Friday, May 3, 2024

ऐसे थे बाबूजी

ऐसे‌ थे बाबूजी

—ज्योति नारायण त्रिवेदी 


हमारे पिताजी को हम सब बाबूजी कहते थे। बाबूजी का पूरा नाम कैलाशनारायण था। बाबुजी का जन्म 17 जून 1934 को सैलाना में हुआ था। बाबूजी अपने माता पिता की सबसे बड़ी संतान थे।  बाबूजी की माध्यमिक स्कूल तक की शिक्षा सैलाना में हुई तथा मेट्रिक तक की शिक्षा सन् 1951 में अपने ताऊजी के घर रहकर मंदसौर से पूरी की।  सन् 1952 मे़ं वे सैलाना के पास  यग्राम अडवानिया में प्राथमिक स्कुल शिक्षक बन गये। सन् 1955 में पश्चिम रेलवे में स्टेशन मास्टर बन‌ गये। बाबूजी की रेलवे में पहली नियुक्ति गुजरात राज्य में बड़ौदा के पास ढबोई नामक स्थान पर हुई। बाद में वे पश्चिम रेलवे के रतलाम मंडल में पंचपिपलया, रूनखेड़ा, खाचरोद, जावरा, नागदा, बांगरोद, बेडावन्या आदि स्टेशनों पर पदस्थ रहते हुए सन 1982 मे़ं स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति ले ली। 


यह बात सुनने में ही अविश्वसनीय लगती है कि कोई बेटा अपने पिता को विश्राम देने के लिये लगी लगाई सरकारी नौकरी, वो भी रेलवे की, छोड़कर घर आ जाए। यह अविश्वसनीय घटना घटी 19 अक्टूबर 1982 को। उस दिन बाबूजी की माताजी, हमारी दादीजी, का अकस्मात निधन हो गया। उनका पार्थिव देह रात्रि में घर लाया गया। उस रात्रि को ही हमारे दादाजी ने अपनी सेवानिवृत्ति की घोषणा कर दी और बाबूजी को उनके सारे कार्यों को करने का आदेश दिया। बाबूजी ने उनके आदेश को शिरोधार्य कर रेलवे से सेवानिवृत्ति ले ली और अपने पिता काम संभाला।  उस समय बाबूजी करना राज करने जैसा हुआ करता था। पर बाबूजी ने राज करने के बजाय अपने पिता को विश्राम देने की पुनीत और कठिन जिम्मेदारी निभाई। 


उनके पिता प्रजामंडल के जमाने के स्वतंत्रता संग्रामके सेनानी थे तथा सन् 1936 से निजी विद्यालय संचालित कर रहे थे। वे सन् 1947 से ही नईदुनिया सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं से सम्बन्धित थे। साथ ही वे अनेक सामाजिक संगठनों से भी जुड़े थे। बाबूजी ने उनके सारे क्रियाकलापों को जस का तस स्वीकार कर बिना किसी घालमेल के उन्हें निरंतर बनाए रखा। बाबूजी के इरादे नेक थे। अतः भगवान ने भी उनकी मदद की तथा वे शीघ्र ही सैलाना के शिक्षा, पत्रकारिता और समाजसेवा क्षेत्र के स्तम्भ बन गये। 


