कंगना रनौत द्वारा निर्देशित, निर्मित एवं अभिनीत 'इमरजेंसी' एक अच्छी फिल्म है। दुख है तो इस बात का कि इतनी शिक्षाप्रद फ़िल्म को देखने से कुछ लोग वंचित रह जाएँगे क्योंकि हिंसक घटनाएँ अत्यधिक हिंसक तरीक़े से दिखाई गईं हैं। थोड़ी प्रतीकात्मक हो सकती थीं। इतना विभत्स रस भी ठीक नहीं।
फ़िल्म का नाम इमरजेंसी न होकर इंदिरा होना चाहिए था। इंटरवल के बाद ही इमरजेंसी शुरू होती है। इंटरवल से पहले इंदिरा के बचपन से लेकर बांग्लादेश के निर्माण तक की कहानी है। कहानी बहुत ही रोचक है। संतुलित है। कंगना की प्रशंसा करनी होगी इतनी अच्छी कहानी लिखने के लिए।
सारे प्रमुख व्यक्तियों का उल्लेख खुलेआम किया गया है। कहीं भी किसी को ऊँचा या नीचा दिखाने में ऊर्जा नहीं खर्च की गई है। बहुत दिनों बाद इतनी बेबाक़ फ़िल्म देखी जिसमें सब कुछ जस का तस रख दिया गया है। कोई मिर्च-मसाला नहीं जोड़ा गया। हर इंसान में गुण-दोष होते हैं। कोई भी दूध का धुला नहीं है। ऐसा नहीं कि कोई केला है तो कोई करेला।
जद्दू कृष्णामूर्ति, मानेक्शा, निक्सन, धवन, किसिंजर, जैल सिंह, जगजीवन राम, अटल बिहारी वाजपेयी, जयप्रकाश नारायण, पुपुल जयकार, विजयलक्ष्मी पंडित, हुसैन - सब को नाम सहित दर्शाया गया है।
इलाहाबाद का आनन्द भवन और वहाँ की उच्च न्यायालय के घटनाक्रम ने रोमांचित कर दिया कि मैं भी उनके इर्द-गिर्द घूमा हूँ।
बहुत ही बढ़िया फ़िल्म है। बस कुछ हिंसक दृश्य फ़ॉरवर्ड करने की मेहनत करनी होगी।
राहुल उपाध्याय । 9 फ़रवरी 2025 । सिएटल
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