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Wednesday, December 9, 2020

शब्दावली: कविता तिवारी: वन्दना

बन्दना की प्रथा बहुत पुरानी है। और प्रभु के हज़ारों नामों को दोहराना भी एक प्रक्रिया है जिससे कई लोगों को शांति मिलती है। 


कई लोगों को इन सबका अर्थ जाने बिना दोहराना भी अच्छा लगता है। जैसे मेरी मम्मी। विष्णु सहस्त्रनाम पढ़तीं है। लेकिन अर्थ से अनभिज्ञ। 


कविता तिवारी की यह वन्दना कई मामलों में अनूठी है। एक तो यह आधुनिक है। दूसरा, वर्तमान समय की समस्याओं के समाधान की और ध्यान आकर्षित करती है। तीसरा, यह सार्वजनिक वन्दना है, निजी नहीं। चौथी, यह कोरी गुणगान या प्रशंसा नहीं है। 


हालाँकि यह अवधि, संस्कृत या ब्रजभाषा में नहीं है, फिर भी शब्द इतने क्लिष्ट है कि शब्दकोश के बिना समझना कठिन है। ये बात और है कि कविता कविता इतने प्रभावशाली ढंग से सुनातीं हैं कि श्रोता ताली बजाए बिना रह नहीं सकता। ताली कई बार स्मरणशक्ति की सराहना में भी बजा दी जाती है। 


हे ईश्वर, मालिक, हे दाता

हे जगत नियंता दीनबंधु

हे परमेश्वर, प्रभु, हे भगवन 

हे प्रतिपालक, हे दयासिंधु


सच्चिदानंद, घट-घट वासी

हे पुण्यराशि, करूणावतार

हे विघ्नहरण, मंगलमूर्त

हे शक्तिरूप, हे गुणागार


सभ्यता यशस्वी हो जाए

मानवता का फैले प्रकाश

सब दिव्य दृष्टि के पोषक हो

कर दो कुदृष्टि का सर्वनाश


इतिहास गढ़े जाएँ प्रतिपल

पृष्ठों में अकलंकता रहे

सज्जनता का अनुशीलन हो

मानव को पथ का पता रहे


हर एक बालिका विदुषी हो

हर बालक नीति निधान रहे

फहराए तिरंगा अंबर तक

माँ का धानी परिधान रहे


'कविता' चाहेगी धरती पर

संस्कृतियों का सम्मान रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सुपुनीता होकर मनोवृत्ति

उत्तुंग शिखर स्पर्श करे

गुण श्रेष्ठ प्रस्फुटित हों इतने

सम्यक हों क्रांति विमर्श करें


उत्फुल्ल रहे हर एक व्यक्ति

पर परम सरलता बनी रहे

शब्दों की अपनी गरिमा हो

अविराम तरलता बनी रहे


हे त्रिभुवन के पथ-उन्नायक 

आपदा प्रबन्धन के स्वामी

हम विनत भाव करबद्ध खड़े हैं

सर्वेश्वर अंर्तयामी


हे नाथ, सनाथ करो सबको

जन-जन हो जाए निर्विकार

विप्लवी घोष विध्वंश मिटे

खोलो सबके हित मोक्ष द्वार


नित नव किसलय विकसित प्रसून 

अति स्वर्णिम सुखद विहान रहे

भ्रमरों का जिस पर झूम झूम

अनुगुंजित मधुरिम गान रहे


आरती भारती की उतरे 

अर्पित तन-मन-धन प्राण रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सारंग धनुर्धारी भगवन

श्रीराम भुवन भय दूर करो 

हे चक्रपाणी कर कृपादृष्टि

छल-दम्भ-द्वेष को चूर करो 


हे त्रयम्बकेश्वर महादेव 

हे नीलकंठ अवढरदानी

त्रैलोक्यनाथ रोको-रोको

बढ़ रही नित्य प्रति मनमानी 


सम्मोहन-मारण-वशीकरण 

उच्चाटन मंत्र प्रयुक्त दिखे 

जिनके कारण भय व्याप्त हुआ

भयहीन दिखे, भयमुक्त दिखे 


अरिहंत तुरंत करो कौतुक

रोको अनर्थ की छाया को 

मन प्राण सन्न, सहमे, सकुचे

क्या हुआ मनुज की काया को 


अनुरक्ति बढ़े सीमाओं तक 

लेकिन विरक्ति का ध्यान रहे 

मिट जाये तिमिर अशिक्षा का

भाषित शिक्षा का दान रहे 


मानव अर्पित हो राष्ट्र हेतु 

पूजित युग-युग अभिमान रहे 

जब तक सूरज-चंदा चमके 

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


(कविता तिवारी)


