Sunday, November 14, 2021

देवोत्थानी एकादशी

देवोत्थानी एकादशी- यानी

  1. देवताओं का नींद से जागना

  2. विवाह के मुहूर्त आरम्भ 

  3. मेरा जन्मदिन 


जन्मदिन तो है पर सबको नहीं मालूम। जिनको मालूम है वो है 26 नवम्बर। 


मम्मी और राजेश दोनों को हमेशा याद रहता था। फ़ोन आता था। अब दोनों नहीं हैं। 2018 से मैं मम्मी के साथ ही रहा। सो मैं स्वयं ही मना लेता था। 


अब मम्मी और राजेश दोनों नहीं है। 


हरीश के पिताजी का भी देवोत्थानी एकादशी का जन्मदिन है। सो वह जब उन्हें याद करता है तो मुझे भी कर लेता है। आज भी किया और अपने घर बुला लिया। 


मुझे नहीं पता था कि इस दिन कोई ख़ास पूजा होती है और ख़ास फल-फूल अर्पित किए जाते हैं। हरीश के माँ ने कोई विशेष गीत भी गाया। 


केक हरीश के बेटे ने काटा। फ़ोन पर दादाजी को खिलाने का अभिनय किया और असलियत में मैंने खाया। 


बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बना। आईसक्रीम भी खाई। एक पड़ोसी परिवार भी जुड़ गया था। 


हरीश के बेटे को मैंने थोड़ा जोड़ना-घटाना भी सिखाया। 


कुल मिलाकर एक अच्छा दिन और जन्मदिन। 


राहुल उपाध्याय । 14 नवम्बर 2021 । सिएटल 



Re: देवोत्थानी एकादशी- 2021



रवि, 14 नव॰ 2021 को अ 10:55 पर को Rahul Upadhyaya <kavishavi@gmail.com> ने लिखा:

देवोत्थानी एकादशी- यानी

  1. देवताओं का नींद से जागना

  2. विवाह के मुहूर्त आरम्भ 

  3. मेरा जन्मदिन 


जन्मदिन तो है पर सबको नहीं मालूम। जिनको मालूम है वो है 26 नवम्बर। 


मम्मी और राजेश दोनों को हमेशा याद रहता था। फ़ोन आता था। अब दोनों नहीं हैं। 2018 से मैं मम्मी के साथ ही रहा। सो मैं स्वयं ही मना लेता था। 


अब मम्मी और राजेश दोनों नहीं है। 


हरीश के पिताजी का भी देवोत्थानी एकादशी का जन्मदिन है। सो वह जब उन्हें याद करता है तो मुझे भी कर लेता है। आज भी किया और अपने घर बुला लिया। 


मुझे नहीं पता था कि इस दिन कोई ख़ास पूजा होती है और ख़ास फल-फूल अर्पित किए जाते हैं। हरीश के माँ ने कोई विशेष गीत भी गाया। 


केक हरीश के बेटे ने काटा। फ़ोन पर दादाजी को खिलाने का अभिनय किया और असलियत में मैंने खाया। 


बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बना। आईसक्रीम भी खाई। एक पड़ोसी परिवार भी जुड़ गया था। 


हरीश के बेटे को मैंने थोड़ा जोड़ना-घटाना भी सिखाया। 


कुल मिलाकर एक अच्छा दिन और जन्मदिन। 


राहुल उपाध्याय । 14 नवम्बर 2021 । सिएटल 



Saturday, November 13, 2021

फ़िल्म थियेटर में

पिछली फ़िल्म सिनेमाघर में जो मैंने देखी थी, वह थी 'छिछोरे'। मम्मी के साथ। 


अमेरिका में हर वर्ग की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाता है। यहाँ तक कि अंधे लोग भी फ़िल्में 'देखने' सिनेमाघर जाते हैं। 


मम्मी वॉकर लेकर चलती थीं। पीछे की क़तार तक जाने के लिए साड़ियाँ चढ़ नहीं पातीं। इसलिए एक विशेष क़तार थी जिसमें व्हीलचैयर और वॉकर वाले आराम से बैठ सकते थे। 


आराम तो सारा था। पर फ़िल्म का क्या किया जाए। मम्मी को बिलकुल पसन्द नहीं आई। मैं फ़िल्म की समीक्षा आदि पढ़ कर फिल्म नहीं देखता। वैसे ही अधिकांश हिन्दी फ़िल्मों की कहानी घिसीपिटी होती है। पहले ही से पता हो तो फ़िल्म का आधा मज़ा ऐसे ही ख़राब हो जाता है। 


