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Friday, December 4, 2020

4 दिसम्बर 2013

सात साल पहले पचासवाँ जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। 29 नवम्बर को। मुझे पता नहीं था। जैसा कि हर वर्ष होता है, धन्यवाद ज्ञापन दिवस के उपलक्ष्य में चार दिन का अवकाश था। मंजू ने शुक्रवार के दिन भव्य दावत का आयोजन किया था। मुझे और प्रेरक को किसी काम से बाहर भेज दिया था। 


जितने भी मेहमान आए थे सबसे कहा गया कि अपनी गाड़ियाँ कहीं दूर पार्क करें ताकि लौटने पर मुझे कोई शक़ न हो। जूते भी छुपाए गए। 


हम दोनों जब वापस घर आए तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। बहुत लोग आए थे। तब मेरे पास आईफ़ोन नहीं था। किसी सज्जन से कहा फ़ोटो लेने के लिए। कुछ ठीक आए, कुछ नहीं आए। 


बहरहाल, आमतौर पर एक उम्र के बाद उपहार का प्रचलन बंद हो जाता है। पर पचासवाँ जन्मदिन था सो सब कुछ न कुछ लाए। 


तब मैं सोम से शुक्र रोज़ मम्मी-बाऊजी से फ़ोन पर बात किया करता था। प्रेरक को स्कूल छोड़कर दफ़्तर जाते वक़्त जो दस मिनट लगते थे उसी में बात हो जाती थी। बातें कुछ ख़ास नहीं होती थीं। सिर्फ यही कि स्वास्थ्य कैसा है। उनसे मिलकर हम चारों जुलाई में ही लौटे थे। जब तक हम थे, वे ठीक थे। हमारे निकलने के बाद हालत बिगड़ गई थी। फिर सुधर गई थी। 


सोमवार, 2 दिसम्बर, को प्रेरक को स्कूल छोड़कर मैंने दिल्ली फ़ोन लगाया। मम्मी-बाऊजी दोनों से बात हुई। दोनों ख़ुश हुए कि जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। मैं बताने लगा कि उपहार में क्या-क्या मिला। याद करके बता रहा था, सो कुछ बता पाया, कुछ नहीं। 


अगले दिन फिर वही, प्रेरक को छोड़कर फ़ोन लगाया। बाक़ी उपहारों की बात करने लगा। बाऊजी खाँस रहे थे। मम्मी ने कहा कि खांसी नहीं है। बस यूँही अभी खाँस रहे हैं। बात पूरी नहीं हो पाई। 


4 की सुबह फिर फ़ोन लगाया। घंटी बजती रही। किसी ने नहीं उठाया। दोबारा लगाया। नहीं उठाया। कुछ देर में दिल्ली में हमारे पड़ोसी राव साहब का फ़ोन आया। 


ख़बर दी कि मम्मी अस्पताल में हैं। वहाँ फ़ोन कर लूँ। बाऊजी नहीं रहे। 


फ़ोन किया। बात की। गाड़ी घर की ओर पलटी। मंजू को फ़ोन किया। कहा दिल्ली का टिकट ख़रीदों। 


तीन घंटे में मेरा प्लेन सिएटल छोड़ चुका था। 


——-


दिल्ली में 4 को विधानसभा के चुनाव थे। मेरी भतीजी ने मम्मी से कहा कि दादी आप वोट दे आओ। बाऊजी का चलना-फिरना सीमित है सो वे नहीं जा सकते थे। 


मम्मी वोट देकर आई। बाऊजी ने खाना खाया। कुछ देर बाद परेशानी का ज़िक्र किया। मम्मी ने अस्पताल चलने का आग्रह किया। वे मना करते रहे। वे अस्पताल से घबराते थे। तीन साल पहले आई-सी-यू का अनुभव अच्छा नहीं रहा। वे नलियाँ खींच लेते थे। सो उनके हाथ बाँध दिए गए थे। 


मम्मी ने फिर भी मनाने की कोशिश की। कहा कि चलो वो नया कुर्ता पहन लो जो जन्मदिन (15 नवम्बर) पर मिला है। मम्मी कुर्ता पहनाने में मदद करने लगी। बाऊजी पसीने में तर-बतर हो गए। 


मम्मी ने एक हाथ से बाऊजी को सहारा दिया, और दूसरे से टैक्सी के लिए फ़ोन लगाया। बाऊजी तभी निढाल हो गए। 


——-


रतलाम में रिश्ते में तेरहवीं थी। बाऊजी ने भाईसाब से कहा कि किसी को तो जाना चाहिए। तुम चले जाओ। 


