Sunday, October 17, 2021

भारत 2021

मुझे, दिनांक अच्छी तरह से याद रहते हैं। लेकिन इस बार की भारत यात्रा इतनी तेज़ रफ़्तार से गुजरी कि बार-बार सोचना पड़ रहा है कि मैं कब कहाँ था, और कब कहाँ से कहाँ गया। 


फ़ोटो में दिनांक और समय होते हैं तो खोजबीन में ज़्यादा समय नहीं लगता है। 


जब मम्मी मेरे साथ अमेरिका आई तो लगा अब भारत में कुछ नहीं रखा है वापस आने के लिए। जब भी मम्मी की किसी से बात होती थी, सब उनसे भारत आने का कहते थे। मैंने उनका ग्रीन कार्ड इसीलिए बनवाया था कि वे अमेरिका में आराम से रह सकें। इस उम्र में और कमज़ोर अवस्था में वे लंबा सफ़र तय नहीं कर सकती थीं। 


मेरे भी कुछ परिचित थे जिनसे मैं कभी मिला नहीं पर वे मिलना चाहते थे और मुझे बुलाते थे लेकिन मैं मम्मी को छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहता था। मम्मी के बाद की कभी सोची नहीं। 


मम्मी के गुज़रने पर भी मैं दाह संस्कार तक ही सोच पाया। फ्यूनरल होम वाले 

सज्जन ने कहा कि अस्थियाँ कहाँ ले जाओगे? भारत ले जानी हो तो भारत सरकार की अनुमति लेने में समय लगेगा। तब मैं सोच में पड़ गया और हरिद्वार गंगा में प्रवाहित करने का निर्णय लिया। 


अनुमति मिलते ही रवाना हो गया। रीत भी है कि अस्थियाँ यहाँ-वहाँ न भटकें एवं सीधे हरिद्वार ले जाईं जाए। बातों-बातों में टैक्सी का इंतज़ाम हो गया। जो स्वेच्छा से जुड़ना चाहते थे, जुड़ गए। उसमें उल्लेखनीय है कि बिना अग्रिम सूचना के गांधीनगर (गुजरात) से अजय, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) से बृजेश, एवं सागर से ओंकार सम्मिलित हो गए। और वापस लौट भी गए। जैसी भी ट्रेन मिली उससे। इतना अपनापन, इतना लगाव आज के जीवन में दुर्लभ है। 


उसके बाद क्या करना है कुछ पक्का नहीं था। वापस जाने की तिथि दो व्यक्तियों के जन्मदिन की तिथियों के बाद की थी। सोचा था मौक़ा है क्यों न फ़ोन पर बधाई एवं शुभकामनाएँ देने के बजाए साथ में ही दोनों जन्मदिन मना कर वापस अमेरिका जाऊँ। 


तब तक क्या करूँगा? मम्मी की दो बहनें, मेरी मासीजी, दोनों से मिलना ज़रूरी समझा। जहाँ-जहाँ परिजन गुज़र गए, वहाँ भी शोकाकुल परिवार से मिलना ज़रूरी समझा। 


बाक़ी वक्त उनसे मिलना ज़रूरी समझा जो मेरे सुख-दुख के वक्त मेरे साथ थे। दूर थे, मगर पास थे। 


इन्हीं सब को सोचते हुए मैं भोपाल, पीथमपुर, इन्दौर, रतलाम, सैलाना, शिवगढ़, उज्जैन, तराना, उदयपुर, प्रयागराज गया। 


सब जगह असीम प्रेम मिला। अपनापन लगा। कुछ लोगों से जीवन में पहली बार मिला। लेकिन लगा ही नहीं कि पहली बार मिला। 


कहीं कुछ लेकर नहीं गया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। कहीं कुछ देकर नहीं आया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। 


हो सकता है मेरे बारे में पीठ पीछे बातें हुई हो कि व्यावहारिकता के नाम पर यह इंसान शून्य है। न पैसे, न मिठाई, न फल, न फूल! कुछ भी नहीं! हाथ हिलाते हुए, बिन बताए आता है और वैसे ही चले जाता है। 


