Friday, July 26, 2024

येमेन

हमने रात्रि का भोजन येमेन रेस्टोरेन्ट में किया। नीली प्लास्टिक (पन्नी) जो दिख रही है उस पर ही खाना खाया जाता है। कोई प्लेट नहीं मिलती है। न चीनी की। न प्लास्टिक की। 


पूरी टेबल पर एक बड़ी प्लास्टिक। सबके लिए अलग नहीं। 


रोटी भी इतनी बड़ी है कि हाथ से तोड़ कर शेयर करनी पड़ती है। 


ऐसा माहौल दिल को छू गया। पहली बार ज़िन्दगी में ऐसा देखा। बचपन की याद आ गई जब सैलाना में हम सात-आठ भाई बहन एक ही थाली में साथ खाते थे। तीन सेकेंड में एक रोटी ग़ायब हो जाती थी। कुछ खा पाते थे। कुछ मुँह ताकते रहते रहते थे। चम्मच तो होता नहीं था कि बिना रोटी के भी कुछ खा लो। 


रेस्टोरेन्ट में चम्मच और काँटे ज़रूर दिए गए। मेरे विचार से उन्हें भी हटा देना चाहिए। रोटी तो हाथ से ही खाई जाती है। चावल भी खाए जा सकते हैं। 

अजय ब्रह्मात्मज

अजय ब्रह्मात्मज जी से कल ऐम्स्टरडम में अचानक मुलाक़ात हो गई। अप्रत्याशित। अप्रत्याशित घटनाएँ ही मेरे जीवन का हासिल रही हैं। 


मेरा परिचय उनसे तब से हैं जब 2008 में अमिताभ बच्चन के ब्लॉग का हिन्दी अनुवाद किया करता था। ब्रह्मात्मज जी इतने सजग पत्रकार हैं कि उन्हें भनक लग गई और भारत से ही मेरा फ़ोन पर साक्षात्कार ले लिया। उस ज़माने में व्हाटसेप या मैसेंजर आदि की सुविधाएँ नहीं थी कि फ़्री में कॉल हो सके। 


साक्षात्कार आज भी पढ़ा जा सकता हैः

http://www.chavannichap.com/2008/10/blog-post_09.html?m=1


मेरा अनुवाद भीः

http://amitabhkablog-hindi.blogspot.com/?m=1


उस साक्षात्कार की ख़ास उपलब्धि है पाठकों की टिप्पणियाँ। उनमें से एक यूनुस खान जी की भी है। और रवि रतलामी जी की भी। 


यूनुस खान आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण से बहुत वर्षों से जुड़े हैं एवं उम्दा कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। समाचार पत्रों में स्तम्भ भी लिखे हैं। विविध भारती पर उनकी आवाज़ रोज़ सुनी जा सकती है। फ़ेसबुक पर उनकी उम्दा पोस्ट रोज़ पढ़ी जा सकती हैं। 


रवि रतलामी जी ने कई बरसों तक रतलाम में काम किया सो रतलामी उपनाम जोड़ लिया। वैसे रवि श्रीवास्तव थे। भोपाल में उनके यहाँ रहने का भी मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। आय-टी क्षेत्र के न होते हुए भी उन्होंने हिन्दी में ब्लॉग लेखन को बहुत बढ़ावा दिया। सबको प्रोत्साहित करते रहें। एवं हर किसी समस्या का हल ढूँढते रहे। सबको बताते रहें। इंटरनेट पर पहली बार हिन्दी में रामचरितमानस उपलब्ध कराने का बीड़ा उन्होंने उठाया था और वह कार्य पूरा भी किया। 


उनके एक आलेख में उन्होंने मुझे याद भी किया। 

https://raviratlami.blogspot.com/2017/01/blog-post_4.html?m=1#more


अजय ब्रह्मात्मज जी मुम्बई में रहते हैं एवं सिने जगत की रिपोर्ट लिखते रहते हैं। पहले ब्लॉग लिखते थे, अख़बारों में छपते थे। अब यूट्यूब और फ़ेसबुक पर सक्रिय हैं। यह उनका चैनल हैः


https://m.youtube.com/@CineMahaul



Tuesday, July 23, 2024

रूहानी

कोई भी रिश्ता रूहानी नहीं होता। रिश्ते होते ही जिस्म से हैं। भाषा से, बातचीत से, खानपान से, कपड़ों से, ज़ुल्फ़ों से, चैट से, व्हाट्सेप से, फ़ेसबुक से। इन सबके लिए जिस्म चाहिए। हाँ, रिश्ते स्पर्शहीन हो सकते हैं। रूहानी नहीं। 