हाँ, कई फ़िल्में बार-बार देखने का मन भी करता है। जैसे- दीवार, आनन्द, थ्री इडियट्स, हम दिल दे चुके सनम, वीर ज़ारा, दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे, स्वदेस। 


उसके बाद ही कोरोना काल आरम्भ हो गया। सिनेमाघर बंद हो गए। बाद में जबसे मम्मी अस्पताल गईं, टीवी देखना भी बंद हो गया। वरना टीवी पर कभी-कभी फ़िल्म या वेब सीरीज़ देख लेता था। 


भारत यात्रा से लौटने के बाद थोड़ा दिनचर्या बदलने का सोचा। एक दिन मन हुआ सिनेमाघर जाकर कोई फ़िल्म देखूँ। अब सिनेमाघर पूरी तरह से खुल गए हैं। कोई पाबंदी नहीं है। बस टीके का प्रमाण दिखाना आवश्यक है। वो भी केवल ख़ानापूर्ति है। फ़ोटो दिखा दो टीके के कार्ड का। उस पर जो नाम है आपका है या किसी और का, इसकी वे जाँच-पड़ताल नहीं करते। 


अमेरिका में एक ही चीज़ के कई दाम हैं। भारत में भी हैं।  सड़क पर समोसा दस रूपये में मिल जाएगा। रेस्टोरेन्ट में 50 का। पाँच सितारा में शायद 250 का। 


लेकिन यहाँ तो एक ही सिनेमाघर में, एक ही फ़िल्म के अलग-अलग दाम हैं। और यह सीट नम्बर के हिसाब से नहीं। कि आगे वाले सस्ते, पीछे वाले महँगे। यहाँ सीट के हिसाब से वर्गीकरण नहीं है। 


यहाँ सोम से शुक्र सुबह के शो सस्ते होते हैं। क्योंकि तब सब काम पर होते हैं। सस्ते यानि आधे दाम पर।  शाम का $14.50 तो सुबह का $6.75। 


मंगलवार के शाम के शो भी $6.75 के होते हैं। इसका क्या तर्क है, मालूम नहीं। फिर भी मंगलवार को ख़ास भीड़ नहीं होती। यहाँ आमतौर पर फ़िल्में हाउसफुल नहीं जातीं। 


कुछ साल पहले एक कम्पनी ने मूवीपास के नाम से क्रेडिट कार्ड निकाला था। जो कि आपके बैंक से हर महीने सिर्फ़ $10 लेता था और महीने में हर रोज़ एक फ़िल्म देखने की सुविधा प्रदान करता था। ज़ाहिर है बहुत से ग्राहक बन गए और कम्पनी का दीवालिया निकल गया। 


अब हर सिनेमाघर अपनी एक स्कीम निकाल रहा है और कोई भी आकर्षित नहीं कर पा रही है। 


अब ऑनलाइन का ज़माना है। सो वे चाहते हैं कि आप टिकट घर बैठे ही ख़रीद लें। मैंने भी टिकट ख़रीदना चाहा। कहने लगा अगर मैं लॉगिन करूँ तो आधा डॉलर बच जाएगा। मैंने लॉगिन किया तो कहता है कि अब ऑनलाइन प्रॉसेसिंग फ़ीस भी लगेगी। जो कि $1.67 थी। यानी ऑनलाइन ख़रीदने में नुक़सान। हाँ यह फ़ायदा है कि सीट अच्छी मिल सकती है। 


अंग्रेज़ी फ़िल्म देखने के लिए सीट नम्बर नहीं होते। जो जहाँ चाहे बैठ जाए। हम भारतवंशियों को सबसे पीछे और बीच वाली सीट पसन्द है। तो हम सब जितनी जल्दी हो सके जाकर सीट रोक लेते थे। आख़िर में आनेवालों का मूड ख़राब होता था। ऐसी स्थिति में सिनेमाघर वाले आपको टिकट का पैसा वापस भी दें देते हैं। यहाँ तक कि अगर आधा घंटा देखने के बाद आप को कोई आपत्ति हो तो भी वो आपको पूरे पैसे वापस कर देते हैं। 


