Wednesday, December 9, 2020

शब्दावली: कविता तिवारी: वन्दना

बन्दना की प्रथा बहुत पुरानी है। और प्रभु के हज़ारों नामों को दोहराना भी एक प्रक्रिया है जिससे कई लोगों को शांति मिलती है। 


कई लोगों को इन सबका अर्थ जाने बिना दोहराना भी अच्छा लगता है। जैसे मेरी मम्मी। विष्णु सहस्त्रनाम पढ़तीं है। लेकिन अर्थ से अनभिज्ञ। 


कविता तिवारी की यह वन्दना कई मामलों में अनूठी है। एक तो यह आधुनिक है। दूसरा, वर्तमान समय की समस्याओं के समाधान की और ध्यान आकर्षित करती है। तीसरा, यह सार्वजनिक वन्दना है, निजी नहीं। चौथी, यह कोरी गुणगान या प्रशंसा नहीं है। 


हालाँकि यह अवधि, संस्कृत या ब्रजभाषा में नहीं है, फिर भी शब्द इतने क्लिष्ट है कि शब्दकोश के बिना समझना कठिन है। ये बात और है कि कविता कविता इतने प्रभावशाली ढंग से सुनातीं हैं कि श्रोता ताली बजाए बिना रह नहीं सकता। ताली कई बार स्मरणशक्ति की सराहना में भी बजा दी जाती है। 


हे ईश्वर, मालिक, हे दाता

हे जगत नियंता दीनबंधु

हे परमेश्वर, प्रभु, हे भगवन 

हे प्रतिपालक, हे दयासिंधु


सच्चिदानंद, घट-घट वासी

हे पुण्यराशि, करूणावतार

हे विघ्नहरण, मंगलमूर्त

हे शक्तिरूप, हे गुणागार


सभ्यता यशस्वी हो जाए

मानवता का फैले प्रकाश

सब दिव्य दृष्टि के पोषक हो

कर दो कुदृष्टि का सर्वनाश


इतिहास गढ़े जाएँ प्रतिपल

पृष्ठों में अकलंकता रहे

सज्जनता का अनुशीलन हो

मानव को पथ का पता रहे


हर एक बालिका विदुषी हो

हर बालक नीति निधान रहे

फहराए तिरंगा अंबर तक

माँ का धानी परिधान रहे


'कविता' चाहेगी धरती पर

संस्कृतियों का सम्मान रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सुपुनीता होकर मनोवृत्ति

उत्तुंग शिखर स्पर्श करे

गुण श्रेष्ठ प्रस्फुटित हों इतने

सम्यक हों क्रांति विमर्श करें


उत्फुल्ल रहे हर एक व्यक्ति

पर परम सरलता बनी रहे

शब्दों की अपनी गरिमा हो

अविराम तरलता बनी रहे


हे त्रिभुवन के पथ-उन्नायक 

आपदा प्रबन्धन के स्वामी

हम विनत भाव करबद्ध खड़े हैं

सर्वेश्वर अंर्तयामी


हे नाथ, सनाथ करो सबको

जन-जन हो जाए निर्विकार

विप्लवी घोष विध्वंश मिटे

खोलो सबके हित मोक्ष द्वार


नित नव किसलय विकसित प्रसून 

अति स्वर्णिम सुखद विहान रहे

भ्रमरों का जिस पर झूम झूम

अनुगुंजित मधुरिम गान रहे


आरती भारती की उतरे 

अर्पित तन-मन-धन प्राण रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सारंग धनुर्धारी भगवन

श्रीराम भुवन भय दूर करो 

हे चक्रपाणी कर कृपादृष्टि

छल-दम्भ-द्वेष को चूर करो 


हे त्रयम्बकेश्वर महादेव 

हे नीलकंठ अवढरदानी

त्रैलोक्यनाथ रोको-रोको

बढ़ रही नित्य प्रति मनमानी 


सम्मोहन-मारण-वशीकरण 

उच्चाटन मंत्र प्रयुक्त दिखे 

जिनके कारण भय व्याप्त हुआ

भयहीन दिखे, भयमुक्त दिखे 


अरिहंत तुरंत करो कौतुक

रोको अनर्थ की छाया को 

मन प्राण सन्न, सहमे, सकुचे

क्या हुआ मनुज की काया को 


अनुरक्ति बढ़े सीमाओं तक 

लेकिन विरक्ति का ध्यान रहे 

मिट जाये तिमिर अशिक्षा का

भाषित शिक्षा का दान रहे 


मानव अर्पित हो राष्ट्र हेतु 

पूजित युग-युग अभिमान रहे 

जब तक सूरज-चंदा चमके 

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


(कविता तिवारी)