और हर रिश्ता जितना सुहाना होता है उतना ही दुख भी देता है। 


यह सब पहली मोहब्बत में पता नहीं होता है। पता चलने के बाद भी दूसरी-तीसरी-चौथी मोहब्बत से इंसान बाज नहीं आता। ऐसा तो है नहीं कि उस गली या उस बाज़ार या उस दुकान पर जाना छोड़ दे तो मोहब्बत नहीं होगी। दारू-सिगरेट की तरह नहीं है कि ख़रीदोगे ही नहीं तो पियोगे कहाँ से। 


सो मोहब्बत होती रहती है, दुख होता रहता है। चोट लगती रहती है। दर्द भरे गीत अच्छे लगते रहते हैं। कभी-कभी, सिलसिला, 8 ए-एम मेट्रो मलहम लगाती रहती हैं। ज़ख़्म ताज़ा करती रहती हैं।  


कभी कोई कहानी आठ दिन की होती है। कोई तीन हफ़्ते की।


यह कहानी ग्यारह महीनों की है। 


वह किसी से बात नहीं करती थी। बात करना उसे पसन्द नहीं है। जब मैंने उससे पहली बार बात की तो मैं समझ रहा था कि मैं उसकी बड़ी बहन से बात कर रहा हूँ। मुझे किसी के नाम ठीक से याद नहीं रहते हैं। कौन विभा है और कौन विनीता मुझे आज भी नहीं पता। कौन विनीत और वेंकट, इसमें भी बेहद कन्फ्यूज़न है।  


वह समझी मैं उसी से बात कर रहा हूँ। 


हमने हमेशा फ़ोन पर ही बातें की। हम कभी मिले नहीं। मिलते भी कैसे? वह सुदूर उस देश में और मैं इस देश में। हम दिन में दो बार गुड मार्निंग और गुड नाइट कहते थे। मैं उसे जगाता था। वह मुझे। 


न जाने कैसे हमें एक दूसरे से प्यार हो गया था। हम दोनों ने एक दूसरे के प्यार भरे नाम भी रख लिए थे। मैं जानता था कि हम कभी एक दूसरे के नहीं हो पाएंगे। लाख बातें कर लो पर उम्र का ख़याल तो रखना ही पड़ता है। मैंने उससे कहा कि उसे जल्दी से एक साथी बना लेना चाहिए जिसे वो गले लगा सके, उसे बाँहों में ले सके, वो उसे गले लगा सके, बाँहों में ले सके, साथ सो सके, वो सब शादी से पहले कर सके जो लोग शादी के बाद करते हैं। ऐसा भी नहीं कि उससे शादी ही करनी है, जीवन भर साथ रहने की क़समें खानी है। दो महीने रिश्ता चले तो ठीक। दो साल चले तो ठीक। पूरी ज़िंदगी चले तो ठीक। और न चले तो कोई ग़म नहीं। कोई दूसरा मिलेगा। न मिले तो भी ग़म नहीं। लोग बातें बनाएँ तो बनाने दो। हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, और भी कई लोगों को क्या फ़र्क़ पड़ गया? ज़माना हमेशा कुछ न कुछ कहता रहा है। करने वाले अपने मन की करते रहे हैं। हाँ, लेकिन किसी ने भी कोई ग़ैर क़ानूनी कार्य नहीं किया।  प्यार करना कोई गुनाह नहीं है। अपराध नहीं है। एक से या दस से। या किसी से भी नहीं।  


मैंने उसे वैलेंटाइन डे तक की चुनौती दी थी। उसने ये सब जनवरी में ही कर के दिखा दिया। बहुत साहसी और हिम्मती थी वह। अनुशासन प्रिय और ज़बान की पक्की। मैंने कहा कि कल कोई कहे कि तुमने यह सब क्यों किया? किसके कहने पर किया? तो क्या कहोगी? कहने लगी कि मैं सब अपने पर लूँगी। मुझे अच्छे-बुरे की समझ है। नहीं है तो होनी चाहिए। मैं अपना हित-अहित भलीभाँति जानती हूँ। मैं जो करती हूँ सोच समझ कर करती हूँ। कुछ अच्छा हुआ तो मैं ज़िम्मेदार हूँ। कुछ बुरा हुआ तो मैं ज़िम्मेदार हूँ। 


