Thursday, February 17, 2022

इंदीवर- 2

इंदीवर के जीवन में बहुत त्रासदी रही। और यह त्रासदी उनके गीतों में सकारात्मक रूप से झलकती है। 


उनकी शादी कम उम्र में ज़बरदस्ती कर दी गई थी। लिहाज़ा वे अपनी पत्नी से बहुत नाराज़ रहें। और पीछा छुड़ाने के लिए बम्बई गीत लिखने आ गए। गीत लिखें भी। पर चले नहीं। 


निराश होकर गाँव लौट गए। वहाँ पत्नी ने उनका स्वागत किया। दोनों क़रीब आए। पत्नी ने सलाह दी कि वे एक बार फिर बम्बई जाकर प्रयास करें। 


इस बार इंदीवर छा गए। वे वापस गए पत्नी को बम्बई साथ ले जाने के लिए। पत्नी ने इंकार कर दिया। तकरार हुई। वे टस से मस नहीं हुई। 


ये भी ज़िद कर बैठे कि मैं भी अब गाँव कभी नहीं आऊँगा।


न ये वापस गए। न वे कभी आईं। 


दोनों ने अलग-अलग अकेले जीवन बिताया। 


उनका यह मशहूर गीत उनकी अनूठी सकारात्मकता का परिचायक है। सौ से कम शब्दों में कितना कुछ कह गए जो कि आज भी हर किसी के दिल को छू जाता है। एक और अमर गीत उनकी कलम से। 


ज़िंदगी का सफ़र, है ये कैसा सफ़र

कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं

है ये कैसी डगर, चलते हैं सब मगर

कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं


ज़िंदगी को बहुत प्यार हमने किया

मौत से भी मुहब्बत निभायेंगे हम

रोते रोते ज़माने में आये मगर

हँसते हँसते ज़माने से जायेँगे हम

जायेँगे पर किधर, है किसे ये खबर

कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं


ऐसे जीवन भी हैं जो जिये ही नहीं

जिनको जीने से पहले ही मौत आ गई

फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं

जिनको खिलने से पहले फ़िज़ा खा गई

है परेशां नज़र, थक गये चाराग़र

कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं


राहुल उपाध्याय । 17 फ़रवरी 2022 । सिएटल 

https://youtu.be/Y9iWRDRxFDg





जीवन मिटाना है दीवानापन

जब मैंने यह गीत पहली बार सुना था तब मैं नवीं कक्षा में कलकत्ता में था। हमारे ऊपर हमारे मकान मालिक रहते थे। वे बंगाली थे। उनकी दो बेटियाँ थीं। उन्हें यह गाना बहुत पसन्द था। रिकार्डिं प्लेयर पर बजता ही रहता था। 


हमारे घर में आवाज़ ठीक से नहीं आती थी। मैं सीड़ियों पर बैठ सुना करता था। पेट ही नहीं भरता था। 


आज भी सिर्फ़ इस एक गीत को मैं घंटों लूप पर सुन सकता हूँ। 


आज इस गीत से जुड़े सारे मुख्य कलाकार दुनिया छोड़ चुके हैं। गीत अमर है। 


जीवन मिटाना है दीवानापन

कोई प्यार जीवन से प्यारा नहीं


सारे जहाँ की अमानत है ये

ये जीवन तुम्हारा तुम्हारा नहीं

जीने के लाखों सहारे यहाँ

बस एक ही तो सहारा नहीं


अगर कोई दुनिया से रूठे तो क्या

कोई फूल खिलते ही टूटे तो क्या

सितारे हज़ारों हैं आकाश पर

बस एक ही तो सितारा नहीं


किसी के इरादों के खातिर जियो

किसी की मुरादों के खातिर जियो

है यादों में जीना भी तो ज़िंदगी

जीना तुम्हें क्यों गवारा नहीं


कैसी उदासी ये कैसा है सोग

जीवन में आते हैं जाते हैं लोग

नया कोई साथी खड़ा राहों में

उसे प्यार से क्यों पुकारा नहीं


गीतकार: इंदीवर (1 जनवरी 1924 - 27 फ़रवरी 1997)

संगीतकार: बप्पी लाहिड़ी (27 नवम्बर 1952 - 15 फ़रवरी 2022)

गायक: किशोर कुमार (4 अगस्त 1929 - 13 अक्टूबर 1987)

अभिनेता: शम्मी कपूर (21 अक्टूबर 1931 - 14 अगस्त 2011)


राहुल उपाध्याय । 16 फ़रवरी 2022 । सिएटल 

https://youtu.be/SH5Q9PxINJc




Sunday, February 6, 2022

मम्मी की छ: माही

जितने भी लोग आज मम्मी की याद में एकत्रित हुए सब ने किसी न किसी काम में हाथ बँटाया। 


मैंने बहुत ही साधारण सा नियम रखा था। दिन में 12 से लेकर रात के दस बजे तक कभी भी कोई आ सकता है। बैठेंगे, बातें करेंगे, कुछ खा-पी लेंगे। 


