मतलब हर कमरा अपने आप में टू बी एच के है। के - यानी किचन -  को छोड़ दीजिए। 


रात को जब मैं अपने कमरे में सो रहा था, मित्र का फ़ोन आया कि अंदर से ताला अच्छे से लगा लेना। और एक रॉड रखी है कमरे में, उसे भी दरवाज़े में फँसा देना ताकि अतिरिक्त सुरक्षा रहे। कभी ऐसा हुआ नहीं है कि कोई घर में घुस आए। पर ज़माना ख़राब है। सबको हमारी सफलता सुहाती नहीं है। कोई भी घुस सकता है। कोई कितना भी हल्ला करे, दरवाज़ा नहीं खोलना। 


घर के परिसर के बाहर गेट है। गार्ड है। भव्य द्वार पर ताला है। रॉड है। फिर भी इतनी एहतियात?


ख़ैर, मैंने रॉड लगा ली। जैसा देश, वैसा भेष। 


हम किसी पार्टी में गए। आते-आते रात के एक बज गए। वे अपने कमरे में सोने चले गए, मैं अपने। 


उनके बेटे और बहू शहर से बाहर गए हुए थे। घर में हम तीन ही थे। 


क़रीब एक घंटे बाद फ़ोन आया। हम अपने कमरे में बंद हो गए हैं। तुम नीचे आकर बाहर से खोल सकते हो। 


मैं गया। दरवाज़े में चाबी लगी हुई थी। मैंने चाबी से ताला खोला और वह बाहर आ पाया। 


हुआ यह कि जब हम पार्टी में गए थे तब वह अपना कमरा लॉक करके गया था। एक और ताला अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। 


जब वे कमरे में घुसे तो ताला तो खोल दिया पर चाबी की-होल में ही रह गई। फिर अंदर से बंद कर दिया। 


यह अजीब बात है कि जब चाबी की-होल में है तो अंदर से ताला बंद तो हो सकता है पर खुल नहीं सकता। खुलता बाहर से चाबी से ही है। या यदि चाबी की-होल से गिर जाए या हटा दी जाए। 


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2024 । गोरखपुर 



Saturday, August 24, 2024

आई लव यू

तुम इतना शर्माती क्यों हो? जो कहना हो, कह दो। आई लव यू बोलना है तो बोल दो। मेरी याद आती है, बोलना है तो बोल दो। इसमें इतना संकोच कैसा? ज़िन्दगी में जब जो होता है, अच्छा ही होता है। इसमें इतना क्या सोचना? न तुम्हारा वज़न गिर जाएगा, न मेरा बढ़ जाएगा। जो जैसा था, वैसा ही रहेगा। मन पर से बोझ ज़रूर कम हो जाएगा। हल्कापन महसूस करोगी। उड़ने लगोगी। जो कभी स्कूल-कॉलेज में नहीं कहा, अब कह दोगी तो थोड़ा और जी लोगी। जवानी लौट आएगी। नुक़सान कुछ नहीं। फ़ायदा ही फ़ायदा है। 


मुझे आई लव यू बोलना है। बहुत दिनों से बोलना चाह रही हूँ। पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। पहले कभी किसी से कहा नहीं। मेरे लिए ये चाँद पर क़दम रखने जितना बड़ा है। तुमने तो सौ बार, सौ लोगों से कहा होगा। तुम्हारे लिए सब आसान है। तुम कुछ छुपाते भी नहीं। तुम्हें किसी का डर नहीं। मुझे आई लव यू कहना, प्रोपोज़ करने जैसा लगता है। भारी भरकम। तुमने ठीक से जवाब नहीं दिया तो मैं तो मर ही जाऊँगी। सारी ज़िंदगी जिस लम्हे को बचा कर रखा उसका कत्ल होते नहीं देख सकती। तुम बहुत अच्छे हो। जैसे भी हो बहुत अच्छे लगते हो। औरों की तरह चिपकू नहीं हो। मैं फ़ोन नहीं करूँ तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बार-बार पिंग भी नहीं करते कि कहाँ हो, कैसी हूँ। कई बार तो लगता है कि तुम्हें कोई प्यार-व्यार है भी या नहीं। या तुम जानते भी हो कि प्यार क्या होता है। रात भर जागे हो किसी के लिए? दिन भर बेचैन रहे हो? तुम बहुत ही केयरफ़्री और केज़ुअल हो। बहुत ही निष्ठुर। और इसीलिये तुम पर और भी प्यार आता है। तुम जैसे हो, वैसे हो। कोई कवच नहीं। आवरण नहीं। दिखावा नहीं। 


फिर भी चाहती हूँ कि जिस दिन आई लव यू बोलूँ तुम थोड़ा संजीदा हो जाओ। ऐसे रिएक्ट करो जैसे ये लफ़्ज़ पहली बार सुन रहे हो। मुझे ऐसे चाहो जैसे किसी को कभी चाहा न हो। 


तुम्हारी नासंजीदगी, तुम्हारा निर्मोही नैचर ही तुम्हारी ख़ासियत है। मैं भी कैसी बेवक़ूफ़ हूँ। क्यूँ कभी-कभी तुम्हें बदलना चाहती हूँ। 


पता है मैं क्या सोचती थी? मैं सोचती थी कि आई लव यू सिर्फ़ उसी से बोलना चाहिए जिसके साथ सारी ज़िंदगी बितानी हो। आई लव यू बोलकर बाय नहीं बोल सकते। सात जनम का साथ हो जाता है। 


यहाँ तो मैं शादीशुदा हूँ। दो बच्चे भी हैं। तलाक़ का भी कोई इरादा नहीं है। सब बढ़िया चल रहा है। फिर तुम्हारे साथ यह सब क्यूँ?


जिसके साथ इतने सालों से हूँ न उसने मुझसे, न मैंने उससे कभी आई लव यू कहा। न कहने का मन है। पर बंधन तो है सात जनम का। 


मन ही मन तुमसे हज़ार बार प्यार कर चुकी हूँ। हज़ार बार आई लव यू भी कह चुकी हूँ। क्या मैं अब सती-सावित्री नहीं रही? क्या मन से किसी को चाह लेना भी बेवफ़ाई है? क्या मेरे सारे करवा चौथ झूठे हैं?


सच, अब तो ख़ुद पर भी शक होने लग गया है कि मैं करवा चौथ किसके लिए करती हूँ? तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए? हमारे प्यार के लिए?


तुम तो इन सारी बातों को मानते ही नहीं। सारे व्रत-उपवास तुम्हें बेकार लगते हैं। 


तुम इतने निर्दयी क्यों हो? अगर मैं कल से बात करना बंद कर दूँ, तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। चाहे तीन दिन, तीन महीने, तीन साल गुजर जाए। 


जानती हूँ मैं भी जी लूँगी। सब जी लेते हैं। सब साथ जीने-मरने की क़समें खाते हैं। पर सब जी लेते हैं। मेरे देवर को गुज़रे नौ साल हो गए। देवरानी आराम से हँस-खेल रही है। अपने बच्चों के साथ। एक बेटे की तो शादी भी हो गई। जैसे सबका परिवार, वैसा उसका। 


मुझे हमारी पहली मुलाक़ात अच्छी तरह से याद है। शुरू से ही तुम मुझे तुम-तुम कहते रहे। मुझे बड़ा अजीब लगा। ऐसे कोई बात करता है? फिर सोचा चलो बुजुर्ग होंगे। वह तो बाद में पता चला कि तुम मुझसे दो साल छोटे हो। मैं आभिजात्य परिवार की हूँ। नैनीताल की रहने वाली। बचपन से कान्वेन्ट स्कूल मे पढ़ी। घर में नौकर-चाकर कार सब शुरू से थे। मेरे परिवार के कई लोग अमेरिका में रह रहे थे। जब भी आते थे किलो-दो किलो एम एण्ड एम लाते थे। लूडो, स्क्रेबल, मोनोपोली हम बचपन से खेलते आए हैं। हम लोग पिकनिक पर जाते थे। होलिडेज़ पर निकल जाते थे। मेरे पिता इंजीनियर थे। माँ स्कूल में टीचर। 


तुम्हारा और मेरा कहाँ कोई ताल-मेल था। हम कभी एक नहीं हो सकते थे। तुम ठहरे गाँव वाले। लोटा लेकर खेत जानेवाले। हम पाश्चात्य शैली वाले। हम डाइनिंग टेबल वाले। तुम कहीं भी बैठ कर खाने वाले। तुम शुद्ध हिन्दी वाले। हम अंग्रेज़ी वाले। 


एक दिन मुझे लगा कि ज़िन्दगी में मज़ा नहीं रह गया है। कब मैं नौकरानियों को सम्भालते-सम्भालते ख़ुद नौकरानी बन गई हूँ पता ही नहीं चला। सारी ज़िंदगी रिश्ते निभाने में चली गई। कभी पति, कभी सास, कभी माँ, कभी बच्चे। मैं कहाँ खो गई?