वह बहुत समझदार थी। मेरे बारे में चिंतित रहती थी। कहती थी आपने मुझे इतना प्यार दिया, आपको क्या मिला। मुझे आपने एक साथी भी दिया जो मुझे बहुत प्यार करता है। जब वो प्यार करता है मैं सोचती हूँ आप पर क्या गुज़र रही होगी? आप कैसे यह सब ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लेते हो? यह कैसा प्यार है आपका? मैं खुश तो आप खुश। झूठ बोलते हो आप। शादी क्यों नहीं कर लेते?


(मैंने उसे अपनी पूरी कहानी बता रखी थी। हम दोनों एक दूसरे से कोई भी बात नहीं छुपाते थे। 


मुझे एक लड़की बहुत प्यार करती थी। जब हम मिले तब हम स्कूल में थे। मैं नागपुर में था। वह पुणे में। मैं दसवीं में था। वह आठवीं में। हम सिर्फ आठ दिन के लिए मिले थे। मैं अपने मित्र की बहन की शादी में गया था। उसके पड़ोस में दिव्या रहती थी। वह भी गानों की शौक़ीन थी। मैं भी। वह बातें बहुत करती थी। बहुत प्यारी बातें करती थी। मैं सवाल बहुत करता था। ऐसे सवाल जो किसी ने कभी उससे नहीं पूछे थे। बाद में हम ख़त लिखने लगे। ख़त में वो खुले आम अपने प्यार का इज़हार करने लगी थी। हम अब बड़े हो गए थे। मैं होस्टल चला गया था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह लिखने लगी कि माँ को पता चल गया है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ। वे कह रही हैं कि तुम अपने घरवालों से हमारी शादी की बात करो। मेरे हाथ-पाँव फूल गए। अभी पढ़ाई ख़त्म नहीं हुई है। नौकरी का कोई भरोसा नहीं। इसे कहाँ रखूँगा? 


मैं डर गया और उस दिन के बाद से उसे एक भी ख़त नहीं लिखा। वह लिखती रही। मैं पढ़ता रहा। नौकरी का ऑफ़र आ गया। लेकिन विदेश में आगे पढ़ने का भी सुनहरा अवसर गँवाना नहीं चाहता था सो नौकरी नहीं की। दिव्या को कुछ नहीं बताया और अमेरिका चला आया। 


लगता है मैंने उसके साथ बहुत बुरा किया। इसीलिए उसके बाद से मुझे कई साथी मिले। बहुत प्यार मिला।  पर कोई भी टिका नहीं। सब के सब बिछड़ते गए बारी-बारी। 


कुछ से मैंने शादी की बात भी चलाई पर हो नहीं पाई।)


बस ऐसे ही बात करते-करते रो पड़ती थी। फिर कहती थी कोई बात नहीं। जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँगी मैं आपको अपने साथ रख लूँगी। मैं कहता था कि मैं अभी तीस साल और जीऊँगा। रख सकोगी इतने साल? कहती थी हाँ क्यों नहीं। आप मेरे बच्चों का ख़याल रखना। जब मैं काम से आऊँगी हम मिल कर खाना बनाएँगे और गप्पें हाँकेंगे। 


फिर ऐसा हुआ कि मिलने का मौक़ा मिल गया। कहने लगी आप होटल में ठहरना मैं मिलने आ जाया करूँगी। मैंने कहा मुझे होटल पसन्द नहीं। जहां तक हो सके परिचितों के यहाँ ठहरता हूँ। तुम वही मिलने आ जाना। हम फिर कहीं घूमने-खाने-पीने भी जा सकते हैं। किसी तरह मान गई। वह पी-जी में रहती थी जहां लड़कों का आना सख़्त मना था।  


मैं बम्बई में रूक गया था कुछ काम से। और वो हाय-तौबा करने लगी कब आ रहे हो इटारसी। मेरी तो जान ही निकल रही है और वहाँ कैसे मौज उड़ा रहे हो। जल्दी बताओ कब ट्रेन आ रही है। कब पहुँच रहे हो। 