अब अर्थ के साथ:


हे ईश्वर, मालिक, हे दाता

हे जगत नियंता दीनबंधु

हे परमेश्वर, प्रभु, हे भगवन 

हे प्रतिपालक, हे दयासिंधु


सच्चिदानंद घट-घट वासी

हे पुण्यराशि करूणावतार

हे विघ्नहरण मंगलमूर्त

हे शक्तिरूप, हे गुणागार


सभ्यता यशस्वी हो जाए 

मानवता का फैले प्रकाश

सब दिव्य दृष्टि के पोषक हो

कर दो कुदृष्टि का सर्वनाश


इतिहास गढ़े जाएँ प्रतिपल

पृष्ठों में अकलंकता रहे

सज्जनता का अनुशीलन (नियमित अध्ययन) हो

मानव को पथ का पता रहे


हर एक बालिका विदुषी हो

हर बालक नीति निधान (आधार) रहे

फहराए तिरंगा अंबर तक

माँ का धानी (हल्का हरा) परिधान रहे


'कविता' चाहेगी धरती पर

संस्कृतियों का सम्मान रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सुपुनीता (मक्खन) होकर मनोवृत्ति (मन की स्थिति)

उत्तुंग ( ऊँचा) शिखर स्पर्श करे

गुण श्रेष्ठ प्रस्फुटित हों इतने

सम्यक (उचित) हों क्रांति विमर्श करें


उत्फुल्ल (प्रसन्न) रहे हर एक व्यक्ति

पर परम सरलता बनी रहे

शब्दों की अपनी गरिमा हो

अविराम तरलता बनी रहे


हे त्रिभुवन के पथ-उन्नायक

आपदा प्रबन्धन के स्वामी

हम विनत भाव करबद्ध खड़े हैं

सर्वेश्वर अंर्तयामी


हे नाथ, सनाथ (जो अनाथ न हो) करो सबको,

जन-जन हो जाए निर्विकार (जिसमें कोई दोष न हो)

विप्लवी (उपद्रवी) घोष विध्वंश मिटे, 

खोलो सबके हित मोक्ष द्वार


नित नव किसलय (पौधों में निकलने वाले नए पत्ते) विकसित प्रसून (फूल), 

अति स्वर्णिम सुखद विहान (सवेरा) रहे

भ्रमरों का जिस पर झूम झूम

अनुगुंजित मधुरिम गान रहे


आरती भारती की उतरे 

अर्पित तन-मन-धन प्राण रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सारंग (विष्णु का धनुष ) धनुर्धारी भगवन, 

श्रीराम भुवन भय दूर करो 

हे चक्रपाणी कर कृपादृष्टि

छल-दम्भ-द्वेष को चूर करो 


हे त्रयम्बकेश्वर महादेव

हे नीलकंठ अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालने वाले) 

त्रैलोक्यनाथ रोको-रोको

बढ़ रही नित्य प्रति मनमानी 


सम्मोहन-मारण-वशीकरण

उच्चाटन ( एक तांत्रिक प्रयोग) मंत्र प्रयुक्त दिखे 

जिनके कारण भय व्याप्त हुआ

भयहीन दिखे, भयमुक्त दिखे 


अरिहंत (योग्य एवं गुणी) तुरंत करो कौतुक (आवेग)

रोको अनर्थ की छाया को 

मन प्राण सन्न, सहमे, सकुचे

क्या हुआ मनुज की काया को 


अनुरक्ति (प्रेम) बढ़े सीमाओं तक, 

लकिन विरक्ति (किसी के प्रति प्रेम, सहानुभूति आदि न रह जाने का भाव ) का ध्यान रहे 

मिट जाये तिमिर (अंधकार) अशिक्षा का

भाषित शिक्षा का दान रहे 


मानव अर्पित हो राष्ट्र हेतु

पूजित युग-युग अभिमान रहे 

जब तक सूरज-चंदा चमके 

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


इसे यहाँ सुना जा सकता है:

https://youtu.be/xcmpI7bVoyY 


राहुल उपाध्याय । 9 दिसम्बर 2020 । सिएटल 

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Best Regards,
Rahul
425-445-0827