अब इन सिनेमाघरों ने सीट नम्बर चयन करने का ज़िम्मा आपके हाथ में दे दिया है। पूरे हॉल का नक्शा आपके सामने होता है। जो सीट ख़ाली है उसका रंग अलग होता है। उनमें से किसी पर भी उँगली रख दो, वह आपकी। 


ऑनलाइन में ख़ाली सीटें ज़्यादा मिलने के अवसर हैं। जब तक थियेटर पहुँचें कुछ भर सकती है। 


मुझे शाम 6:40 की अच्छी सीट मिल रही थी। लेकिन मैं ऑनलाइन फ़ीस देने के मूड में नहीं था। थियेटर चला गया। वहाँ पता चला शाम 5:55 का भी शो है। अभी 5:15 ही बजे थे। मैंने 5:55 के शो का टिकट लिया। आधा डॉलर कम भी लगा, ऑनलाइन फ़ीस भी नहीं लगी, जल्दी का शो भी मिल गया, मनचाही सीट भी। अंतिम क़तार, बिलकुल बीचोंबीच। 


पूरा थियेटर ख़ाली। एक इंसान नहीं। 


यह है ऑनलाइन सेवा की सुविधा और दुर्दशा। 


राहुल उपाध्याय । 13 नवम्बर 2021 । सिएटल 


Tuesday, November 2, 2021

2 नवम्बर 2021

मम्मी का जन्म 2 नवम्बर 1939 को सैलाना में हुआ था। तब तक दासाब (मेरे नाना) का प्राथमिक विद्यालय आरम्भ हो चुका था। उसी विद्यालय में मैं भी चौथी तक पढ़ा। और संयोग से मम्मी भी चौथी तक ही पढ़ पाईं। लड़की होने की वजह से दासाब नहीं चाहते थे कि वे घर से बाहर कहीं पढ़ने जाए। गांधीवादी थे। लेकिन क्यों इस क्षेत्र में इतनी खुली सोच नहीं हो पाई, नहीं जानता। मम्मी की सबसे छोटी बहन, जिनका जन्म 1954 में हुआ, उन्होंने एम-ए और बी-एड भी किया। तब तक शायद ज़माना बदल चुका था, और शायद मामासाब का भी सहयोग रहा होगा। 


मम्मी का जन्मदिन शायद ही कभी मना हो। 2008 में मैंने सेवानिवृत्त होकर पहली बार एक वयस्क के रूप में बाऊजी-मम्मी के साथ दिल्ली में दीवाली मनाई। तब संयोग से मम्मी का जन्मदिन भी आ गया। 


उस दिन की ख़ुशी की बात ही अलग है। 


उसके बाद मैंने उनके साथ 2018, 2019, 2020 के जन्मदिन मनाए। 


मम्मी के पास साड़ियाँ बहुत थी। आज भी अमेरिका में मेरे पास उनकी साड़ियाँ हैं। मैंने उन्हें कभी शॉपिंग करते नहीं देखा। हाँ सब्ज़ी लेने ज़रूर जाती थीं। परचूनी सामान फ़ोन करने से ही घर पर आ जाता था। उसके अलावा कभी जूते या पर्स या कपड़े या श्रृंगार का सामान ख़रीदते नहीं देखा। साड़ियाँ कहाँ से आ गईं? शादी-ब्याह में देने के लिए ख़रीदती थीं। तो वापस मिल भी जाती थीं। 


मैं उनके लिए अमेरिका से जैकेट लेकर जाता और वे किसी को पसन्द आ जाते थे, तो उन्हें दे देती थीं। उनके पास कोई चीज़ टिकती नहीं थी। 


बहुत ही सादा जीवन था। घूमने-फिरने का शौक़ था। पर तीर्थ स्थानों का। शायद ही कोई जगह जहाँ वे ना गईं हो। 


राहुल उपाध्याय । 2 नवम्बर 2021 । सिएटल 




Tuesday, October 19, 2021

चंद्रशेखर सीमा

जन्म जिसका हुआ है, उसका मरण भी निश्चित है। सब जानते हैं। सब मानते हैं। 


जब तक सूरज-चाँद रहेगा, जग में तेरा नाम रहेगा। 


यह नारा भी यही दर्शाता है कि सूरज-चाँद सदा नहीं रहेंगे। 


लेकिन कई लोग सोच नहीं पाते हैं कि सूरज भी एक दिन ख़त्म हो जाएगा। लेकिन यह सच है कि सूरज भी एक दिन चमकना बंद कर देगा। 