4 की शाम भाईसाब रतलाम गए हुए थे। उन्हें ख़बर लगी। वे भी लौटे। 


——


दो बेटे। एक विदेश में। एक दिल्ली में रहते हुए भी, संयोगवश उस दिन दूर दूसरे शहर में। 

दोनों में से कोई भी पास नहीं। 


नहीं जानता था कि 2001 में लिखीं ये पंक्तियाँ 12 वर्ष बाद सही साबित होंगी। 


न तो मिला तुम्हें वनवास

ना ही हो तुम श्री राम

मिली हैं सारी खुशियाँ

मिले हैं ऐश-ओ-आराम

फिर भला क्यूँ उनको 

दशरथ की गति है पानी

जो करीब नहीं हैं उनकी 

ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


ऐ मेरे वतन के लोगो

ज़रा आँख में भर लो पानी

जो करीब नहीं हैं उनकी 

ज़रा याद करो क़ुर्बानी 


——-

राहुल उपाध्याय । 4 दिसम्बर 2020 । सिएटल 



Wednesday, December 2, 2020

26 नवम्बर 2020

मैं अपना हर जन्मदिन 2007 में लिखी कविता 'जन्म' भेजकर शुरू करता हूँ। 


इस बार नहीं कर पाया। बड़ी सुबह ही से फ़ोन आने शुरू हो गए। 


इस बार 26 को गुरूवार था, नवम्बर का अंतिम गुरूवार। यानी धन्यवाद ज्ञापन दिवस। यानी चार दिन के अवकाश का पहला दिन। 


25 को देवोत्थानी एकादशी थी। सो उस दिन भी जन्मदिन था। एक मित्र उस शाम आ गए थे। बहुत स्वादिष्ट व्यंजन लेकर। 


कोई और काल होता तो 26 को दावत रखता। दोस्तों को बुलाता। कोरोना के कारण हिदायत थी कि कोई ऐसे आयोजन न किए जाए। 


इस वर्ष 14 परिवार को आमंत्रित करने की योजना थी। न बुला सका तो सोचा क्यों न मैं ही उनसे मिल आऊँ और उनकी शुभकामनाएँ एवं आशीर्वाद लेता आऊँ। धन्यवाद देकर धन्यवाद ज्ञापन दिवस भी सार्थक कर दूँ। 


आजकल यहाँ की भारतीय दुकानें रतलामी सेव रखने लगी हैं। हल्दीराम से लेकर बंसीराम तक। सब ब्रांड की। मैंने 14 पैकेट उठाए और चल पड़ा सबसे मिलने। 


किसी को कोई सूचना नहीं दी। सबके यहाँ बिन बताए टपक पड़ा। बहुत आनन्द आया। एक यादगार जन्मदिवस महोत्सव। चारों दिन ख़ुशी से भरपूर रहे। 


इस वर्ष कुछ चित्र एकत्रित किए। एपल ने स्वयं वीडियो बना दिया। अच्छा लगा। सो साझा कर रहा हूँ। 


राहुल उपाध्याय । 2 दिसम्बर 2020 । सिएटल 


'जन्म' कविता यहाँ पढ़ी जा सकती है:

https://mere--words.blogspot.com/2007/11/blog-post_26.html?m=1



Tuesday, November 24, 2020

राजेश शर्मा

यदि मैं नवीं में असफल न होता तो राजेश से कभी नहीं मिल पाता और हम दोस्त नहीं होते। 


वह मम्मी-बाऊजी के लिए हम दोनों बेटों से बढ़कर था। जब भी उन्हें कोई ज़रूरत महसूस हुई वो हमेशा मदद के लिए तैयार था। बेटा होता तो शायद दो-चार बात कह भी देता। सौ बहाने कर देता। 


बाऊजी की जब सर्जरी हो रही थी, उन्हें खून की आवश्यकता थी। मैं अमेरिका में था। भाई साहब का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। सारी ज़िम्मेदारी राजेश और उसके परिवार और मित्रों ने उठाई। 


और भी कई क़िस्से हैं जिन्हें मम्मी और बाऊजी ने मुझे बताया नहीं। कुछ पता है। 


इस धन्यवाद ज्ञापन दिवस ही नहीं, हर दिन, हर पल मैं उसका ऋणी हूँ। 


जब भी मैं उससे मिलता मैं सोचता था उसे कुछ नहीं होगा। वो हमेशा मेरी माँ का ख्याल रखेगा जब बाऊजी नहीं रहे। मुझे क्या पता था कि वो ही चल बसेगा। 