अब अर्थ के साथ:


हे ईश्वर, मालिक, हे दाता

हे जगत नियंता दीनबंधु

हे परमेश्वर, प्रभु, हे भगवन 

हे प्रतिपालक, हे दयासिंधु


सच्चिदानंद घट-घट वासी

हे पुण्यराशि करूणावतार

हे विघ्नहरण मंगलमूर्त

हे शक्तिरूप, हे गुणागार


सभ्यता यशस्वी हो जाए 

मानवता का फैले प्रकाश

सब दिव्य दृष्टि के पोषक हो

कर दो कुदृष्टि का सर्वनाश


इतिहास गढ़े जाएँ प्रतिपल

पृष्ठों में अकलंकता रहे

सज्जनता का अनुशीलन (नियमित अध्ययन) हो

मानव को पथ का पता रहे


हर एक बालिका विदुषी हो

हर बालक नीति निधान (आधार) रहे

फहराए तिरंगा अंबर तक

माँ का धानी (हल्का हरा) परिधान रहे


'कविता' चाहेगी धरती पर

संस्कृतियों का सम्मान रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सुपुनीता (मक्खन) होकर मनोवृत्ति (मन की स्थिति)

उत्तुंग ( ऊँचा) शिखर स्पर्श करे

गुण श्रेष्ठ प्रस्फुटित हों इतने

सम्यक (उचित) हों क्रांति विमर्श करें


उत्फुल्ल (प्रसन्न) रहे हर एक व्यक्ति

पर परम सरलता बनी रहे

शब्दों की अपनी गरिमा हो

अविराम तरलता बनी रहे


हे त्रिभुवन के पथ-उन्नायक

आपदा प्रबन्धन के स्वामी

हम विनत भाव करबद्ध खड़े हैं

सर्वेश्वर अंर्तयामी


हे नाथ, सनाथ (जो अनाथ न हो) करो सबको,

जन-जन हो जाए निर्विकार (जिसमें कोई दोष न हो)

विप्लवी (उपद्रवी) घोष विध्वंश मिटे, 

खोलो सबके हित मोक्ष द्वार


नित नव किसलय (पौधों में निकलने वाले नए पत्ते) विकसित प्रसून (फूल), 

अति स्वर्णिम सुखद विहान (सवेरा) रहे

भ्रमरों का जिस पर झूम झूम

अनुगुंजित मधुरिम गान रहे


आरती भारती की उतरे 

अर्पित तन-मन-धन प्राण रहे

जब तक सूरज-चंदा चमके

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


सारंग (विष्णु का धनुष ) धनुर्धारी भगवन, 

श्रीराम भुवन भय दूर करो 

हे चक्रपाणी कर कृपादृष्टि

छल-दम्भ-द्वेष को चूर करो 


हे त्रयम्बकेश्वर महादेव

हे नीलकंठ अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालने वाले) 

त्रैलोक्यनाथ रोको-रोको

बढ़ रही नित्य प्रति मनमानी 


सम्मोहन-मारण-वशीकरण

उच्चाटन ( एक तांत्रिक प्रयोग) मंत्र प्रयुक्त दिखे 

जिनके कारण भय व्याप्त हुआ

भयहीन दिखे, भयमुक्त दिखे 


अरिहंत (योग्य एवं गुणी) तुरंत करो कौतुक (आवेग)

रोको अनर्थ की छाया को 

मन प्राण सन्न, सहमे, सकुचे

क्या हुआ मनुज की काया को 


अनुरक्ति (प्रेम) बढ़े सीमाओं तक, 

लकिन विरक्ति (किसी के प्रति प्रेम, सहानुभूति आदि न रह जाने का भाव ) का ध्यान रहे 

मिट जाये तिमिर (अंधकार) अशिक्षा का

भाषित शिक्षा का दान रहे 


मानव अर्पित हो राष्ट्र हेतु

पूजित युग-युग अभिमान रहे 

जब तक सूरज-चंदा चमके 

तब तक ये हिंदुस्तान रहे


इसे यहाँ सुना जा सकता है:

https://youtu.be/xcmpI7bVoyY 


राहुल उपाध्याय । 9 दिसम्बर 2020 । सिएटल 

--
Best Regards,
Rahul
425-445-0827

Saturday, November 21, 2020

यदि मुक्ति मार्ग

कविता में शब्द होते हैं। और जैसा कि पिछली पोस्ट में कहा, कई बार हम उनका अर्थ समझे बिना उनसे प्रभावित हो जाते हैं। चाहे वे भारी भरकम हो या सीधे-सादे। 


