Saturday, September 12, 2020

ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

ये धुआँ कहाँ से उठता है


समस्याएँ कहाँ नहीं है। और कब नहीं रहीं हैं। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि भ्रष्टाचार पहले भी था, आज भी है। महंगाई पहले भी थी, आज भी है। 


इन दिनों तथाकथित विकसित एवं समृद्ध अमेरिका के पश्चिमी तट पर जंगलों में आग लगी हुई है। इतनी भीषण आग कि बड़े-बड़े महानगरों में धुएँ का आतंक है और नतीजन प्राकृतिक लॉकडाउन है। इसका एक ही निवारण है - वर्षा। अनुमान है कि कल बारिश होगी। 


जंगल में आग कैसे लग सकती है? भारत के किसी महानगर को इस आपदा से नहीं जूझना पड़ता है। यहाँ भी न्यू यॉर्क एवं अन्य पूर्वी तट पर बसे महानगरों को यह परेशानी नहीं होती। 


पश्चिमी तट पर शुष्की एवं गर्मी ज़्यादा है। हर साल आग लगने का अंदेशा रहता है। मेरे राज्य, वाशिंगटन, में ज़्यादातर आग का कारण मानवीय गतिविधियाँ रहीं हैं। लापरवाही नहीं। कोई जानबूझकर लगाई गई भी नहीं। बस थोड़ी सी चिंगारी उड़ी और हज़ारों एकड़ के जंगल तबाह हो जाते हैं। 


इंटरनेट पर तमाम फ़ोटो हैं जो एक साथ आपको अचंभित, उत्तेजित, एवं भयभीत कर सकते हैं। 


पहले मैं और मम्मी हर शाम आसपास स्थित सोलह मन्दिरों में से किसी एक में चले जाते थे। कोविड के चक्कर में वे बन्द हुए तो हम हमारे अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में ही भ्रमण कर लेते थे। पिछले तीन दिनों से घर पर ही हैं। अस्सी वर्षीय माँ की सेहत के लिए धुएँ में जाना ठीक नहीं। 


ये धुआँ कहाँ से उठता है, यह मीर की एक ग़ज़ल के पहले शेर (मतला) का दूसरा मिसरा है। पहली पंक्ति उतनी मशहूर नहीं। पूरी ग़ज़ल यहाँ देखें:

https://www.rekhta.org/ghazals/dekh-to-dil-ki-jaan-se-uthtaa-hai-mir-taqi-mir-ghazals?lang=hi


कठिन शब्दों के अर्थ भी वहाँ सहज उपलब्ध हैं। कोई मदद चाहिए तो मुझसे सम्पर्क करें। 


यहाँ सुनी जा सकती है:

https://youtu.be/QSDtPJV0G3w 


चन्द उदाहरण और जहाँ दूसरा मिसरा इतना मशहूर हुआ कि पहले को खा गया:


ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

(मिर्ज़ा रज़ा बर्क़)

वस्ल = मिलान

तदबीर = उपाय

 

भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया

ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं

(माधव राम जौहर)

 

चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले

आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले

(मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी)

 

दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से,

इस घर को आग लग गई, घर के चराग़ से

(महताब राय ताबां)

 

ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम

रस्म-ए-दुनिया भी है, मौक़ा भी है, दस्तूर भी है

(क़मर बदायूंनी)

 

क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो

ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

(मियाँ दाद ख़ां सय्याह)

 

'मीर' अमदन भी कोई मरता है

जान है तो जहान है प्यारे

(मीर तक़ी मीर)

अमदन = जानबूझकर 

 

शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली

रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।

(जलील मानिकपुरी)

रिंद = शराबी

 

शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी

कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को

(शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी)

मुनादी = घोषणा

 

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई

(मुज़फ़्फ़र रज़्मी)

जब्र = अत्याचार 

तारीख़ = इतिहास 


और चलते-चलते आनंद बक्षी को भी सलाम। 

https://youtu.be/kpM0jPd6-7w 


राहुल उपाध्याय । 11 सितम्बर 2020 । सिएटल 


Monday, September 7, 2020

वर्तनी सुधार अभियान

या तो हम विद्यार्थी हैं, या महारथी। दोनों ही हालात में हमें अपनी त्रुटियों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। 


यदि हम इन दो छोरों के बीच के हैं, तब भी। 


मतलब हर हाल में। 


कई बार त्रुटियाँ अज्ञानतावश होतीं हैं। जैसे मेरी। मैं जो भी लिखता हूँ, उसे दो-चार बार ठीक से जाँचने परखने के बाद ही कहीं भेजता हूँ। मेरी त्रुटियों में टंकण का दोष कदापि नहीं है। 