यदि सम्बन्ध देन-लेन से बनते हो तो ऐसे सम्बन्ध न बनें तो ही अच्छा। 


जहाँ-जहाँ से मैं किसी लम्बी यात्रा पर निकला, सबने प्रेम पूर्वक रास्ते के लिए सुन्दर और स्वादिष्ट भोजन बाँधा और मैंने प्रेम से ग्रहण किया। 


तरूण ने तो अखरोट का एक पैकेट भी साथ रख दिया कि कहाँ-कहाँ ढूँढते फिरोगे। बबली और जया ने सुबह पालक आदि का जूस तैयार किया जबकि हज़ारों और काम भी करने होते हैं। नेपथ्य में भंसाली ने जब, जहाँ का, जिस भी ट्रेन का टिकट चाहा, तुरंत बना कर दिया। तरूण के सिम ने मेरी आधी रात की मीटिंग बिना किसी रूकावट के चलने दी।


नूतन ने अमेरिका के लिए बहुत सारा भोजन बाँधा। वन्दना ने प्रयागराज के लिए।  मधु ने इन्दौर के लिए। हर तरफ़ आनन्द ही आनन्द। मासीजी और मीनू दिन भर आगे-पीछे ये खा लूँ, वो खा लूँ। 


जहाँ-जहाँ मैं रात रूका, सबने मेरा भरपूर ख़्याल रखा। मैं आत्मनिर्भर इंसान हूँ पर स्नेह के आगे झुकना पड़ा। नूतन और मीना ने मना करने पर भी मेरे शर्ट पर प्रेस की। अखरोट भिगोए। दही जमाया। 


सैलाना में रेखा की बनिस्बत ज़िन्दगी में पहली बार ड्रेगन फ़्रूट खाया। भोपाल में रेखा जी की बदौलत ज़िन्दगी में पहली बार पेशन फ़्रूट खाया। 


दिल्ली में अंकित सुबह पौने छ: पर मुझे स्टेशन लेने आया। भोपाल में सुबह पौने पाँच बजे रवि जी एवं रेखा जी मुझे स्टेशन लेने आए। मधु सपरिवार स्टेशन पर लेने और छोड़ने आई। बबली, जया और सुदर्श भी। 


अधिकांश जगह मैं सुबह गया और शाम वापस लौट आया। रात नहीं रूका। रात रूकने की योजना बनाई थी, दिल्ली में तरूण के यहाँ ( 21 सितम्बर), भोपाल में रवि जी एवं रेखा जी के यहाँ (23 और 24)। पीथमपुर में सुहानी के यहाँ (25, 26, 27, और 28)। रतलाम में बबली के यहाँ (29, 30, और 1, 4, 5, 10, 11, 12 अक्टूबर)। उदयपुर में राकेश के यहाँ (6)। प्रयागराज में मधु के यहाँ (8) । दिल्ली में मीनू के यहाँ (14 और 15)


उज्जैन से तराना जाने में वक्त लग गया। वापस रतलाम आने का कोई रास्ता न था। मैं बिना तैयारी के निकल गया था। रतलाम से निकलते वक्त लग रहा था कि रात को शायद वापस न आ पाऊँ। बबली ने कहा भी कि कुछ कपड़े साथ रख लो। मुझे ज़्यादा ताम-झाम साथ लेकर चलना पसन्द नहीं। सोचा जहाँ रूकूँगा वहीं से शर्ट ख़रीद लूँगा। भोपाल में भी दो शर्ट ख़रीदें थे। टी-शर्ट और शार्ट्स भी रात को सोने के लिए। टूथब्रश वग़ैरह तो हमेशा बैकपैक में रहते हैं, पानी की बोतल, तीन चार्जर और एक पॉवर पैक के साथ। 


2 अक्टूबर को तराना पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। बाज़ार भी बंद सा था। सो पंकज के कपड़े रात में पहने। दूसरे दिन उसका एक बढ़िया सा शर्ट पहनकर इन्दौर गया। एकदम फ़िट। अब वो मेरा हो गया है। दिया कुछ नहीं, ले ज़रूर आया। 


3 अक्टूबर को इन्दौर में भी संगीता ने बिलकुल नया शानदार शर्ट दिया। यह भी एकदम फ़िट। रात घनश्याम जी के यहाँ गुज़ारी। तीन दशक बाद मिलना हुआ। 