पिछली पोस्ट में साहिर ने भी नज़्म पढ़ी, और अमिताभ ने भी। साहिर ने जब पढ़ी तो अदायगी न के बराबर थी। बिलकुल सपाट रही। हालांकि उन्होंने कुछ पंक्तियाँ दोहराई ज़रूर। लेकिन वो जादू नहीं था जो अमिताभ ने पैदा किया। 


मेरे विचार में अदायगी भी श्रोता पर असर छोड़ती है। यदि यश चोपड़ा इस नज़्म को फिल्म में न लेते, यदि अमिताभ की आवाज़ का जादू उस पर नहीं चढ़ता तो शायद यह नज़्म इतना असर नहीं करती और न ही इतनी सुनी जाती। शायद यही हश्र साहिर की अन्य रचनाओं का होता यदि काबिल संगीतकार, एवं गायक उन्हें एक नया रूप नहीं देते। 


इन दिनों, कविता तिवारी की एक रचना बहुत प्रसिद्ध हुई। मैंने वीडियो देखा। प्रभावशाली अदायगी। सुनते ही कोई भी मंत्रमुग्ध हो जाए। इतने कठिन, तत्सम शब्द कि सर ही चकरा जाए। मैंने इसे इंटरनेट पर खोजने की कोशिश की। लिखित रूप में कहीं नहीं मिली। सो मैंने स्वयं ही सुन-सुन कर लिख डाली। कठिन शब्दों के अर्थ भी खोजे। कुछ का अंदाजा लगाया। 


पहले प्रस्तुत है, बिना अर्थों के। उसके बाद है अर्थ सहित। 


मन चंचल है, तन व्यूहल है 

झंझावातों का है समूह 

अगणित प्रतिकूल परीक्षाएँ 

नित जीवन पथ लगता दुरूह 


विकृतियाँ, कृतियों के दल का 

यदि फलादेश सी लगती हों  

संस्तुतियाँ चल विपरीत दिशा 

यदि महाक्लेश सी लगती हों 


यदि काव्यतत्व के समीकरण 

संत्रास दिखाई देते हों 

यदि वर्तमान वाले अवगुण

इतिहास दिखाई देते हों 


यदि मर्यादाएँ मार्ग छोड़ 

पथ भ्रष्ट दिखाई देती हों 

यदि नराधमों की अनुकृतियाँ 

उत्कृष्ट दिखाई देती हों 


कर दो विरोध के स्वर बुलंद 

सबके हित में परिणाम कहो

निश्चित मत करो समय सीमा 

फिर सुबह कहो या शाम कहो 


तम हर, अंतर्मन उज्ज्वल कर 

जय करुणाकर सुखधाम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


शुभ लक्ष्य लिए आए अतीत 

तब तो भविष्य के स्वप्न बुनों 

अन्यथा सहज पथ पर चल कर 

विक्षिप्त बनों, निज शीश धुनों 


जो अंधकार का अनुचर है 

अनुयायी है पथ भ्रष्टों का 

औचित्य भला कैसे होगा 

ऐसे निकृष्ट परिशिष्टों का 


तुम याज्ञवल्क के वंशज हो 

नचिकेता जैसा तप लेकर 

हिरण्यकश्यप से युद्ध करो 

प्रहलाद सरीखा जप लेकर 


धुन के पक्के पौरुष वाले 

ध्रुव जैसे श्रेष्ठ तपस्वी हो 

वह कृत्य करो, अनुरक्ति भरो 

जिससे यह विश्व यशस्वी हो 


हो त्याज्य अशुभ कुल फलादेश 

जागृत हो कर शुभ नाम कहो 

जो संस्कृति के संरक्षक हो

उनको ही बस गुणधाम कहो

 