उन्हें सैलाना ही नहीं पूरा अंचल बाबूजी कहता था। वे त्रिवेदीजी से बाबूजी कब और कैसे बने कोई नहीं जानता। शायद बाबूजी को भी इस संबोधन यात्रा का उद्गम ज्ञात नहीं होगा। बाबूजी ने सैलाना में प्रेसक्लब की स्थापना की और अंत तक व्यवहारिक अध्यक्ष बने रहे। सनाढ्य ब्राह्मण समाज मंदिर के भी अंत समय तक अध्यक्ष बने रहे। उन्होंने शांतिवन जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया और अपने विश्वसनीय साथियों की टीम बनाकर उसका कायाकल्प कर दिया। उन्होंने शांतिवन में पौधे रोपे और प्रतिदिन चार किलोमीटर दूर सायकल से पौधों को‌ पानी पिलाने जाते थे। आज हरा-भरा शांतिवन अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने वाले लोगों को सुकून दे रहा है। नईदुनिया अखबार के माध्यम से जनहितैषी समाचारों को छापने से कभी गुरेज नहीं किया। सैलाना नल जल योजना के सुचारू क्रियान्वयन के लिये पी-एच-ई से लेकर नगर परिषद को सौपने के लिये उन्होंने अखबार के माध्यम से शासन तक बात पहुंचाई। नगर परिषद को जलप्रदान का कार्य सौपने से आज लोगों के घर में‌ नियमित जलप्रदान हो रहा है।  सैलाना बायपास के लिये काफी लंबे समय तक शासन का ध्यान अपने अखबार के माध्यम से आकर्षित किया। बायपास बनने से सैलाना की यातायात व्यवस्था काफी बेहतर हुई है। रेलवे के नियम के अनुसार बाबूजी को प्रथम श्रेणी पास की सुविधा थी किंतु रेलवे छोड़ने के बाद उन्होंने एक बार भी इसका उपयोग नहीं किया। मुफ्तखोरी के इस जमाने में बाबूजी ऐसा कैसे कर लेते थे इसका उत्तर कभी नहीं मिलेगा। उन्हें लोगों का सम्मान और लाड़ प्यार मिला और खूब मिला क्योंकि वे सबको अपने मन की तलहटी से सम्मान और प्यार देते थे। 


हम सबको भी बाबूजी ने अनुशासन में रहकर ईमानदारी से कार्य करने की प्रेरणा दी। आइये सब आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनके बताए हुए मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा ले। 

Monday, April 15, 2024

दीक्षा

खबर है कि भावेश परिवार समस्त सम्पत्ति दान कर दीक्षा ले रहा है। 


ध्यान दें। खबर यह नहीं है कि कोई दीक्षा ले रहा है। खबर यह भी नहीं है कि कोई दो हज़ार रूपये दान दे कर दीक्षा ले रहा है। खबर है कि करोड़ों की सम्पत्ति दान की जा रही है। 


मान लीजिए कि हर कोई दान दे कर दीक्षा ले रहा है। तो फिर दान लेगा कौन? भिक्षा देगा कौन?


इन दीक्षार्थियों और भिक्षार्थियों के जीवनयापन के लिए उस समाज का होना ज़रूरी है जिसमें धनोपार्जन को प्राथमिकता दी जाती हो।


स्वयं को कभी हेय दृष्टि से न देखें। मोह-माया अच्छी बात है। धन सब-कुछ नहीं। पर धन बहुत-कुछ है। 


आप हैं तो जहान है। 


बाक़ी तो जैसे कहते हैं ना बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ होती रहती हैं। 



https://www.thelallantop.com/amp/news/post/gujarat-businessman-bhavesh-bhandari-wife-donate-rs-200-crore-wealth-to-become-jain-monks/


राहुल उपाध्याय । 15 अप्रैल 2024 । सिएटल 


Sunday, April 14, 2024

अमरसिंह चमकीला- एक समीक्षा

अमरसिंह चमकीला की असली कहानी क्या है, मैं नहीं जानता। मुझे उसे जानने में समय भी नहीं लगाना है। मैंने यह फ़िल्म इसलिए देखी कि यह इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित है। यह उनकी फ़िल्म है। 


जैसा कि सुभाष घई के साथ हुआ वैसा बाक़ी के साथ भी हो सकता है। और वही इम्तियाज़ के साथ हो रहा है। जब वी मेट वाली पकड़ छूटती जा रही है। 


मूल कहानी में दम नहीं है। इसलिए एक सूत्रधार का सहारा लिया गया कथानक बढ़ाने के लिए। लेकिन वह सूत्रधार ऐसा है कि दर्शक ठगा महसूस करते हैं। 


सब कुछ नाटकीय है। द्वंद्व बहुत कम है। किरदार से दर्शक जुड़ नहीं पाते हैं। 


जब वह अश्लील गाने गाने छोड़ देता है, तब थोड़ी जान आई फिल्म में। और फिर पटरी से फिसल गई। 


एक कलाकार की मनोभावना को मैं कुछ हद तक समझ सकता हूँ और उसका सम्मान भी करता हूँ। जो चमकीला ने कलाकार की हैसियत से किया उसका कुछ हद तक मैं समर्थन भी करता हूँ। लेकिन फ़िल्म का नहीं। इसे बेहतर बनाया जा सकता था। 