मैंने झूठ कह दिया कि फ़लाँ दिन आ रहा हूँ। और दो दिन पहले ही निकल गया। ट्रेन में होने की वजह से उसका फ़ोन मेरे पास नहीं आ सका तो उसने दुनिया भर में फ़ोन कर डाले और मेरे दोस्त से उगलवा लिया कि मैं निकल चुका हूँ। 


मैं उसे सरप्राइज़ देने वाला था। और उसे पता चल चुका था। फिर भी मेरा हौसला बनाए रखने के लिए वह नाटक करती रही और मुझे अपने पी-जी होस्टल का हुलिया समझाने लगी ताकि मुझे ढूँढने में परेशानी न हो। 


मैं भी अब कुछ-कुछ समझ गया था कि क्या चल रहा है। मेरे बम्बई और इटारसी वाले मेज़बान हैरान थे कि आज के ज़माने में कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है। वह भी खुले आम। उन्हें उम्र का पता नहीं था वरना हार्ट अटैक ही हो जाता। 


मैं पी-जी पहुँच गया। और सीधे उसके कमरे में। उसने कमरे तक का रास्ता नहीं बताया था पर वीडियो कॉल से कुछ अंदाज़ा तो लग गया था। 


कमरे में फ़ोन के स्पीकर पर गाना चल रहा था। क्या यही प्यार है। दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं। वक्त गुज़रता नहीं। क्या यही प्यार है। हाँ, हाँ, यही प्यार है।  


वह पलंग पर बैठी कुछ नोट्स बना रही थी। मैंने पीछे से अपनी हथेलियों से उसकी आँखें बंद कर दीं। 


वह ख़ुशी से चीख पड़ी। उसने मुझे पहचान लिया था। मैंने उसका मुँह बंद किया। शोर मत करो कोई आ जाएगा। मैं चुपके से आया हूँ। उसने खुद को सम्भालते हुए कहा, पर तुम आए कैसे? यहाँ तो कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता। 


मैंने कहा, बस यही प्यार है। और हम दोनों ज़ोर से हँस पड़े। मैं जब हँसता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे रावण अट्टहास कर रहा हो। इस बार उसने मेरा मुँह बंद किया। 


मैंने उसे गले लगाते हुए कहा। प्यार किया तो डरना क्या। प्यार किया कोई चोरी नहीं की। छुप-छुप आहें भरना क्या। 


वह कहने लगी, देखो हमारा प्यार कितना सच्चा है। जब तुम आए यही गाना क्यों बज रहा था? क्योंकि ये तो होना ही था। एक मैं और एक तू। दोनों मिले इस तरह। और जो तन-मन में हो रहा है। ये तो होना ही था। 


बस यह सब तेरह मिनट में समाप्त होना था। सो हो गया। 


लेकिन उन तेरह मिनटों में मानो मैंने कई जीवन जी लिए। पहले तो यह कि जिसकी सेल्फ़ी से मेरी गुगल ड्राइव भरी पड़ी है एक जीती-जागती गुड़िया है। मैं उसे चिढ़ाता था कि तुम्हारे सारे फ़ोटो में फ़िल्टर लगा हुआ है। तुम इतनी सुन्दर हो ही नहीं सकती। देखा तो वह वाक़ई में बहुत सुन्दर थी। 


हम दोनों उसके प्रेमी विनोद से मिलने गए। खूब फ़ोटो खींचें। खूब मौज-मस्ती की। खूब मज़ाक़ किया। खूब हँसे। मैं मेज़बान के घर आकर रो सकता था। नहीं रोया। बहुत ही समझदार हूँ मैं। 


दो दिन बाद हम सदा के लिए जुदा हो गए। 


मेरी शर्ट उसने धो कर अच्छे इस्त्री कर आंसुओं से भीगो दी थी। वह शर्ट मैंने क़रीब एक साल तक नहीं पहनी। उसके सूखे आंसुओं को टटोलता रहा। एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की परेशानियों को समझने का प्रयास करता रहा। वह घरवालों को यदि यह बता देती कि हमारा कोई चक्कर नहीं है। इनके सहयोग से ही आज मैं विनोद के साथ खुश हूँ तो स्थिति सुधर सकती थी। नहीं, कैसे सुधर सकती थी। उल्टा उस पर और मुझ पर गाज गिरती कि शादी से पहले यह सब कौन करता है और कौन बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा करने को प्रेरित करता है? 


