कोई भी रिश्ता रूहानी नहीं होता। रिश्ते होते ही जिस्म से हैं। भाषा से, बातचीत से, खानपान से, कपड़ों से, ज़ुल्फ़ों से, चैट से, व्हाट्सेप से, फ़ेसबुक से। इन सबके लिए जिस्म चाहिए। हाँ, रिश्ते स्पर्शहीन हो सकते हैं। रूहानी नहीं।
और हर रिश्ता जितना सुहाना होता है उतना ही दुख भी देता है।
यह सब पहली मोहब्बत में पता नहीं होता है। पता चलने के बाद भी दूसरी-तीसरी-चौथी मोहब्बत से इंसान बाज नहीं आता। ऐसा तो है नहीं कि उस गली या उस बाज़ार या उस दुकान पर जाना छोड़ दे तो मोहब्बत नहीं होगी। दारू-सिगरेट की तरह नहीं है कि ख़रीदोगे ही नहीं तो पियोगे कहाँ से।
सो मोहब्बत होती रहती है, दुख होता रहता है। चोट लगती रहती है। दर्द भरे गीत अच्छे लगते रहते हैं। कभी-कभी, सिलसिला, 8 ए-एम मेट्रो मलहम लगाती रहती हैं। ज़ख़्म ताज़ा करती रहती हैं।
कभी कोई कहानी आठ दिन की होती है। कोई तीन हफ़्ते की।
यह कहानी ग्यारह महीनों की है।
वह किसी से बात नहीं करती थी। बात करना उसे पसन्द नहीं है। जब मैंने उससे पहली बार बात की तो मैं समझ रहा था कि मैं उसकी बड़ी बहन से बात कर रहा हूँ। मुझे किसी के नाम ठीक से याद नहीं रहते हैं। कौन विभा है और कौन विनीता मुझे आज भी नहीं पता। कौन विनीत और वेंकट, इसमें भी बेहद कन्फ्यूज़न है।
वह समझी मैं उसी से बात कर रहा हूँ।
हमने हमेशा फ़ोन पर ही बातें की। हम कभी मिले नहीं। मिलते भी कैसे? वह सुदूर उस देश में और मैं इस देश में। हम दिन में दो बार गुड मार्निंग और गुड नाइट कहते थे। मैं उसे जगाता था। वह मुझे।
न जाने कैसे हमें एक दूसरे से प्यार हो गया था। हम दोनों ने एक दूसरे के प्यार भरे नाम भी रख लिए थे। मैं जानता था कि हम कभी एक दूसरे के नहीं हो पाएंगे। लाख बातें कर लो पर उम्र का ख़याल तो रखना ही पड़ता है। मैंने उससे कहा कि उसे जल्दी से एक साथी बना लेना चाहिए जिसे वो गले लगा सके, उसे बाँहों में ले सके, वो उसे गले लगा सके, बाँहों में ले सके, साथ सो सके, वो सब शादी से पहले कर सके जो लोग शादी के बाद करते हैं। ऐसा भी नहीं कि उससे शादी ही करनी है, जीवन भर साथ रहने की क़समें खानी है। दो महीने रिश्ता चले तो ठीक। दो साल चले तो ठीक। पूरी ज़िंदगी चले तो ठीक। और न चले तो कोई ग़म नहीं। कोई दूसरा मिलेगा। न मिले तो भी ग़म नहीं। लोग बातें बनाएँ तो बनाने दो। हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, और भी कई लोगों को क्या फ़र्क़ पड़ गया? ज़माना हमेशा कुछ न कुछ कहता रहा है। करने वाले अपने मन की करते रहे हैं। हाँ, लेकिन किसी ने भी कोई ग़ैर क़ानूनी कार्य नहीं किया। प्यार करना कोई गुनाह नहीं है। अपराध नहीं है। एक से या दस से। या किसी से भी नहीं।
मैंने उसे वैलेंटाइन डे तक की चुनौती दी थी। उसने ये सब जनवरी में ही कर के दिखा दिया। बहुत साहसी और हिम्मती थी वह। अनुशासन प्रिय और ज़बान की पक्की। मैंने कहा कि कल कोई कहे कि तुमने यह सब क्यों किया? किसके कहने पर किया? तो क्या कहोगी? कहने लगी कि मैं सब अपने पर लूँगी। मुझे अच्छे-बुरे की समझ है। नहीं है तो होनी चाहिए। मैं अपना हित-अहित भलीभाँति जानती हूँ। मैं जो करती हूँ सोच समझ कर करती हूँ। कुछ अच्छा हुआ तो मैं ज़िम्मेदार हूँ। कुछ बुरा हुआ तो मैं ज़िम्मेदार हूँ।
वह बहुत समझदार थी। मेरे बारे में चिंतित रहती थी। कहती थी आपने मुझे इतना प्यार दिया, आपको क्या मिला। मुझे आपने एक साथी भी दिया जो मुझे बहुत प्यार करता है। जब वो प्यार करता है मैं सोचती हूँ आप पर क्या गुज़र रही होगी? आप कैसे यह सब ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लेते हो? यह कैसा प्यार है आपका? मैं खुश तो आप खुश। झूठ बोलते हो आप। शादी क्यों नहीं कर लेते?