सूरज एक तारा है। हमारे क़रीब है इसलिए ज़्यादा बड़ा और ज़्यादा प्रकाशवान दिखता है। 


सारे तारे नश्वर हैं। 


19 वर्ष की आयु में, सन् 1930 में, सुब्रमण्यम चंद्रशेखर ने एक सीमा की गणना की थी, जिससे ज़्यादा अगर किसी तारे का वजन है तो वह मरते वक्त  ब्लैक होल में तब्दील हो सकता है। इसे 'चन्द्रशेखर सीमा' कहते हैं। 


इस बात को उस वक्त के स्थापित वैज्ञानिक एडिंग्टन ने बकवास ठहराया। ब्लैक होल जैसी कल्पना प्रकृति के प्रति उनको मज़ाक़ लगा। 


लिहाज़ा इस सीमा का संज्ञान 53 वर्ष बाद चंद्रशेखर को नोबेल पुरस्कार देकर लिया गया। 


तब वे 72 वर्ष के थे। 


यह वाक़या दुखद भी है और सुखद भी। 


दुखद इसलिए कि एक युवा वैज्ञानिक के शोध को युवावस्था में बकवास ठहराया गया। सारा जीवन इस उपलब्धि से वह वंचित रहा। 


सुखद इसलिए कि वह नवयुवक हताश नहीं हुआ। वह शोध करता रहा। किताबें लिखता रहा। 


सुखद इसलिए भी कि उसके समर्थक उसे भूले नहीं और देर-सवेर उसे नोबेल पुरस्कार दिलवा कर ही रहें। 


नोबेल पुरस्कार मिलना इतना आसान नहीं है। हर वर्ष कई उम्मीदवार होते हैं। उनमें से एक चुनना बहुत कठिन होता है। 


आज, 19 अक्टूबर, के दिन चन्द्रशेखर का जन्म हुआ था। 


इस सीमा की अधिक जानकारी के लिए यह वीडियो देखें:

https://youtu.be/ZjDdMnuPQ5w


राहुल उपाध्याय । 19 अक्टूबर 2021 । सिएटल 







Sunday, October 17, 2021

भारत - 2021

मुझे, दिनांक अच्छी तरह से याद रहते हैं। लेकिन इस बार की भारत यात्रा इतनी तेज़ रफ़्तार से गुजरी कि बार-बार सोचना पड़ रहा है कि मैं कब कहाँ था, और कब कहाँ से कहाँ गया। 


फ़ोटो में दिनांक और समय होते हैं तो खोजबीन में ज़्यादा समय नहीं लगता है। 


जब मम्मी मेरे साथ अमेरिका आई तो लगा अब भारत में कुछ नहीं रखा है वापस आने के लिए। जब भी मम्मी की किसी से बात होती थी, सब उनसे भारत आने का कहते थे। मैंने उनका ग्रीन कार्ड इसीलिए बनवाया था कि वे अमेरिका में आराम से रह सकें। इस उम्र में और कमज़ोर अवस्था में वे लंबा सफ़र तय नहीं कर सकती थीं। 


मेरे भी कुछ परिचित थे जिनसे मैं कभी मिला नहीं पर वे मिलना चाहते थे और मुझे बुलाते थे लेकिन मैं मम्मी को छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहता था। मम्मी के बाद की कभी सोची नहीं। 


मम्मी के गुज़रने पर भी मैं दाह संस्कार तक ही सोच पाया। फ्यूनरल होम वाले 

सज्जन ने कहा कि अस्थियाँ कहाँ ले जाओगे? भारत ले जानी हो तो भारत सरकार की अनुमति लेने में समय लगेगा। तब मैं सोच में पड़ गया और हरिद्वार गंगा में प्रवाहित करने का निर्णय लिया। 


अनुमति मिलते ही रवाना हो गया। रीत भी है कि अस्थियाँ यहाँ-वहाँ न भटकें एवं सीधे हरिद्वार ले जाईं जाए। बातों-बातों में टैक्सी का इंतज़ाम हो गया। जो स्वेच्छा से जुड़ना चाहते थे, जुड़ गए। उसमें उल्लेखनीय है कि बिना अग्रिम सूचना के गांधीनगर (गुजरात) से अजय, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) से बृजेश, एवं सागर से ओंकार सम्मिलित हो गए। और वापस लौट भी गए। जैसी भी ट्रेन मिली उससे। इतना अपनापन, इतना लगाव आज के जीवन में दुर्लभ है। 