बहुत मिलना-जुलना हुआ। फिर भी मंदसौर और नागदा जाना रह गया। भोपाल दोबारा जाना था। नहीं जा पाया। प्रतापगढ़ भी छूट गया। पलवल भी जाना है। मुम्बई, सागर, लखनऊ, मैंगलोर और हैदराबाद का न्योता स्वीकार न सका। दिल्ली में कुछ लोगों से मिलना रह गया। 


शायद अगली बार। 


मम्मी की तेरहवीं सिएटल में की थी। सैलाना में जिस मंदिर को मम्मी ने बनवाया था, उस मन्दिर में सीमा ने भी तेरहवीं की थी। मैं भी चाहता था कि मेरी इस प्रथम यात्रा में कोई कार्यक्रम हो जाए। सीमा और पंडित जी से बात करने पर तय हुआ कि पितृ पक्ष की अमावस्या  के दिन एक हवन कर लिया जाए। उस दिन मम्मी को गुज़रे हुए दो महीने भी हो रहे थे। सो 6 अक्टूबर को वह कार्य सम्पन्न हुआ। 


जुलाई में सैलाना में बरसी करने का मन है। 


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । शिकागो





Friday, October 1, 2021

आज़ादी

आज़ादी? क्या होती है आज़ादी?


15 सितम्बर 1986 को जब मैं अमेरिका पहुँचा, मुझे पूरी आज़ादी थी कि मैं जब चाहूँ अमेरिका छोड़ सकता था। लेकिन प्लेन टिकट ख़रीदने के लिए पर्याप्त धनराशि न होने की वजह से नहीं छोड़ा। यह थी आर्थिक ग़ुलामी। 


बाद में धनराशि जोड़ लेने पर भी नहीं आया। क्यों? क्योंकि वापस अमेरिका के लिए वीज़ा मिल पाना निश्चित नहीं था। निश्चित करने में पाँच साल लगे। 


आज के मिलन के सुख के लिए मैं अपने सुखद भविष्य की बलि नहीं देना चाहता था। 


पाँच साल तक मैं एक जेल में रहा। ख़ुद की बनाई हुई। उस जेल में कोई सलाख़ें नहीं थी। मैं उससे जब चाहे तब छाती चौड़ी कर निकल सकता था। कोई रोक-टोक नहीं। कोई पूछताछ नहीं। कोई जाँच-पड़ताल नहीं। 


लेकिन वापस आते वक्त हज़ार दिक़्क़तें आ सकती थीं। 


हम रोज़ ऐसे निर्णय लेते हैं। रोज़ किसी न किसी जेल का निर्माण करते हैं और उसमें रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। 


गाँधी जी आज़ाद थे। कुछ कटु अनुभव हुए। वे दूसरों की बनाई हुई जेल में क़ैद हुए ताकि वे और अन्य आज़ाद हो सके, विदेशी ताक़त के बनाए नियम-क़ानून से। 


और हम हैं कि अपने ही घर, परिवार, समाज के बनाए हुए नियम-क़ानून में हर दिन, हर पल बँधे रहते हैं। 


क्या पहनें? हम आज़ाद नहीं हैं। 

क्या खाएँ? हम आज़ाद नहीं हैं। 

क्या करें? हम आज़ाद नहीं हैं। 

किससे मिलें? हम आज़ाद नहीं हैं। 

किसे फ़ोन करें? हम आज़ाद नहीं हैं। 


राहुल उपाध्याय । 2 अक्टूबर 2021 । रतलाम-उज्जैन के बीच 



Tuesday, September 21, 2021

अंग्रेज़ी

हमारी ज़िन्दगी बिना अंग्रेज़ी के नहीं चल सकती। यह तय है। और इस बात को मानने में कोई बुराई नहीं है। 


किसी युवती को माहवारी में यदि देर हो जाए और वह जानना चाहें कि वह गर्भवती है या नहीं, बिना अंग्रेज़ी जाने यह सम्भव नहीं है। कोई उपकरण नहीं है जिसमें देवनागरी अक्षर हो। सब में अंग्रेज़ी/रोमन है। उसे अपनी निजी जानकारी के लिए किसी अंग्रेज़ी के जानकार की मदद लेनी पड़ती है। 