सुबह से शाम तक कोई काम नहीं करती हूँ। करवाती हूँ। क्या मैं न करवाऊँ तो नहीं होगा? होगा, ज़रूर होगा। कमला अच्छी तरह से जानती है कब क्या बनाना है। बिन्दु अच्छी तरह से जानती है कब कपड़े धो कर सुखाने है। गोविंद को पता है कब बाज़ार जाना है और क्या लाना है। पूर्वा भी झाड़ू-पोंछा ठीक कर लेती है। मेरी क्या ज़रूरत?


तब तुम्हीं ने समझाया था कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है। तुम अपने मानसिक दायरे से बाहर तो निकलो। हम एक आदर्शवादी जीवन जीने के चक्कर में खुद को कितनी बार मार देते हैं। स्कूल में कोई हाथ न लगा दे इसलिए दस हाथ दूर चलते हैं। कभी किसी स्कूल ट्रिप पर नहीं गए कि भगवान जाने लड़के क्या कर बैठे। किसी के साथ कोई फिल्म नहीं देखी। किसी के साथ जाकर आईसक्रीम नहीं खाई। किसी से मिलने मन्दिर नहीं गई। किसी लड़के के साथ शादी में नहीं नाची। 


तुमने यह भी कहा था कि - ऊपर जाने से पहले मेरे पास आ जाना। मैं शायद एक आभिजात्य ज़िंदगी न दे पाऊँ। लेकिन एक ज़िन्दगी तो होगी। ट्राय करके देख लेना। प्लान बी समझ कर। 


तुम्हारा आश्वासन पाकर बहुत अच्छा लगा। लगा कोई तो है इस दुनिया में जो मुझे ज़िन्दा रखना चाहता है। चाहता है कि मैं जीवन अपने मन मुताबिक़ जीऊँ। किसी सीमित दिनचर्या में नहीं। 


आज भी बस यही विचार मुझे ज़िन्दा रखे हुए हैं। मैं शायद ही कभी उस जीवन को जी पाऊँ जिसकी तुम बात करते हो। पर कम से कम उम्मीद तो रख सकती हूँ। 


तुममें और मुझमें कई अंतर हैं। तुम हो पूजा-पाठ वाली, व्रत-उपवास वाली। हाँ, तुम बाक़ी लोगों जैसी नहीं हो कि किसी प्रयोजन से व्रत करो। तुम जानती हो कि ईश्वर को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न उससे अच्छा काम करवाया जा सकता है, न बुरा। वह किसी की सुनता ही नहीं है। यहाँ हम दोनों में सहमति है। 


अंतर वहाँ है जहां तुम राम से, राम के चरित्र से बेहद प्यार करती हो। वे तुम्हारे आदर्श हैं। मुझे इससे भी कोई आपत्ति नहीं। दीवार का विजय या वीर-ज़ारा का वीर भी आदर्श पात्र हैं। लेकिन उनकी तस्वीर की पूजा करना मुझे ठीक नहीं लगता। फ़िल्में बार-बार देखी जा सकती हैं, देखी जानी चाहिए। गाने बार-बार सुने जा सकते हैं, सुने जाने चाहिए। रामचरितमानस भी बार-बार पढ़ो। चौपाईयाँ गाओ। लेकिन किसी ख़ास पात का जन्मदिन मनाना ठीक नहीं। 


बस यही अंतर हमारे बीच कई बार विवाद की स्थित उत्पन्न कर देता है। हम दोनों अच्छे इंसान हैं पर ऐसे मौक़ों पर सहज नहीं हो पाते हैं। 


जब दो व्यक्ति हर मुद्दे पर खुलकर बात न कर सके तो एक दूरी सी बन ही जाती है। हम इतने करीब होकर भी कितने दूर है। 


मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी विचारधारा बदलूँ। तुम्हें पूरा हक़ है अपनी सोच पर। 


एक और बात यह कि तुम्हें मैडिटेशन से फ़ायदा होता है। शांति मिलती है। मुझे आज तक मैडिटेशन समझ नहीं आया। रत्ती भर का भी फ़ायदा नहीं मिला। उल्टा समय की बर्बादी होती है सो अलग। 


हम दोनों में मतभेद कई हैं। उन पर बहस हो सकती है। चर्चा हो सकती है। सहमति भी हो सकती है। पर हर विषय पर सहमति हो यह आवश्यक नहीं। 


हम साथ रह सकते हैं। दो घंटे। दो दिन। दो हफ़्ते। फिर शायद हमारे मतभेद हमें उद्वेलित कर देंगे। शांति भंग कर देंगे। 


हम दोनों खुले दिमाग़ के हैं। जैसे कल थे, वैसे कल नहीं रहेंगे। लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हो सकते। होना भी नहीं चाहिए। विविधता ही नवीनता को जन्म देती है। 


हम न पास हैं, न दूर हैं। इतने पास हैं कि एक-दूसरे को सहारा दे सकते हैं। मदद के लिए उपस्थित हो सकते हैं। इतने दूर है कि खुल कर साँस ले सकते हैं, जी सकते हैं। मुक्त गगन में उड़ सकते हैं। 


मुझे अपनी आज़ादी पसन्द है। तुम्हें अपनी। हम दोनों को वह सब प्राप्त है जो हमने पूरी शिद्दत से चाहा। फिर शिकायत कैसी?


इस रिश्ते को कोई नाम देना भी आवश्यक नहीं। हर चीज़ का नाम होना ज़रूरी नहीं। कितने सारे रंग हैं जिनके शब्दकोश में नाम भी मिल जाएँगे पर क्या फ़ायदा। तितली जैसी है, खूबसूरत है। कौन से रंग हैं, कौन से नहीं इनसे क्या फ़र्क़ पड़ता है।


किसी से प्यार हो जाना - इसका क्या मतलब है? क्या बलिदान और त्याग प्यार की अनिवार्य शर्त है? एक न एक को समझौता करना ही होगा? क्यों दोनों अपनी-अपनी बात पर क़ायम नहीं रह सकते? क्यों दोनों की पसंद-नापसंद एक जैसी होनी चाहिए? क्यों दोनों का एक दूसरे से बंधना आवश्यक हो जाता है? क्यों दोनों आज़ादी से नहीं जी सकते?