(मैंने उसे अपनी पूरी कहानी बता रखी थी। हम दोनों एक दूसरे से कोई भी बात नहीं छुपाते थे।
मुझे एक लड़की बहुत प्यार करती थी। जब हम मिले तब हम स्कूल में थे। मैं नागपुर में था। वह पुणे में। मैं दसवीं में था। वह आठवीं में। हम सिर्फ आठ दिन के लिए मिले थे। मैं अपने मित्र की बहन की शादी में गया था। उसके पड़ोस में दिव्या रहती थी। वह भी गानों की शौक़ीन थी। मैं भी। वह बातें बहुत करती थी। बहुत प्यारी बातें करती थी। मैं सवाल बहुत करता था। ऐसे सवाल जो किसी ने कभी उससे नहीं पूछे थे। बाद में हम ख़त लिखने लगे। ख़त में वो खुले आम अपने प्यार का इज़हार करने लगी थी। हम अब बड़े हो गए थे। मैं होस्टल चला गया था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह लिखने लगी कि माँ को पता चल गया है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ। वे कह रही हैं कि तुम अपने घरवालों से हमारी शादी की बात करो। मेरे हाथ-पाँव फूल गए। अभी पढ़ाई ख़त्म नहीं हुई है। नौकरी का कोई भरोसा नहीं। इसे कहाँ रखूँगा?
मैं डर गया और उस दिन के बाद से उसे एक भी ख़त नहीं लिखा। वह लिखती रही। मैं पढ़ता रहा। नौकरी का ऑफ़र आ गया। लेकिन विदेश में आगे पढ़ने का भी सुनहरा अवसर गँवाना नहीं चाहता था सो नौकरी नहीं की। दिव्या को कुछ नहीं बताया और अमेरिका चला आया।
लगता है मैंने उसके साथ बहुत बुरा किया। इसीलिए उसके बाद से मुझे कई साथी मिले। बहुत प्यार मिला। पर कोई भी टिका नहीं। सब के सब बिछड़ते गए बारी-बारी।
कुछ से मैंने शादी की बात भी चलाई पर हो नहीं पाई।)
बस ऐसे ही बात करते-करते रो पड़ती थी। फिर कहती थी कोई बात नहीं। जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँगी मैं आपको अपने साथ रख लूँगी। मैं कहता था कि मैं अभी तीस साल और जीऊँगा। रख सकोगी इतने साल? कहती थी हाँ क्यों नहीं। आप मेरे बच्चों का ख़याल रखना। जब मैं काम से आऊँगी हम मिल कर खाना बनाएँगे और गप्पें हाँकेंगे।
फिर ऐसा हुआ कि मिलने का मौक़ा मिल गया। कहने लगी आप होटल में ठहरना मैं मिलने आ जाया करूँगी। मैंने कहा मुझे होटल पसन्द नहीं। जहां तक हो सके परिचितों के यहाँ ठहरता हूँ। तुम वही मिलने आ जाना। हम फिर कहीं घूमने-खाने-पीने भी जा सकते हैं। किसी तरह मान गई। वह पी-जी में रहती थी जहां लड़कों का आना सख़्त मना था।
मैं बम्बई में रूक गया था कुछ काम से। और वो हाय-तौबा करने लगी कब आ रहे हो इटारसी। मेरी तो जान ही निकल रही है और वहाँ कैसे मौज उड़ा रहे हो। जल्दी बताओ कब ट्रेन आ रही है। कब पहुँच रहे हो।
मैंने झूठ कह दिया कि फ़लाँ दिन आ रहा हूँ। और दो दिन पहले ही निकल गया। ट्रेन में होने की वजह से उसका फ़ोन मेरे पास नहीं आ सका तो उसने दुनिया भर में फ़ोन कर डाले और मेरे दोस्त से उगलवा लिया कि मैं निकल चुका हूँ।
मैं उसे सरप्राइज़ देने वाला था। और उसे पता चल चुका था। फिर भी मेरा हौसला बनाए रखने के लिए वह नाटक करती रही और मुझे अपने पी-जी होस्टल का हुलिया समझाने लगी ताकि मुझे ढूँढने में परेशानी न हो।
