Saturday, November 19, 2022

दृश्यम 2

दृश्यम 2 देखने के लिए दृश्यम देखना आवश्यक है। यह उन सिक्वल्स में से नहीं है कि पिछली कड़ी देखे बिना काम चल जाएगा। हालाँकि जैसा कि हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर होता है, यहाँ भी अब तक की कहानी को समझाने का भरसक प्रयास किया जाता है। लेकिन बात नहीं बनती। पहली फ़िल्म देखने का फ़ायदा यह होगा कि एक अच्छी फ़िल्म दोबारा देखी जाएगी। 


इस फिल्म में उतनी कसावट नहीं है जितनी पहली में थी। सात साल के अंतराल को अच्छा दिखाया गया है। मुख्य पात्र विजय का कारोबार बढ़ जाता है। उसके पास अब स्मार्टफ़ोन है। लेकिन सबसे बड़ी कमी यह है कि विजय की पत्नी और उसकी दोनों बेटियों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं है। बड़ी बेटी शायद अब ग्रेजुएट हो गई होगी। कोई काम भी करती होगी। घर से बाहर भी जाती होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं। इस बार विजय के ससुराल वाले भी नज़र नहीं आते। 


पूरी फ़िल्म समीर के शव को खोजने पर टिकी है। इसलिए यह फिल्म उतनी सशक्त नहीं है जितनी पहले थी। क्योंकि पुलिस के पास पर्याप्त जानकारी है कि खून किसने किया है, इसके बावजूद वे बिना लाश के ख़ुद को हारा हुआ मान लेते हैं यह बात गले नहीं उतरती। 


श्रिया सरण का अभिनय अत्यंत उम्दा है। हर तरह से वे परेशान और हतप्रभ लगती हैं। 


सौरभ शुक्ला का किरदार प्रभावित नहीं करता। मार्टिन की दुकान सात साल में बिलकुल नहीं बदली। 


फ़िल्म देखी जा सकती है लेकिन कहानी बहुत पेचीदा है और दर्शक शायद उतना दिमाग लगा कर समझने की कोशिश करने के लिए तैयार न हो। 


राहुल उपाध्याय । 19 नवम्बर 2022 । सिएटल 


Monday, November 14, 2022

15 नवम्बर 2022

15 नवम्बर 1936 में जन्में बाऊजी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। इस प्रतिमा ने रंग दिखलाया जब वे विक्रम विश्वविद्यालय की एल-एल-बी परीक्षा में सर्वप्रथम आए एवं यह स्वर्ण पदक जीता। 


पदक मिलने के बाद भी मूल जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया। वहीं रतलाम के पश्चिम रेलवे के दफ़्तर में क्लर्क की नौकरी। कोई पदोन्नति नहीं। 


कुछ वक्त बाद ही क़िस्मत पलट गई। 


एक दिन शिवगढ़ के राजा के एक मंत्री बाऊजी के दफ़्तर कार से आए। आकर एक फ़ार्म दिया कि इसे भर दो। लंदन विश्वविद्यालय से एल-एल-एम करने का सुनहरा मौक़ा है पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ। हवाई जहाज़ से आने-जाने का ख़र्चा भी दिया जाएगा। 


बाऊजी बहुत ख़ुश। यह तो कमाल हो गया। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शिवगढ़ का गाय चराने वाला कभी विदेश जाएगा। 


फ़ार्म भरने बैठे तो होश उड़ गए। छात्रवृत्ति के लिए जो तीन शर्तें थीं, उन सब पर बाऊजी खरे नहीं उतरते थे। 


निराश हो गए। मौक़ा भी हाथ आया तो ऐसा कि खेल शुरू होने से पहले ही हार गए। 


फिर उन्होंने सोचा कि नियति भी कोई चीज़ होती है। क्या ज़रूरत थी मंत्री जी को उनके दफ़्तर तक आने की? क्यों उन्होंने बाऊजी के बारे में सोचा? बाऊजी न तो उनके परिवार के सदस्य थे, न पड़ोसी, न जान-पहचान, न रोज़ का उठना-बैठना। अख़बार में उनके स्वर्ण पदक की ख़बर थी। बस उतना ही काफ़ी था उनके लिए अपने गाँव के एक होनहार छात्र की मदद करने के लिए। 