राहुल उपाध्याय । 24 अगस्त 2024 । प्रॉग  




आई लव यू

तुम इतना शर्माती क्यों हो? जो कहना हो, कह दो। आई लव यू बोलना है तो बोल दो। मेरी याद आती है, बोलना है तो बोल दो। इसमें इतना संकोच कैसा? ज़िन्दगी में जब जो होता है, अच्छा ही होता है। इसमें इतना क्या सोचना? न तुम्हारा वज़न गिर जाएगा, न मेरा बढ़ जाएगा। जो जैसा था, वैसा ही रहेगा। मन पर से बोझ ज़रूर कम हो जाएगा। हल्कापन महसूस करोगी। उड़ने लगोगी। जो कभी स्कूल-कॉलेज में नहीं कहा, अब कह दोगी तो थोड़ा और जी लोगी। जवानी लौट आएगी। नुक़सान कुछ नहीं। फ़ायदा ही फ़ायदा है। 


मुझे आई लव यू बोलना है। बहुत दिनों से बोलना चाह रही हूँ। पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। पहले कभी किसी से कहा नहीं। मेरे लिए ये चाँद पर क़दम रखने जितना बड़ा है। तुमने तो सौ बार, सौ लोगों से कहा होगा। तुम्हारे लिए सब आसान है। तुम कुछ छुपाते भी नहीं। तुम्हें किसी का डर नहीं। मुझे आई लव यू कहना, प्रोपोज़ करने जैसा लगता है। भारी भरकम। तुमने ठीक से जवाब नहीं दिया तो मैं तो मर ही जाऊँगी। सारी ज़िंदगी जिस लम्हे को बचा कर रखा उसका कत्ल होते नहीं देख सकती। तुम बहुत अच्छे हो। जैसे भी हो बहुत अच्छे लगते हो। औरों की तरह चिपकू नहीं हो। मैं फ़ोन नहीं करूँ तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बार-बार पिंग भी नहीं करते कि कहाँ हो, कैसी हूँ। कई बार तो लगता है कि तुम्हें कोई प्यार-व्यार है भी या नहीं। या तुम जानते भी हो कि प्यार क्या होता है। रात भर जागे हो किसी के लिए? दिन भर बेचैन रहे हो? तुम बहुत ही केयरफ़्री और केज़ुअल हो। बहुत ही निष्ठुर। और इसीलिये तुम पर और भी प्यार आता है। तुम जैसे हो, वैसे हो। कोई कवच नहीं। आवरण नहीं। दिखावा नहीं। 


फिर भी चाहती हूँ कि जिस दिन आई लव यू बोलूँ तुम थोड़ा संजीदा हो जाओ। ऐसे रिएक्ट करो जैसे ये लफ़्ज़ पहली बार सुन रहे हो। मुझे ऐसे चाहो जैसे किसी को कभी चाहा न हो। 


तुम्हारी नासंजीदगी, तुम्हारा निर्मोही नैचर ही तुम्हारी ख़ासियत है। मैं भी कैसी बेवक़ूफ़ हूँ। क्यूँ कभी-कभी तुम्हें बदलना चाहती हूँ। 


पता है मैं क्या सोचती थी? मैं सोचती थी कि आई लव यू सिर्फ़ उसी से बोलना चाहिए जिसके साथ सारी ज़िंदगी बितानी हो। आई लव यू बोलकर बाय नहीं बोल सकते। सात जनम का साथ हो जाता है। 


यहाँ तो मैं शादीशुदा हूँ। दो बच्चे भी हैं। तलाक़ का भी कोई इरादा नहीं है। सब बढ़िया चल रहा है। फिर तुम्हारे साथ यह सब क्यूँ?


जिसके साथ इतने सालों से हूँ न उसने मुझसे, न मैंने उससे कभी आई लव यू कहा। न कहने का मन है। पर बंधन तो है सात जनम का। 


मन ही मन तुमसे हज़ार बार प्यार कर चुकी हूँ। हज़ार बार आई लव यू भी कह चुकी हूँ। क्या मैं अब सती-सावित्री नहीं रही? क्या मन से किसी को चाह लेना भी बेवफ़ाई है? क्या मेरे सारे करवा चौथ झूठे हैं?


सच, अब तो ख़ुद पर भी शक होने लग गया है कि मैं करवा चौथ किसके लिए करती हूँ? तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए? हमारे प्यार के लिए?


तुम तो इन सारी बातों को मानते ही नहीं। सारे व्रत-उपवास तुम्हें बेकार लगते हैं। 


तुम इतने निर्दयी क्यों हो? अगर मैं कल से बात करना बंद कर दूँ, तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। चाहे तीन दिन, तीन महीने, तीन साल गुजर जाए। 


जानती हूँ मैं भी जी लूँगी। सब जी लेते हैं। सब साथ जीने-मरने की क़समें खाते हैं। पर सब जी लेते हैं। मेरे देवर को गुज़रे नौ साल हो गए। देवरानी आराम से हँस-खेल रही है। अपने बच्चों के साथ। एक बेटे की तो शादी भी हो गई। जैसे सबका परिवार, वैसा उसका। 


मुझे हमारी पहली मुलाक़ात अच्छी तरह से याद है। शुरू से ही तुम मुझे तुम-तुम कहते रहे। मुझे बड़ा अजीब लगा। ऐसे कोई बात करता है? फिर सोचा चलो बुजुर्ग होंगे। वह तो बाद में पता चला कि तुम मुझसे दो साल छोटे हो। मैं आभिजात्य परिवार की हूँ। नैनीताल की रहने वाली। बचपन से कान्वेन्ट स्कूल मे पढ़ी। घर में नौकर-चाकर कार सब शुरू से थे। मेरे परिवार के कई लोग अमेरिका में रह रहे थे। जब भी आते थे किलो-दो किलो एम एण्ड एम लाते थे। लूडो, स्क्रेबल, मोनोपोली हम बचपन से खेलते आए हैं। हम लोग पिकनिक पर जाते थे। होलिडेज़ पर निकल जाते थे। मेरे पिता इंजीनियर थे। माँ स्कूल में टीचर। 


तुम्हारा और मेरा कहाँ कोई ताल-मेल था। हम कभी एक नहीं हो सकते थे। तुम ठहरे गाँव वाले। लोटा लेकर खेत जानेवाले। हम पाश्चात्य शैली वाले। हम डाइनिंग टेबल वाले। तुम कहीं भी बैठ कर खाने वाले। तुम शुद्ध हिन्दी वाले। हम अंग्रेज़ी वाले। 


एक दिन मुझे लगा कि ज़िन्दगी में मज़ा नहीं रह गया है। कब मैं नौकरानियों को सम्भालते-सम्भालते ख़ुद नौकरानी बन गई हूँ पता ही नहीं चला। सारी ज़िंदगी रिश्ते निभाने में चली गई। कभी पति, कभी सास, कभी माँ, कभी बच्चे। मैं कहाँ खो गई?


सुबह से शाम तक कोई काम नहीं करती हूँ। करवाती हूँ। क्या मैं न करवाऊँ तो नहीं होगा? होगा, ज़रूर होगा। कमला अच्छी तरह से जानती है कब क्या बनाना है। बिन्दु अच्छी तरह से जानती है कब कपड़े धो कर सुखाने है। गोविंद को पता है कब बाज़ार जाना है और क्या लाना है। पूर्वा भी झाड़ू-पोंछा ठीक कर लेती है। मेरी क्या ज़रूरत?


तब तुम्हीं ने समझाया था कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है। तुम अपने मानसिक दायरे से बाहर तो निकलो। हम एक आदर्शवादी जीवन जीने के चक्कर में खुद को कितनी बार मार देते हैं। स्कूल में कोई हाथ न लगा दे इसलिए दस हाथ दूर चलते हैं। कभी किसी स्कूल ट्रिप पर नहीं गए कि भगवान जाने लड़के क्या कर बैठे। किसी के साथ कोई फिल्म नहीं देखी। किसी के साथ जाकर आईसक्रीम नहीं खाई। किसी से मिलने मन्दिर नहीं गई। किसी लड़के के साथ शादी में नहीं नाची। 


तुमने यह भी कहा था कि - ऊपर जाने से पहले मेरे पास आ जाना। मैं शायद एक आभिजात्य ज़िंदगी न दे पाऊँ। लेकिन एक ज़िन्दगी तो होगी। ट्राय करके देख लेना। प्लान बी समझ कर। 


तुम्हारा आश्वासन पाकर बहुत अच्छा लगा। लगा कोई तो है इस दुनिया में जो मुझे ज़िन्दा रखना चाहता है। चाहता है कि मैं जीवन अपने मन मुताबिक़ जीऊँ। किसी सीमित दिनचर्या में नहीं। 


आज भी बस यही विचार मुझे ज़िन्दा रखे हुए हैं। मैं शायद ही कभी उस जीवन को जी पाऊँ जिसकी तुम बात करते हो। पर कम से कम उम्मीद तो रख सकती हूँ। 