यदि आप अपना बुख़ार नापना चाहें, कोई उपकरण नहीं जिसमें देवनागरी में अक्षर/अंक हो। 


कार में गियर रोमन में हैं। देवनागरी में नहीं। 


वजन लेना हो तो अंग्रेज़ी में। 


ये वैज्ञानिक यंत्र हैं। उपकरण हैं। जिनका अविष्कार पश्चिमी देशों में हुआ। हिन्दी/देवनागरी का अभाव समझ में आता है। 


जितनी भी ऑनलाइन सेवाएँ हैं, अंग्रेज़ी से अनभिज्ञ इंसान को इस आत्मनिर्भर भारत में किसी और पर निर्भर होना पड़ता है, किसी कियोस्क में जाकर  किसी दूसरे को अपना ओ-टी-पी देना पड़ता है। 


बुरा तो तब लगता है जब हम अपनी भावनाएँ व्यक्त करने में भी इसके बाहुल्य से नहीं बच पाते हैं। 


क्या किसी को याद करना पाश्चात्य संस्कृति की उपज है? क्या किसी से विदा लेना पश्चिमी देशों ने सीखाया? क्या किसी को ख़ुशियाँ देना हमने कहीं और से सीखा? क्या हमें पहले प्यार करना नहीं आता था? क्या हम सांत्वना देना नहीं जानते थे। 


आई मिस यू।सी यू लेटर। बाय। कॉन्ग्रेचुलेशन्स। आई लव यू। माई डीपेस्ट कंडोलेन्सेस। 


जन्मदिन मनाना शायद हमने पश्चिम से सीखा। इसलिए हैप्पी बर्थडे समझ में आता है। लेकिन हैप्पी दीवाली? हैप्पी होली? 


कोई भी कार्यक्रम तय करना हो जहाँ दो-चार परिवार इकट्ठे करने हो, तुरंत व्हाट्सएप ग्रुप बन जाता है। हिन्दी/देवनागरी की तमाम सुविधाएँ होने के बावजूद अंग्रेज़ी में ही सारी जानकारियों का आदान-प्रदान होता है। 


कितने लोग आ रहे हैं? यह नहीं पूछा जाता। आई नीड हेडकाऊंट। 


कृपया किसी के शब्दकोश में नहीं है। प्लीज़ का कोई हिसाब नहीं है। हर दूसरे वाक्य में प्लीज़ होता है। प्लीज़ कम ऑन टाईम। केन यू प्लीज़ रिस्पांड। 


धन्यवाद कौन कहता है? थैंक्यू से पूरा व्हाट्सएप भरा पड़ा है। 


लगता है हम स्वस्थ, ज्ञानी, सुशिक्षित, सुसंस्कृत एवं विनम्र अंग्रेज़ी पढ़-लिख-बोल-सुन कर ही हुए हैं। 


राहुल उपाध्याय । 22 सितम्बर 2021 । दिल्ली 







Sunday, September 19, 2021

अस्थि विसर्जन

मम्मी की अंतिम यात्रा जारी है। 


अमेरिका से भारत अस्थियाँ ले जाने के लिए भारत सरकार की अनुमति आवश्यक है। 


शुक्रवार को अनुमति मिली। कोविड-19 का टेस्ट कराया। शनिवार सुबह नेगेटिव रिज़ल्ट आया। आज, रविवार का टिकट बुक कराया। 


सोमवार, 20 की शाम दिल्ली उतरूँगा। 21 को हरिद्वार में गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 19 सितम्बर 2021 । न्यूआर्क 

Thursday, September 16, 2021

15 सितम्बर 2021

15 सितम्बर 1986 मेरे जीवन की इतनी बड़ी तारीख़ है कि इसके बारे में मैं कहते-लिखते नहीं थकता। 


यही वो दिन है जब मैं अनमने मन से अमेरिका आया था और अमेरिका आने के 12 घण्टे के अंदर ही यह निर्णय कर लिया था कि अब मैं अमेरिका में ही रहूँगा। अपनी मर्ज़ी से यह देश नहीं छोड़ूँगा। किसी मजबूरी में शायद छोड़ना पड़ जाए, पर अपने आप नहीं। 