जुलाई 2015 में वह नींद से ही नहीं जागा। 


मुझे दुख है कि अब वो नहीं है लेकिन मुझे इस बात की ख़ुशी है कि उसके जीवन से मुझे प्रेरणा मिली और मेरे जीवन को नई राह। 


राहुल उपाध्याय । 24 नवम्बर 2020 । सिएटल 


नगद में घर

जब नगद में घर लिया तो कई लोग इससे सहमत नहीं थे। 


घर के लिए यदि क़र्ज़ लिया जाए तो उस पर जो ब्याज चढ़ता है उससे आयकर कम हो जाता है। क्यूँकि जितनी ब्याज राशि होती है वह आमदनी में से घटा दी जाती है। 


दूसरी ओर जो धन राशि घर ख़रीदने में नहीं लगाई, वह कहीं और लगाई जा सकती है। जैसे कि स्टॉक मार्केट में। या भारत में कोई घर ख़रीद कर किराए पर उठाकर कमाई की जा सकती है। या अमेरिका में ही घर ख़रीदकर किराए पर उठाए जा सकते है। 


इतनी बड़ी धनराशि जो मैंने जोड़ ली थी, उसके पीछे कारण था सेन फ़्रांसिस्को से सीबल की नौकरी छोड़ सिएटल में माइक्रोसॉफ़्ट में आना। वहाँ घर तीस साल के लोन पर था। सात साल भर चुका था। 23 साल और बचे थे। 


मुझे कुछ लोगों ने यह भी सलाह दी कि इसे बेचो मत। किराएदार रख लो। 


मुझे क़र्ज़ से सख़्त नफ़रत है। सो किसी की राय नहीं मानी। सेन फ़्रांसिस्को का घर बेचा। और सिएटल में ख़रीदा। 


चैन की नींद सोने का यह भी एक कारण है। 


राहुल उपाध्याय । 24 नवम्बर 2020 । सिएटल 


नवम्बर 2008

जुलाई, 2007 में जब मैंने सिएटल में घर नगद में ख़रीदा, एक राहत की साँस ली। 


अब न महीने-महीने किराया देना था। न ही कोई किश्त भरनी थी। मासिक ख़र्चे फिर भी थे। बिजली, पानी, फ़ोन, आदि के। कुछ वार्षिक ख़र्च भी थे। जैसे सम्पत्ति कर, बीमा, वाहन बीमा, पंजीकरण। और कुछ साप्ताहिक परचूनी ख़र्च। 


बच्चों की बारहवीं तक की पढ़ाई सार्वजनिक स्कूल में नि:शुल्क पढ़ाई होती है। कॉपी-किताब-पेन्सिल आदि के ख़र्च नगण्य है।


बाक़ी कराटे-स्काउट-सॉकर-बेसबॉल आदि की फ़ीस भी ख़ास नहीं है। गर्मी की छुट्टियों में भ्रमण आदि के व्यय भी सामान्य ही है। 


कॉलेज की पढ़ाई अवश्य बहुत महँगी होती है। उसका भी इंतज़ाम था। और यहाँ यह भी व्यवस्था है कि यदि छात्र होनहार है, और माता-पिता गरीब तो कॉलेज स्वयं आपूर्ति कर देता है। और यदि होनहार नहीं है तो किसी सस्ते कॉलेज से भी पढ़ाई की जा सकती है। 


कुल मिलाकर अब जीवन इस पड़ाव पर आ गया था कि मासिक वेतन के लिए किसी की जी-हजूरी करने में अब कोई तुक नज़र नहीं आ रही थी। अमेरिका का नागरिक दो वर्ष पूर्व बन ही चुका था। सो किसी तरह की अब आवाजाही पर भी रोक नहीं थी। 


सो 2008 में सेवानिवृत्त होकर जीवन को नए सिरे से सोचने का प्रण किया। 


उसी वर्ष 27 साल बाद पहली बार घर पर मम्मी-बाऊजी के साथ दीवाली (28 अक्टूबर) और मम्मी का जन्मदिन (2 नवम्बर) मनाया। उससे पहले जब भी घर गया या तो बच्चों की गरमी की या क्रिसमस की छुट्टियों पर। 


इन चित्रों में जितना उल्लास है, उतना न इससे पहले देखा, न बाद में। बहुत ही सुखद यात्रा थी वह। 


राहुल उपाध्याय । 24 नवम्बर 2020 । सिएटल 






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Monday, November 23, 2020

26 नवम्बर 1963

मैं जब दसवीं की परीक्षा के लिए आवेदन पत्र भर रहा था, तब मैंने बाऊजी-मम्मी से अपनी जन्मतिथि पूछी तो दोनों में बहस होने लगी। एक कहे 26 अक्टूबर, एक कहे 26 नवम्बर। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि चलो जन्मदिन नहीं मनाया कभी, सो कोई बात नहीं। पर जन्मदिन ठीक से याद भी नहीं?