कई लोगों से बात करने पर पता चला कि वे किसी कारणवश देवनागरी कीबोर्ड का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए ऐसी तकनीक अपना रहे हैं जिसमें रोमन में लिखने से देवनागरी विकल्प प्रदान किए जाते हैं। यदि विकल्प पर ध्यान न दिया जाए तो जो उस तकनीक को जो ठीक लगे वह आ जाता है। और ज़्यादातर इसी वजह से कि/की की त्रुटियाँ होतीं हैं। 


मेरा निवेदन हैं कि सब सदस्य सतर्क रहें ताकि उनकी पोस्ट त्रुटिहीन हो। 


कि:

1. मैंने कहा कि

2. मैंने लिखा कि

3. मैंने बताया कि

4. उनसे इतना भी नहीं हुआ कि वे मेरी ख़ैरियत पूछ लेते। 

5. मुझे पता चला कि 


की:

  1. अमिताभ की फ़िल्में 

  2. देश की मिट्टी 

  3. सूरज की गर्मी 

  4. दिल की बीमारी 

  5. कोरोना की दवाई


की: यहाँ तात्पर्य करी से है

  1. उसने बात नहीं की

  2. उसने ऐसे बात की


की और कि साथ में:

  1. राम ने श्याम की पिटाई इसलिए की कि उसे ग़ुस्सा आ गया था और स्वयं को रोक न सका। 

  2. उसने ऐसे बात की कि मन खिन्न हो गया। 


अज्ञानतावश जो त्रुटियाँ मैं करता रहा, उनकी सही वर्तनी देखिए:

  1. पुरस्कार (मैं हमेशा पुरूस्कार लिखता रहा)

  2. ऊपर (मैं उपर लिखता था)

  3. है (एकवचन), हैं (बहुवचन, सम्मान)

  4. थी (एकवचन), थीं (बहुवचन, सम्मानसूचक)

  5. दृढ़ 

  6. द्रोण

  7. चिड़िया 

  8. चिढ़ना

  9. पीढ़ी 

  10. पीड़ा

  11. सीढ़ी

  12. गाड़ी (कार)

  13. गाढ़ी (मोटी) कमाई 

  14. गाड़ देना (गहरे घुसा देना)

  15. चढ़ावा 

  16. चढ़ाई 

  17. दृष्टि 

  18. उद्देश्य (मैं उद्धेश्य लिखता था)

  19. सीखा, सिखाया 

  20. खाया, खिलाया

  21. पिया, पिलाया 

  22. दिया, दिलाया

  23. हँसा, हँसाया

  24. हंस (पक्षी)

  25. हसीं (सुन्दर, हसीना)

  26. कही (कोई बात कही)

  27. कहीं (किसी स्थान का सूचक, कहीं दूर जब दिन ढल जाए)

  28. कहा (कुछ कहना)

  29. कहाँ (किस स्थान के बारे में प्रश्न)

  30. वहीं (उसी स्थान पर)

  31. वही (जो मैं कह रहा था वही बात आप कह रहे हैं)

  32. यहीं (इसी स्थान पर, तुम्हारी कार की चाबी यहीं कहीं होनी चाहिए)

  33. श्रद्धांजली

  34. लफ़्ज़

  35. गुणी 

  36. बहु (कई), बहू (वधू)

  37. जाती और जाति —- दोनों में अंतर है
  38. तुझे 


http://www.hindi2dictionary.com/ एवं  https://www.rekhta.org/urdudictionary  से वर्तनी जाँच लें।

राहुल उपाध्याय । 7 सितम्बर 2020 । सिएटल


Saturday, September 5, 2020

5 सितम्बर


यह तस्वीर उस वर्ष की है जिस वर्ष मैं नवीं कक्षा में दूसरे प्रयास में सफल हुआ था। 


पहली बार गणित और अंग्रेज़ी में कच्चा रह गया था। यदि मैं असफल न होता तो कक्षा में सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। 


असफल होने पर घर पर कोई हंगामा नहीं हुआ। मुझे कोई भाषण नहीं दिए गए। कोई सांत्वना भी नहीं दी गई। क्योंकि मैं रोया भी नहीं। निराश भी नहीं हुआ। कोई सपना भी नहीं था, जो टूटा।


असफल होना ऐसा था जैसे बस छूट गई। दूसरी मिल जाएगी। 


जब मुझे पता चला कि दूसरे साल भी वही पढ़ना है, जो पिछले साल पढ़ना था। वैसे ही प्रश्न आएँगे जो पिछले साल आए थे। तब मैं जागा। कि धिक्कार है मुझ पर जो मैं इस साल भी असफल रहा। 