सो बाऊजी ने मंत्री जी के परिश्रम का निरादर न करते हुए फ़ार्म भरकर भेज दिया। बाऊजी का चयन हो गया। पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ। 


राहुल उपाध्याय । 15 नवम्बर 2022 । सिएटल 





Wednesday, November 9, 2022

बाईडेन की प्रेस कॉन्फ़्रेंस

चुनाव के नतीजे आ रहे हैं। कुछ निर्णायक रहे। कुछ की गणना अभी चल रही है। 


इस माहौल में आज बाईडेन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की जिसमें पत्रकारों ने उनसे खुल कर सवाल किए। 


-*-* क्या वे 2024 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ेंगे?

-*-* क्या वे चीन से तायनान के विषय पर बात करेंगे?

-*-* कॉलेज में दाख़िले के लिए जो 'आरक्षण' का प्रावधान है, यदि वह समाप्त हो गया तो वे देश को कैसे सम्भालेंगे?

-*-*- रूस में जो महिला बास्केटबॉल की खिलाड़ी जेल में है, उसे छुड़ाने की क्या योजना है?

-*-*- दुनिया नहीं चाहती कि ट्रम्प फिर से राष्ट्रपति बनें। आप इसे कैसे रोकेंगे?

-*-*- क्या इलॉन मस्क देश का अहित कर रहे हैं ट्विटर को विदेशी निवेशकों की मदद से ख़रीद कर?


अच्छा लगा जब ऐसे और अन्य सवाल उनसे पूछे गए और उन्होंने सबका सीधा जवाब दिया। 


लगा कि हम एक स्वस्थ लोकतंत्र में साँस ले रहे हैं। 


राहुल उपाध्याय । 9 नवम्बर 2022 । सिएटल 





Saturday, November 5, 2022

अमेरिका के मिड-टर्म चुनाव

मंगलवार को अमेरिका में चुनाव है। इसे मिड-टर्म चुनाव कहते हैं। मिड-टर्म इसलिए कि ये राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बिलकुल बीच में होता है। इसमें कांग्रेस (यानी यहाँ की लोकसभा) के सारे सदस्यों का चुनाव होता है। उनका कार्यकाल सिर्फ़ दो साल का होता है। सीनेट के एक-तिहाई सदस्यों का भी चुनाव होता है। सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल 6 साल का होता है। 


सीनेट का चुनाव कांग्रेस से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उनका कार्यकाल लम्बा होता है। और सीनेट में जिस दल का बहुमत होता है उसका सहयोग क़ानून पारित करने में आवश्यक होता है। उनकी ही मंज़ूरी से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश चुने जाते हैं जिनका कार्यकाल आजीवन होता है। वे रिटायर भी नहीं होते। 


आमतौर पर मिड-टर्म चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति का दल हारता है यानी सीटें कम हो जाती हैं। उसका कारण यह है कि कोई भी राष्ट्रपति अपने चुनावी वादे पूरे करने में असमर्थ होता है और नयी समस्याएँ आ जाती हैं सो अलग। 


ईंधन के दाम जिस तरह से बढ़े हैं बाईडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए हानिकारक है। 


कई राज्यों के राज्यपाल का भी चुनाव है। 


अमेरिका में सारे चुनाव नवम्बर के दूसरे मंगलवार को ही होते हैं। तमाम आपदाओं-विपदाओं के बावजूद यह क्रम बदला नहीं है। चुनाव के दिन छुट्टी नहीं होती है। मैं जिस राज्य में रहता हूँ, वाशिंगटन, वहाँ सारा चुनाव डाक द्वारा होता है। घर पर मतदान पात्र और लिफ़ाफ़ा आ जाता है। एक बुकलेट भी होती है जिसमें सारे उम्मीदवारों के नाम और उनके घोषणापत्र होते हैं। मतदान पत्र भर कर, हस्ताक्षर कर, डाक-टिकट लगाकर डाल सकते हैं। या कुछ निश्चित जगहों पर बैलेट बॉक्स में बिना डाक-टिकट के भी डाल सकते हैं। 