Monday, December 7, 2020

6 दिसम्बर 2020

 


कल का सामूहिक रविवारीय प्रातः भ्रमण मेडायना में हुआ। यहाँ माइक्रोसॉफ़्ट के संस्थापक बिल गेट्स और अमेज़ॉन के संस्थापप जेफ़ बेज़ोस के घर हैं। जहाँ से हमने चलना शुरू किया वहाँ नगर पालिका है, पोस्ट ऑफ़िस है, पुलिस स्टेशन है और एक छोटी सी दुकान है। वहाँ से मात्र दस घर दूर बिल गेट्स का आलीशान मकान है।  इसके चर्चे इंटरनेट पर एक ज़माने में बहुत रहे।  आज भी इनकी जानकारी वहाँ से मिल सकती है। इस घर की क़ीमत 700 करोड़ रूपये से अधिक है, जिसका सालाना टैक्स 7 करोड़ रूपया है। 


मुझे अमेरिका के जीवन की यह बात बहुत अच्छी लगती है कि जो सुविधाएँ अमीरों को उपलब्ध है, वे एक आम आदमी को भी हैं।  जिस झील का, जिस पानी का, जिस पर्वत का, जिस दृश्य का आनंद बिल गेट्स अपने घर की खिड़कियों से उठाते हैं, वही आनंद मैं भी मेडायना बीच पार्क से उठा सकता हूँ। मैं इसलिए यहाँ कई-कई बार आता हूँ। 


यह शहर मेरे शहर से क़रीब दस मील दूर ही है और जुड़ा हुआ है। माइक्रोसॉफ्ट का दफ़्तर भी यहाँ से क़रीब तीन-चार मील के अंदर ही है। मैं पहले भी कह चुका हूँ लेकिन एक बार फिर बता देता हूँ कि यहाँ सम्पन्न से सम्पन्न व्यक्ति भी अपनी कार ख़ुद ही चलाता है।  वो शायद इसलिए कि उन्हें कार चलाने का शौक़ है और कार जो वो लेते हैं वो कोई आम कार नहीं होती है। उन्हें चलाने का आनंद ही अलग होता है। बहरहाल बिल गेट्स के बारे में तो मशहूर है कि वे कारों के शौक़ीन हैं और तेज कार चलाने की उनकी आदत है। बिल गेट्स तो पैदा ही सिएटल में हुए थे लेकिन यह घर माइक्रोसॉफ्ट की कमाई से ही बनवाया था।  जेफ़ बेज़ोस बहुत बाद में पूर्वी अमेरिका से आए और उन्होंने भी अमेजॉन की कमाई से ही यहाँ यह घर बनवाया। 


सिएटल बहुत ही सुंदर शहर है। रोज़गार, मौसम और शिक्षा के मामले में अन्य शहरों से कहीं आगे। और महँगाई बाक़ी महानगरों की अपेक्षा कम है। इसलिए मुझे सर्वाधिक पसंद है। जेफ़ बेज़ोस और बिल गेट्स के भी अपने कारण होंगे। 


कल बादल थे सो माउंट रेनियर नहीं दिखा। जून 2017 का फ़ोटो दे रहा हूँ।


क्रिसमस की सजावट भी अब शुरू हो गई है। सो एक पार्क में क्रिसमस की रोशनी की तस्वीर है। चर्च के अंदर की रोशनी भी बाहर से प्यारी लग रही है। 


राहुल उपाध्याय । 7 दिसम्बर 2020 । सिएटल 

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Best Regards,
Rahul
425-445-0827

Sunday, December 6, 2020

क्या ग़ज़ल नहीं है

'कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है'


यह ग़ज़ल नहीं है। 


ग़ज़ल दो-दो पंक्तियों के समूह को कहते हैं। पहली दो पंक्तियाँ तुकांत होतीं हैं। 


तुकांत दायें से बाएँ देखी जाती हैं। जहाँ तुक ख़त्म हो जाए, वहाँ तक के शब्द समूह में से रदीफ़ और क़ाफ़िया तय किए जाते हैं। 


जो हुबहू हैं, वे रदीफ़। जो नहीं वह क़ाफ़िया तय करते हैं। 


जैसे:

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं 

इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं


दायें से बाएँ तुकांत हैं:

