आज जब पता चला कि मेरे दादा के भाई के पोते मंदसौर में हैं तो अचानक से सारी यादें उमड़ आईं।
मेरी दादी जावरा की हैं। शादी शिवगढ़ में हुई। उनकी बहन, हम सबकी मासीजी, की शादी मंदसौर में हुई।
हमारी जान-पहचान में वे बहुत धनवान थीं। मोटे-मोटे कंगन पहनती थीं। उतने ही मोटे ज़ेवर पाँव में भी होते थे। कभी साड़ी नहीं पहनी। हमेशा घाघरा-लुगड़ा। कभी कोई बैग-सूटकेस-बैकपैक नहीं। सिर्फ़ एक थैली या पोटली। जिसमें सब समा जाता था। रतलाम की प्रसिद्ध बलम ककड़ी। सेंव। मावा। सब। मंदसौर से हमेशा नुगदी लेकर आती थीं। मासाजी को कभी रतलाम आते नहीं देखा।
मासीजी के जितने खुरदरे हाथ थे उतने मैंने किसी के नहीं देखे। वे शादियों में खाना बनाने का काम करती थीं। तीन-चार दिन तक रोटी-सब्ज़ी-दाल-सेंव-मिर्ची के पकोड़े। शादी के दिन और उसके आसपास, सेंव-पूड़ी-रायता-चक्की-सब्ज़ी-नुगदी बनती थीं। जब भी गर्मी की छुट्टियों में मंदसौर जाता पेट भर कर नुगदी, चक्की और सेंव खा कर आता।
मंदसौर में पेम बनाने की फ़ैक्ट्री थी। पेम चॉक जैसी होती है पर चॉक से पतली और सख़्त। यह चॉक से ही ज़्यादा दिन तक चलती थी। कम खर्च होती थी। चॉक से ब्लैक बोर्ड पर लिखते थे। पेम से स्लेट पर।
पेम के कारख़ाने में जो मज़दूर काम करते होंगे उनके फेफड़ों में अवश्य दिक्कत रहती होगी। इतने कण गली की हवा में उड़ते थे कि बयान नहीं कर सकता।
मासीजी ने उन मज़दूरों के लिए एक प्याऊ की स्थापना कर रखी थी। जहां मज़दूर आकर अपनी प्यास बुझा सकते थे। मैं दिन में दो-तीन घंटे उस प्याऊ पर बैठ कर उन्हें पानी पिलाता था। मेरे विचार से मैंने न उससे पहले, न उसके बाद कोई समाजसेवा का कोई काम किया है।
मासीजी जब भी रतलाम-शिवगढ़ आतीं, आराम से रहतीं। जाने की कोई जल्दी नहीं रहती। जाने का दिन भी दिशा-शूल देखकर तय होता। आज बुधवार है इसलिए उस दिशा में नहीं जा सकते। अरे! आज तो द्वादशी है, आज नहीं जा सकते।
मंदसौर में नदी के तट पर पशुपतिनाथ का मंदिर है। बहुत ही आकर्षक। शिवजी की मूर्ति ब्रह्माजी की तरह चतुर्मुखी है। विशालकाय। बरसात के मौसम में नदी का पानी गर्भगृह तक पहुँच जाता है। मंदिर जाने के रास्ते बंद हो जाते हैं। बहुत ही रोमांचक स्थिति हो जाती है। यह हमें हमेशा उत्साह से भर देता था। हमें कभी लगा ही नहीं कि यह समस्या है।
मंदसौर में ही ताश भी खेलना सीखा। और अंग-बंग-चंग-चौक। यानी गाँव का लूडो। किसी बोर्ड की आवश्यकता नहीं। पेम से किसी भी ज़मीन पर चार गुणा चार की ग्रिड बनाकर खेला जा सकता है। डाइस की या पासे की भी आवश्यकता नहीं। इमली के दो बीज को बीच में से फाड़ कर काम चल जाता है। चार भाग से पाँच चाल चली जा सकती है। एक उजला - एक घर आगे बढ़ो।। दो उजले - दो घर। तीन उजले - तीन घर। चाप उजले - चाप घर। सारे काले - पास।
मासीजी ने अपने सारे बड़े इलाज रतलाम के सरकारी अस्पताल से ही करवाए। जब भी वे भर्ती होतीं मैं ही उनके पास बैठता था। करना कुछ नहीं होता था। सिर्फ़ मौसमी का रस निकाल कर देना होता था। बाक़ी समय मैं पड़ोसी मरीज़ों के पास बैठनेवालों से उपन्यास उधार लेकर पढ़ता रहता था। उसी ज़माने में कर्नेल रंजीत और ओमप्रकाश शर्मा के कई सारे उपन्यास पढ़े। अस्पताल से घर और घर से अस्पताल जाते वक्त पान की दुकानों के रेडियो से चल रहे विविध भारती के कार्यक्रमों से फ़िल्मी गीत सुनता था। आएगी ज़रूर चिठ्ठी मेरे नाम की। हाल मेरा लोगों तुम तब देखना। मैं जट-यमला-पगला-दीवाना इत्ती से बात न जाना।