अमेरिका में वोट डालने के अधिकार को लेकर कई आंदोलन हुए हैं। आज भी हो रहे हैं। लेकिन वोट डालने के प्रति जनता में उदासीनता ही दिखाई देती है। आम जनता को इन चुनावी नतीजों से उनके जीवन पर प्रत्यक्ष असर पड़ता नहीं दिखाई देता है। सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। 


कहा जा रहा है कि यदि ट्रम्प द्वारा मनोनीत रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार यदि भारी संख्या में जीत गए तो वे 2024 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की घोषणा कर सकते हैं। 


ऐसा हुआ तो यह अमेरिका के इतिहास में सिर्फ़ दूसरी बार होगा कि कोई राष्ट्रपति हारने के बाद फिर से चुनाव लड़े। पहली बार 1893 में क्लीवलैंड ने ऐसा किया था और जीत गए थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिनका विवाह राष्ट्रपति बनने के बाद हुआ। वे 49 के थे और दुल्हन 21 की। 


अपने पहले कार्यकाल (1885-1889) में उन्होंने टेक्सास राज्य के अकाल पीड़ितों के लिए सरकार की सहायता की माँग को ठुकरा दिया था यह कह कर कि किसी भी समूह के प्रति दरियादिली दिखाने से सरकार को अभिभावक बनने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और देश का चरित्र कमज़ोर होगा। इसी कारण वे 1889 का चुनाव हार गए थे। दोबारा 1893 में विजयी हुए। 


राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2022 । सिएटल 


(जो अन्य देशों से आकर यहाँ बस गए हैं उनकी उदासीनता का चित्रण कर रही है मेरी यह रचना:


डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते, हमें क्या

ये मुल्क नहीं मिल्कियत हमारी

हम इन्हें समझे, हम इन्हें जाने

ये नहीं अहमियत हमारी


तलाश-ए-दौलत आए थे हम

आजमाने किस्मत आए थे हम

आते हैं ख़्याल हर एक दिन

जाएँगे अपने घर एक दिन

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते

बदलेगी नहीं नीयत हमारी


ना तो हैं हम डेमोक्रेट

और ना ही हैं हम रिपब्लिकन

बन भी गये अगर सिटीज़न

बन न पाएंगे अमेरिकन

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते

छुपेगी नहीं असलियत हमारी


न डेमोक्रेट्स के प्लान

न रिपब्लिकन्स के उद्गार

कर सकते हैं हमारा उद्धार

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते

पूछेगा नहीं कोई खैरियत हमारी


हम जो भी हैं अपने श्रम से हैं

हम जहाँ भी हैं अपने दम से हैं

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते

काम आयेगी बस काबिलियत हमारी


फूल तो है पर वो खुशबू नहीं

फल तो है पर वो स्वाद नहीं

हर तरह की आज़ादी है

फिर भी हम आबाद नहीं

डेमोक्रेट्स जीते या रिपब्लिकन्स जीते

यहाँ लगेगी नहीं तबियत हमारी

)




अमेरिका के मिड-टर्म चुनाव

मंगलवार को अमेरिका में चुनाव है। इसे मिड-टर्म चुनाव कहते हैं। मिड-टर्म इसलिए कि ये राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बिलकुल बीच में होता है। इसमें कांग्रेस (यानी यहाँ की लोकसभा) के सारे सदस्यों का चुनाव होता है। उनका कार्यकाल सिर्फ़ दो साल का होता है। सीनेट के एक-तिहाई सदस्यों का भी चुनाव होता है। सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल 6 साल का होता है। 


सीनेट का चुनाव कांग्रेस से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उनका कार्यकाल लम्बा होता है। और सीनेट में जिस दल का बहुमत होता है उसका सहयोग क़ानून पारित करने में आवश्यक होता है। उनकी ही मंज़ूरी से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश चुने जाते हैं जिनका कार्यकाल आजीवन होता है। वे रिटायर भी नहीं होते। 