मम्मी को याद था कि वह देवोत्थानी एकादशी की रात थी। सो पंचांग निकाल कर 26 नवम्बर मान लिया गया। अब पता चला कि रात की बारह बज चुके थे सो क़ायदे से 27 नवम्बर होना चाहिए। 


चूँकि शुरू के कुछ वर्षों में मैं जन्मोत्सव से वंचित रहा, इसलिए अब चार दिन अपना जन्मोत्सव मनाता हूँ। देवोत्थानी एकादशी और उसके अगले दिन द्वादशी को भी। 26 नवम्बर और 27 नवम्बर को भी।  


इस वर्ष विक्रम सम्वत् में बारह महीने के बजाय तेरह महीने रहे। पितृ पक्ष के समाप्त होते ही नवरात्रि आरम्भ हो जाती है। इस वर्ष वह एक महीने बाद हुई। अतिरिक्त माह को अधिक मास या पुरूषोत्तम माह कहा जाता है। 


जैसे कि ग्रिगोरियन कैलेण्डर, जो कि पूर्णिमा या अमावस पर आधारित नहीं है, में हर चार साल बाद फ़रवरी में एक दिन जोड़ दिया जाता है वैसे ही हर 32.5 महीने बाद चन्द्रमा पर आधारित भारतीय हिन्दू कैलेण्डर में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। 


लेकिन आश्चर्य की बात है कि कार्तिक माह कभी अधिक माह नहीं रहा। 250 साल की अवधि में (1901 ईस्वी से 2050 ईस्वी तक) सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है। और वह था वर्ष 1963। यानी जिस वर्ष मैं पैदा हुआ। 


और इससे भी ज़्यादा अचरज की बात है कि उस वर्ष भैया दूज दीवाली के दो दिन बाद नहीं, 31 दिन बाद हुई। 16 अक्टूबर को दीवाली थी। 17 नवम्बर को भैया दूज। 


देवोत्थानी एकादशी दीवाली के ग्यारह दिन बाद नहीं 41 दिन बाद हुई। 


इसीलिए मेरी जन्मतिथि और जन्मदिन एक लम्बे अरसे तक फिर से एक ही दिन नहीं हो सकते। 


और मैं जिस वर्ष पैदा हुआ, वह था 2020। यानी आज ही का साल। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि आज है 2020 ईस्वी। और वह था विक्रम सम्वत् 2020। 


इस वर्ष मेरे जन्मदिन पर अमेरिका में चार दिन, 26-29 तक, का अवकाश भी रहेगा। 26 को धन्यवाद ज्ञापन दिवस। 27 को क्रिसमस की ख़रीदारी। 28, 29 शनि-रवि। 


जब मेरा जन्मदिन 26 नवम्बर तय हो गया तो बाऊजी ने बड़े धूमधाम से मनाने का निर्णय लिया। तब हम कलकत्ता में ढाकूरिया झील के पास शरत बनर्जी रोड पर रहते थे। उस झील पर एक क्लब था। क्लब किराया से लिया गया। भव्य पार्टी दी गई। 


मैं बहुत रोष में रहा। मुझे लगा कि दिखावा हो रहा है। सब लोगों से कटा-कटा सा रहा। अनमना सा। 


उस दिन के लिए यह शर्ट ली गई थी। 


उसके बाद बारहवीं की परीक्षा, जे-ई-आ, मेडिकल, आर-ई-सी - सब के लिए यही फ़ोटो आवेदन पत्र पर चिपकाया गया। 


राहुल उपाध्याय । 23 नवम्बर 2020 । सिएटल 




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Sunday, November 15, 2020

15 नवम्बर 2020

आज के दिन 84 वर्ष पहले बाऊजी का जन्म हुआ था। 


उन्होंने न कभी डाँटा, न पुचकारा। इन सबका मुझ पर गहरा असर पड़ा। और जो मैं आज हूँ, उसमें उनका कहीं न कहीं योगदान अवश्य है। 


जब मैं नवीं कक्षा में गणित में विफल हो गया तब उन्होंने मेरी तथाकथित 'ट्यूशन' नहीं लगाई। उन्होंने अपने एक विधि के विद्यार्थी से कहा कि यह गणित में कमजोर है, देख लो कुछ मदद कर सको तो। 


यह बहुत बेतुकी बात है। गणित का विधि से क्या लेना-देना?