तुममें और मुझमें कई अंतर हैं। तुम हो पूजा-पाठ वाली, व्रत-उपवास वाली। हाँ, तुम बाक़ी लोगों जैसी नहीं हो कि किसी प्रयोजन से व्रत करो। तुम जानती हो कि ईश्वर को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न उससे अच्छा काम करवाया जा सकता है, न बुरा। वह किसी की सुनता ही नहीं है। यहाँ हम दोनों में सहमति है। 


अंतर वहाँ है जहां तुम राम से, राम के चरित्र से बेहद प्यार करती हो। वे तुम्हारे आदर्श हैं। मुझे इससे भी कोई आपत्ति नहीं। दीवार का विजय या वीर-ज़ारा का वीर भी आदर्श पात्र हैं। लेकिन उनकी तस्वीर की पूजा करना मुझे ठीक नहीं लगता। फ़िल्में बार-बार देखी जा सकती हैं, देखी जानी चाहिए। गाने बार-बार सुने जा सकते हैं, सुने जाने चाहिए। रामचरितमानस भी बार-बार पढ़ो। चौपाईयाँ गाओ। लेकिन किसी ख़ास पात का जन्मदिन मनाना ठीक नहीं। 


बस यही अंतर हमारे बीच कई बार विवाद की स्थित उत्पन्न कर देता है। हम दोनों अच्छे इंसान हैं पर ऐसे मौक़ों पर सहज नहीं हो पाते हैं। 


जब दो व्यक्ति हर मुद्दे पर खुलकर बात न कर सके तो एक दूरी सी बन ही जाती है। हम इतने करीब होकर भी कितने दूर है। 


मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी विचारधारा बदलूँ। तुम्हें पूरा हक़ है अपनी सोच पर। 


एक और बात यह कि तुम्हें मैडिटेशन से फ़ायदा होता है। शांति मिलती है। मुझे आज तक मैडिटेशन समझ नहीं आया। रत्ती भर का भी फ़ायदा नहीं मिला। उल्टा समय की बर्बादी होती है सो अलग। 


हम दोनों में मतभेद कई हैं। उन पर बहस हो सकती है। चर्चा हो सकती है। सहमति भी हो सकती है। पर हर विषय पर सहमति हो यह आवश्यक नहीं। 


हम साथ रह सकते हैं। दो घंटे। दो दिन। दो हफ़्ते। फिर शायद हमारे मतभेद हमें उद्वेलित कर देंगे। शांति भंग कर देंगे। 


हम दोनों खुले दिमाग़ के हैं। जैसे कल थे, वैसे कल नहीं रहेंगे। लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हो सकते। होना भी नहीं चाहिए। विविधता ही नवीनता को जन्म देती है। 


हम न पास हैं, न दूर हैं। इतने पास हैं कि एक-दूसरे को सहारा दे सकते हैं। मदद के लिए उपस्थित हो सकते हैं। इतने दूर है कि खुल कर साँस ले सकते हैं, जी सकते हैं। मुक्त गगन में उड़ सकते हैं। 


मुझे अपनी आज़ादी पसन्द है। तुम्हें अपनी। हम दोनों को वह सब प्राप्त है जो हमने पूरी शिद्दत से चाहा। फिर शिकायत कैसी?


इस रिश्ते को कोई नाम देना भी आवश्यक नहीं। हर चीज़ का नाम होना ज़रूरी नहीं। कितने सारे रंग हैं जिनके शब्दकोश में नाम भी मिल जाएँगे पर क्या फ़ायदा। तितली जैसी है, खूबसूरत है। कौन से रंग हैं, कौन से नहीं इनसे क्या फ़र्क़ पड़ता है।


राहुल उपाध्याय । 24 अगस्त 2024 । प्रॉग  




आई लव यू

तुम इतना शर्माती क्यों हो? जो कहना हो, कह दो। आई लव यू बोलना है तो बोल दो। मेरी याद आती है, बोलना है तो बोल दो। इसमें इतना संकोच कैसा? ज़िन्दगी में जब जो होता है, अच्छा ही होता है। इसमें इतना क्या सोचना? न तुम्हारा वज़न गिर जाएगा, न मेरा बढ़ जाएगा। जो जैसा था, वैसा ही रहेगा। मन पर से बोझ ज़रूर कम हो जाएगा। हल्कापन महसूस करोगी। उड़ने लगोगी। जो कभी स्कूल-कॉलेज में नहीं कहा, अब कह दोगी तो थोड़ा और जी लोगी। जवानी लौट आएगी। नुक़सान कुछ नहीं। फ़ायदा ही फ़ायदा है। 


मुझे आई लव यू बोलना है। बहुत दिनों से बोलना चाह रही हूँ। पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। पहले कभी किसी से कहा नहीं। मेरे लिए ये चाँद पर क़दम रखने जितना बड़ा है। तुमने तो सौ बार, सौ लोगों से कहा होगा। तुम्हारे लिए सब आसान है। तुम कुछ छुपाते भी नहीं। तुम्हें किसी का डर नहीं। मुझे आई लव यू कहना, प्रोपोज़ करने जैसा लगता है। भारी भरकम। तुमने ठीक से जवाब नहीं दिया तो मैं तो मर ही जाऊँगी। सारी ज़िंदगी जिस लम्हे को बचा कर रखा उसका कत्ल होते नहीं देख सकती। तुम बहुत अच्छे हो। जैसे भी हो बहुत अच्छे लगते हो। औरों की तरह चिपकू नहीं हो। मैं फ़ोन नहीं करूँ तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बार-बार पिंग भी नहीं करते कि कहाँ हो, कैसी हूँ। कई बार तो लगता है कि तुम्हें कोई प्यार-व्यार है भी या नहीं। या तुम जानते भी हो कि प्यार क्या होता है। रात भर जागे हो किसी के लिए? दिन भर बेचैन रहे हो? तुम बहुत ही केयरफ़्री और केज़ुअल हो। बहुत ही निष्ठुर। और इसीलिये तुम पर और भी प्यार आता है। तुम जैसे हो, वैसे हो। कोई कवच नहीं। आवरण नहीं। दिखावा नहीं। 


फिर भी चाहती हूँ कि जिस दिन आई लव यू बोलूँ तुम थोड़ा संजीदा हो जाओ। ऐसे रिएक्ट करो जैसे ये लफ़्ज़ पहली बार सुन रहे हो। मुझे ऐसे चाहो जैसे किसी को कभी चाहा न हो। 


तुम्हारी नासंजीदगी, तुम्हारा निर्मोही नैचर ही तुम्हारी ख़ासियत है। मैं भी कैसी बेवक़ूफ़ हूँ। क्यूँ कभी-कभी तुम्हें बदलना चाहती हूँ। 


पता है मैं क्या सोचती थी? मैं सोचती थी कि आई लव यू सिर्फ़ उसी से बोलना चाहिए जिसके साथ सारी ज़िंदगी बितानी हो। आई लव यू बोलकर बाय नहीं बोल सकते। सात जनम का साथ हो जाता है। 


यहाँ तो मैं शादीशुदा हूँ। दो बच्चे भी हैं। तलाक़ का भी कोई इरादा नहीं है। सब बढ़िया चल रहा है। फिर तुम्हारे साथ यह सब क्यूँ?


जिसके साथ इतने सालों से हूँ न उसने मुझसे, न मैंने उससे कभी आई लव यू कहा। न कहने का मन है। पर बंधन तो है सात जनम का। 


मन ही मन तुमसे हज़ार बार प्यार कर चुकी हूँ। हज़ार बार आई लव यू भी कह चुकी हूँ। क्या मैं अब सती-सावित्री नहीं रही? क्या मन से किसी को चाह लेना भी बेवफ़ाई है? क्या मेरे सारे करवा चौथ झूठे हैं?


सच, अब तो ख़ुद पर भी शक होने लग गया है कि मैं करवा चौथ किसके लिए करती हूँ? तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए? हमारे प्यार के लिए?