उसके बाद क्या करना है कुछ पक्का नहीं था। वापस जाने की तिथि दो व्यक्तियों के जन्मदिन की तिथियों के बाद की थी। सोचा था मौक़ा है क्यों न फ़ोन पर बधाई एवं शुभकामनाएँ देने के बजाए साथ में ही दोनों जन्मदिन मना कर वापस अमेरिका जाऊँ। 


तब तक क्या करूँगा? मम्मी की दो बहनें, मेरी मासीजी, दोनों से मिलना ज़रूरी समझा। जहाँ-जहाँ परिजन गुज़र गए, वहाँ भी शोकाकुल परिवार से मिलना ज़रूरी समझा। 


बाक़ी वक्त उनसे मिलना ज़रूरी समझा जो मेरे सुख-दुख के वक्त मेरे साथ थे। दूर थे, मगर पास थे। 


इन्हीं सब को सोचते हुए मैं भोपाल, पीथमपुर, इन्दौर, रतलाम, सैलाना, शिवगढ़, उज्जैन, तराना, उदयपुर, प्रयागराज गया। 


सब जगह असीम प्रेम मिला। अपनापन लगा। कुछ लोगों से जीवन में पहली बार मिला। लेकिन लगा ही नहीं कि पहली बार मिला। 


कहीं कुछ लेकर नहीं गया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। कहीं कुछ देकर नहीं आया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। 


हो सकता है मेरे बारे में पीठ पीछे बातें हुई हो कि व्यावहारिकता के नाम पर यह इंसान शून्य है। न पैसे, न मिठाई, न फल, न फूल! कुछ भी नहीं! हाथ हिलाते हुए, बिन बताए आता है और वैसे ही चले जाता है। 


यदि सम्बन्ध देन-लेन से बनते हो तो ऐसे सम्बन्ध न बनें तो ही अच्छा। 


जहाँ-जहाँ से मैं किसी लम्बी यात्रा पर निकला, सबने प्रेम पूर्वक रास्ते के लिए सुन्दर और स्वादिष्ट भोजन बाँधा और मैंने प्रेम से ग्रहण किया। 


तरूण ने तो अखरोट का एक पैकेट भी साथ रख दिया कि कहाँ-कहाँ ढूँढते फिरोगे। बबली और जया ने सुबह पालक आदि का जूस तैयार किया जबकि हज़ारों और काम भी करने होते हैं। नेपथ्य में भंसाली ने जब, जहाँ का, जिस भी ट्रेन का टिकट चाहा, तुरंत बना कर दिया। तरूण के सिम ने मेरी आधी रात की मीटिंग बिना किसी रूकावट के चलने दी।


नूतन ने अमेरिका के लिए बहुत सारा भोजन बाँधा। वन्दना ने प्रयागराज के लिए।  मधु ने इन्दौर के लिए। हर तरफ़ आनन्द ही आनन्द। मासीजी और मीनू दिन भर आगे-पीछे ये खा लूँ, वो खा लूँ। 


जहाँ-जहाँ मैं रात रूका, सबने मेरा भरपूर ख़्याल रखा। मैं आत्मनिर्भर इंसान हूँ पर स्नेह के आगे झुकना पड़ा। नूतन और मीना ने मना करने पर भी मेरे शर्ट पर प्रेस की। अखरोट भिगोए। दही जमाया। 


सैलाना में रेखा की बनिस्बत ज़िन्दगी में पहली बार ड्रेगन फ़्रूट खाया। भोपाल में रेखा जी की बदौलत ज़िन्दगी में पहली बार पेशन फ़्रूट खाया। 


दिल्ली में अंकित सुबह पौने छ: पर मुझे स्टेशन लेने आया। भोपाल में सुबह पौने पाँच बजे रवि जी एवं रेखा जी मुझे स्टेशन लेने आए। मधु सपरिवार स्टेशन पर लेने और छोड़ने आई। बबली, जया और सुदर्श भी। 