राहुल उपाध्याय । 14 अप्रैल 2024 । सिएटल 


Friday, March 29, 2024

क्रू - एक समीक्षा

आज ही रिलीज़ हुई और तबू, करीना, कृति अभिनीत फ़िल्म 'क्रू' बहुत ही मज़ेदार फ़िल्म है। जितना छोटा नाम, उतनी छोटी फ़िल्म। मात्र दो घंटे की। गाने भी हैं। पर गानों में समय बर्बाद नहीं होता। बल्कि सदुपयोग होता है। कहानी को विस्तार देने में मदद करते हैं। 


सोना कितना सोना है - यह गीत बहुत ही अच्छी सिचुएशन पर इस्तेमाल किया गया है। 


पटकथा, संवाद, सम्पादन, कहानी - सब एक से बढ़कर एक हैं। संवाद और अभिनय इस फिल्म की जान हैं। राजेश कृष्णन का निर्देशन इतना कसा हुआ है कि क्या कहने। 


कोई हीरो नहीं है। कोई रोमांस नहीं है। किसी की शादी हो गई है। कोई थोड़ी मोटी हो गई है। कहानी हवाई जहाज के कर्मचारियों के आसपास घूमती है फिर भी ज़मीन से, दर्शकों से जुड़ी रहती है। 


हर चीज़ का सही ढंग से सही समय पर इस्तेमाल किया गया है। हिन्दी फ़िल्म लेखन की यह ख़ासियत है कि जो संवाद पहले बोला गया है उसे फिर से दोहराया जाता है बाद में, बहुत बाद में और किसी दूसरे कलाकार से। तब इसका आनंद दुगुना हो जाता है क्योंकि दर्शक ही आधा सुनते ही पूरा कर देते हैं। इस फिल्म में ऐसा तीन बार होता है। 


बहुत ही अच्छी फिल्म है। एकता कपूर और अनिल कपूर इसके निर्माता हैं। 


राहुल उपाध्याय । 29 मार्च 2024 । सिएटल 

Tuesday, March 26, 2024

तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया - एक समीक्षा

'तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया' एक बेहतरीन फिल्म है। हर मायने में। कहानी उम्दा है। अभिनय कमाल का है। मनोरंजन भरपूर है। एवं एक संदेश भी। 


सेट्स भी अच्छे हैं और लोकेशन्स भी। 


कई तरह के सवाल भी खड़े करती है। जवाब किसी का नहीं देती है। 


सोचने पर मजबूर करती है। 


कृति सनन की अदाकारी का तो कोई जवाब ही नहीं है। 


अमित जोशी और आराधना शाह ने लिखी और निर्देशित की है। मनीष प्रधान का सम्पादन सराहनीय है। 


अवश्य देखें। अब ओ-टी-टी पर उपलब्ध है। 


राहुल उपाध्याय । 26 मार्च 2024 । सिएटल 

Thursday, March 14, 2024

शैतान- समीक्षा

'शैतान' एक अजीबोग़रीब दुनिया की कहानी है। ऐसी कहानी जिसे कई बार व्हाट्सेप पर फ़ॉरवर्ड किया जाता है। रोचक होती हैं पर अविश्वसनीय। 


अजय देवगन और महादेवन के अभिनय दमदार हैं। पटकथा कसी हुई है। दर्शक को बाँधे रखती है। राघवन की तरह नहीं कि बीच में से उठ नहीं सकते। लेकिन फिर भी प्रशंसनीय है। 


कहानी किसी विदेशी उपन्यास या फ़िल्म से प्रभावित हो भी सकती है और नहीं भी। लेकिन परिवार बिलकुल विदेशी है। उनका रहन-सहन विदेशी है। और फार्म हाउस तो पक्का विदेशी है। 


गाने हैं भी और नहीं भी। अच्छी बात है। विषय से नहीं भटके। 


यदि दिल कमजोर नहीं है तो अवश्य देखी जानी चाहिए। 


राहुल उपाध्याय । 14 मार्च 2024 । सिएटल 

Tuesday, March 12, 2024

2024 का सूर्य ग्रहण

अमावस को चाँद नहीं निकलता है। यह ग़लत है। निकलता है किंतु सूरज की रोशनी चाँद के उस हिस्से पर पड़ती है जिसे हमने धरती से कभी नहीं देखा। 


है ना विचित्र बात? 