मस्ताने हज़ारों हैं/अफ़साने हज़ारों हैं


हुबहू हैं: हज़ारों हैं

इसलिए रदीफ़ है: हज़ारों हैं


क़ाफ़िया: मस्ताने/अफ़साने 


यानि अब हर शेर (दो पंक्तियाँ) की दूसरी पंक्ति का अंत ऐसे होगा:

ाने हज़ारों हैं 


जैसे: 

गाने हज़ारों हैं

तराने हज़ारों हैं

लाने हज़ारों हैं

खाने हज़ारों हैं

बहाने हज़ारों हैं

रूलाने हज़ारों हैं 

आदि


ग़लत होंगे:

देने हज़ारों हैं

लेने हज़ारों हैं

धोने हज़ारों हैं 

छूने हज़ारों हैं

पहने हज़ारों हैं


बाक़ी के अशआर देखें:

इक तुम ही नहीं तन्हा, उलफ़त में मेरी रुसवा

इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं 


इक सिर्फ़ हम ही मय को आँखों से पिलाते हैं 

कहने को तो दुनिया में मयखाने हज़ारों हैं 


इस शम्म-ए-फ़रोज़ाँ को आंधी से डराते हो 

इस शम्म-ए-फ़रोज़ाँ के परवाने हज़ारों हैं

https://youtu.be/lpNAOiJmS2c 


आम भ्रांति है कि हर उर्दू शब्दों से जड़ी रचना को ग़ज़ल मान लिया जाता है। 


जैसे:

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ

ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ


पहली दो पंक्तियाँ ग़ज़ल की परिभाषा पर खरी उतरती हैं। 


रदीफ़: किसे पेश करूँ

क़ाफ़िया: ात 


लेकिन अंतरों में दो पंक्तियों के समूह नहीं हैं, इसलिए यह ग़ज़ल नहीं है, बावजूद इसके कि फिल्म का नाम ग़ज़ल है। ये रहे अंतरे:


मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह  

अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह

तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ


ये मेरे शेर मेरे आखरी नज़राने हैं   

मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं

बेताल्लुक सी मुलाकात किसे पेश करूँ


सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे 

तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे

मैं ये ख़्वाहिश ये ख़यालात किसे पेश करूँ


कौन कहता है कि चाहत पे सभी का हक़ है 

तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है

मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ

https://youtu.be/CZmSgtSq9T8 


इसी फिल्म की इसी रदीफ़/काफ़िए के साथ लता द्वारा प्रस्तुत की गई यह रचना ग़ज़ल है:


नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ

ये छलकते हुए जज़बात किसे पेश करूँ


शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊँ किस पर

मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात किसे पेश करूँ


गर्म सांसों में छुपे राज़ बताऊँ किसको

नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ


कोइ हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले

दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ

https://youtu.be/7Tlzul3JZJ0 


ग़ज़ल नहीं है, यह पहचानना ज़्यादा आसान। ग़ज़ल है, यह कहना बहुत कठिन। क्योंकि रदीफ़ और क़ाफ़िए के अलावा बहर भी एक चीज़ होती है, जिसका मुझे बिलकुल भी ज्ञान नहीं है। 


देखिए यह रचना जो मैंने 2008 में लिखी थी। रदीफ़ और क़ाफ़िए का निर्वाह हुआ है, लेकिन बहर में नहीं है। 