अधिकांश जगह मैं सुबह गया और शाम वापस लौट आया। रात नहीं रूका। रात रूकने की योजना बनाई थी, दिल्ली में तरूण के यहाँ ( 21 सितम्बर), भोपाल में रवि जी एवं रेखा जी के यहाँ (23 और 24)। पीथमपुर में सुहानी के यहाँ (25, 26, 27, और 28)। रतलाम में बबली के यहाँ (29, 30, और 1, 4, 5, 10, 11, 12 अक्टूबर)। उदयपुर में राकेश के यहाँ (6)। प्रयागराज में मधु के यहाँ (8) । दिल्ली में मीनू के यहाँ (14 और 15)


उज्जैन से तराना जाने में वक्त लग गया। वापस रतलाम आने का कोई रास्ता न था। मैं बिना तैयारी के निकल गया था। रतलाम से निकलते वक्त लग रहा था कि रात को शायद वापस न आ पाऊँ। बबली ने कहा भी कि कुछ कपड़े साथ रख लो। मुझे ज़्यादा ताम-झाम साथ लेकर चलना पसन्द नहीं। सोचा जहाँ रूकूँगा वहीं से शर्ट ख़रीद लूँगा। भोपाल में भी दो शर्ट ख़रीदें थे। टी-शर्ट और शार्ट्स भी रात को सोने के लिए। टूथब्रश वग़ैरह तो हमेशा बैकपैक में रहते हैं, पानी की बोतल, तीन चार्जर और एक पॉवर पैक के साथ। 


2 अक्टूबर को तराना पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। बाज़ार भी बंद सा था। सो पंकज के कपड़े रात में पहने। दूसरे दिन उसका एक बढ़िया सा शर्ट पहनकर इन्दौर गया। एकदम फ़िट। अब वो मेरा हो गया है। दिया कुछ नहीं, ले ज़रूर आया। 


3 अक्टूबर को इन्दौर में भी संगीता ने बिलकुल नया शानदार शर्ट दिया। यह भी एकदम फ़िट। रात घनश्याम जी के यहाँ गुज़ारी। तीन दशक बाद मिलना हुआ। 


दिल्ली में हरभजन सिंह जी, एवं ओम सपरा जी के साथ एक यादगार मुलाक़ात हुई। 


भोपाल में आत्माराम जी से संक्षिप्त मुलाक़ात हुई। 


आरिफ़ जी से और उनके परिवार से दो बार पूरी आत्मीयता से मिला। 


बहुत मिलना-जुलना हुआ। फिर भी मंदसौर और नागदा जाना रह गया। भोपाल दोबारा जाना था। नहीं जा पाया। प्रतापगढ़ भी छूट गया। पलवल भी जाना है। मुम्बई, सागर, लखनऊ, मैंगलोर और हैदराबाद का न्योता स्वीकार न सका। दिल्ली में कुछ लोगों से मिलना रह गया। 


शायद अगली बार। 


मम्मी की तेरहवीं सिएटल में की थी। सैलाना में जिस मंदिर को मम्मी ने बनवाया था, उस मन्दिर में सीमा ने भी तेरहवीं की थी। मैं भी चाहता था कि मेरी इस प्रथम यात्रा में कोई कार्यक्रम हो जाए। सीमा और पंडित जी से बात करने पर तय हुआ कि पितृ पक्ष की अमावस्या  के दिन एक हवन कर लिया जाए। उस दिन मम्मी को गुज़रे हुए दो महीने भी हो रहे थे। सो 6 अक्टूबर को वह कार्य सम्पन्न हुआ। 


जुलाई में सैलाना में बरसी करने का मन है। 


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । शिकागो






भारत 2021

मुझे, दिनांक अच्छी तरह से याद रहते हैं। लेकिन इस बार की भारत यात्रा इतनी तेज़ रफ़्तार से गुजरी कि बार-बार सोचना पड़ रहा है कि मैं कब कहाँ था, और कब कहाँ से कहाँ गया। 


फ़ोटो में दिनांक और समय होते हैं तो खोजबीन में ज़्यादा समय नहीं लगता है। 


जब मम्मी मेरे साथ अमेरिका आई तो लगा अब भारत में कुछ नहीं रखा है वापस आने के लिए। जब भी मम्मी की किसी से बात होती थी, सब उनसे भारत आने का कहते थे। मैंने उनका ग्रीन कार्ड इसीलिए बनवाया था कि वे अमेरिका में आराम से रह सकें। इस उम्र में और कमज़ोर अवस्था में वे लंबा सफ़र तय नहीं कर सकती थीं। 