भोजन भी साधारण, रोटी-सब्ज़ी, दाल-चावल, पापड़, आईसक्रीम। 


राहुल उपाध्याय । 6 फ़रवरी 2022 । सिएटल 




लता मंगेशकर

संयोग देखिए कि 6 फ़रवरी को मम्मी को गुज़रे हुए 6 महीने हो गए, और उसी दिन लता जी भी चल बसीं। 


मम्मी के अंतिम संस्कार में मेरे छोटे बेटे, मिहिर, ने कहा था कि यदि दादी नहीं होतीं तो हम अमेरिका तो क्या इस दुनिया में नहीं होते। 


हम कई बार भूल जाते हैं कि हमें यहाँ तक पहुँचाने में कितनों का योगदान है। हम बस यही सोचते हैं कि एक अच्छी कम्पनी में नौकरी मिलने से हमें ग्रीन कार्ड मिल गया। 


लता जी न होती तो हिन्दी फ़िल्म संगीत अवश्य अधूरा रहता। मैं तो अवश्य मैं न होता। साहिर के लब्ज़, आनन्द बक्षी के गीत, मजरूह की ग़ज़लें, और गुलज़ार की पेचीदा शायरी मेरे दिल में कैसे उतरती? न अमीन सायनी होते, न बिनाका गीतमाला होती

, न यश चोपड़ा की नायिकाएँ प्रेम करतीं, न राज कपूर की नायिका एक कमरें में बंद होती। 


लता जी के कई गीत मेरे बेहद प्रिय हैं। मैं किसी वीरान टापू पर उनके गीतों के सहारे एक जीवन बीता सकता हूँ। मैंने टेनेसी के स्मोकी माउंटेन्स की दिलकश खामोशी में लता की मधुर आवाज़ सुनी है। कार के स्पीकर्स से वादियों में घुलती आवाज़ आज भी मुझे एक मीठा दर्द दे जाती है। इस एक गीत ने मुझे प्यार की शक्ति से रू-ब-रू कराया। जब भी ख़ुद को कमज़ोर पाता हूँ, यह गीत सुन लेता हूँ। 


वो नक़्श ही क्या हुआ जो मिटाए से मिट गया

वो दर्द ही क्या हुआ जो दबाए से दब गया


https://youtu.be/nmJwIzRZh2E 


राहुल उपाध्याय । 6 फ़रवरी 2022 । सिएटल 


Saturday, February 5, 2022

वसंत बर्फ़

मेरा जन्म भारत में कर्क रेखा पर स्थित शिवगढ़, मध्य प्रदेश में हुआ। इसका अक्षांश 23 डिग्री और 26 मिनट उत्तर है। 


पिछले 17 वर्षों से मैं सिएटल में हूँ जो कि अमेरिका के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर है। कनाडा के समीप। इसका अक्षांश है 47 डिग्री और 36 मिनट उत्तर। 


यानी वसंत यहाँ 21 मार्च के आसपास आता है। सारे मौसम जैसे कैलेंडर देख कर चलते हो। 21 जून से गर्मी। 21 सितम्बर से पतझड़। 21 दिसम्बर से सर्दी। 


यानी हमारे यहाँ अभी सर्दी का माहौल है। आज 7 डिग्री तापमान है। 


तीन साल पहले, 2019,  आज के दिन अथाह बर्फ जमी हुई थी। हर खिड़की से साक्षात स्विट्ज़रलैंड का नज़ारा था। 


उस साल वसंत पंचमी 10 फ़रवरी को थी। 


राहुल उपाध्याय । 5 फ़रवरी 2022 । सिएटल 


Friday, January 28, 2022

भाषा

भाषा का समाज में, संविधान में, सरकार में क्या दर्जा है और इसके क्या दूरगामी परिणाम होते हैं यह जानना हो तो लंदन का आज का ताज़ा समाचार पढ़ लें। 


सांकेतिक भाषा यानी वह भाषा जो ज़बान से नहीं बल्कि हाथों के इशारे से बोली जाती है, उस भाषा को आज ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक बिल पारित कर उसे सरकार की और से मान्यता प्राप्त भाषा घोषित कर दिया गया। 


ब्रिटेन में सांकेतिक भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा 2003 में ही मिल गया था। लेकिन उससे वो लाभ नहीं मिल पा रहे थे जो कि अब मिलेंगे। 


ब्रिटेन के सरकारी अस्पतालों में मान्यता प्राप्त भाषा बोलने वाले मरीज़ों को यह अधिकार प्राप्त है कि वह एक इन्टरप्रेटर या दुभाषिये की सुविधा की माँग कर सकते हैं। और अस्पताल को यह सुविधा प्रदान करनी होती है। अब तक सांकेतिक भाषा बोलने वालों को किसी अपने सगे को या मित्र को साथ ले जाना पड़ता था। इससे मरीज़ को हिचकिचाहट होती थी। अपनी बीमारी के बारे में डॉक्टर से खुल कर बात नहीं कर पाते थे। इसी चक्कर में सही उपचार भी नहीं हो पाता था। 