मासीजी चला हुआ खाना नहीं खाती थीं। यानी घर पर परा खाना अस्पताल में नहीं खा सकती थीं। क्योंकि वो चल कर आया है। इसलिए उनके लिए अस्पताल की खुलीं ज़मीन पर दो ईंटें लगा कर लकड़ी जलाकर खाना बनता था।
उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने गोपाल मामा को गोद ले लिया था। उनकी शादी जल्दी कर दी गई। यह सोच कर कि जल्दी ही कोई बच्चा घर में आ जाएगा। लेकिन वह भी नहीं हो पाया।
पार्वती मामी बहुत सुन्दर थीं। उनसे ज़्यादा गोरा इंसान मैंने कोई नहीं देखा।
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मेरे नाना (दासाब) दो भाई थे। उनके बड़े भाई (रामनारायण जी त्रिवेदी) को किसी अमीर परिवार ने गोद ले लिया था। उन्होंने ख़ूब तरक़्क़ी की। मंदसौर हाईकोर्ट में जज नियुक्त हो गए। ख़ूब मनान ख़रीदे। स्टेट बैंक उनकी किराएदार थी। एक सिनेमाघर के मालिक भी थे।
जब 1966 में बाऊजी लंदन पीएचडी करने गए, मम्मी हम दोनों भाई को लेकर अपने मायके रहने लगीं। दासाब का अपना स्कूल था। उसी में मैंने चौथी कक्षा तक की पढ़ाई की। उस प्राथमिक स्कूल में छः कक्षाएँ - कक्का से पाँचवीं तक की - चलती थीं एक बड़े हॉल में।
बाऊजी 1970 में लंदन से लौट आए थे। लेकिन एक जगह स्थिर नहीं थे। न्यूज़ीलैंड-ऑस्ट्रेलिया भी छोटे-मोटे अस्थायी नियुक्तियों पर जाते रहते थे।
दासाब घर वालों से बहुत ही कम बात करते थे। हमेशा अपनी जाली वाले कमरे में रहते थे। गद्दी पर। वह उनका दफ़्तर था। उनके पास एक रजिस्टर था जिसे आज के जमाने की स्प्रेडशीट कहा जा सकता है। इसमें सबके जन्म की तारीख़, समय और स्थान दर्ज था। जब भी जो जानना चाहे मिल सकता था। मेरा जन्म शिवगढ़ में हुआ था और उसकी कोई सूचना उन्हें सैलाना में नहीं मिली तो मेरी जानकारी ग़ायब है। यह ग़म मुझे हमेशा सालता रहा है। बाऊजी जिन्हें जहां भर की तारीख़ें याद हैं वे भी भूल गए। इसका मतलब घाव पर नमक छिड़कना।
मैं जब दसवीं की परीक्षा के लिए आवेदन पत्र भर रहा था, तब मैंने बाऊजी-मम्मी से अपनी जन्मतिथि पूछी तो दोनों में बहस होने लगी। एक कहे 26 अक्टूबर, एक कहे 26 नवम्बर। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि चलो जन्मदिन नहीं मनाया कभी, सो कोई बात नहीं। पर जन्मदिन ठीक से याद भी नहीं?
दासाब के एक बेटा और चार बेटियाँ थीं। चौथी बेटी मेरे बड़े भाई की हमउम्र थी। उधर दादी की तरफ़ भी मेरी छोटी बुआ मेरे बड़े भाई की हमउम्र थीं।
मामासाब के चार बच्चे थे। मामासाब रतलाम के पास रूनखेड़ा रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। छोटा सा गाँव। कोई स्कूल की सुविधा नहीं। इसलिए मामीसाब एवं चारों बच्चे सैलाना में दासाब के साथ ही रहते थे। फिर आ गए मम्मी और हम दो। उधर प्रभा मासीजी भी अस्वस्थ होने के कारण अपनी बेटी के साथ सैलाना रहने लगी। हम सात बच्चे और सात बड़े एक संयुक्त परिवार में हँसी-ख़ुशी रहने लगे।
घर में कुआँ था। उसी का पानी पीते। उसी से नहाते। कपड़े धुलते। बर्तन साफ़ होते।
कुएँ के आसपास अमरूद, जामुन, सीताफल, पपीते के पेड़ थे।
मुझे बचपन में कोई समस्या हो गई थी। इसलिए लकड़ी की कुर्सी पर पाश्चात्य शैली का टॉयलेट बनाया गया। सब चाय पीते थे। मुझे दूध पिलाया जाता था। इसलिए आज तक चाय नहीं पी। अब दूध भी नहीं पीता हूँ।
दासाब ने बाऊजी से कभी कोई बात नहीं की। दासाब और बाईं (नानी) यह मानते थे कि बेटी की घर कभी नहीं जाना है। यदि गए भी तो पानी तक नहीं पीना है। मामासाब जब भी रतलाम आते थे, पड़ोसी के यहाँ माँग कर पानी पीते थे। तब पानी की बोतलें नहीं होती थीं कि साथ में लेकर चलो।