मेरे भी कुछ परिचित थे जिनसे मैं कभी मिला नहीं पर वे मिलना चाहते थे और मुझे बुलाते थे लेकिन मैं मम्मी को छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहता था। मम्मी के बाद की कभी सोची नहीं। 


मम्मी के गुज़रने पर भी मैं दाह संस्कार तक ही सोच पाया। फ्यूनरल होम वाले 

सज्जन ने कहा कि अस्थियाँ कहाँ ले जाओगे? भारत ले जानी हो तो भारत सरकार की अनुमति लेने में समय लगेगा। तब मैं सोच में पड़ गया और हरिद्वार गंगा में प्रवाहित करने का निर्णय लिया। 


अनुमति मिलते ही रवाना हो गया। रीत भी है कि अस्थियाँ यहाँ-वहाँ न भटकें एवं सीधे हरिद्वार ले जाईं जाए। बातों-बातों में टैक्सी का इंतज़ाम हो गया। जो स्वेच्छा से जुड़ना चाहते थे, जुड़ गए। उसमें उल्लेखनीय है कि बिना अग्रिम सूचना के गांधीनगर (गुजरात) से अजय, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) से बृजेश, एवं सागर से ओंकार सम्मिलित हो गए। और वापस लौट भी गए। जैसी भी ट्रेन मिली उससे। इतना अपनापन, इतना लगाव आज के जीवन में दुर्लभ है। 


उसके बाद क्या करना है कुछ पक्का नहीं था। वापस जाने की तिथि दो व्यक्तियों के जन्मदिन की तिथियों के बाद की थी। सोचा था मौक़ा है क्यों न फ़ोन पर बधाई एवं शुभकामनाएँ देने के बजाए साथ में ही दोनों जन्मदिन मना कर वापस अमेरिका जाऊँ। 


तब तक क्या करूँगा? मम्मी की दो बहनें, मेरी मासीजी, दोनों से मिलना ज़रूरी समझा। जहाँ-जहाँ परिजन गुज़र गए, वहाँ भी शोकाकुल परिवार से मिलना ज़रूरी समझा। 


बाक़ी वक्त उनसे मिलना ज़रूरी समझा जो मेरे सुख-दुख के वक्त मेरे साथ थे। दूर थे, मगर पास थे। 


इन्हीं सब को सोचते हुए मैं भोपाल, पीथमपुर, इन्दौर, रतलाम, सैलाना, शिवगढ़, उज्जैन, तराना, उदयपुर, प्रयागराज गया। 


सब जगह असीम प्रेम मिला। अपनापन लगा। कुछ लोगों से जीवन में पहली बार मिला। लेकिन लगा ही नहीं कि पहली बार मिला। 


कहीं कुछ लेकर नहीं गया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। कहीं कुछ देकर नहीं आया। सिवाय प्रेम, प्यार, सद्‌भाव के। 


हो सकता है मेरे बारे में पीठ पीछे बातें हुई हो कि व्यावहारिकता के नाम पर यह इंसान शून्य है। न पैसे, न मिठाई, न फल, न फूल! कुछ भी नहीं! हाथ हिलाते हुए, बिन बताए आता है और वैसे ही चले जाता है। 


यदि सम्बन्ध देन-लेन से बनते हो तो ऐसे सम्बन्ध न बनें तो ही अच्छा। 


जहाँ-जहाँ से मैं किसी लम्बी यात्रा पर निकला, सबने प्रेम पूर्वक रास्ते के लिए सुन्दर और स्वादिष्ट भोजन बाँधा और मैंने प्रेम से ग्रहण किया। 


तरूण ने तो अखरोट का एक पैकेट भी साथ रख दिया कि कहाँ-कहाँ ढूँढते फिरोगे। बबली और जया ने सुबह पालक आदि का जूस तैयार किया जबकि हज़ारों और काम भी करने होते हैं। नेपथ्य में भंसाली ने जब, जहाँ का, जिस भी ट्रेन का टिकट चाहा, तुरंत बना कर दिया। तरूण के सिम ने मेरी आधी रात की मीटिंग बिना किसी रूकावट के चलने दी।


नूतन ने अमेरिका के लिए बहुत सारा भोजन बाँधा। वन्दना ने प्रयागराज के लिए।  मधु ने इन्दौर के लिए। हर तरफ़ आनन्द ही आनन्द। मासीजी और मीनू दिन भर आगे-पीछे ये खा लूँ, वो खा लूँ। 