लेकिन बाद में समझ आया कि शम्भू दा से बढ़िया और कोई शिक्षक नहीं हो सकता था। पहली बात तो वे परिवार के मित्र थे सो कोई झिझक नहीं थी। दूसरा वे अच्छी तरह से समझ जाते थे कि मुझे क्या कठिनाई हो रही है, क्यों हल करने का कोई तरीक़ा आसानी से समझ नहीं आ रहा है। 


यह एक वरदान साबित हुआ। ऐसा नहीं कि मैं रातों रात ज्ञान की खान बन गया। लेकिन मुझमें प्रश्न पूछने की हिम्मत आ गई। अब मैं बेझिझक कक्षा में शिक्षक से प्रश्न पूछ सकता था, और पूछता था। 


मेरा छोटा बेटा, वाशिंगटन विश्वविद्यालय में, कम्प्यूटर साईंस की पढ़ाई कर रहा है। वह कहता है कि वहाँ के एक प्रोफेसर क्रिप्टोग्राफ़ी की एक विशेष विधा के जनक हैं। वे विश्वविख्यात हैं। यशस्वी हैं। बहुत ज्ञानी हैं। लेकिन बहुत बुरे शिक्षक। उन्हें पता ही नहीं कि किसी को कुछ समझने में क्या कठिनाई हो सकती है। उनके लिए सब आसान है। 


राहुल उपाध्याय । 15 नवम्बर 2020 । सिएटल 



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Wednesday, October 21, 2020

पहली पतझड़

यह मेरा पहला फ़ोटो हैं अमेरिका के पतझड़ के साथ। तब मुझे भारत से आए सिर्फ़ दो महीने ही हुए थे। 


सिनसिनाटी विश्वविद्यालय की यह परम्परा रही है कि हर नए विदेशी छात्र से एक लोकल परिवार को जोड़ दिया जाता है ताकि नवआगंतुक खुद को अकेला न समझे। 


मुझे यह परम्परा बहुत अच्छी लगी। उन्होंने प्रथम वर्ष मेरा बहुत ख़याल रखा। मुझे लेने आते थे, अपने घर कुछ समय बीताने, खाना खिलाने के बाद, वापस छोड़ भी जाते थे। 


यह फ़ोटो उनके इण्डियना राज्य स्थित अवकाश गृह का है। कैमरा उन्हीं का है। प्रिंट भी उन्होंने ही दिया था। 


उस दिन मेरा जन्मदिन भी था। और धन्यवाद ज्ञापन दिवस की पूर्व संध्या भी। 


बहुत मीठा दिन। 26 नवम्बर 1986। 


तब से मैं सिनसिनाटी, इण्डियनापोलिस, फिलाडेल्फिया, टोराण्टो, और सिएटल के पतझड़ का दीवाना हूँ। 


धन्यवाद ज्ञापन दिवस हर वर्ष नवम्बर के चौथे गुरूवार को मनाया जाता है। यही एकमात्र दिन है जिसकी दो दिन (गुरू-शुक्र) की छुट्टियाँ एक साथ मिलतीं हैं। यानी चार दिन की। क्योंकि शनि-रवि को वैसे भी छुट्टी रहती है। 


गुरूवार की छुट्टी परिवार के संग भोजन करने के लिए होती है। परम्परा अनुसार उस दिन माँसाहारियों के यहाँ टर्की पकाई जाती है। एक टर्की इतनी बड़ी होती है कि एक अकेला परिवार उसे खा नहीं सकता। इसलिए यह सबसे उपयुक्त दिन होता है। इतनी बड़ी टर्की को पकाने में भी घण्टों लगते हैं। सो मिल जुल कर पकाने के लिए भी यह श्रेष्ठ दिन रहता है। 


उस दिन रेस्टोरेन्ट बंद रहते हैं। सारे बाज़ार, मॉल सब बंद रहते हैं। अमेरिका में चौबीसों घण्टे खुलने वाली दुकानें भी बंद रहतीं हैं। हर जगह सन्नाटा। 


परिवार एक दूसरे से मिलने के लिए हज़ारों मीलों की यात्राएँ तय करते हैं। बुधवार के दिन हर एयरपोर्ट पर बहुत भीड़ रहती है आने-जाने वालों की। लेने-छोड़ने वालों की। 


जिन परिवारों में खटपट है, या टूट चुके हैं, या बिखर चुके हैं, या आने में असमर्थ हैं, उनके लिए यह दिन अत्यंत कष्टदायक होता है। कई लोग निराशा की गिरफ़्त में आ जाते हैं। 