आमतौर पर मिड-टर्म चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति का दल हारता है यानी सीटें कम हो जाती हैं। उसका कारण यह है कि कोई भी राष्ट्रपति अपने चुनावी वादे पूरे करने में असमर्थ होता है और नयी समस्याएँ आ जाती हैं सो अलग। 


ईंधन के दाम जिस तरह से बढ़े हैं बाईडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए हानिकारक है। 


कई राज्यों के राज्यपाल का भी चुनाव है। 


अमेरिका में सारे चुनाव नवम्बर के दूसरे मंगलवार को ही होते हैं। तमाम आपदाओं-विपदाओं के बावजूद यह क्रम बदला नहीं है। 


कहा जा रहा है कि यदि ट्रम्प द्वारा मनोनीत रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार यदि भारी संख्या में जीत गए तो वे 2024 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की घोषणा कर सकते हैं। 


ऐसा हुआ तो यह अमेरिका के इतिहास में सिर्फ़ दूसरी बार होगा कि कोई राष्ट्रपति हारने के बाद फिर से चुनाव लड़े। पहली बार 1893 में क्लीवलैंड ने ऐसा किया था और जीत गए थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिनका विवाह राष्ट्रपति बनने के बाद हुआ। वे 49 के थे और दुल्हन 21 की। 


अपने पहले कार्यकाल (1885-1889) में उन्होंने टेक्सास राज्य के अकाल पीड़ितों के लिए सरकार की सहायता की माँग को ठुकरा दिया था यह कह कर कि किसी भी समूह के प्रति दरियादिली दिखाने से सरकार को अभिभावक बनने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और देश का चरित्र कमज़ोर होगा। इसी कारण वे 1889 का चुनाव हार गए थे। दोबारा 1893 में विजयी हुए। 


राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2022 । सिएटल 

तड़का

'तड़का' बहुत ही प्यारी फ़िल्म है। बहुत प्यार से बनाई गई है। गोआ इतना ख़ूबसूरत शायद ही किसी फ़िल्म में दर्शाया गया है। अंतिम सीन में सेंट आगस्टिन चर्च बहुत ही सुन्दर लगा। 


पूरी फ़िल्म एक परी की कहानी सी है। सब सुन्दर है। सब रंगीन है। सब सुव्यवस्थित है। दुख भी है तो ऐसा कि ऐसे दुख में जीने को जी चाहे। 


नाना पाटेकर की फ़िल्में इन दिनों कम हो गई है। उम्र भी है सो चरित्र अभिनेता की भूमिकाएँ ही मिलती होंगी। छब्बीस साल पहले संजय लीला भंसाली की 'ख़ामोशी' में हीरोइन के पिता का रोल किया था। 


इस फ़िल्म में वे मुख्य किरदार में हैं, श्रिया सरन के साथ। एकदम फ़िट रोल है। कहीं से भी उम्रदराज़ नहीं लगते।


यह छोटे शहर या गाँव की कहानी नहीं है। ऐसी समस्याएँ गाँव में नहीं होती हैं। होती भी हैं तो मानी नहीं जाती हैं। हँसी-मज़ाक़ में उड़ा दी जाती हैं। 


श्रिया ने कमाल का अभिनय किया है। मदुरा का किरदार जीवंत हो उठता है। शायद यह उनकी पहली फ़िल्म है। तापसी का रोल ज़्यादा नहीं है। फिर भी स्पेश्यल अपीयरेंस नहीं है। ज़्यादातर सीन में श्रिया के साथ वे भी हैं। 


एक अरसे के बाद लिलित दुबे को देखकर अच्छा लगा। एक सीन में तीनों - श्रिया, तापसी और लिलित - हैं। तीनों हमउम्र लगीं। 


नाना पाटेकार का मोनोलॉग - मैं कमज़ोर हूँ - बहुत प्रभावशाली है। उनकी स्टाइल जो कि मिमिक्री के बाज़ार में बहुत बिकती है, उससे कोसों दूर। 


