Friday, May 8, 2026

VRP

मई का महीना कितना रोचक है। सन 55 में मम्मी की शादी हुई। 2023 में मेरा तलाक। 2020 में मुझे माइक्रोसॉफ़्ट में कहा गया कि मैं अपने जिंदगी के सफर की कहानी लिखूं। और इसी मई के महीने में आज मुझसे कहा गया कि मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ सकता हूँ और उसके बदले में मुझे एक लाख डॉलर मिलेंगे। यानी एक करोड़ रुपए, यह कम भी है और एक तरह से नहीं भी। एक करोड़ रुपए बहुत होते हैं, पर एक लाख डॉलर कुछ भी नहीं। टैक्स के बाद यह हो जाएगा $70,000 या ₹70 लाख। उतने में तो मैंने अभी टेस्ला ही ली थी। एक टेस्ला के बदले नौकरी कैसे छोड़ दूँ? 


यह ले-ऑफ नहीं है। ले-ऑफ में आपके पास अपना निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। एकतरफा निर्णय होता है कि अब आपकी नौकरी नहीं है। अब आप यहां से चले जाइए। यहां निर्णय मेरे हाथों में है। मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ूं, चाहूं तो ना छोड़ूं। पर लोग कह रहे हैं कि अभी तो एक करोड़ रूपए या एक लाख डॉलर मिल रहे हैं। बाद में अगर कुछ हुआ तो शायद कुछ भी ना मिले। खैर, मुझे तो इसमें कोई रुचि नहीं है। टेस्ला मेरे पास है ही और 70 लाख रुपए या 70,000 डॉलर की मेरे जीवन में कोई कीमत नहीं है। 


मैं सन 2008 से ही धन कमाने की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुका हूं। तब तो जबकि ज्यादा जरूरत भी थी, बच्चे छोटे थे, उन्हें कॉलेज भेजना था। तब भी धन कमाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस हो रही थी। अब तो जबकि मैं अकेला हूं, सिर्फ अपनी ही देखभाल करनी है। तब तो और भी आवश्यकता नहीं है। न कोई घर का किराया है, न कोई ज्यादा खर्च। 


पिछले दिनों माइक्रोसॉफ़्ट का स्टॉक बहुत गिरा है। पिछले अक्टूबर से लेकर अभी तक मेरे खाते में कुल साढ़े तीन लाख डॉलर की गिरावट आई है। एक लाख डालर तो कुछ भी नहीं है। 


लोग कहते हैं कि ऐसी बातें ना कहनी चाहिए, ना लिखनी चाहिए, इतने विस्तार से। नजर लग सकती है। देखिए आगे क्या होता है। 


हैं दामन पे जो दाग मेरे

मैं उनसे हुआ अमीर हूँ 


तुम मिले, मुझे सब मिला

मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ


राहुल उपाध्याय । 7 मई 2026 । सिएटल 




Saturday, May 2, 2026

एक दिन

साई पल्लवी और जुनैद खान अभिनीत नई फिल्म "एक दिन" बहुत ही अच्छी फिल्म है। सिर्फ दो घंटे की है, जो कि आजकल चार घंटे चलने वाली फिल्मों के बजाय काफी अच्छी है और पूरी फिल्म एक ही विषय पर केंद्रित है। इधर-उधर की बातों में भटकती नहीं है। हाँ, हालांकि एक अंग्रेजी फिल्म ‘वन डे’ पर आधारित है, लेकिन फिर भी बहुत अच्छी है। मैंने मूल फिल्म देखी नहीं है, पर जो भी हो, बहरहाल बहुत ही अच्छी फिल्म है। 


फिल्म का विषय यह सोचने पर बाध्य करता है कि हमें सब कुछ पूरे जीवन ही क्यों चाहिए? एक जीवन भी कई बार पूरा नहीं पड़ता है, पर एक जीवन की सीमा तो है ही। तो कभी अगर एक दिन की ही सीमा हो तो क्या बुरा है? क्यों हम चाहें कि हम पेरिस में पूरे जीवन रहें? क्यों नहीं एक दिन ही काफी है? 


इसी तरह किसी का साथ एक दिन, 50 दिन या पाँच साल ही रहे तो भी क्या बुरा है? क्यों पूरे जीवन साथ रहने की जिद है? 


फिल्म की पटकथा में कुछ खामियां जरूर हैं, लेकिन वो सब नजरअंदाज की जा सकती हैं। 


साई पल्लवी का अभिनय बहुत ही दमदार है। 


इस फिल्म की वजह से शायद लोग अब जापान ठंड के दिनों में जाने की कोशिश करेंगे, और यह एक नया स्विट्जरलैंड साबित हो सकता है। 


राहुल उपाध्याय । 2 मई 2026 । सिएटल