मेरे हाथों की लकीरों में 'गर मुक़द्दर होता

मैं अपने ही हाथों के हुनर से बेखबर होता


आपत्तियों के पर्वत यदि न होते विशाल

विश्वविख्यात न आज सिकंदर होता


ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी होती तो अच्छी

लेकिन जीवन नीरस और बेअसर होता


सच्चे प्यार से न कभी होती मुलाकात

अगर झील सी आँखों में न समंदर होता


गर्व यदि होता हमें स्वयं पर

नालंदा आज न खंडहर होता


हाँ में हाँ यदि मिलाते सभी

मरघट सा यहाँ मंजर होता


परहेज़ जिसे कहता है डाक्टर

वही तो रोगी को प्रियकर होता


दुत्कारते न आप भरी सभा में मुझको

नाम मेरा न जाने कैसे अमर होता


छंद-मात्रा में यदि होता मैं सक्षम

मैं समक्ष आपके किताबों में छपकर होता


बहर-वजन का भी मैं रखता खयाल

जगजीत का मुझे मिला स्वर होता


दूसरों को बुरा भला जो कहते हैं लोग

उनके पास आईना नहीं अक्सर होता


थोड़ा सा सब्र जो कर लेते लोग

बात-बात पर न बवंडर होता


इंटरनेट की लड़ाईयाँ हैं बिट्स-बाईट्स तक सीमित

अन्यथा यहाँ महाभारत रोज जमकर होता


दिन-प्रतिदिन तो पकवान परोसे नहीं जाते

प्रत्येक दिन पर्व का नहीं अवसर होता


असम्भव था सिद्धार्थ का बुद्ध होना

राहुल संतान जो नहीं बनकर होता


राहुल उपाध्याय । 29 अप्रैल 2008 । सिएटल 

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राहुल उपाध्याय । 6 दिसम्बर 2020 । सिएटल 



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Best Regards,
Rahul
425-445-0827

Friday, December 4, 2020

4 दिसम्बर 2013

सात साल पहले पचासवाँ जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। 29 नवम्बर को। मुझे पता नहीं था। जैसा कि हर वर्ष होता है, धन्यवाद ज्ञापन दिवस के उपलक्ष्य में चार दिन का अवकाश था। मंजू ने शुक्रवार के दिन भव्य दावत का आयोजन किया था। मुझे और प्रेरक को किसी काम से बाहर भेज दिया था। 


जितने भी मेहमान आए थे सबसे कहा गया कि अपनी गाड़ियाँ कहीं दूर पार्क करें ताकि लौटने पर मुझे कोई शक़ न हो। जूते भी छुपाए गए। 


हम दोनों जब वापस घर आए तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। बहुत लोग आए थे। तब मेरे पास आईफ़ोन नहीं था। किसी सज्जन से कहा फ़ोटो लेने के लिए। कुछ ठीक आए, कुछ नहीं आए। 


बहरहाल, आमतौर पर एक उम्र के बाद उपहार का प्रचलन बंद हो जाता है। पर पचासवाँ जन्मदिन था सो सब कुछ न कुछ लाए। 


तब मैं सोम से शुक्र रोज़ मम्मी-बाऊजी से फ़ोन पर बात किया करता था। प्रेरक को स्कूल छोड़कर दफ़्तर जाते वक़्त जो दस मिनट लगते थे उसी में बात हो जाती थी। बातें कुछ ख़ास नहीं होती थीं। सिर्फ यही कि स्वास्थ्य कैसा है। उनसे मिलकर हम चारों जुलाई में ही लौटे थे। जब तक हम थे, वे ठीक थे। हमारे निकलने के बाद हालत बिगड़ गई थी। फिर सुधर गई थी। 


सोमवार, 2 दिसम्बर, को प्रेरक को स्कूल छोड़कर मैंने दिल्ली फ़ोन लगाया। मम्मी-बाऊजी दोनों से बात हुई। दोनों ख़ुश हुए कि जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। मैं बताने लगा कि उपहार में क्या-क्या मिला। याद करके बता रहा था, सो कुछ बता पाया, कुछ नहीं। 


अगले दिन फिर वही, प्रेरक को छोड़कर फ़ोन लगाया। बाक़ी उपहारों की बात करने लगा। बाऊजी खाँस रहे थे। मम्मी ने कहा कि खांसी नहीं है। बस यूँही अभी खाँस रहे हैं। बात पूरी नहीं हो पाई। 


4 की सुबह फिर फ़ोन लगाया। घंटी बजती रही। किसी ने नहीं उठाया। दोबारा लगाया। नहीं उठाया। कुछ देर में दिल्ली में हमारे पड़ोसी राव साहब का फ़ोन आया। 


ख़बर दी कि मम्मी अस्पताल में हैं। वहाँ फ़ोन कर लूँ। बाऊजी नहीं रहे। 


फ़ोन किया। बात की। गाड़ी घर की ओर पलटी। मंजू को फ़ोन किया। कहा दिल्ली का टिकट ख़रीदों। 


तीन घंटे में मेरा प्लेन सिएटल छोड़ चुका था। 


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दिल्ली में 4 को विधानसभा के चुनाव थे। मेरी भतीजी ने मम्मी से कहा कि दादी आप वोट दे आओ। बाऊजी का चलना-फिरना सीमित है सो वे नहीं जा सकते थे। 