मुझमें हिम्मत आ गई साफ़ लफ़्ज़ों में और बुलंद आवाज़ में कहने की कि मुझे फ़लाँ बात समझ में नहीं आई। मुझे समझाइए। 


वे दिन अच्छे थे कि शिक्षक कक्षा में ही शंका समाधान कर देते थे। ट्यूशन का ज़माना नहीं था। आज भी शायद अच्छे दिन हैं। गुगल, यूट्यूब,और खान एकेडमी जैसी सुविधाएँ सहज उपलब्ध हैं, जहाँ हर शंका का त्वरित निवारण हो जाता है। बीच का दौर ख़राब सा रहा। 


हक़ सर गणित पढ़ाते थे। उन्होंने धेर्यपूर्वक मेरे सारे प्रश्नों के उत्तर दिए। मुझमें गणित के प्रति प्रेम उनके व्यवहार से ही पनपा। 


चन्द्रा मैडम इस तस्वीर में नहीं हैं। उन्होंने मुझे प्रेरित किया कि मैं अंग्रेज़ी में कुछ न कुछ लिखता रहूँ। धीरे-धीरे मेरी कमजोरी दूर हो जाएगी। ऐसा ही हुआ। मुझे हिन्दी फ़िल्मे देखने का बहुत शौक था। मैं उनकी कहानियाँ अंग्रेज़ी में लिखने लगा। व्याकरण और शब्दावली, दोनों में सुधार हुआ। 


शास्त्री जी, धोती पहने प्रिंसिपल सर के पास बैठे हैं। उनका व्यक्तित्व अत्यंत गरिमामय था। आवाज़ भी दमदार थी। वे एक से बढ़कर एक श्लोक सुनाते थे, एवं समझाते थे। वे सब मेरी प्रेरणा बने। उनसे ही मेरा जीवन रोशन हुआ। 


उस कम उम्र में भी मेरी उनसे ईश्वर के अस्तित्व पर बहस हुई थी। मेरे पास उनके तर्क का तब जवाब नहीं था। अब है। 


उनके तर्क को मैंने 2007 में लिखी जन्म कविता में प्रस्तुत किया। 


उनका पढ़ाया श्लोक आज भी मेरी रग-रग में है। 


विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।

पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।।


विद्या विनय अर्थात विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से मनुष्य योग्यता प्राप्त करता है। अपनी योग्यता के दम पर मनुष्य धन प्राप्त करता है। और धन से धार्मिक कार्य समपन्न हो सकते हैं। धार्मिक कार्य से असीम आनन्द की प्राप्ति होती है। 


राहुल उपाध्याय । 5 सितम्बर 2020 । सिएटल


https://mere--words.blogspot.com/2012/11/blog-post_26.html?m=1




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Best Regards,
Rahul
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Sunday, August 16, 2020

शब्दावली: कभी-कभी

किसी पाठक ने कहा कि मेरी शब्दावली वृहद एवं अच्छी है। यह स्नेहवश कहा या यह सच है, नहीं जानता। 


जो रचनाएं हम सुनते हैं, उनमें प्रयुक्त शब्दों के अर्थ से अनभिज्ञ होते हुए भी प्रभावित हो जाते हैं। कभी उनका अर्थ खोजने का समय नहीं निकाल पाते हैं। जैसे कि 'कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है'। रचना सुने चालीस साल से अधिक वर्ष हो गए हैं। शायद ही कभी सोचा हो कि शादाब और शुआओं का क्या मतलब है। 


फ़िल्म में कई बार कुछ फेरबदल कर दिया जाता है, कथानक को ध्यान में रखते हुए। कभी-कभी में भी ऐसा ही हुआ। प्रस्तुत है, मूल कविता। आप उसे साहिर की आवाज़ में यहाँ सुन सकते हैं। 

http://youtu.be/1TA-Ng3vHbw 


कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फों की नर्म छांव में गुज़रने पाती 

तो शादाब (हरी-भरी) हो भी सकती थी

ये तीरगी (अँधेरा) जो मेरी ज़ीस्त (जिंदगी) का मुक़द्दर है

तेरी नज़र की शुआओं (रश्मियों) में खो भी सकती थी


अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम (दु:ख से अनजान) रहकर 

तेरे जमाल (सौन्दर्य) की रानाईयों (सुन्दरता) में खो रहता 

तेरा गुदाज़ (मुलायम) बदन, तेरी नीमबाज़ (अधखुली) आँखें 

इन्हीं हसीन फ़सानों में महव (तल्लीन) हो रहता 

पुकारती मुझे जब तल्खियाँ (कड़वाहट) ज़माने की

तेरे लबों से हलावत (मीठे) के घूंट पी लेता 

हयात (ज़िन्दगी) चीखती फिरती बरहना (नंगे) सर

और मैं घनेरी जुल्फों के साए में छुप के जी लेता 

मगर ये हो न सका और अब ये आलम (हाल) है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू (तलाश) भी नहीं 

गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी

जैसे इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले

गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रहगुज़ारों (राहों) से

मुहीब (भयानक) साए मेरी सिम्त (दिशा में) बढ़ते आते हैं  

हयात-ओ-मौत (ज़िन्दगी और मौत) के पुरहौल (डरावने) ख़ारज़ारों (काँटों भरी जगह) से

न कोई जादा (पगडंडी), न मंजिल, न रोशनी का सुराग 

भटक रही है खलाओं (शून्य) में ज़िन्दगी मेरी

इन्हीं ख़लाओं (शून्य) में रह जाऊँगा कभी खो कर

मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स (दोस्त) मगर यूँ ही 

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है 


मुकेश द्वारा गाए गए गीत के शब्द तो अलग थे, लेकिन जब राखी अमिताभ से बात करती है टीवी पर तब भी इस नज़्म के शब्द बदल दिए जाते हैं: https://www.youtube.com/watch?v=lGfxSNDQ3CI 


कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फों की नर्म छांव में गुज़रने पाती 

तो शादाब (हरी-भरी) हो भी सकती थी

ये रंज-ओ-ग़म की सियाही जो दिल पे छाई है 

तेरी नज़र की शुआओं (रश्मियों) में खो भी सकती थी


मगर ये हो न सका और अब ये आलम (हाल) है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू (तलाश) भी नहीं 

गुज़र रही है ज़िन्दगी कुछ इस तरह जैसे 

इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


न कोई राह, न मंजिल, न रोशनी का सुराग 

भटक रही है अँधेरों में ज़िन्दगी मेरी

इन्हीं अँधेरों में रह जाऊँगा मैं कभी खो कर

मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स (दोस्त) मगर यूँ ही 

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है 


राहुल उपाध्याय । 16 अगस्त 2020 । सिएटल



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Best Regards,
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Sunday, November 20, 2016

ऊँ जय नगदीश हरे, स्वामी जय नगदीश हरे

ऊँ जय नगदीश हरे, स्वामी जय नगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट
क्षण में दूर करे


जो धावे वही पावे, दुख बिनसे मन का
स्वामी दुख बिनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे

कष्ट मिटे तन का


मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दूजा, ए-टी-एम और न दूजा, 

आस करूँ मैं जिसकी


तुम पूरण सुखदाता, तुम से हर पाई
स्वामी तुम से हर पाई

यार-दोस्त-नेता आदि

तुम सबके स्वामी


तुम मूल्यों के सागर, तुम पालन करता
स्वामी तुम पालन करता

मैं सेवक तुम स्वामी

कृपा करो भरता


तुम हो एक अगोचर, सबके प्राण पति
स्वामी सबके प्राण पति
किस विधि मिले विनिमय

तुम हो शाणपति


दीन बंधु दुख हरता, तुम रक्षक मेरे
स्वामी तुम रक्षक मेरे
बहुधा हस्त में आओ

द्वार पड़ा मैं तेरे


क्रय विकार मिटाओ, बिल भरो देवा

स्वामी बिल भरो देवा
समृद्धि सम्पत्ति बढ़ाओ

खावे नित मेवा


तन-मन-धन सब कुछ है तुझसे

स्वामी सब कुछ है तुझसे

सबका मुझको अर्पण

क्यूँ छोड़ूँ किसीका


(शिवानन्द स्वामी से क्षमायाचना सहित)

19 नवम्बर 2016

भवानी मण्डी के आसपास

मुझे बहती नदी में ख़त बहाने हैं

मुझे बहती नदी में ख़त बहाने हैं

क्यूँ?
क्यूँकि 
फ़िल्मों में देखा है
किताबों में पढ़ा है
गानों में सुना है

और
दिल भी टूटा है
साथ भी छूटा है
सब कुछ तो रूठा है

पर होगा नहीं 

क्यूँ?
क्यूँकि
न ख़त है
न नदी है
न बहता शिकारा है
बस गिटपिट का पिटारा है
जिसमें 
मिट के भी कुछ मिटता नहीं 
और हो के भी कुछ होता नहीं 

आप कहेंगे
फ़क़त बहाने हैं
लेकिन सच मानिए
कुछ लालसाएँ 
ऐसी ही होती हैं
पूरी नहीं होतीं

जीवन-मरण का
अनवरत चक्र 
चलता ही रहता है

दुनिया विकसित होती रहती है
और
फ़िल्मों-किताबों-गीतों के
मुहावरे बदलते नहीं

20 नवम्बर 2016
सैलाना | 001-425-445-0827
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