शुक्रवार को छुट्टी इसलिए होती है कि क्रिसमस में सिर्फ़ 4 हफ़्ते रह गए हैं, जिसे जो उपहार देना हो, ख़रीद लें। इसलिए जितना सन्नाटा गुरूवार को था, उतनी ही ज़्यादा भीड़ होती है शुक्रवार को। हर दुकान की होड़ रहती है कि उसकी ज़्यादा बिक्री हो। इसलिए कुछ दुकानें सामान इतना सस्ता देने की घोषणा करते हैं कि लम्बी क़तारें लग जातीं हैं दुकान खुलने के कुछ घण्टों पहले से ही। ग़ज़ब का मेला होता है। 


इरादा उपहार के लिए ख़रीददारी का होता है। लेकिन अपने लिए भी सस्ते दाम पर कुछ मिल जाए तो हर्ज ही क्या है?


राहुल उपाध्याय । 21 अक्टूबर 2020 । सिएटल 



Thursday, October 15, 2020

मदर टेरेसा

कई बार लगता है कि सारे महान चरित्र इतिहास में हुए हैं। काश हम तब होते तो कितना अच्छा होता। 


हम यह भूल जाते हैं कि जब वे थे तब भी कई लोगों ने उसे अपना सौभाग्य नहीं माना। किसी न किसी ख़ामी की वजह से दूरी बनाए रखी। 


और यही हम आज कर रहे हैं। जो हमारे आसपास हैं, उन्हें ही इतिहास एक दिन महान करार देगा। तब हम हाथ मलते रह जाएँगे। कि मौक़ा था, और उसे हाथ से जाने दिया। 


कई बार लगता है कि बड़े लोगों से मिलना तो विदेश में बसे भारतीयों के लिए आसान है। ज़्यादा भारतीय हैं नहीं। और अमेरिका कर्म-प्रधान देश है। काम से छुट्टी लेकर बहुत कम ही किसी को देखने या सुनने जाते हैं। तो जो जा रहे हैं उनको मिलने के अवसर और बढ़ जाते हैं। 


जबकि जो अपने ही देश में, अपने ही शहर में हैं, उनसे मिलने की हम सोचते ही नहीं। घर की मुर्ग़ी दाल बराबर। 


नवीं में असफल होने का दुःख तो हुआ था। पर फ़ायदे भी बहुत हुंए। उनमें से एक था मदर टेरेसा से मिलना। 


असफल होने पर नई नवीं कक्षा में, और फिर दसवीं में मिस चन्द्रा मिलीं। वे प्रोत्साहित करतीं थीं, और मुझे अंग्रेज़ी पढ़ना-लिखना भाने लगा था। 1979 में, दसवीं की अंग्रेज़ी पुस्तक में मदर टेरेसा से एक मुलाक़ात पर आधारित ख़ुशवंत सिंह का लिखा निबंध था। 


मिस चन्द्रा ने योजना बनाई कि क्यूँ न पूरी कक्षा मदर टेरेसा से स्वयं मिले। ताकि जो पढ़ रहे हैं, उसे अनुभव कर सकें। 


जिस दिन जाना था मिलने, मैं जल्दी तैयार हो गया था। दरवाज़े के नीचे से सरकाया हुआ स्टेट्समैन समाचार पत्र मैंने ही उठाया। मुख्यपृष्ठ पर मदर टेरेसा की बड़ी सी तस्वीर थी। और समाचार था कि उन्हें इस साल के नोबेल पुरस्कार के लिए चुन लिया गया है। 


ख़ुशी तो हुई। चिन्ता उससे ज़्यादा हुई। कि यह भी आज ही होना था। क्या पता वे इतनी व्यस्त हों कि हमसे मिले ही नहीं। या मिले भी तो कुछ ही क्षणों के लिए। 


हम उस गली में पहुँचे। जहाँ उनका मिशन था। ख़ुशवंत सिंह के बताए अनुसार वैसा ही दरवाज़ा था, वैसी ही बड़ी चर्च जैसी घण्टी थी, जो रस्सी खींचने पर बजती थी। घण्टी बजने पर कोई सिस्टर आईं। हमें उनके दफ्तर ले गईं। 


मदर टेरेसा सहज भाव से मिली। नोबेल का प्रभाव कहीं नहीं था। पूरे मिशन, अस्पताल, रोगी, बच्चों, सबसे परिचय कराया। 


उस दिन किसी के पास कैमरा नहीं था। 


एक अविस्मरणीय दिन। एक अविस्मरणीय मुलाक़ात। एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व। 


राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2020 । सिएटल 



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15 अक्टूबर 2020

आज भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम का जन्मदिन है। 


24 अप्रैल 2009 को वे सिएटल पधारे। वाशिंगटन विश्वविद्यालय में हुए उनके स्वागत समारोह में मैं भी उपस्थित था। 


उन्हें मेरी हिन्दी कविताओं की पुस्तक भेंट की। एक सुनानी भी चाही। पर, अफ़सोस, उन्हें हिन्दी समझ नहीं आती। 


इसे पुस्तक कहना शायद उचित नहीं होगा। कुछ चुनिंदा कविताओं का प्रिंट ले कर, पन्नों का आधा काट कर, मोटे काग़ज़ का आवरण बना कर, जोड़ दिया था स्पाइरल बाइंडिंग में। 


राहुल उपाध्याय । 15 अक्टूबर 2020 । सिएटल 



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Tuesday, September 29, 2020

29 सितम्बर 2020

आज, 29 सितम्बर, का क्या महत्व है मेरे जीवन में और इस तस्वीर के पीछे की कहानी मैं लिख चुका हूँ पहले। न मिली हो, न पढ़ी हो, या याद न हो, तों यहाँ देख लें:

https://rahul-upadhyaya.blogspot.com/2020/09/29-1966.html?m=1 


कितनी अजीब बात है कि 54 वर्ष पहले ली गई तस्वीर आज भी सहज उपलब्ध है। जबकि पिछले दस साल में ली गईं तस्वीरें न जाने किस फ़ोल्डर, किस अकाउंट, किस क्लाउड में फँसी है पता ही नहीं। 


यह भी बहुत अजीब है कि जाने की तिथि याद है। उनके आने की नहीं। चाँद पर उतरना भी हमें याद है। वापस आना नहीं (24 जुलाई 1969)। 


जिस दिन बाऊजी लंदन गए, मैं तीन वर्ष का भी नहीं हुआ था। वह दिन मुझे बिलकुल याद नहीं है। 


जिस रात वे लौटे, वह अच्छी तरह से याद है। तब मैं छ: साल का था। तब तक उनके लंदन से भेजे रंगीन पोस्टकार्डों से परिचित था। छोटी मौसी पढ़कर सुनातीं थीं। भाईसाब से शायद लिखवातीं भी थीं कि 'सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से, बाऊजी जल्दी आ जाना।'


रतलाम स्टेशन पर खूब भीड़ थी। आमतौर पर ताँगे से घर जाते थे। उस दिन किसी सरकारी जीप से गए। पहली बार बैठा था जीप में। तब मन में इच्छा हुई थी कि एक दिन मेरी भी जीप हो तो कितना अच्छा हो। अमेरिका आने के बाद यहाँ की आब-ओ-हवा को देखकर वह विचार त्याग दिया। अब घर में चार प्राणी हैं, और चार टोयोटा प्रियस। 


घर पहुँच कर भोजन हुआ। इतनी सारी कटोरियाँ थीं कि बड़ी सी थाली भर गई। बाऊजी एक कटोरी ख़त्म कर दूसरी खाते थे। डालने वाले ख़ाली कटोरी भरते जाते थे। बाऊजी कह रहे थे, अभी नहीं। जब सब ख़त्म हो जाए तब और ले लूँगा। 


मैं तो पहले ही खा चुका था। हमारे यहाँ आमतौर पर सूर्यास्त के आसपास ही खाना खा लिया जाता था। नौ बजे तक सब सो जाते थे। आकाशवाणी से पौने नौ पर हिन्दी में पन्द्रह मिनट के समाचार आते थे। उसके ख़त्म होते ही सारी रोशनियाँ बन्द। 


बाऊजी ने कहा आजा साथ बैठ जा। मैं बैठ गया। थोड़ा बहुत उनकी थाली से खा लिया। 


जब तक बनारस बी-टेक के लिए नहीं गया तब तक जब भी बाऊजी के साथ रहा, हमने एक ही थाली में खाना खाया। 


राहुल उपाध्याय । 29 सितम्बर 2020 । सिएटल 



29 सितम्बर 1966.

तब कैमरे भी घर में नहीं होते थे कि जब चाहे फ़ोटो ले ली। 


यह मेरा एकमात्र फ़ोटो है जिसमें मैं अपनी मम्मी की गोद में हूँ। 


दिनांक: 29 सितम्बर 1966.

