Sunday, April 18, 2021

18 अप्रैल 2021

मेरे ऊपर एक नए दम्पति आए हैं। चन्द्र कला, और उसका पति। ढाई साल की बेटी भी है। 


जैसा कि मैं सबसे कहता हूँ, मैंने चन्द्र कला से भी कहा कि मेरे अपार्टमेंट का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। 24 घंटे। कभी ताला नहीं लगाया। सो जब चाहे आ जाना। मम्मी से भी मिल लेना। 


सब के अपने-अपने गुट होते हैं। उसका भी है। उसके जैसी ही किसी तीन साल की बच्ची की माँ। उसके साथ वो आसपास टहलने निकल जाती है। बाक़ी वक़्त बच्ची को नहलाने-धुलाने-खिलाने-सुलाने में निकल जाता है। किस के पास कभी कोई वक़्त बचता है किसी और को अपने से जोड़ने का? 


आज रविवार है। कल और आज, दो दिन, तापमान शिमला से लेकर कलकत्ता तक का हो गया। सुबह सात डिग्री, दोपहर 26 डिग्री। सिएटल में 26 होते ही त्राहि-त्राहि मच जाती है। ऐसे दिन साल में ले-दे कर सात-आठ ही होते हैं। इसलिए ज़्यादातर अपार्टमेंट में एयरकंडिशनर नहीं होता है। सेन्ट्रल हीटिंग तो अनिवार्य है और वह हर जगह होती है। एयरकंडिशनर हर दफ़्तर, मन्दिर, दुकान, बस, सिनेमाघर, पुस्तकालय में होता है। यानी हर सार्वजनिक स्थल पर। सो अधिकांश जनता किसी रमणीक जगह घूमने निकल जाती हैं या किसी सार्वजनिक स्थल को कूच कर जाती हैं। इन दिनों कोरोना के चक्कर में सारे सार्वजनिक स्थलों पर एकत्रित होना ठीक नहीं। 


सो चन्द्र कला का गुट आज भंग हो गया। या तो उसकी सहेली घर में व्यस्त है या बाहर घूमने-घामने गई है। चन्द्र कला का पति सो रहा था। सो वो बच्ची को लेकर मेरे यहाँ आ गई। 


कहने लगी घर पर ताला क्यों नहीं लगाते? मैंने सुना है यहाँ बहुत चोरी होती है। 


मैंने कहा कि चोरी कहाँ नहीं होती? खून ख़राबा कहाँ नहीं होता? एयरपोर्ट से आधी रात को टैक्सी में लूटपाट कहाँ नहीं हुई?


सब बुरे काम सब जगह होते हैं। फिर भी हम विश्वास करते है। ट्रेन में जब सहयात्री अपना भोजन साझा करता है तो उसका विश्वास करते हैं। 


विश्वास न हो तो दुनिया चल ही न पाए। 


वैसे भी मेरे घर में चोरी लायक़ कुछ भी नहीं है। जो है सब फ़्री का है। कोई ले जाएगा तो फ़्री में दूसरा आ जाएगा।


जो फ़्री की वस्तुएँ नहीं हैं उन्हें कोई नहीं ले जाएगा। मेरे फ़ोटो। मम्मी-बाऊजी  का कैनवास पर फ़ोटो। चम्मच। बर्तन। प्लेटें।  


मेरे पास बच्चों को बहलाने का कोई साधन नहीं है। टेबल टेनिस का शौक़ है। सो उसकी गेंद और पैडल है। बच्ची को गेंद दी। वह कुछ देर तक उलझी रही। फिर फ़्रीज़ पर चिपकने वाले चुम्बकीय अल्फाबेट्स दिए। उसे 26 में से 23 की पक्की पहचान है। चाहे आड़ा-तिरछा-घुमा-फिरा के कैसे भी पड़ा हो पहचान लेती है। रंग भी सारे पता हैं। 


भुने हुए चने दिए मुरमुरे के साथ। बैठकर एक-एक दाना शांति से खा गई। 


मैं खाने में सिर्फ़ सब्ज़ी और सलाद खाता हूँ। सलाद में खीरा-टमाटर-शिमला मिर्च-अवाकाडो-नींबू का रस लेता हूँ। काट कर बनाया। बच्ची है इसलिए शिमला मिर्च छोड़ दी। 


