Thursday, January 23, 2025

हिसाब बराबर-समीक्षा

'हिसाब बराबर' अश्विनी धीर द्वारा निर्देशित बहुत अच्छी फिल्म है। विषय अछूता है। आम आदमी को समझाना भी मुश्किल। लेकिन फिर भी यह कामयाब हो जाती है। 


हाँ, यह अलग बात है कि फ़िल्म में ड्रामा डालने के चक्कर में कई कृत्रिम हथकंडे अपनाए गए हैं। लेकिन अंत भला तो सब भला। 


संवाद भी अच्छे हैं। माधवन का अभिनय भी उम्दा है। 


मल्या का विदेश भाग जाना, केजरीवाल का दिल्ली में महिलाओं के लिए फ्री बस सेवा, रिज़र्व बैंक की चीफ़ का बाज़ार से सौदा लेना - सब कहानी को ताज़ा बनाता है। बैंक डूबने की तस्वीरें और समाचार पत्रों की सुर्ख़ियाँ अभी भी हमें याद है। बैंक का ना डू है या दो, यह भी सही लगा। एक फ़ूड डिलीवरी कम्पनी का नाम ठूँसों है। सही व्यंग्य है। 


राहुल उपाध्याय । 23 जनवरी 2025 । सिएटल 



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