मुझे दुख भी हुआ कि उसे खो दिया। ख़ुशी भी हुई कि हमारा प्यार इतना प्रबल था कि छुप न सका। और इसकी सज़ा भी मिली। हम आधुनिक दुनिया के लैला-मजनू बन गए। ज़िन्दगी बेकार नहीं गई। 


उस शर्ट के साथ उसने एक ख़त भी दिया। बहुत छुपा कर मेरे बैग में रख दिया था। 


आज मैं यह ख़त रंगों से नहीं भर रही हूँ। पहली बात तो यह कि सारे रंग होस्टल में है। दूसरी बात यह है कि मैंने तुम्हारा वक्त बर्बाद किया।  तुम्हारी यात्रा ख़राब की। इतना हंगामा कर के बुलाया और अंत में दुख ही दिया। 


मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। मैं स्वभाव से ख़ुशमिज़ाज हूँ। मैं चाहती हूँ कि सब ख़ुश रहे। जब मुझे पता चला कि तुम आ रहे हो तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। मैं सातवें आसमान पर थी। 


मैं जो आज तुम्हें छोड़ कर जा रही हूँ यह अपने मन से नहीं कर रही हूँ। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी हैं। मुझे पता होता तो मैं तुम्हें कभी नहीं बुलाती। मुझे माफ़ कर दो। आय एम वेरी सॉरी। 


मैं जानती हूँ कि तुम जानते हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ। यह दुनिया बहुत बुरी है। मुझे अब समझ आया। तुम जितनी जल्दी हो सके यहाँ से वापस चले जाओ। तुम्हें अपने देश में ही शांति मिलेगी। यहाँ के लोग बहुत बुरे हैं। 


मैं कल रात बहुत रोई। मैं जल्दी सोने चली गई थी। सोने नहीं, रोने गई थी। तुम एक पवित्र आत्मा हो और सीधी बात करते हो। लेकिन यहाँ के लोगों को बनावटीपन पसन्द है।  


मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। मैंने तुम्हें गले लगाया, मैंने तुम्हें छुआ, मैंने तुम्हें महसूस किया, यही मेरे लिए बहुत है। 


आज का दिन मेरे लिए बहुत बड़ा दिन है। मैं हमेशा से ही अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। लेकिन आज मेरी इच्छा और प्रबल हो गई है।


न मैं तुम्हारी मदद चाहती हूँ। न अपने घरवालों की। मैं अपने आप से कुछ बनना चाहती हूँ। जब मैं कुछ बन जाऊँगी तब हम फिर मिलेंगे। 


यहाँ कोई अच्छे दिल का नहीं है। मैं सबको जानती हूँ। तुम बहुत भोले हो। इधर अब कभी मत आना। 


याद रखना, मैं तुम्हारा प्यार हूँ, तुम मेरे प्यार हो, आय एम योर सनशाइन, योर ओनली सनशाइन, आय विल आलवेज़ शाइन ऑन यू। 


देखना एक दिन तुम्हें मुझ पर बहुत गर्व होगा। 


ये दिन, ये मुलाक़ात, ये हग्स, ये किसेस मुझे हमेशा मोटिवेट करते रहेंगे। 


आय एम योर सनशाइन एण्ड आलवेज़ विथ यू। 


लव यू


राहुल उपाध्याय । 24 जुलाई 2024 । ऐमस्टरडम


Saturday, July 20, 2024

एक तरफ़ा टिकट

आमतौर पर मैं एकतरफ़ा टिकट बनाता नहीं हूँ। जहां तक हो सके आने का दिन तय कर के ही टिकट ख़रीदता हूँ। कुछ सस्ता भी पड़ जाता है और फिर घर तो आना ही है। काम भी तो करना है। 


2019 में मम्मी को अमेरिका का वीसा लेने के लिए सैलाना से मुम्बई जाना था इंटरव्यू देने। मैंने सोचा 79 वर्ष की आयु में मम्मी यह काम अकेले नहीं कर पाएँगी। कोई साथ होना चाहिए। मामला अमेरिका का है तो मुझसे बेहतर कौन हो सकता है। सो मैं चला गया इंदौर। मम्मी को इंदौर तक बुआजी की बेटी सीमा ने छोड़ दिया था। वहाँ से मुम्बई हम दोनों प्लेन से जा रहे थे। 