हो हंस वंश अवतंश श्रेष्ठ 

होकर सकाम निष्काम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


कर्तार उन्हें कर तार-तार 

जो हैं कतार को तोड़ रहे

शुचिता-श्रद्धा-करुणा नकार 

अपसंस्कृतियों को जोड़ रहे 


उद्देश्य पूर्ण कर दे धरती 

कर दे मानवता का विकास 

क्षमता को दे जागरण मंत्र 

तम हर भर दे सात्विक प्रकाश 


तू निखिल विश्व का स्वामी है 

अंतर्यामी घट-घट वासी 

सज्जनता को कर दे विराट 

कर खड़ी खाट जो संत्रासी 


उद्भव-स्थिति-संहार-शक्ति

कुल तेरी ही तो छाया है 

कहते हैं वेद, पुराण ग्रंथ 

तुझमें ही विश्व समाया है


कवियो, भूमिका निभाओ तुम 

यति-लय-गति-छंद-ललाम कहो 

शुद्धतायुक्त परिमार्जन हो 

मत उनको दक्षिण-वाम कहो 


श्रद्धायुत नतशीर होकर के 

तत्क्षण शत बार परिणाम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


———


अब अर्थ सहित:


मन चंचल है, तन व्यूहल (विहल) है 

झंझावातों का है समूह 

अगणित प्रतिकूल परीक्षाएँ

नित जीवन पथ लगता दुरूह 


विकृतियाँ, कृतियों के दल का 

यदि फलादेश (परिणाम) सी लगती हों  

संस्तुतियाँ (सुझाव) चल विपरीत दिशा 

यदि महाक्लेश सी लगती हों 


यदि काव्यतत्व के समीकरण (संतुलन)

संत्रास (आतंक) दिखाई देते हों 

यदि वर्तमान वाले अवगुण

इतिहास दिखाई देते हों 


यदि मर्यादाएँ मार्ग छोड़ 

पथ भ्रष्ट दिखाई देती हों 

यदि नराधमों की अनुकृतियाँ (नकल)

उत्कृष्ट दिखाई देती हों 


कर दो विरोध के स्वर बुलंद 

सबके हित में परिणाम कहो

निश्चित मत करो समय सीमा 

फिर सुबह कहो या शाम कहो 


तम हर, अंतर्मन उज्ज्वल कर 

जय करुणाकर सुखधाम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


शुभ लक्ष्य लिए आए अतीत 

तब तो भविष्य के स्वप्न बुनों 

अन्यथा सहज पथ पर चल कर 

विक्षिप्त (पागल) बनों, निज शीश धुनों 


जो अंधकार का अनुचर है 

अनुयायी (समर्थक) है पथ भ्रष्टों का 

औचित्य भला कैसे होगा 

ऐसे निकृष्ट परिशिष्टों (बाद में जो जोड़ा गया) का 


तुम याज्ञवल्क के वंशज हो 

नचिकेता जैसा तप लेकर 

हिरण्यकश्यप से युद्ध करो 

प्रहलाद सरीखा जप लेकर 


धुन के पक्के पौरुष वाले 

ध्रुव जैसे श्रेष्ठ तपस्वी हो 

वह कृत्य करो, अनुरक्ति (लगाव) भरो 

जिससे यह विश्व यशस्वी हो 


हो त्याज्य अशुभ कुल फलादेश 

जागृत हो कर शुभ नाम कहो 

जो संस्कृति के संरक्षक हो

उनको ही बस गुणधाम कहो

 

हो हंस वंश अवतंश (श्रेष्ठ) श्रेष्ठ 

होकर सकाम निष्काम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


कर्तार (करने वाला, ईश्वर) उन्हें कर तार-तार 

जो हैं कतार को तोड़ रहे

शुचिता (सफाई, पवित्र)-श्रद्धा-करुणा नकार 

अपसंस्कृतियों को जोड़ रहे 


उद्देश्य पूर्ण कर दे धरती 

कर दे मानवता का विकास 

क्षमता को दे जागरण मंत्र 

तम हर भर दे सात्विक प्रकाश 


तू निखिल विश्व का स्वामी है 

अंतर्यामी घट-घट वासी 

सज्जनता को कर दे विराट 

कर खड़ी खाट जो संत्रासी (आतंकी)


उद्भव-स्थिति-संहार-शक्ति

कुल तेरी ही तो छाया है 

कहते हैं वेद, पुराण ग्रंथ 

तुझमें ही विश्व समाया है


कवियो, भूमिका निभाओ तुम 

यति (कविता में एक जगह )-लय-गति-छंद-ललाम (अलंकार) कहो 

शुद्धतायुक्त परिमार्जन (सफाई) हो 

मत उनको दक्षिण-वाम (परंपरावादी-प्रगतिशील) कहो 


श्रद्धायुत नतशीर होकर के 

तत्क्षण शत बार परिणाम कहो 

यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो

मेरे संग जय सिया राम कहो 


https://youtu.be/be5qsYTJWtc 

——

राहुल उपाध्याय । 23 अगस्त 2020 । सिएटल 



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Best Regards,
Rahul
425-445-0827