स्थान: बम्बई एयरपोर्ट 


मैं तीन साल का हूँ। पिताजी (बाऊजी) के गले में हार है। वे इंग्लैंड जा रहे हैं विधि में एल-एल-एम करने। 


उनकी कहानी अत्यंत प्रेरणादायी है। 


नवम्बर 1936 में उनका जन्म हुआ। दस वर्ष तक स्कूल नहीं गए। जाते भी कैसे। जिस गाँव (शिवगढ़, ज़िला रतलाम, मध्य प्रदेश) में रहते थे, वहाँ कोई स्कूल नहीं था। तीन सन्तानों में वे सबसे बड़े थे। सो घर के कामकाज में हाथ बँटाते रहे। ब्राह्मण थे सो नदी किनारे शिव मन्दिर की देख-रेख करते थे। कहीं सत्यनारायण कथा भी कह आते थे। घर में गायें थीं। उन्हें चराने भी ले जाते थे। 


क़िस्मत से कोई मौलवी साहब एक पेड़ के नीचे कच्चा-पक्का स्कूल चलाने लगे। 


बाऊजी उनसे सीखने लगे। जो सुनते थे याद हो जाता था। कहीं लिखने की आवश्यकता नहीं। अंग्रेज़ी लिखना/पढ़ना/बोलना फटाफट सीख गए। यहाँ तक कि गाँव के पोस्ट ऑफिस में उनसे मदद ली जाने लगी अंग्रेज़ी  के कामकाज में। 


किसी ने कहा मैट्रिक कर लो। कर ली। किसी ने कहा मास्टर बन जाओ। सो बन गए। पड़ोस के गाँव में पढ़ाने लगे। 


किसी ने कहा, बी-ए कर लो। सो कर लिया। किसी ने कहा, रेलवे में क्लर्क बन जाओ। सो बन गए।किसी ने कहा, ईवनिंग क्लासें लेकर एल-एल-बी कर लो, कर ली। 


एल-एल-बी उन्होंने रतलाम से की। जो विक्रम विश्वविद्यालय से जुड़ा था। उन्हें सबसे अधिक अंकमिले। स्वर्ण पदक मिला। 


जो दूसरे नम्बर पर आया, उस छात्र ने शिकायत की कि इतने अंक आ ही नहीं सकते। ज़रूर कोई धाँधली हुई है। 


उस ज़माने में, और शायद आज भी, परीक्षापत्र में निर्देश होते थे कि सात प्रश्नों में से किन्हीं पाँच का उत्तर दें। दूसरे छात्र को शक था कि बाऊजी ने सातों प्रश्न के उत्तर दे दिए हैं। इसीलिए उन्हें सबसे अधिक अंक मिले हैं। 


जब दुबारा जाँच की गई, उसका शक सही निकला। लेकिन यह भी पुष्टि हो गई कि अंक सिर्फ पाँच के ही जोड़े गए। 


सो स्वर्ण पदक के असली हक़दार बाऊजी ही रहे। लेकिन अब क्या? 


रेलवे में इस डिग्री और स्वर्ण पदक की कोई अहमियत नहीं थी। वही की वही नौ से पाँच की क्लर्क की नौकरी। 


एक दिन शिवगढ़ के राजा के एक मंत्री बाऊजी के दफ़्तर कार से आए। आकर एक फ़ार्म दिया कि इसे भर दो। लंदन विश्वविद्यालय से एल-एल-एम करने का सुनहरा मौक़ा है पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ।हवाई जहाज़ से आने-जाने का ख़र्चा भी दिया जाएगा। 


बाऊजी बहुत ख़ुश। यह तो कमाल हो गया। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शिवगढ़ का गाय चराने वाला कभी विदेश जाएगा। 


फ़ार्म भरने बैठे तो होश उड़ गए। छात्रवृत्ति के लिए जो तीन शर्तें थीं, उन सब पर बाऊजी खरे नहीं उतरते थे। 


निराश हो गए। मौक़ा भी हाथ आया तो ऐसा कि खेल शुरू होने से पहले ही हार गए। 


फिर उन्होंने सोचा कि नियति भी कोई चीज़ होती है। क्या ज़रूरत थी मंत्री जी को उनके दफ़्तर तक आने की? क्यों उन्होंने बाऊजी के बारे में सोचा? बाऊजी न तो उनके परिवार के सदस्य थे, न पड़ोसी, न जान-पहचान, न रोज़ का उठना-बैठना। अख़बार में उनके स्वर्ण पदक की ख़बर थी। बस उतना हीकाफ़ी था उनके लिए अपने गाँव के एक होनहार छात्र की मदद करने के लिए। 


सो बाऊजी ने मंत्री जी के परिश्रम का निरादर न करते हुए फ़ार्म भरकर भेज दिया। बाऊजी का चयन हो गया। पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ। 


यह थी इस फ़ोटो के पीछे की कहानी। 


राहुल उपाध्याय । 23 अप्रैल 2020 । सिएटल