दासाब-बाई को कोई दिक़्क़त नहीं थी कि इतने लोग उनके यहाँ रह रहे थे। मंदसौर वाले नाना को यह बात जँची नहीं कि होनहार पिता के बेटे छोटे से गाँव में पल-बढ़ रहे हैं। उन्होंने बाऊजी को चिठ्ठी लिखी कि अपने बच्चों के भविष्य पर भी ध्यान दो।
तब बाऊजी हम दो भाई और मम्मी को अपने साथ मेरठ ले गए।
मेरठ में हम साकेत में रहते थे। मुझे आज भी पता अच्छी तरह से याद है। 101 साकेत, मेरठ। वह इसलिए कि उससे पहले वाले पते इसके पास, उसके सामने, ज़िला फ़लाना होते थे।
पाँचवीं कक्षा का दाख़िला साकेत के ही अंग्रेज़ी माध्यम वाले प्रायमरी स्कूल में किया गया। मुझे ए-बी-सी-डी तक का ज्ञान नहीं था। और यहाँ सब धड़ाधड़ अंग्रेज़ी में बतिया रहे थे। उम्र ही कुछ ऐसी थी कि मुझमें कोई हीनभावना नहीं जागी। घर में भी किसी को चिन्ता नहीं थी कि स्कूल कैसा चल रहा है। मम्मी ने 1947 में चौथी पास की, उसके बाद कोई पढ़ाई नहीं की। उन्हें क्या पता कि होमवर्क क्या होता है, टेस्ट क्या होते हैं। बाऊजी दूसरे छोर पर थे। लॉ कॉलेज में व्यस्त।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि अंग्रेज़ी की वार्षिक परीक्षा के दिन स्कूल जाते वक़्त न जाने मुझे क्या सूझी और मैंने उनसे पूछ लिया कि नाऊन क्या होता है। वे तब अख़बार पढ़ रहे थे। वे अख़बार नियमित रूप से पढ़ते थे। शुरू से लेकर आख़िर तक। कोई भी ख़बर, कोई भी विज्ञापन उनसे छूटता नहीं था। तभी वे दुनिया भर को सलाह दे पाते थे कि तुम यह पढ़ सकते हो, तुम वहाँ दाख़िला ले सकते हो, इस नौकरी के लिए आवेदन भर दो आदि।
बाऊजी ने अख़बार रखा और कहा कि कॉपी या कोई काग़ज़ दो। उस काग़ज़ पर उन्होंने नाऊन की परिभाषा लिख दी। और फिर अख़बार पढ़ने लगे।
मैं स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते उसे रटने लगा। लेकिन अफ़सोस मुझे रटना नहीं आता। कोई फ़ायदा नहीं हुआ। सारे पर्चे अदिति ने ही दिए थे।
मैं बक़ायदा यूनिफ़ॉर्म पहन बालों में बायीं ओर माँग निकाल कर राजा बेटा बन कर रोज़ स्कूल जाता था। पहली बार घर से बाहर के किसी स्कूल में गया। सैलाना में एक हॉल में कक्का से तीसरी तक की चार कक्षाएँ चलती थीं। टाटपट्टियाँ तय करती थीं आप किस कक्षा में हैं। चौथी और पाँचवीं कक्षा हॉल के बाहरी भाग में लगती थीं। मेरठ में कमरें थे। कुर्सियाँ थीं। डेस्क थीं। यूनिफ़ॉर्म थीं। एक से ज़्यादा अध्यापिकाएँ थीं। गणित की अलग। ड्राइंग की अलग। वग़ैरह।
प्रिंसिपल को बहुत बुरा लग रहा होगा कि अंग्रेज़ी मीडियम के पाँचवीं कक्षा के छात्र को ए-बी-सी-डी तक नहीं आती। सो वे लंच के समय मुझे अपने दफ़्तर में बिठा कर सिखाने लगीं। और मैं सीख गया।
वार्षिक परीक्षा, हर विषय की, तीन घंटे की होती थी। अदिति बहुत स्मार्ट और सहृदय थी। परीक्षा के कमरे में हर डेस्क दूसरे डेस्क से सटी नहीं थी। अलग-अलग थी। उसकी डेस्क मेरी दायीं ओर थी। वह दिखाती भी कुछ तो मैं न तो देख पाता और न ही समझ पाता। हमने कोई बात भी नहीं की थी कि कैसे क्या होगा।
उसने देखा कि मैं तो चुपचाप बैठा हूँ। एक अक्षर तक नहीं लिखा। उसने बिना कुछ कहे, अपनी कॉपी मेरे डेस्क पर रख दी, और मेरी ले ली। वो अपना सारा काम कर चुकी थी। अब वो मेरा काम कर रही थी।
इसी प्रकार सारे विषय के पर्चे उसी ने दिए। यहाँ तक कि ड्राइंग में ऐपल बनाना था। उसी ने बनाया।