आर्थिक कारणों की वजह से तुरंत तो कोई नहीं लौटता है, लेकिन हाँ सबके मन में यह भाव तो रहता ही है कि एक न एक दिन भारत वापस लौट जाएँगे। 


मैंने कभी नहीं सोचा। 


15 की शाम जब जे-एफ-के एयरपोर्ट उतरा तो मेरी अज्ञानतावश मेरी अटेचियाँ कस्टम्स में रह गई। टी-डबल्यू-ए एयरलाइंस के प्रतिनिधि ने भरोसा दिलाया कि चिन्ता न करें हम सामान सुरक्षित सिनसिनाटी में आपके घर पहुँचा देंगे। और सामान दूसरे दिन तड़के सुबह सही-सलामत घर पहुँच गया। जबकि मेरा कोई घर न था। अपर्णा जो मुझे एयरपोर्ट लेने आए थी, उसके घर। अपर्णा, जिसे मैं जानता तक ना था, नाम भी नहीं सुना था। वह एयरपोर्ट लेने आई क्योंकि राज ने कहा था। राज को भी मैं नहीं जानता था। राज, सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के भारतीय छात्र संघ के अध्यक्ष थे। (उन्हें मेरे आने की खबर अंतरराष्ट्रीय छात्र संध ने दी थी।) राज को शहर से बाहर जाना था सो अपर्णा को मेरा काम सौंप दिया। साथ ही अपने घर की चाबी दे गए ताकि मैं पहली रात एक अनजान देश में आराम से गुज़ार सकूँ। 


टी-डबल्यू-ए के प्रतिनिधि और राज के व्यवहार ने मेरा दिल जीत लिया और मैं सदा के लिए अमेरिका का हो गया। 


हर साल मैं उस दिन के घटनाक्रम पर विचार करता हूँ। 2019 में 33वीं वर्षगाँठ मनाई। सब कह रहे थे, ये कैसा पागलपन है? 33वीं कौन मनाता है? 25, 50 तो समझ भी आती है। 


अच्छा किया, मना ली। मम्मी साथ में थी। उनके साथ मन गई। 2020 में कोविड की वजह से कुछ हो नहीं पाया। 


इस साल मम्मी नहीं है। उनका न होने का दुख तो बहुत है फिर भी कुछ लोगों के साथ बैठ कर कल 15 सितम्बर 86 को याद किया। 


राज भी सिएटल में ही रहते हैं। माइक्रोसॉफ़्ट में कार्यरत हैं। 33वीं पर भी आए थे, कल भी आए। मम्मी के दाह संस्कार में भी आए थे। 


सचमुच बहुत अच्छा लगता है यह जानकर कि हम दोनों आज भी सम्पर्क में हैं। 


राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2021 । सिएटल 



Saturday, September 11, 2021

8 सितम्बर 1986

8 सितम्बर 1986 को मिले इस वीसा ने मेरी ज़िन्दगी का रूख बदल दिया। 


मेरे पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी। बोकारो स्टील प्लांट की पसंदीदा नौकरी का प्रस्ताव भी था। मैं आरामपसंद हूँ। और एक आरामदायक ज़िन्दगी की परिकल्पना 1985 की गर्मियों में की इन्टर्नशिप कर चुका था। बोकारो की ज़िंदगी, वहाँ की आवास व्यवस्था से मैं प्रसन्न था। नौ से पाँच वातानुकूलित दफ़्तर में काम करूँगा। शाम को फिल्म देखूँगा और जी भर आईस क्रीम खाऊँगा। 


22 का था। लेकिन सोच यही तक सीमित थी। किसी बात का जज़्बा नहीं। कपिल देव इससे कम उम्र में पाकिस्तान में देश का गौरव बढ़ा चुके थे। 


यह वीसा भी मेरी महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। आय-आय-टी की हवा ही कुछ ऐसी होती है। आप भी भीड़ का एक हिस्सा है। जो सब करते हैं, वही आप भी करते हैं। मौलिक सोच बहुत कम होती है। 


सबने जी-आर-ई की परीक्षा दी। मैंने भी दी। टोफल की भी। अमेरिका के चार कॉलेज को मास्टर्स के आवेदन पत्र भेजे। उनमें से एक ने स्वीकृति दे दी और छात्रवृत्ति भी। 