अब यह समस्या दूर होगी। 


ऐसी और भी कई समस्याएँ होंगी जिनका हमें कोई अंदाज़ा नहीं है। 


लेकिन यह तो है कि यदि कोई जज़्बा हो तो सफलता अवश्य हाथ लगती है। 


यह जो सफलता आज मिली है इसके पीछे जज़्बा था एक ऐसे सांसद का जिनके माँ-बाप जन्म से बधिर हैं। 


राहुल उपाध्याय । 28 जनवरी 2022 । सिएटल 


Thursday, January 27, 2022

सुप्रीम कोर्ट

कई बार कई बातें इतनी साफ़ होते हुए भी समझ नहीं आतीं। और कई बार यह समझ में नहीं आता है कि जब सब बराबर है और संविधान में भी लिखा है कि सब बराबर है फिर यह क्यों सोचा जाता है कि अब तक कोई महिला अमेरिका की राष्ट्रपति क्यों नहीं बन सकी? और सब क्यों हाथ धो के पीछे पड़ जाते हैं कि इस बार तो बनना ही चाहिए। बहुत हो गया। जब तक ओबामा नहीं बनें, तब भी यह चर्चा का विषय था। जब कमला हैरिस उपराष्ट्रपति बनीं, तब फूलों की वर्षा की गई कि चलो यहाँ तक तो बात पहुँची। 


अब सुप्रीम कोर्ट के जज के पद पर इस तरह की चर्चा हो रही है। बाईडेन किसे जज बनाएँगे? सुनने में आया है कि जैसे उन्होंने उपराष्ट्रपति के लिए एक अश्वेत महिला का वादा किया था, और पूरा किया। वैसा ही कुछ जज के साथ भी होगा। 


क्यों? क्यों कोई किसी पद पर क़ाबिलियत के बल पर नहीं चुना जाता है? क्या कोटा भरना ज़रूरी है?


और एक और अजीब बात।  न सिर्फ़ लिंग और रंग देखा जाता है, बल्कि विचारधारा की और रूझान भी देखा जाता है। साफ़ शब्दों में कहूँ तो कांग्रेसी राष्ट्रपति कांग्रेसी जज को चुनेगा। भारतीय जनता पार्टी वाला अपना जज ढूँढेगा। और यह खुले आम होता है। ट्रम्प के शासनकाल के अंतिम महीनों में वे अपनी पसंद का जज बैठा कर चले गए। 


और एक और अजीब बात। जब कोई जज बन जाता है तो वो आजीवन उस पद पर आसीन रहता है। चाहे कुछ हो जाए। यदि 50 वर्षीय व्यक्ति को जज कोई बना दे तो अगले 40 साल तक वो आपके पक्ष में ही फ़ैसला लिखेगा। नौ जज होते हैं। एक भी कम-ज़्यादा हो जाए तो दूसरे पक्ष का पलड़ा भारी हो जाता है। 


अब जो भागा-दौड़ी हो रही है वह इसीलिए हो रही है कि एक जज साहब ने स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति का फ़ैसला ले लिया है। तो उस पद को अब भरना है। बाईडेन के लिए यह सुनहरा मौक़ा है। 


ट्रम्प के समय में जज साहिबा की मृत्यु हो गई थी। इसलिए उन्हें भी एक मौक़ा मिल गया था। 


है ना अजीबोग़रीब बातें। 


मैं तो सोचता था कि अमेरिका में पिछले 200 साल से लोकतंत्र है यहाँ तो सब आँख मूँद कर होता होगा। लेकिन नहीं। यहाँ भी कुछ बातें समझ से परे हैं। 


यहाँ किसी भी मसले को सड़क पर नहीं अदालत में हल किया जाता है। समलैंगिक विवाह की मान्यता भी अदालत से ही ली गई। स्वेच्छा से गर्भपात होना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय भी अदालत ही लेती है। मास्क पहनने चाहिए या नहीं, अदालत तय करती है। टीका लगाना है या नहीं, अदालत तय करती है।


इसीलिए जज की अहमियत यहाँ कई ज़्यादा है। 


जबकि जज को अपनी विचारधारा छोड़ क़ानून के मुताबिक़ फ़ैसला देना चाहिए। लेकिन नहीं। यहाँ विचारधारा ज़्यादा मायने रखते हैं। यदि जज गर्भपात के विरोध में है तो वह क़ानून की व्याख्या उसी सन्दर्भ में करेगा। क़ानून भी दूध का दूध और पानी का पानी नहीं करता। सब गड्डमड्ड होता रहता है। आज यह सही है तो कल यही ग़लत है। 


राहुल उपाध्याय । 27 जनवरी 2022 । सिएटल