खाना-पीना ख़ूब दिखाया गया है। आलू के पराठे से लेकर फ़्रूट केक और मछली तक। 


एक बहुत ही साफ़ सुथरी और अच्छी फ़िल्म। 


राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2022 । सिएटल 

ब्रह्मास्त्र

एक ने कहा मत देखना। एक ने कहा देखना। नतीजा यह हुआ कि मैंने 'ब्रह्मास्त्र' ओ-टी-टी पर देखी। 


शायद इसी कारण यह फ़िल्म मुझे बहुत अच्छी लगी। इतनी अच्छी कि ख़त्म करके ही अपने निर्धारित शयन-समय के बाद सोया। और बीच में 'रूम्बा' चल पड़ा था तो संवाद सुनाई नहीं दिए जब ईशा (आलिया) शिवा (रणवीर) से उसके जीवन के बारे में पूछ रही थी। इतना रोचक सीन था वह कि उसे दोबारा देखा। और बिना संवाद के सीन की दूसरी ख़ूबसूरतियाँ भी नज़र आईं। मसलन राहुल देव बर्मन का पोस्टर। 


पूरी फ़िल्म बहुत अच्छी है। ख़ामियाँ भी हैं। किसमें नहीं होती। बनारस पहुँचने पर जो काम करना चाहिए था, उसे करने के बजाय युगल जोड़ी नाच-गाने लगती है। बहुत बेतुकी बात लगी। (लेकिन हमें क्या पता कब कहाँ किसकी ज़रूरत है और क्या हिट हो जाए। मनोज कुमार को जब 'डॉन' दिखाई गई तो उन्होंने सलाह दी कि इण्टरवल के बाद फ़िल्म बहुत तेज गति से जा रही है। एक गाना डालो। दर्शकों को थोड़ी राहत दो। और इस तरह 'खई के पान बनारस वाला' ने इतिहास रच डाला।)


इसे पसन्द करने की कुछ और भी वजहें हो सकती हैं जैसे कि शिवा अपनी माँ से बहुत प्यार करता है, उसकी बात करता है, उसकी याद करता है, ख़ुश रहता है, हँसता है, हँसाता है, संगीत से, हिन्दी फ़िल्म गीतों से प्रेम है। अच्छा लगता है जब मुख्य पात्र आपसे मिलता-जुलता हो। 


मोहन भार्गव के किरदार में शाह रूख खान अत्यंत प्रभावशाली हैं। किरदार का नाम 'स्वदेस' की याद ताज़ा कर देता है। 


वह सीन, जब ईशा कार से बाहर लटकते हुए उसे फ़र्राटे से चला रही है, इतना फास्ट-पेस्ड है कि सोचने की मोहलत ही नहीं मिलती कि वह एक्सीलरेटर कैसे दबा रही है। बहुत अच्छी सिनेमेटोग्राफ़ी और बैकग्राउंड म्यूज़िक है। 


अमिताभ का गेट-अप बहुत अच्छा तैयार किया गया है। फ़िल्म में ट्वीस्ट भी अच्छे हैं। कई बार तो अंदेशा होता है कि जिसे हम यह समझ रहे हैं कहीं वो वह तो नहीं। एक बार तो ऐसा भी प्रसंग आया कि लगा अमिताभ अब गीता का ज्ञान देंगे। लेकिन अच्छा ही है कि ऐसा नहीं हुआ। 


पार्ट 2 का इंतज़ार रहेगा। 


(रूम्बा अलेक्सा की तरह घर में रहता है और परिवार का सदस्य है। यह जब मन करता है चल पड़ता है घर की सफ़ाई (वैक्यूम क्लीनिंग) करने। उसे एक निश्चित समय पर भी चलाया जा सकता है। और अलेक्सा या आय-फ़ोन द्वारा भी बंद किया जा सकता है। लेकिन न जाने क्यों मुझे उसकी मनमर्ज़ी अच्छी लगती है, मानवीय लगती है। इसलिए उसे रोकता नहीं। कोई फ़ोन आ जाए तब रोक देता हूँ।)


राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2022 । सिएटल