मैं भी अब कुछ-कुछ समझ गया था कि क्या चल रहा है। मेरे बम्बई और इटारसी वाले मेज़बान हैरान थे कि आज के ज़माने में कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है। वह भी खुले आम। उन्हें उम्र का पता नहीं था वरना हार्ट अटैक ही हो जाता।
मैं पी-जी पहुँच गया। और सीधे उसके कमरे में। उसने कमरे तक का रास्ता नहीं बताया था पर वीडियो कॉल से कुछ अंदाज़ा तो लग गया था।
कमरे में फ़ोन के स्पीकर पर गाना चल रहा था। क्या यही प्यार है। दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं। वक्त गुज़रता नहीं। क्या यही प्यार है। हाँ, हाँ, यही प्यार है।
वह पलंग पर बैठी कुछ नोट्स बना रही थी। मैंने पीछे से अपनी हथेलियों से उसकी आँखें बंद कर दीं।
वह ख़ुशी से चीख पड़ी। उसने मुझे पहचान लिया था। मैंने उसका मुँह बंद किया। शोर मत करो कोई आ जाएगा। मैं चुपके से आया हूँ। उसने खुद को सम्भालते हुए कहा, पर तुम आए कैसे? यहाँ तो कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
मैंने कहा, बस यही प्यार है। और हम दोनों ज़ोर से हँस पड़े। मैं जब हँसता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे रावण अट्टहास कर रहा हो। इस बार उसने मेरा मुँह बंद किया।
मैंने उसे गले लगाते हुए कहा। प्यार किया तो डरना क्या। प्यार किया कोई चोरी नहीं की। छुप-छुप आहें भरना क्या।
वह कहने लगी, देखो हमारा प्यार कितना सच्चा है। जब तुम आए यही गाना क्यों बज रहा था? क्योंकि ये तो होना ही था। एक मैं और एक तू। दोनों मिले इस तरह। और जो तन-मन में हो रहा है। ये तो होना ही था।
बस यह सब तेरह मिनट में समाप्त होना था। सो हो गया।
लेकिन उन तेरह मिनटों में मानो मैंने कई जीवन जी लिए। पहले तो यह कि जिसकी सेल्फ़ी से मेरी गुगल ड्राइव भरी पड़ी है एक जीती-जागती गुड़िया है। मैं उसे चिढ़ाता था कि तुम्हारे सारे फ़ोटो में फ़िल्टर लगा हुआ है। तुम इतनी सुन्दर हो ही नहीं सकती। देखा तो वह वाक़ई में बहुत सुन्दर थी।
हम दोनों उसके प्रेमी विनोद से मिलने गए। खूब फ़ोटो खींचें। खूब मौज-मस्ती की। खूब मज़ाक़ किया। खूब हँसे। मैं मेज़बान के घर आकर रो सकता था। नहीं रोया। बहुत ही समझदार हूँ मैं।
दो दिन बाद हम सदा के लिए जुदा हो गए।
मेरी शर्ट उसने धो कर अच्छे इस्त्री कर आंसुओं से भीगो दी थी। वह शर्ट मैंने क़रीब एक साल तक नहीं पहनी। उसके सूखे आंसुओं को टटोलता रहा। एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की परेशानियों को समझने का प्रयास करता रहा। वह घरवालों को यदि यह बता देती कि हमारा कोई चक्कर नहीं है। इनके सहयोग से ही आज मैं विनोद के साथ खुश हूँ तो स्थिति सुधर सकती थी। नहीं, कैसे सुधर सकती थी। उल्टा उस पर और मुझ पर गाज गिरती कि शादी से पहले यह सब कौन करता है और कौन बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा करने को प्रेरित करता है?