एक और विचित्र बात कि सूरज और चाँद की साइज़ अलग है और उनकी हमसे दूरी भी अलग है। पर धरती से दोनों एक ही साइज़ के लगते हैं। इसीलिए दोनों आँख मिचौली खेलते रहते हैं हमारे साथ। 


सूर्य ग्रहण के दिन चाँद पूरी तरह से सूरज को ढक लेता है धरती और सूरज के बीच आ कर। चंद्रग्रहण की रात पूनम के चाँद को धरती की छाया ढक लेती है। कितना रोमांच है तब सोच कर कि धरती के दूसरी ओर सूरज अपनी पूरी रोशनी फेंक रहा है जबकि इधर रात है। 


सूर्य ग्रहण मैंने सत्तर के दशक में कलकत्ता में पहली बार देखा था। देखी तो टीवी पर फ़िल्में थीं। क्योंकि तब सूर्य ग्रहण को देखना हानिकारक माना जाता था। खिड़की-दरवाज़े सब बंद कर के हम टीवी पर एक के बाद एक फ़िल्में देखे जा रहे थे। तब हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन -रविवार- को ही एक ही फिल्म देख पाते थे। उस दिन दूरदर्शन पर दिन भर फ़िल्में दिखाई गईं ताकि लोग घर से बाहर न निकले। 


2017 में सिएटल में एक बार फिर अवसर मिला सूर्य ग्रहण को देखने का। देख लिया इस बार एक ख़ास तरह का काला चश्मा पहन कर।


इस बार 8 अप्रैल को अमेरिका के पूर्वी राज्यों में पूर्ण सूर्यग्रहण दिखाई देगा। यदि बादल आ गए तो सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा इसलिए कुछ एयरलाइंस ने ख़ास सूर्य ग्रहण के लिए भी फ़्लाइट चलाई है ताकि बादल से ऊपर शर्तिया सूर्य ग्रहण देखा जा सके। 


मेरे एक मित्र पर सूर्य ग्रहण का जुनून सवार है। वह ड्राइव कर के दो हज़ार मील दूर टेक्सास राज्य से इसका आनंद उठाना चाह रहा है। 


उसने कहा तुम भी चलो। मैंने हामी भर दी। मैंने एक और से कहा। उसने भी हामी भर दी। 


हम तीन तीन अप्रैल को सिएटल से निकलेंगे। पूरे दिन गाड़ी चलाकर रात किसी होटल में गुज़ारेंगे। चार को भी यहीं करेंगे। पाँच को भी। पर छ; को पूरा दिन एक राष्ट्रीय उद्यान में गुज़ारेंगे। सात को पूरे दिन चला कर हम अपने गंतव्य स्थान - सेन एंटोनियो - पहुँच जाएँगे। आठ की दोपहर सूर्य ग्रहण देखेंगे। 


आठ की रात वापस लौट सकते हैं पर प्लेन की टिकट बहुत महँगी हैं। नौ की भी महँगी हैं। दस की सुबह की फ़्लाइट से वापस लौटेंगे। सीधी फ़्लाइट महँगी है। सो लास वेगास होते हुए आएँगे। समय इतना नहीं होगा कि घूमा फिरा जा सके। 


इसलिए जाते वक्त के लिए कार किराए की ले जा रहे हैं। उसे डलॉस एयरपोर्ट पर छोड़ देंगे। वहीं से हमारी वापसी की फ़्लाइट भी है। 


कार का किराया 750 डॉलर। फ्लाइट का किराया 750 डॉलर। होटल का किराया 700 डॉलर। गाड़ी के ईंधन का खर्चा 400 डॉलर। बाक़ी और भी खर्चे होंगे। खाने-पीने के। ये दो आदमी के खर्चे हैं। एक का पड़ा लगभग 1300 डॉलर। यानी एक लाख रूपये के आसपास। कम से कम। 


राहुल उपाध्याय । 12 मार्च 2024 । सिएटल