मुझे भरोसा नहीं था कि वो खाएगी। बड़े सलाद पसन्द नहीं करते हैं तो यह क्यों करेगी। 


चन्द्र कला भी लगातार शिकायत कर रही थी ये कुछ खाती नहीं है। आज सुबह दो घंटे तक लगी रही तब जाकर आधा डोसा खाया। न दाल खाती है, न चावल। दूध भी चम्मच से पीती है। वह भी तब जब हर घूँट में ब्रिटानिया बिस्किट का टुकड़ा हो। 


मैंने एक बोल में सलाद दिया चम्मच के साथ। वह ख़ुश हो कर खाने लगी। खाती ही रही। 


चन्द्र कला ने पुलाव बनाया था। मैंने कहा कि मैं कोई अनाज नहीं खाता। लेकिन कोई प्रेम से बनाता है तो मना भी नहीं करता। 


उसने कहा कि मैं लेकर आती हूँ। पति को बता भी दूँगी कि मैं यहाँ हूँ। 


मुझे लगा कि माँ के जाते ही बच्ची रोने लगेगी। 


लेकिन यह तो बहुत ख़ुश थी। 


हम दोनों एक दूसरे को देख-देख कर हँसते जा रहे थे। 


लग ही नहीं रहा था कि हम आज पहली बार मिले हैं। वह पहली बार इस अपार्टमेंट में आई है। पहली बार यह सलाद खा रही है। 


बाद में उसने माँ के हाथ का पुलाव भी खाया। मेरा बनाया दही भी। 


राहुल उपाध्याय । 18 अप्रैल 2021 । सिएटल 


Friday, April 16, 2021

मेरे घर आईं मेरी प्यारी माँ

15 मार्च 2019 को मम्मी, मेरे साथ, सिएटल आईं। 16 साल के अकाल के बाद मेघ बरसे थे। 


तब यह रचना लिखी थी। 


15 फ़रवरी से उनका खाना-पीना बंद था। खा कुछ पाती नहीं थीं। जो भी पीती थी वो उलट देती थी। 24 मार्च से अस्पताल में इलाज चल रहा था। 


खाने-पीने का मन न हो तो उसका कोई इलाज नहीं है। इन्श्योर एक पेय पदार्थ है जिसमें सारे पौष्टिक तत्व हैं। उसे घूँट-घूँट पिलाकर कमज़ोरी दूर करने का प्रयास कर रहा हूँ। 17 मार्च से बिस्तर से उठ नहीं पाई हैं। 


कल, 15 अप्रैल 2021, को मम्मी को अस्पताल से घर लाया। 


यह रचना फिर से याद आ गई। 


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मेरे घर आईं मेरी प्यारी माँ 

करके कई सरहदें पार


उनकी पूजा में सेवा का है भाव

उनके भजनों में प्रभु का है गान

भोग ऐसे कि जैसे हों मिष्ठान 

घण्टी बजे तो लगे छेड़े सितार 


उनके आने से मेरे जीवन को

मिल गया ध्येय, मिल गई है राह

देख-भाल कर के उनकी जी नहीं भरता

कर लूँ मैं चाहे कितनी बार


जिन्होंने रखा था कभी मेरा ख़याल 

उनका रखूँ मैं बन के मशाल

ढाल उनकी मैं, मैं उनका साथी हूँ

साथ उनके हूँ सातों वार


पूछा उनसे कि पहले क्यों नहीं आईं

हँस के बोलीं कि मैं हूँ तेरा प्यार

मैं तेरे दिल में थी हमेशा से

घर में आई हूँ आज पहली बार


(साहिर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 20 अप्रैल 2019 । सिएटल

https://mere--words.blogspot.com/2019/04/blog-post_60.html 


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राहुल उपाध्याय । 16 अप्रैल 2021 । सिएटल 




Thursday, April 15, 2021

हसरत जयपुरी

आज, 15 अप्रैल, के दिन हसरत जयपुरी का जन्म 1922 में जयपुर में इक़बाल हुसैन के नाम से हुआ था। उनके गीतों से हिन्दी फ़िल्मों के प्रेमी सुपरिचित हैं। 