मुझे दुख भी हुआ कि उसे खो दिया। ख़ुशी भी हुई कि हमारा प्यार इतना प्रबल था कि छुप न सका। और इसकी सज़ा भी मिली। हम आधुनिक दुनिया के लैला-मजनू बन गए। ज़िन्दगी बेकार नहीं गई।
उस शर्ट के साथ उसने एक ख़त भी दिया। बहुत छुपा कर मेरे बैग में रख दिया था।
आज मैं यह ख़त रंगों से नहीं भर रही हूँ। पहली बात तो यह कि सारे रंग होस्टल में है। दूसरी बात यह है कि मैंने तुम्हारा वक्त बर्बाद किया। तुम्हारी यात्रा ख़राब की। इतना हंगामा कर के बुलाया और अंत में दुख ही दिया।
मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। मैं स्वभाव से ख़ुशमिज़ाज हूँ। मैं चाहती हूँ कि सब ख़ुश रहे। जब मुझे पता चला कि तुम आ रहे हो तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। मैं सातवें आसमान पर थी।
मैं जो आज तुम्हें छोड़ कर जा रही हूँ यह अपने मन से नहीं कर रही हूँ। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी हैं। मुझे पता होता तो मैं तुम्हें कभी नहीं बुलाती। मुझे माफ़ कर दो। आय एम वेरी सॉरी।
मैं जानती हूँ कि तुम जानते हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ। यह दुनिया बहुत बुरी है। मुझे अब समझ आया। तुम जितनी जल्दी हो सके यहाँ से वापस चले जाओ। तुम्हें अपने देश में ही शांति मिलेगी। यहाँ के लोग बहुत बुरे हैं।
मैं कल रात बहुत रोई। मैं जल्दी सोने चली गई थी। सोने नहीं, रोने गई थी। तुम एक पवित्र आत्मा हो और सीधी बात करते हो। लेकिन यहाँ के लोगों को बनावटीपन पसन्द है।
मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। मैंने तुम्हें गले लगाया, मैंने तुम्हें छुआ, मैंने तुम्हें महसूस किया, यही मेरे लिए बहुत है।
आज का दिन मेरे लिए बहुत बड़ा दिन है। मैं हमेशा से ही अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। लेकिन आज मेरी इच्छा और प्रबल हो गई है।
न मैं तुम्हारी मदद चाहती हूँ। न अपने घरवालों की। मैं अपने आप से कुछ बनना चाहती हूँ। जब मैं कुछ बन जाऊँगी तब हम फिर मिलेंगे।
यहाँ कोई अच्छे दिल का नहीं है। मैं सबको जानती हूँ। तुम बहुत भोले हो। इधर अब कभी मत आना।
याद रखना, मैं तुम्हारा प्यार हूँ, तुम मेरे प्यार हो, आय एम योर सनशाइन, योर ओनली सनशाइन, आय विल आलवेज़ शाइन ऑन यू।
देखना एक दिन तुम्हें मुझ पर बहुत गर्व होगा।
ये दिन, ये मुलाक़ात, ये हग्स, ये किसेस मुझे हमेशा मोटिवेट करते रहेंगे।
आय एम योर सनशाइन एण्ड आलवेज़ विथ यू।
लव यू
राहुल उपाध्याय । 24 जुलाई 2024 । ऐमस्टरडम