अमेरिका आना इतना आसान नहीं है। इसीलिए मुझे हार-फूल से विदा किया गया। मेरे परिवार के लिए, एवं देश के लिए, मैं देश का गौरव था जिसे ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ था। हर कोई ख़ुश था। 


15 सितम्बर 1986. जिस दिन मैं रवाना हुआ, मैं बहुत रोया। इसलिए नहीं कि मुझमें देशप्रेम कूट-कूट कर भरा था। बल्कि इसलिए कि एक बार नवीं कक्षा में असफल होने के बाद मुझे हर परीक्षा से चिढ़ थी। मुझे सीखना, सीखाना बहुत पसन्द है। इम्तिहान से नफ़रत। हालाँकि उस असफलता ने ही मुझे सिखाया कि कैसे सीखा जाता है। 


जैसे ही बी-टेक ख़त्म हुआ, नौकरी मिली, मैं निश्चिंत था कि अब कोई इम्तिहान नहीं दूँगा। अब यह दो साल की ज़हमत और आ गई सर पर। 


कहने को कोई कह सकता है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी। वीसा लेने तुम ख़ुद गए थे। न जाते तो सारी समस्या की जड़ ही मिट जाती। 


कहना आसान है। सारी हवा ही ऐसी होती है कि न चाहते हुए भी कदम बढ़ते जाते हैं। 


यह वीसा एक साल का था। मास्टर्स करने में दो साल लगते हैं। यानी पहले साल में मैं भारत आऊँ तो वापस बिना नया वीसा लिए अमेरिका जा सकता हूँ। उसके बाद भारत आ सकता हूँ, लेकिन अमेरिका के लिए वीसा लिए बिना नहीं। वीसा मिलना ऐसा जैसे लॉटरी निकलना। पता नहीं किसे मिले, किसे नहीं। 


पहले साल मिलने-जुलने के लिए आना असंभव था। टिकिट के लिए पैसे ही नहीं थे। छात्रवृत्ति से किराया और घर का खर्च निकल जाता था। पढ़ाई के बाद नौकरी लगी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, कम्प्यूटर साईंस, फ़्रेंकलिन कॉलेज, इण्डियना में। अब पैसा था, लेकिन वापस आना इतना आसान नहीं कि टिकट ली और बैठ गए। 


यदि भारत आया, और वीसा नहीं मिला तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा। सो मेक्सिको गया। वीसा नहीं मिला। एक साल बाद फिर गया। तब मिल गया। 


इसी फ़ोटो में दिख रहा है कि मैं 9 जुलाई 1991 को वापस पहली बार भारत आया। 


राहुल उपाध्याय । 14 सितम्बर 2020 । सिएटल



Friday, September 10, 2021

गणेश चतुर्थी 2021

पर्व में उल्लास और बढ़ जाता है जब अनायास ही कोई ख़ुशी मिल जाए और कोई उसमें शामिल हो जाए। 


आज फिर हमेशा की तरह बिना दरवाज़ा खटखटाए ख़ुशी मेरे घर में दाखिल हुई। यानी कला और उसकी तीन वर्षीय बेटी प्राणुषा। 


इस बार कला के हाथ में थाली थी। थाली में गणेश चतुर्थी का प्रसाद था। उन्द्रैला पायसम, बुरेलु और पुलिहारा। 


तीनों उत्कृष्ट और स्वादिष्ट व्यंजन। पुलिहारा बहुत बार खा चुका हूँ। पुलाव से मिलता-जुलता। 


बुरेलु और उन्द्रैला पायसम पहली बार खाए। 


बुरेलु - मूंगदाल की पकोड़ी जैसी है। 


उन्द्रैला पायसम - खीर है। 


पर बनाने की विधि अलग है। स्वाद भी अलग। 


दोनों की विधि यहाँ दे रहा हूँ। 


उन्द्रैला पायसम:

https://youtu.be/whJNKfrPQuo


बुरेलु:

https://youtu.be/OY-ksyGyazM


चावल के आटे और हल्दी के मिश्रण से कला ने बहुत प्यारे गणेश जी भी बनाए। फल और पकवान के भोग के साथ बहुत ही अनुपम छटा निखर आई है इस पर्व की।


राहुल उपाध्याय । 10 सितम्बर 2021 । सिएटल