तुम तो इन सारी बातों को मानते ही नहीं। सारे व्रत-उपवास तुम्हें बेकार लगते हैं। 


तुम इतने निर्दयी क्यों हो? अगर मैं कल से बात करना बंद कर दूँ, तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। चाहे तीन दिन, तीन महीने, तीन साल गुजर जाए। 


जानती हूँ मैं भी जी लूँगी। सब जी लेते हैं। सब साथ जीने-मरने की क़समें खाते हैं। पर सब जी लेते हैं। मेरे देवर को गुज़रे नौ साल हो गए। देवरानी आराम से हँस-खेल रही है। अपने बच्चों के साथ। एक बेटे की तो शादी भी हो गई। जैसे सबका परिवार, वैसा उसका। 


मुझे हमारी पहली मुलाक़ात अच्छी तरह से याद है। शुरू से ही तुम मुझे तुम-तुम कहते रहे। मुझे बड़ा अजीब लगा। ऐसे कोई बात करता है? फिर सोचा चलो बुजुर्ग होंगे। वह तो बाद में पता चला कि तुम मुझसे दो साल छोटे हो। मैं आभिजात्य परिवार की हूँ। नैनीताल की रहने वाली। बचपन से कान्वेन्ट स्कूल मे पढ़ी। घर में नौकर-चाकर कार सब शुरू से थे। मेरे परिवार के कई लोग अमेरिका में रह रहे थे। जब भी आते थे किलो-दो किलो एम एण्ड एम लाते थे। लूडो, स्क्रेबल, मोनोपोली हम बचपन से खेलते आए हैं। हम लोग पिकनिक पर जाते थे। होलिडेज़ पर निकल जाते थे। मेरे पिता इंजीनियर थे। माँ स्कूल में टीचर। 


तुम्हारा और मेरा कहाँ कोई ताल-मेल था। हम कभी एक नहीं हो सकते थे। तुम ठहरे गाँव वाले। लोटा लेकर खेत जानेवाले। हम पाश्चात्य शैली वाले। हम डाइनिंग टेबल वाले। तुम कहीं भी बैठ कर खाने वाले। तुम शुद्ध हिन्दी वाले। हम अंग्रेज़ी वाले। 


एक दिन मुझे लगा कि ज़िन्दगी में मज़ा नहीं रह गया है। कब मैं नौकरानियों को सम्भालते-सम्भालते ख़ुद नौकरानी बन गई हूँ पता ही नहीं चला। सारी ज़िंदगी रिश्ते निभाने में चली गई। कभी पति, कभी सास, कभी माँ, कभी बच्चे। मैं कहाँ खो गई?


सुबह से शाम तक कोई काम नहीं करती हूँ। करवाती हूँ। क्या मैं न करवाऊँ तो नहीं होगा? होगा, ज़रूर होगा। कमला अच्छी तरह से जानती है कब क्या बनाना है। बिन्दु अच्छी तरह से जानती है कब कपड़े धो कर सुखाने है। गोविंद को पता है कब बाज़ार जाना है और क्या लाना है। पूर्वा भी झाड़ू-पोंछा ठीक कर लेती है। मेरी क्या ज़रूरत?


तब तुम्हीं ने समझाया था कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है। तुम अपने मानसिक दायरे से बाहर तो निकलो। हम एक आदर्शवादी जीवन जीने के चक्कर में खुद को कितनी बार मार देते हैं। स्कूल में कोई हाथ न लगा दे इसलिए दस हाथ दूर चलते हैं। कभी किसी स्कूल ट्रिप पर नहीं गए कि भगवान जाने लड़के क्या कर बैठे। किसी के साथ कोई फिल्म नहीं देखी। किसी के साथ जाकर आईसक्रीम नहीं खाई। किसी से मिलने मन्दिर नहीं गई। किसी लड़के के साथ शादी में नहीं नाची। 


तुमने यह भी कहा था कि - ऊपर जाने से पहले मेरे पास आ जाना। मैं शायद एक आभिजात्य ज़िंदगी न दे पाऊँ। लेकिन एक ज़िन्दगी तो होगी। ट्राय करके देख लेना। प्लान बी समझ कर। 


तुम्हारा आश्वासन पाकर बहुत अच्छा लगा। लगा कोई तो है इस दुनिया में जो मुझे ज़िन्दा रखना चाहता है। चाहता है कि मैं जीवन अपने मन मुताबिक़ जीऊँ। किसी सीमित दिनचर्या में नहीं। 


आज भी बस यही विचार मुझे ज़िन्दा रखे हुए हैं। मैं शायद ही कभी उस जीवन को जी पाऊँ जिसकी तुम बात करते हो। पर कम से कम उम्मीद तो रख सकती हूँ। 


तुममें और मुझमें कई अंतर हैं। तुम हो पूजा-पाठ वाली, व्रत-उपवास वाली। हाँ, तुम बाक़ी लोगों जैसी नहीं हो कि किसी प्रयोजन से व्रत करो। तुम जानती हो कि ईश्वर को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न उससे अच्छा काम करवाया जा सकता है, न बुरा। वह किसी की सुनता ही नहीं है। यहाँ हम दोनों में सहमति है। 


अंतर वहाँ है जहां तुम राम से, राम के चरित्र से बेहद प्यार करती हो। वे तुम्हारे आदर्श हैं। मुझे इससे भी कोई आपत्ति नहीं। दीवार का विजय या वीर-ज़ारा का वीर भी आदर्श पात्र हैं। लेकिन उनकी तस्वीर की पूजा करना मुझे ठीक नहीं लगता। फ़िल्में बार-बार देखी जा सकती हैं, देखी जानी चाहिए। गाने बार-बार सुने जा सकते हैं, सुने जाने चाहिए। रामचरितमानस भी बार-बार पढ़ो। चौपाईयाँ गाओ। लेकिन किसी ख़ास पात का जन्मदिन मनाना ठीक नहीं। 


बस यही अंतर हमारे बीच कई बार विवाद की स्थित उत्पन्न कर देता है। हम दोनों अच्छे इंसान हैं पर ऐसे मौक़ों पर सहज नहीं हो पाते हैं। 


जब दो व्यक्ति हर मुद्दे पर खुलकर बात न कर सके तो एक दूरी सी बन ही जाती है। हम इतने करीब होकर भी कितने दूर है। 


मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी विचारधारा बदलूँ। तुम्हें पूरा हक़ है अपनी सोच पर। 


एक और बात यह कि तुम्हें मैडिटेशन से फ़ायदा होता है। शांति मिलती है। मुझे आज तक मैडिटेशन समझ नहीं आया। रत्ती भर का भी फ़ायदा नहीं मिला। उल्टा समय की बर्बादी होती है सो अलग। 


राहुल उपाध्याय । 24 अगस्त 2024 । सिएटल 




Wednesday, August 21, 2024

सुविधाओं के ग़ुलाम

एक बार चम्मच न होने की वजह से मैंने लंच नहीं खाया था। लंच में खिचड़ी ले कर गया था। चम्मच भूल गया था। बिना चम्मच के हाथ से बचपन में कई बार खाई है। पर 54 की उम्र में हिम्मत नहीं हुई। खाने से पहले और खाने के बाद हाथ धोने की भी समस्या थी। 


पिछले सप्ताह ऑस्ट्रिया में एक प्राचीन होटल में ठहरना हुआ। अति मनोरम एवं रमणिक स्थान पर। दिल ख़ुश हो गया। 


नहाने के लिए टब था और हाथ से घुमाने वाला फ़व्वारा। कोई शॉवर नहीं। कोई शॉवर कर्टेन नहीं। पानी दुनिया भर में फैले। मुझे क़तई पसंद नहीं कि पानी की एक बूँद भी बाथटब से बाहर निकले। टॉयलेट सीट, वॉश बेसिन का एरिया गीला हो जाए। 