आज मुझे 13 वर्ष पूर्व लिखा यह प्रतिगीत याद आ गया। 


तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे

हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे

जब कभी भी पढ़ोगे कविताएँ मेरी

सच देख कर तुम बिलबिलाओगे

हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे


वो एन-आर-आई, वो ईश्वर की बातें

जिनमें कोसे थे रिसते रिश्ते नाते

उन कविताओं की याद आएगी

जब ख़्यालों में मुझको लाओगे

हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे


मैं कविताओं में तुमको लिखता था

जब भी तुमको मनाना होता था

और सहारा लेता था प्रतिगीत का

वो नगमे किस तरह भुलाओगे

हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे


मुझको पढ़े बिना क़रार न था

एक ऐसा भी दौर गुज़रा है

झूठ मानो तो देख लो आँकड़े 

मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे

हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे


राहुल उपाध्याय । 2 सितम्बर 2008 । सिएटल

(हसरत जयपुरी से क्षमायाचना सहित)


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राहुल उपाध्याय । 15 अप्रैल 2021 । सिएटल




Wednesday, April 14, 2021

रामचरितमानस भाग 3

तीसरे भाग में प्रस्तुत हैं बालकाण्ड के बाक़ी के वे दोहे - जिन्होंने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया:


241.2 में राम-लक्ष्मण सीता स्वयंवर की सभा में उपस्थित हैं और उन्हें देखकर सब क्या सोच रहे हैं, इसे व्यक्त करने के लिए गोस्वामीजी ने यह लिखा:


जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥2॥

भावार्थ:-जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥2॥ 

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246.3 में सीता जी को सबसे श्रेष्ठ बतलाने के लिए गोस्वामी जी कमाल की सृजनात्मकता दिखाते हैं। सरस्वती जी में भी ख़ामी ढूँढ ली। 


गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥

बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥3॥

भावार्थ:-(पृथ्वी की स्त्रियों की तो बात ही क्या, देवताओं की स्त्रियों को भी यदि देखा जाए तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुंदर हैं, तो उनमें) सरस्वती तो बहुत बोलने वाली हैं, पार्वती अंर्द्धांगिनी हैं (अर्थात अर्ध-नारीनटेश्वर के रूप में उनका आधा ही अंग स्त्री का है, शेष आधा अंग पुरुष-शिवजी का है), कामदेव की स्त्री रति पति को बिना शरीर का (अनंग) जानकर बहुत दुःखी रहती है और जिनके विष और मद्य-जैसे (समुद्र से उत्पन्न होने के नाते) प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मी के समान तो जानकीजी को कहा ही कैसे जाए॥3॥

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259.3 में सीताजी के मन में यह विश्वास जगाया कि:


जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥3॥

भावार्थ:- जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥3॥ 


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282.4 में पोद्दार जी परशुराम के नौ गुणों के नाम बताते हैं। 


देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥

सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥4॥

भावार्थ:-हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र (शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता ये) नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए॥4॥


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317.1 में आश्चर्य होता है कि राम कभी घोड़े पर सवार हुए थे। किसी चित्रकार ने ऐसा कोई चित्र नहीं बनाया। एक और जानकारी मिली कि शिवजी के तीन नहीं पन्द्रह नेत्र हैं। 


जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥

संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥1॥


भावार्थ:-जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्री रामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्री रामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे॥1॥


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317.2 और 317.3 में पता चलता है कि ब्रह्मा जी को 8 नेत्र भी कम पड़ रहे हैं राम जी के रूप को निहारने के लिए। स्वामी कार्तिक के 12 नेत्र हैं। इन्द्र के एक हज़ार। 


हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥

निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥2॥


भावार्थ:-भगवान विष्णु ने जब प्रेम सहित श्री राम को देखा, तब वे (रमणीयता की मूर्ति) श्री लक्ष्मीजी के पति श्री लक्ष्मीजी सहित मोहित हो गए। श्री रामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे॥2॥


* सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥

रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥3॥


भावार्थ:-देवताओं के सेनापति स्वामि कार्तिक के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से ड्योढ़े अर्थात बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुंदर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र (अपने हजार नेत्रों से) श्री रामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं॥3॥


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329.1 में पता चला कि भोजन के पहले पाँच कौर पाँच मंत्रों के उच्चारण के साथ खाए जाते हैं। 

* पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।

भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥1॥


भावार्थ:-सब लोग पंचकौर करके (अर्थात 'प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा' इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर) भोजन करने लगे। गाली का गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गए। अनेकों तरह के अमृत के समान (स्वादिष्ट) पकवान परसे गए, जिनका बखान नहीं हो सकता॥1॥


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329.2 में जानकारी मिली की दावत में चार प्रकार के भोजन होने चाहिए। 


परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥

चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥2॥


भावार्थ:-चतुर रसोइए नाना प्रकार के व्यंजन परसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकार के (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीना-खाने योग्य) भोजन की विधि कही गई है, उनमें से एक-एक विधि के इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥2॥


राहुल उपाध्याय । 14 अप्रैल 2021 । सिएटल 



Monday, April 12, 2021

हिन्दू नववर्ष?