जहाँ-जहाँ मैं रात रूका, सबने मेरा भरपूर ख़्याल रखा। मैं आत्मनिर्भर इंसान हूँ पर स्नेह के आगे झुकना पड़ा। नूतन और मीना ने मना करने पर भी मेरे शर्ट पर प्रेस की। अखरोट भिगोए। दही जमाया। 


सैलाना में रेखा की बनिस्बत ज़िन्दगी में पहली बार ड्रेगन फ़्रूट खाया। भोपाल में रेखा जी की बदौलत ज़िन्दगी में पहली बार पेशन फ़्रूट खाया। 


दिल्ली में अंकित सुबह पौने छ: पर मुझे स्टेशन लेने आया। भोपाल में सुबह पौने पाँच बजे रवि जी एवं रेखा जी मुझे स्टेशन लेने आए। मधु सपरिवार स्टेशन पर लेने और छोड़ने आई। बबली, जया और सुदर्श भी। 


अधिकांश जगह मैं सुबह गया और शाम वापस लौट आया। रात नहीं रूका। रात रूकने की योजना बनाई थी, दिल्ली में तरूण के यहाँ ( 21 सितम्बर), भोपाल में रवि जी एवं रेखा जी के यहाँ (23 और 24)। पीथमपुर में सुहानी के यहाँ (25, 26, 27, और 28)। रतलाम में बबली के यहाँ (29, 30, और 1, 4, 5, 10, 11, 12 अक्टूबर)। उदयपुर में राकेश के यहाँ (6)। प्रयागराज में मधु के यहाँ (8) । दिल्ली में मीनू के यहाँ (14 और 15)


उज्जैन से तराना जाने में वक्त लग गया। वापस रतलाम आने का कोई रास्ता न था। मैं बिना तैयारी के निकल गया था। रतलाम से निकलते वक्त लग रहा था कि रात को शायद वापस न आ पाऊँ। बबली ने कहा भी कि कुछ कपड़े साथ रख लो। मुझे ज़्यादा ताम-झाम साथ लेकर चलना पसन्द नहीं। सोचा जहाँ रूकूँगा वहीं से शर्ट ख़रीद लूँगा। भोपाल में भी दो शर्ट ख़रीदें थे। टी-शर्ट और शार्ट्स भी रात को सोने के लिए। टूथब्रश वग़ैरह तो हमेशा बैकपैक में रहते हैं, पानी की बोतल, तीन चार्जर और एक पॉवर पैक के साथ। 


2 अक्टूबर को तराना पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। बाज़ार भी बंद सा था। सो पंकज के कपड़े रात में पहने। दूसरे दिन उसका एक बढ़िया सा शर्ट पहनकर इन्दौर गया। एकदम फ़िट। अब वो मेरा हो गया है। दिया कुछ नहीं, ले ज़रूर आया। 


3 अक्टूबर को इन्दौर में भी संगीता ने बिलकुल नया शानदार शर्ट दिया। यह भी एकदम फ़िट। रात घनश्याम जी के यहाँ गुज़ारी। तीन दशक बाद मिलना हुआ। 


बहुत मिलना-जुलना हुआ। फिर भी मंदसौर और नागदा जाना रह गया। भोपाल दोबारा जाना था। नहीं जा पाया। प्रतापगढ़ भी छूट गया। पलवल भी जाना है। मुम्बई, सागर, लखनऊ, मैंगलोर और हैदराबाद का न्योता स्वीकार न सका। दिल्ली में कुछ लोगों से मिलना रह गया। 


शायद अगली बार। 


मम्मी की तेरहवीं सिएटल में की थी। सैलाना में जिस मंदिर को मम्मी ने बनवाया था, उस मन्दिर में सीमा ने भी तेरहवीं की थी। मैं भी चाहता था कि मेरी इस प्रथम यात्रा में कोई कार्यक्रम हो जाए। सीमा और पंडित जी से बात करने पर तय हुआ कि पितृ पक्ष की अमावस्या  के दिन एक हवन कर लिया जाए। उस दिन मम्मी को गुज़रे हुए दो महीने भी हो रहे थे। सो 6 अक्टूबर को वह कार्य सम्पन्न हुआ। 


जुलाई में सैलाना में बरसी करने का मन है। 


राहुल उपाध्याय । 17 अक्टूबर 2021 । शिकागो