तीन दिन नहीं नहाया। ऐम्सटरडम आकर ही नहाया। 


ऐसा नहीं कि मैं शॉवर से ही नहा सकता हूँ। भारत में तमाम जगहों पर मैं बाल्टी से नहाया हूँ। घाट पर, कुएँ पर, खेत पर - सब जगह नहाया हूँ। पर एक बाथरूम में जहां और भी काम होते हैं उसे इतना गीला नहीं कर सकता। 


हम अपनी सुविधाओं के कितने ग़ुलाम हो जाते हैं। 


राहुल उपाध्याय । 22 अगस्त 2024 । प्रॉग 

मंदसौर

आज जब पता चला कि मेरे दादा के भाई के पोते मंदसौर में हैं तो अचानक से सारी यादें उमड़ आईं। 


मेरी दादी जावरा की हैं। शादी शिवगढ़ में हुई। उनकी बहन, हम सबकी मासीजी, की शादी मंदसौर में हुई। 


हमारी जान-पहचान में वे बहुत धनवान थीं। मोटे-मोटे कंगन पहनती थीं। उतने ही मोटे ज़ेवर पाँव में भी होते थे। कभी साड़ी नहीं पहनी। हमेशा घाघरा-लुगड़ा। कभी कोई बैग-सूटकेस-बैकपैक नहीं। सिर्फ़ एक थैली या पोटली। जिसमें सब समा जाता था। रतलाम की प्रसिद्ध बलम ककड़ी। सेंव। मावा। सब। मंदसौर से हमेशा नुगदी लेकर आती थीं। मासाजी को कभी रतलाम आते नहीं देखा। 


मासीजी के जितने खुरदरे हाथ थे उतने मैंने किसी के नहीं देखे। वे शादियों में खाना बनाने का काम करती थीं। तीन-चार दिन तक रोटी-सब्ज़ी-दाल-सेंव-मिर्ची के पकोड़े। शादी के दिन और उसके आसपास, सेंव-पूड़ी-रायता-चक्की-सब्ज़ी-नुगदी बनती थीं। जब भी गर्मी की छुट्टियों में मंदसौर जाता पेट भर कर नुगदी, चक्की और सेंव खा कर आता। 


मंदसौर में पेम बनाने की फ़ैक्ट्री थी। पेम चॉक जैसी होती है पर चॉक से पतली और सख़्त। यह चॉक से ही ज़्यादा दिन तक चलती थी। कम खर्च होती थी। चॉक से ब्लैक बोर्ड पर लिखते थे। पेम से स्लेट पर। 


पेम के कारख़ाने में जो मज़दूर काम करते होंगे उनके फेफड़ों में अवश्य दिक्कत रहती होगी। इतने कण गली की हवा में उड़ते थे कि बयान नहीं कर सकता। 


मासीजी ने उन मज़दूरों के लिए एक प्याऊ की स्थापना कर रखी थी। जहां मज़दूर आकर अपनी प्यास बुझा सकते थे। मैं दिन में दो-तीन घंटे उस प्याऊ पर बैठ कर उन्हें पानी पिलाता था। मेरे विचार से मैंने न उससे पहले, न उसके बाद कोई समाजसेवा का कोई काम किया है। 


मासीजी जब भी रतलाम-शिवगढ़ आतीं, आराम से रहतीं। जाने की कोई जल्दी नहीं रहती। जाने का दिन भी दिशा-शूल देखकर तय होता। आज बुधवार है इसलिए उस दिशा में नहीं जा सकते। अरे! आज तो द्वादशी है, आज नहीं जा सकते। 


मंदसौर में नदी के तट पर पशुपतिनाथ का मंदिर है। बहुत ही आकर्षक। शिवजी की मूर्ति ब्रह्माजी की तरह चतुर्मुखी है। विशालकाय। बरसात के मौसम में नदी का पानी गर्भगृह तक पहुँच जाता है। मंदिर जाने के रास्ते बंद हो जाते हैं। बहुत ही रोमांचक स्थिति हो जाती है। यह हमें हमेशा उत्साह से भर देता था। हमें कभी लगा ही नहीं कि यह समस्या है। 


मंदसौर में ही ताश भी खेलना सीखा। और अंग-बंग-चंग-चौक। यानी गाँव का लूडो। किसी बोर्ड की आवश्यकता नहीं। पेम से किसी भी ज़मीन पर चार गुणा चार की ग्रिड बनाकर खेला जा सकता है। डाइस की या पासे की भी आवश्यकता नहीं। इमली के दो बीज को बीच में से फाड़ कर काम चल जाता है। चार भाग से पाँच चाल चली जा सकती है। एक उजला - एक घर आगे बढ़ो।। दो उजले - दो घर। तीन उजले - तीन घर। चाप उजले - चाप घर। सारे काले - पास। 


मासीजी ने अपने सारे बड़े इलाज रतलाम के सरकारी अस्पताल से ही करवाए। जब भी वे भर्ती होतीं मैं ही उनके पास बैठता था। करना कुछ नहीं होता था। सिर्फ़ मौसमी का रस निकाल कर देना होता था। बाक़ी समय मैं पड़ोसी मरीज़ों के पास बैठनेवालों से उपन्यास उधार लेकर पढ़ता रहता था। उसी ज़माने में कर्नेल रंजीत और ओमप्रकाश शर्मा के कई सारे उपन्यास पढ़े। अस्पताल से घर और घर से अस्पताल जाते वक्त पान की दुकानों के रेडियो से चल रहे विविध भारती के कार्यक्रमों से फ़िल्मी गीत सुनता था। आएगी ज़रूर चिठ्ठी मेरे नाम की। हाल मेरा लोगों तुम तब देखना। मैं जट-यमला-पगला-दीवाना इत्ती से बात न जाना। 


मासीजी चला हुआ खाना नहीं खाती थीं। यानी घर पर परा खाना अस्पताल में नहीं खा सकती थीं। क्योंकि वो चल कर आया है। इसलिए उनके लिए अस्पताल की खुलीं ज़मीन पर दो ईंटें लगा कर लकड़ी जलाकर खाना बनता था। 


उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने गोपाल मामा को गोद ले लिया था। उनकी शादी जल्दी कर दी गई। यह सोच कर कि जल्दी ही कोई बच्चा घर में आ जाएगा। लेकिन वह भी नहीं हो पाया। 


पार्वती मामी बहुत सुन्दर थीं। उनसे ज़्यादा गोरा इंसान मैंने कोई नहीं देखा। 



मेरे नाना (दासाब) दो भाई थे। उनके बड़े भाई (रामनारायण जी त्रिवेदी) को किसी अमीर परिवार ने गोद ले लिया था। उन्होंने ख़ूब तरक़्क़ी की। मंदसौर हाईकोर्ट में जज नियुक्त हो गए। ख़ूब मनान ख़रीदे। स्टेट बैंक उनकी किराएदार थी। एक सिनेमाघर के मालिक भी थे। 


जब 1966 में बाऊजी लंदन पीएचडी करने गए, मम्मी हम दोनों भाई को लेकर अपने मायके रहने लगीं। दासाब का अपना स्कूल था। उसी में मैंने चौथी कक्षा तक की पढ़ाई की। उस प्राथमिक स्कूल में छः कक्षाएँ - कक्का से पाँचवीं तक की - चलती थीं एक बड़े हॉल में। 


बाऊजी 1970 में लंदन से लौट आए थे। लेकिन एक जगह स्थिर नहीं थे। न्यूज़ीलैंड-ऑस्ट्रेलिया भी छोटे-मोटे अस्थायी नियुक्तियों पर जाते रहते थे। 


दासाब घर वालों से बहुत ही कम बात करते थे। हमेशा अपनी जाली वाले कमरे में रहते थे। गद्दी पर। वह उनका दफ़्तर था। उनके पास एक रजिस्टर था जिसे आज के जमाने की स्प्रेडशीट कहा जा सकता है। इसमें सबके जन्म की तारीख़, समय और स्थान दर्ज था। जब भी जो जानना चाहे मिल सकता था। मेरा जन्म शिवगढ़ में हुआ था और उसकी कोई सूचना उन्हें सैलाना में नहीं मिली तो मेरी जानकारी ग़ायब है। यह ग़म मुझे हमेशा सालता रहा है। बाऊजी जिन्हें जहां भर की तारीख़ें याद हैं वे भी भूल गए। इसका मतलब घाव पर नमक छिड़कना। 


मैं जब दसवीं की परीक्षा के लिए आवेदन पत्र भर रहा था, तब मैंने बाऊजी-मम्मी से अपनी जन्मतिथि पूछी तो दोनों में बहस होने लगी। एक कहे 26 अक्टूबर, एक कहे 26 नवम्बर। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि चलो जन्मदिन नहीं मनाया कभी, सो कोई बात नहीं। पर जन्मदिन ठीक से याद भी नहीं?