कितनी हास्यास्पद बात है कि जो भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का डंका बजा रहे हैं उन्हें साथ में 13 अप्रैल 2021 भी लिखना पड़ रहा है। 


कब है रामनवमी? वह भी ग्रिगोरियन कैलेंडर से ही समझ आता है। 21 अप्रैल 2021। कह के देख लो किसी को कि चैत्र शुक्ल नवमी को। वो समझेगा आप मज़ाक़ कर रहे हैं। कब है दीवाली? कह के देखो कार्तिक कृष्ण अमावस्या। 


क्यों हम नाहक अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करते रहते हैं? झूठी शान से क्या हासिल?


कोई हिन्दू नववर्ष कह रहा है। कोई भारतीय नववर्ष। क्या सिर्फ़ नववर्ष से काम नहीं चल सकता? 1 जनवरी को कौन कहता है अंग्रेज़ी नववर्ष या ईसाई नववर्ष?


जब हम कोई विशेषण जोड़ देते हैं तभी कमज़ोर पड़ जाते हैं। 


राहुल उपाध्याय । 12 अप्रैल 2021 । सिएटल 





Friday, April 2, 2021

28 मार्च 2021

कैसी होली? कहाँ की होली?


होली जो बचपन में ही हो ली? 


होली का अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी भाग में होना, न होना बराबर है। फिर भी इंसान का क्या, वो तो जंगल में भी मंगल मना लेता है। गुरूकुल, एक स्थायी संस्था है, जो स्कूल सत्र के दौरान, हर रविवार को दो घंटे के लिए हिन्दी पढ़ना-लिखना सीखाती है। वह होली जून में मनाती है। तब अच्छी ख़ासी गर्मी हो जाती है। एकाध दिन एयरकंडिशनर चलाने का मौक़ा भी मिल जाता है। सिएटल शहर स्वत: वातानुकूलित है। पूरे विश्व में इससे बेहतर कोई शहर नहीं जहाँ इससे बेहतर मौसम हो, रोज़गार हो और शिक्षण संस्थान हो। कोई आश्चर्य नहीं कि विश्व के सबसे अधिक धनवान व्यक्तियों में से दो - बिल गेट्स और जेफ़ बेज़ोस, इसी शहर के निवासी हैं। 


अब यहाँ भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या बढ़ने लगी है। लिहाज़ा भारतीय परचूनी सामान की दुकानें भी बढ़ रही हैं। उन दुकानों में घुसते ही तीज-त्योहार आप पर टूट पड़ता है। इधर रंगों से बचो तो उधर ठंडाई पीछा करती है। उससे पीछा छुड़ाओ तो मिष्ठान गले पड़ जाते हैं। 


सो चाहे-अनचाहे बेमन से सूखे रंगों और बासी पकवानों के साथ परदेस में होली मन ही जाती है। 


आज का रविवारीय सामूहिक प्रात: भ्रमण मैंने अस्पताल के पास ही तय किया जहाँ पिछले चार दिन से मम्मी भर्ती है। वे क़रीब चालीस दिनों से कुछ खा नहीं रही है। कहती हैं इच्छा नहीं है। मुँह का निवाला मुँह में रह जाता है। उतरता नहीं। जूस पिलाओ तो उल्टी। 


हार कर 5 मार्च को इमरजेंसी वार्ड में ले गया। वहाँ दिमाग़, दिल, फेफड़े, गुर्दे, रक्तचाप, इकेजी सब सामान्य पाए गए सो घर लौटा दिए गए। 25 मार्च को गले में कैमरा डाल कर देखने पर पता चला कि खाने की नली में फ़ंगस है। पेट में अल्सर है। इसीलिए भर्ती है। 


होली कब होती है यह भी कुछ समझ नहीं आता। एक तो वैसे ही भारत और अमेरिका के दिन अलग होते हैं। यहाँ रवि तो वहाँ सोम। फिर दहन का एक दिन, रंग का अलग। दहन पहले यहाँ नहीं होता था। ज़्यादातर घर लकड़ी के हैं। जल कर राख होने का ख़तरा रहता है। प्रह्लाद बच सकते हैं। इमारतें नहीं। 