मम्मी वोट देकर आई। बाऊजी ने खाना खाया। कुछ देर बाद परेशानी का ज़िक्र किया। मम्मी ने अस्पताल चलने का आग्रह किया। वे मना करते रहे। वे अस्पताल से घबराते थे। तीन साल पहले आई-सी-यू का अनुभव अच्छा नहीं रहा। वे नलियाँ खींच लेते थे। सो उनके हाथ बाँध दिए गए थे। 


मम्मी ने फिर भी मनाने की कोशिश की। कहा कि चलो वो नया कुर्ता पहन लो जो जन्मदिन (15 नवम्बर) पर मिला है। मम्मी कुर्ता पहनाने में मदद करने लगी। बाऊजी पसीने में तर-बतर हो गए। 


मम्मी ने एक हाथ से बाऊजी को सहारा दिया, और दूसरे से टैक्सी के लिए फ़ोन लगाया। बाऊजी तभी निढाल हो गए। 


——-


रतलाम में रिश्ते में तेरहवीं थी। बाऊजी ने भाईसाब से कहा कि किसी को तो जाना चाहिए। तुम चले जाओ। 


4 की शाम भाईसाब रतलाम गए हुए थे। उन्हें ख़बर लगी। वे भी लौटे। 


——


दो बेटे। एक विदेश में। एक दिल्ली में रहते हुए भी, संयोगवश उस दिन दूर दूसरे शहर में। 

दोनों में से कोई भी पास नहीं। 


नहीं जानता था कि 2001 में लिखीं ये पंक्तियाँ 12 वर्ष बाद सही साबित होंगी। 


न तो मिला तुम्हें वनवास

ना ही हो तुम श्री राम

मिली हैं सारी खुशियाँ

मिले हैं ऐश-ओ-आराम

फिर भला क्यूँ उनको 

दशरथ की गति है पानी

जो करीब नहीं हैं उनकी 

ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


ऐ मेरे वतन के लोगो

ज़रा आँख में भर लो पानी

जो करीब नहीं हैं उनकी 

ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


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राहुल उपाध्याय । 4 दिसम्बर 2020 । सिएटल 



Wednesday, December 2, 2020

26 नवम्बर 2020

मैं अपना हर जन्मदिन 2007 में लिखी कविता 'जन्म' भेजकर शुरू करता हूँ। 


इस बार नहीं कर पाया। बड़ी सुबह ही से फ़ोन आने शुरू हो गए। 


इस बार 26 को गुरूवार था, नवम्बर का अंतिम गुरूवार। यानी धन्यवाद ज्ञापन दिवस। यानी चार दिन के अवकाश का पहला दिन। 


25 को देवोत्थानी एकादशी थी। सो उस दिन भी जन्मदिन था। एक मित्र उस शाम आ गए थे। बहुत स्वादिष्ट व्यंजन लेकर। 


कोई और काल होता तो 26 को दावत रखता। दोस्तों को बुलाता। कोरोना के कारण हिदायत थी कि कोई ऐसे आयोजन न किए जाए। 


इस वर्ष 14 परिवार को आमंत्रित करने की योजना थी। न बुला सका तो सोचा क्यों न मैं ही उनसे मिल आऊँ और उनकी शुभकामनाएँ एवं आशीर्वाद लेता आऊँ। धन्यवाद देकर धन्यवाद ज्ञापन दिवस भी सार्थक कर दूँ। 


आजकल यहाँ की भारतीय दुकानें रतलामी सेव रखने लगी हैं। हल्दीराम से लेकर बंसीराम तक। सब ब्रांड की। मैंने 14 पैकेट उठाए और चल पड़ा सबसे मिलने। 


किसी को कोई सूचना नहीं दी। सबके यहाँ बिन बताए टपक पड़ा। बहुत आनन्द आया। एक यादगार जन्मदिवस महोत्सव। चारों दिन ख़ुशी से भरपूर रहे। 


इस वर्ष कुछ चित्र एकत्रित किए। एपल ने स्वयं वीडियो बना दिया। अच्छा लगा। सो साझा कर रहा हूँ। 


राहुल उपाध्याय । 2 दिसम्बर 2020 । सिएटल 


'जन्म' कविता यहाँ पढ़ी जा सकती है:

https://mere--words.blogspot.com/2007/11/blog-post_26.html?m=1