दासाब के एक बेटा और चार बेटियाँ थीं। चौथी बेटी मेरे बड़े भाई की हमउम्र थी। उधर दादी की तरफ़ भी मेरी छोटी बुआ मेरे बड़े भाई की हमउम्र थीं। 


मामासाब के चार बच्चे थे। मामासाब रतलाम के पास रूनखेड़ा रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। छोटा सा गाँव। कोई स्कूल की सुविधा नहीं। इसलिए मामीसाब एवं चारों बच्चे सैलाना में दासाब के साथ ही रहते थे। फिर आ गए मम्मी और हम दो। उधर प्रभा मासीजी भी अस्वस्थ होने के कारण अपनी बेटी के साथ सैलाना रहने लगी। हम सात बच्चे और सात बड़े एक संयुक्त परिवार में हँसी-ख़ुशी रहने लगे। 


घर में कुआँ था। उसी का पानी पीते। उसी से नहाते। कपड़े धुलते। बर्तन साफ़ होते। 


कुएँ के आसपास अमरूद, जामुन, सीताफल, पपीते के पेड़ थे। 


मुझे बचपन में कोई समस्या हो गई थी। इसलिए लकड़ी की कुर्सी पर पाश्चात्य शैली का टॉयलेट बनाया गया। सब चाय पीते थे। मुझे दूध पिलाया जाता था। इसलिए आज तक चाय नहीं पी। अब दूध भी नहीं पीता हूँ। 


दासाब ने बाऊजी से कभी कोई बात नहीं की। दासाब और बाईं (नानी) यह मानते थे कि बेटी की घर कभी नहीं जाना है। यदि गए भी तो पानी तक नहीं पीना है। मामासाब जब भी रतलाम आते थे, पड़ोसी के यहाँ माँग कर पानी पीते थे। तब पानी की बोतलें नहीं होती थीं कि साथ में लेकर चलो। 


दासाब-बाई को कोई दिक़्क़त नहीं थी कि इतने लोग उनके यहाँ रह रहे थे। मंदसौर वाले नाना को यह बात जँची नहीं कि होनहार पिता के बेटे छोटे से गाँव में पल-बढ़ रहे हैं। उन्होंने बाऊजी को चिठ्ठी लिखी कि अपने बच्चों के भविष्य पर भी ध्यान दो। 


तब बाऊजी हम दो भाई और मम्मी को अपने साथ मेरठ ले गए। 


मेरठ में हम साकेत में रहते थे। मुझे आज भी पता अच्छी तरह से याद है। 101 साकेत, मेरठ। वह इसलिए कि उससे पहले वाले पते इसके पास, उसके सामने, ज़िला फ़लाना होते थे। 


पाँचवीं कक्षा का दाख़िला साकेत के ही अंग्रेज़ी माध्यम वाले प्रायमरी स्कूल में किया गया। मुझे ए-बी-सी-डी तक का ज्ञान नहीं था। और यहाँ सब धड़ाधड़ अंग्रेज़ी में बतिया रहे थे। उम्र ही कुछ ऐसी थी कि मुझमें कोई हीनभावना नहीं जागी। घर में भी किसी को चिन्ता नहीं थी कि स्कूल कैसा चल रहा है। मम्मी ने 1947 में चौथी पास की, उसके बाद कोई पढ़ाई नहीं की। उन्हें क्या पता कि होमवर्क क्या होता है, टेस्ट क्या होते हैं। बाऊजी दूसरे छोर पर थे। लॉ कॉलेज में व्यस्त। 


मुझे अच्छी तरह से याद है कि अंग्रेज़ी की वार्षिक परीक्षा के दिन स्कूल जाते वक़्त न जाने मुझे क्या सूझी और मैंने उनसे पूछ लिया कि नाऊन क्या होता है। वे तब अख़बार पढ़ रहे थे। वे अख़बार नियमित रूप से पढ़ते थे। शुरू से लेकर आख़िर तक। कोई भी ख़बर, कोई भी विज्ञापन उनसे छूटता नहीं था। तभी वे दुनिया भर को सलाह दे पाते थे कि तुम यह पढ़ सकते हो, तुम वहाँ दाख़िला ले सकते हो, इस नौकरी के लिए आवेदन भर दो आदि। 


बाऊजी ने अख़बार रखा और कहा कि कॉपी या कोई काग़ज़ दो। उस काग़ज़ पर उन्होंने नाऊन की परिभाषा लिख दी। और फिर अख़बार पढ़ने लगे। 


मैं स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते उसे रटने लगा। लेकिन अफ़सोस मुझे रटना नहीं आता। कोई फ़ायदा नहीं हुआ। सारे पर्चे अदिति ने ही दिए थे। 


मैं बक़ायदा यूनिफ़ॉर्म पहन बालों में बायीं ओर माँग निकाल कर राजा बेटा बन कर रोज़ स्कूल जाता था। पहली बार घर से बाहर के किसी स्कूल में गया। सैलाना में एक हॉल में कक्का से तीसरी तक की चार कक्षाएँ चलती थीं। टाटपट्टियाँ तय करती थीं आप किस कक्षा में हैं। चौथी और पाँचवीं कक्षा हॉल के बाहरी भाग में लगती थीं। मेरठ में कमरें थे। कुर्सियाँ थीं। डेस्क थीं। यूनिफ़ॉर्म थीं। एक से ज़्यादा अध्यापिकाएँ थीं। गणित की अलग। ड्राइंग की अलग। वग़ैरह। 


प्रिंसिपल को बहुत बुरा लग रहा होगा कि अंग्रेज़ी मीडियम के पाँचवीं कक्षा के छात्र को ए-बी-सी-डी तक नहीं आती। सो वे लंच के समय मुझे अपने दफ़्तर में बिठा कर सिखाने लगीं। और मैं सीख गया। 


वार्षिक परीक्षा, हर विषय की, तीन घंटे की होती थी। अदिति बहुत स्मार्ट और सहृदय थी। परीक्षा के कमरे में हर डेस्क दूसरे डेस्क से सटी नहीं थी। अलग-अलग थी। उसकी डेस्क मेरी दायीं ओर थी। वह दिखाती भी कुछ तो मैं न तो देख पाता और न ही समझ पाता। हमने कोई बात भी नहीं की थी कि कैसे क्या होगा। 


उसने देखा कि मैं तो चुपचाप बैठा हूँ। एक अक्षर तक नहीं लिखा। उसने बिना कुछ कहे, अपनी कॉपी मेरे डेस्क पर रख दी, और मेरी ले ली। वो अपना सारा काम कर चुकी थी। अब वो मेरा काम कर रही थी। 


इसी प्रकार सारे विषय के पर्चे उसी ने दिए। यहाँ तक कि ड्राइंग में ऐपल बनाना था। उसी ने बनाया। 















Saturday, August 17, 2024

रिफंड



चपरासीः सर! आपसे कोई मिलना चाहता है। 


प्रिंसिपलः कौन है? पैरेंट्स अभी नहीं मिल सकते। उनके मिलने का समय दो से तीन है। 


चपरासीः पैरेंट नहीं है


प्रिंसिपलः फिर कौन है?


चपरासीः कहता है कह दो मूलचंद आया है। 


प्रिंसिपलः मूलचंद? कैसा दिखता है? बेवक़ूफ़ या बुद्धिमान?