जनसंख्या बढ़ी सो मन्दिर भी बढ़े। मेरे ही घर के क़रीब 16 मन्दिर हैं। सबको अपनी अलग धाक जमानी होती है। कोई गणेश पूजा के झंडे गाड़ता है। कोई जन्माष्टमी के। कोई अखंड रामायण के। 


होलिका दहन भी प्रतिस्पर्धा में शामिल है। पिछले साल मम्मी और मैं गए थे। निकट के ही मन्दिर में। तब तक कोरोना के प्रकोप से मेरा दफ़्तर बन्द हो चुका था। घर से काम करने की हिदायत थी। मन्दिर प्रबंधकों ने तब तक कोई निर्णय नहीं लिया था। होली के बाद मन्दिर भी बन्द हो गए थे। 


अब खुल गए हैं। होलिका दहन भी हुआ। हम नहीं गए। मम्मी कहीं जाने-आने की स्थिति में नहीं हैं। होतीं तो भी नहीं जाते कोरोना की वजह से। 


भ्रमण की शुरुआत अस्पताल से एक मील की दूरी पर ही हुई। सब साथियों को आगाह किया कि मैं अस्पताल में मम्मी के साथ दिन-रात गुज़ार रहा हूँ। ताकि कोई आपत्ति हो तो बता दो। मुझसे दूरी बनाए रखना। 


हमेशा की तरह बहुत खूबसूरत नज़ारे देखे। सिएटल एक बन्दरगाह है। जहाँ एवर गिवन जैसे जहाज़ आते हैं। उनसे उतारे गए माल वाले डब्बे मालगाड़ी द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में वितरित किए जाते हैं। 


पटरियाँ समुद्री तट पर हैं। बहुत मनोरम दृश्य रहा रेल के डिब्बों का लहरों के साथ ताल से ताल मिलाकर एक ही दिशा में आने का।


भ्रमण के दौरान कई विषयों पर संवाद होता है। पता चला कि शोभित की धर्मपत्नी अर्चना विधिवत रूप से होली के उपलक्ष्य में पकवान बना रही हैं। मुझे डायबीटीज़ है। फिर भी लालच बुरी बला। स्वयं ने प्रस्ताव रखा और धमक गया रसास्वाद करने। दही-बड़ा, गुझिया, रसगुल्ला और छोले-मटर खा कर तृप्त हुआ। 


असली पार्टी सोमवार, 29 मार्च, को थी। 


https://youtu.be/RDTy_GMdrY4 


राहुल उपाध्याय । 2 अप्रैल 2021 । सिएटल 







Thursday, April 1, 2021

जयदेव की आवाज़ में

https://youtu.be/MKR2FrPEqhw 


मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया


देव आनन्द की फिल्म 'हम दोनों' के सारे गीत अमर हैं। साहिर के शब्द और जयदेव की धुनों का वह जादू है कि ये आज भी तरोताज़ा लगते हैं। 


इस ग़ज़ल की बहर, रदीफ, क़ाफ़िया इतने कमाल की है कि हर शेर का अपना आनन्द है। साहिर ने दो-चार अशआर और जोड़े थे जो फिल्म में नहीं हैं। 


वो रफ़्ता-रफ़्ता जाम पिलाते चले गए

मैं रफ़्ता-रफ़्ता होश में आता चला गया


नक़्श-ओ-निगार-ए-ज़िश्त बनाने का शौक था 

नक़्श-ओ-निगार-ए-ज़िश्त बनाता चला गया


दुनिया मेरी ख़ुशी को बहुत घूरती रही

मैं ज़िन्दगी का गीत सुनाता चला गया


मैं गर्दिशों से जाम लड़ाता चला गया

हँसता-हँसाता-पीता-पिलाता चला गया


इन अतिरिक्त अशआर को जयदेव की आवाज़ में यहाँ सुनें। 


कुछ लोग कहते हैं ये साहिर की आवाज़ है। यह साहिर की आवाज़ नहीं है। मैंने उनकी नज़्म - चलो एक बार फिर से - साहिर की आवाज़ में सुनी है। यह आवाज़ वो आवाज़ नहीं है। 


राहुल उपाध्याय । 1 अप्रैल 2021 । सिएटल 

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ज़िश्त = जीवन

निगार = सुन्दर