अमेरिका वाले कब वीसा दे, कब न दे, कोई भरोसा नहीं। कोई भी कारण हो सकता है। कई बार कारण बताते भी नहीं। लेकिन ये ज़रूर है कि मनाही हमेशा की नहीं है। किसी आशिक़ की तरह बार-बार गुहार लगाते रहो, इंटरव्यू देते रहो। क्या पता कब ना हाँ में बदल जाए। 


इसलिए मैं एकतरफ़ा टिकट लेकर गया। कि यदि वीसा नहीं मिला तो तब तक नहीं लौटूँगा जब तक वीसा नहीं मिल जाता। 


वीसा पहली बार में ही मिल गया। मम्मी का भी एकतरफ़ा टिकट लिया। पता था कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मम्मी अब बार-बार अमेरिका-भारत-अमेरिका नहीं कर पाएँगी। 


मम्मी के गुज़र जाने के बाद मैं फ़ुरसतिया हो गया। काम भी कहीं से करने की सुविधा मिल गई कोविड की बनिस्बत। जब सिंगापुर से न्यौता आया कि आप एकतरफ़ा टिकट पर आ जाइये। मुझे अजीब लगा। पर मेरी भी आदत है अजीब काम करने की तो मैं भी एकतरफ़ा टिकट पर निकल पड़ा। 


वहाँ से फिर ऐम्स्टरडम का भी टिकट एकतरफ़ा लिया। और ऐम्स्टरडम से सिएटल का भी। 


इतने एकतरफ़ा टिकट लेने के बाद अब तो चस्का लग गया है। आज फिर एकतरफ़ा टिकट पर ऐम्स्टरडम निकल पड़ा। फ़्लाइट फ्रेंकफर्ट हो कर जा रही है। फ्रेकफर्ट तक कोन्डोर एयरलाइंस है। फ्रेकफर्ट से लुफ़्तांसा। 


आज फँस गया। अब दिक्कत कहाँ की है पता नहीं पर हक़ीक़त बयान कर रहा हूँ। 


शाम पाँच चालीस की फ़्लाइट थी। घर से दो बजे निकलने की योजना बनाई। सुबह सुना था कि कुछ देरी हो सकती है एयरपोर्ट पर। बाद में पता चला अब सब ठीक है। 


बोर्डिंग पास रात में बनवा लिया था। इमेल में आ गया था। चैक इन के लिए कोई सामान नहीं था। एक बैकपैक में लेपटॉप और कपड़े थे। बस। मेरे पास क्लियर सर्विस भी है। बिना लाइन के सिक्योरिटी हो गई। पन्द्रह मिनट में मैं गेट पर था। 3:26 पर। 


समय ही समय था कुछ भी करने के लिए। थोड़ा फ़ोन चलाया। थोड़ी बात की। बोतल में पानी भरा।  टर्मिनल के दो-चार चक्कर मारे।  


बोर्डिंग चालू हुई। मैं लाइन में लगा। तब बताया गया कि इमेल वाले बोर्डिंग पास नहीं चलेंगे। प्रिंट करवाने के लिए अलग लाइन में लगो। पहले बताते तो अच्छा होता। कोई बात नहीं अब हो जाएगा। 


जब मेरा नम्बर आया तो काउंटर पर खड़ी एजेंट कहने लगी वापसी कब की है? मैंने कहा, पता नहीं। बोली वापसी का टिकट चाहिए नहीं तो नहीं जा सकते। मैंने कहा मैं पहले भी ऐसे जा चुका हूँ। कहने लगी हमें नहीं पता। आज तो नहीं जा सकते। 


या तो वापस आने की टिकट दिखाओ या यूरोप से बाहर निकलने की। 


मैंने झक मार के अमुक तारीख़ का अमुक गंतव्य का टिकट तभी फ़ोन पर ख़रीदा और जैसे-तैसे 5:30 पर प्लेन में दाखिल हुआ। 


शायद दिक़्क़त कोन्डोर एयरलाइंस की है। या फिर फ्रेंकफर्ट की। क्योंकि दिसम्बर में ऐम्स्टरडम जाते वक्त कोई दिक्कत नहीं हुई। 


राहुल उपाध्याय । 19 जुलाई 2024 । सिएटल