चपरासीः बुद्धिमान 


प्रिंसिपलः तो फिर स्कूल इंस्पेक्टर तो नहीं हो सकता। अंदर भेजो



मूलचंदः मेरा नाम मूलचंद है। मैं यहाँ अठारह साल पहले पढ़ता था। ये देखो मेरा ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट। मैंने यहाँ पढ़ कर कुछ नहीं सीखा। मैं दो पैसे नहीं कमा सकता। दुनिया लाखों-करोड़ों कमा रही है। विदेश जा रही है। डॉलर कमा रही है। रूपया गिरता जा रहा है। और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। यह सब इस स्कूल का दोष है। मुझे कुछ भी नहीं सिखाया। मैं बर्बाद हो गया। मैंने जितनी भी फ़ीस जमा की थी, मुझे सब वापस दे दीजिए। जल्दी। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। 


प्रिंसिपलः कैसी बेवक़ूफ़ों जैसी बात कर रहे हो? तुम्हारा दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया है? भला ऐसा भी कहीं होता है? मेरी इतने बरसों की सर्विस में आज तक ऐसा नहीं हुआ। चलो तुम यहाँ से चलो। मुझे बहुत सा काम करना है। 


मूलचंदः देखो प्रिंसिपल मैं बिना पैसे लिए नहीं जाऊँगा। पैसे तो तुम्हें देने ही होंगे। वरना मैं शिक्षा मंत्रालय मे शिकायत कर दूँगा। 


प्रिंसिपलः ऐसे कैसे शिकायत कर दोगे? कोई मुद्दा ही नहीं है शिकायत करने का। फ़ालतू में। 


मूलचंदः देखो प्रिंसिपल मुझे कुछ नहीं मालूम। मुझे कुछ नहीं आता है। तुम चाहो तो मेरी परीक्षा ले लो। मैं हर विषय में अण्डा हूँ। हर विषय में गुड़-गोबर। 


प्रिंसिपलः अच्छा मुझे कुछ समय दो। मैं स्टॉफ से बात करता हूँ। बाहर जाकर बैठो



प्रिंसिपलः कैसी मुसीबत सर पर आ गई है। क्या करें उसका?


शिक्षक #1: यह बहुत चालाक इंसान लगता है। इससे निपटने की हमें तरकीब सोचनी होगी। 


शिक्षक #2: क्यों न हम उससे ऐसे सवाल पूछे जिनका जवाब बहुत आसान हो? वो सही जवाब ही देगा और पास हो जाएगा। और हम बच जाएँगे। 


शिक्षक #3: इतना आसान नहीं है उससे पीछा छुड़ाना। वह हर सवाल का जवाब जानबूझकर ग़लत दे तो?


शिक्षक #4: हम भी जानबूझकर हर जवाब को सही कह देंगे चाहे वो कितना ही ग़लत क्यों न हो। हम सब को इस पर सहमत रहना होगा कि जो भी वो जवाब दे उसे हम सही मान लें। 


सब लोगः हम सहमत हैं। 


—-


मूलचंदः अरे तुम सब बूढ़े-खूसट लोग अभी भी यहीं सड़ रहे हों? जितना ख़राब यह स्कूल है, उतने ही ख़राब तुम शिक्षक हों। तुम्हें कौन नौकरी देगा। यहीं सड़ोगे ज़िन्दगी भर। 


शिक्षक #1: वाह! क्या दूरदर्शिता है? तुम वस्तुस्थिति का सही विश्लेषण करने में पारंगत हो। इस क्षेत्र में मैं तुम्हें सौ प्रतिशत अंक देता हूँ। 


शिक्षक #2: अब मैं तुमसे भूगोल का प्रश्न पूछता हूँ। पश्चिम बंगाल कहाँ है? 


मूलचंदः पश्चिम में। सवाल में ही जवाब है। ऐसा सवाल कौन पूछता है?


शिक्षकः यह बहुत ही सही जवाब है। इससे तुम्हारी सूझबूझ का पता चलता है। यह भी पता चलता है कि भूगोल के साथ तुम्हें इतिहास की भी जानकारी है। एक ज़माने में बंगाल के दो भाग कर दिए गए थे। पूर्व बंगाल और पश्चिम बंगाल। पूर्व बंगाल पूर्व में था। और पश्चिम बंगाल पश्चिम में। 


मैं तुम्हें भूगोल सहित, इतिहास मे भी पूर्ण अंक देता हूँ। 


शिक्षक #3: कोई गेलेक्सी यदि पृथ्वी से बीस लाख लाइट यीयर्स यानी बीस लाख प्रकाश वर्ष दूर है तो वहाँ से रोशनी को यहाँ तक आने में कितना समय लगेगा?


मूलचंदः यही कोई चार सौ मीटर। 


शिक्षक #3: वाह! सही जवाब। आप तो परम ज्ञानी है। मुझे नहीं पता था कि समय को दूरी में कैसे बदलते हैं। आपने तो मेरे ज्ञान-चक्षु खोल देख दिए। मैं समय ढूँढ रहा था, आपने उसके दूसरे आयाम से अवगत करा दिया। क्वांटम मैकेनिक्स का इतना सूक्ष्म ज्ञान होना कोई आसान काम नहीं है। 


मूलचंदः ये कर क्या रहे हो तुम सब लोग? मैं जो कहूँ तुम सही मान लेते हो। मैं ऐसे हार नहीं मानने वाला। 


शिक्षक #4: गणित अभी बाक़ी है। मैं दो सवाल पूछूँगा। एक आसान। एक कठिन। 


पहला सवाल। यदि कोई इंसान भागलपुर से वैष्णोदेवी की यात्रा पर निकलता है और दस दिन बाद उसके घर चोरी होती है तो उसके कितने रूपये चोरी हुए?


मूलचंदः तीन सौ बीस। पूरे तीन सौ बीस। न एक पैसा कम। न एक पैसा ज़्यादा। 


शिक्षक #4: बिलकुल ग़लत। सही जवाब है तीन सौ उन्नीस रूपये। मुझे अफ़सोस है कि तुम्हारा जवाब क़रीब-क़रीब सही था पर पूर्णतः सही नहीं था इसलिए तुम गणित में पास नहीं हो सकते। 


अब सारी फ़ीस का हिसाब करके बताओ कि हमें तुम्हें कितना देना है। 


मूलचंदः वाह! देखो प्रिंसिपल मैं न कहता था मैं आज पैसे लेकर ही जाऊँगा। 


चार साल की पढ़ाई में चालीस महीनों की फ़ीस भरी। हर महीने ढाई सौ। चालीस गुणा ढाई सौ हुए दस हज़ार। ऊपर से लैब फ़ीस वग़ैरह थी तीन सौ रूपये हर महीने आखरी के दो साल। यानी बीस महीने। बीस गुणा तीन सौ हुए छः हज़ार। कुल सोलह हज़ार। फिर फ़ील्ड ट्रिप. यूनिफ़ॉर्म, साइंस फ़ेयर की मिला-जुलाकर हो गई दो हज़ार। कुल अठारह हज़ार। 


चलिए अठारह हज़ार रूपये दीजिए और मैं चलता हूँ। 


शिक्षक #4: अरे वाह! तुम तो हिसाब के बहुत ही पक्के निकले। यही तो मेरा कठिन सवाल था। आसान सवाल का जवाब तुम थोड़ा ग़लत कर गए पर कठिन सवाल का जवाब एकदम सही। इस नए तथ्य को देखते हुए तुम्हें मैं गणित में पास घोषित करता हूँ। बधाई हो। तुम इस स्कूल के एक कुशल छात्र हो यह तुमने आज साबित कर दिया है। 


प्रिंसिपल चपरासी सेः इस इंसान को बाहर करो।


(फ्रीट्ज़ करींथी के नाटक से प्रेरित)

राहुल उपाध्याय । 17 अगस्त 2024 । ऐम्स्टरडम

(https://egyankosh.ac.in/bitstream/123456789/27478/1/Unit-4.pdf

Fritz Karinthy's play Refund)